तुलसीदास जी से पूछा गया कि आप किसको कथा सुना रहे हैं ? वे बोले कि भाई ! मैं अपने मन को सुना रहा हूँ । तब तो महाराज ! आपका मन बड़ा ऊँचा होगा, जिसको आप प्रभु की कथा सुना रहे हैं ? बोले कि नहीं, मेरे मन का एक ही विशेषण है । क्या ? मेरा मन बड़ा दुष्ट है । शंकरजी ने सुना तो आश्चर्य चकित हो गये । उन्होंने रोक लगा दी थी, दुष्ट को मत सुनाना । उन्होंने सोचा कि मैंनें दुष्टों को सुनाने पर रोक लगायी और इस दुष्ट ने दुष्ट मन को ही श्रोता बनाया, पर गोस्वामीजी का अभिप्राय यह है कि महाराज ! आप कैलाश शिखर की ऊँचाई पर रहते हैं, वहाँ तो दुष्ट जा ही नहीं सकेगा । हम जिस मनोभूमि में रहते हैं, वहाँ तो दुष्टता ही दुष्टता है । इस दुष्टता की मनोभूमि में अगर हम दुष्ट मन को कथा से वंचित करेंगे, तब तो फिर यह शिष्ट बन ही नहीं पायेगा, इसलिए कृपा कीजिए, गंगा जब ऊपर से नीचे आयेंगी, तभी तो इन दुष्टों की दुष्टता दूर होगी ।
Saturday, 3 March 2018
Friday, 2 March 2018
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
गोस्वामीजी विनयपत्रिका में प्रभु की कृपा का वर्णन करते हैं कि भगवान कितने उदार हैं, क्षमाशील हैं, इसका पूरा वर्णन करते हैं और अन्त में वे सम्बोधित किसे करते हैं, सुना किसे रहे हैं ? रामायण के पहले कथावाचक के यहाँ सबसे कम भीड़ थी या उसके अन्तिम कथावाचक के यहाँ ? रामकथा के प्रथम वक्ता तो शंकरजी हैं, उनके यहाँ तो कथा सुननेवाले के लिए पात्रता की इतनी कठिन कसौटी थी कि स्वयं शंकरजी के गणों को भी वहाँ आकर कथा सुनने का अधिकार नहीं दिया गया । इतनी अधिक मर्यादा जिस कथा की है, वह समझ लें कि कितनी दुर्लभ है । कथा की दुर्लभता का जो स्वरूप है, वह शंकरजी के चरित्र में दिखाई देता है, जहाँ शंकरजी स्वयं एक ही वक्ता और पार्वतीजी एक ही श्रोता हैं । भगवान शंकर प्रथम वक्ता हैं और अन्तिम वक्ता गोस्वामीजी हैं । शंकरजी के यहाँ तो कम-से-कम एक श्रोता दिखाई भी पड़ा, पर गोस्वामीजी के यहाँ कोई श्रोता नहीं है, अकेले बैठे हुए गुनगुना रहे हैं । किसी ने पूछा कि महाराज ! किसे सुना रहे हैं ? गोस्वामीजी ने कहा कि भाई, एक श्रोता तो है । कहाँ है ? वे बोले कि बाहर नहीं भीतर है । बोले कि भाई ! मैं अपने मन को सुना रहा हूँ ।
Thursday, 1 March 2018
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....
रामायण में पार्वतीजी ने भगवान शंकर से कहा कि आप ईश्वर के स्वभाव का अधिक वर्णन न किया करें । क्यों ? बोलीं कि महाराज ! ईश्वर का स्वभाव सुनकर तो लोगों को मनमानी करने की ईच्छा होगी । लोग अगर सुन लेंगे कि ईश्वर तो बड़ा उदार है, क्षमाशील है, वे जीव के अपराध कभी देखते ही नहीं, तो वे यही समझेंगे कि फिर तो हमें सब कुछ करने की छूट है । इस पर भगवान शंकर ने कहा कि पार्वती ! भगवान के स्वभाव का वर्णन व्यक्ति को पाप करने की प्रेरणा देने के लिए नहीं है । तो फिर किसलिए है ? शंकरजी ने सूत्र देते हुए कहा कि भगवान के स्वभाव का वर्णन करने पर भी भला कितने लोग उनके स्वभाव को जान पाते हैं ? बिरले ही कोई जान पाते हैं और जो जान लेते हैं, उसकी कसौटी क्या है ? भगवान के स्वभाव को जान लेने पर तो जीव ऐसा कृतज्ञ हो जाता है कि उसे भगवान का भजन छोड़कर कुछ अच्छा ही नहीं लगता ।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....
चाहे हम यह मान लें कि ईश्वर डरानेवाला है, या यह मान लें कि ईश्वर अभय देने वाला है । जब उनकी कृपा पर दृष्टि जाती है, उनके स्वभाव पर दृष्टि जाती है, तो यही लगता है कि ईश्वर तो जीवन को निर्भय बनाने वाले हैं और जब जीव ईश्वर की महिमा और अपनी कमियों पर दृष्टि डालता है, वह डर के मारे काँपने लगता है । ऐसी स्थिति में मुख्य बात यह है कि हमारे अन्तःकरण में अगर भय से सद्भाव आये या अभय से आये, ये दोनों ही वृत्तियाँ उपयोगी हैं ।