रामचरितमानस में भगवान राम ने हनुमानजी से कहा - तुम मुझे लक्ष्मण से दुगुने प्रिय हो । यद्यपि हनुमानजी ने उसे उस अर्थ में नहीं लिया कि मैं लक्ष्मणजी दुगुना श्रेष्ठ हूँ, परन्तु दूसरी दृष्टि से विचार करके देखें तो हनुमानजी का स्थान श्रेष्ठ है । कैसे ? रामायण में दोनों अनन्य भक्त हैं, हनुमानजी और लक्ष्मणजी । पर दोनों की अनन्यता में भेद है । हमारे भक्ति ग्रन्थों में अनन्यता की दो प्रकार से व्याख्या की गयी है - एक भेदमूलक अनन्यता और दूसरी अभेदमूलक अनन्यता । भेदमूलक अनन्यता के प्रतीक लक्ष्मणजी हैं । विनयपत्रिका में गोस्वामीजी कहते हैं - लक्ष्मणजी रामरुपी श्यामघन के चतुर चातक हैं । श्रीराम को छोड़ किसी पर भी उनकी आस्था नहीं है । पर रामायण में अनन्यता का दूसरा रूप भी बताया गया है और वह है अद्वैतमूलक अनन्यता । इस अनन्यता का उपदेश भगवान राम ने हनुमान को दिया । हनुमानजी ने कहा - महाराज ! मैं तो जानता ही नहीं कि भजन कैसे करना चाहिए । सुनकर भगवान राम बोले - अगर तुम मेरा भजन करना चाहते हो तो तुम्हें यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए -
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत ।
मैं सेवक सचराचर रुप स्वामि भगवंत ।।
- मैं सेवक हूँ और सारा ब्रह्मांड ही मेरे प्रभु का रूप है, ऐसा समझ कर अपने ही प्रभु को सर्वत्र देखना, यह मेरी अनन्य भक्ति है । हनुमानजी और लक्ष्मणजी में अन्तर यही है कि लक्ष्मणजी भगवान में ही भगवान की सेवा कर सकते हैं, अन्यत्र नहीं । और हनुमानजी को भगवान ने बताया कि तुम्हारी अनन्यता यह है कि सारे संसार में मुझे देखकर सबकी सेवा करना ।
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत ।
मैं सेवक सचराचर रुप स्वामि भगवंत ।।
- मैं सेवक हूँ और सारा ब्रह्मांड ही मेरे प्रभु का रूप है, ऐसा समझ कर अपने ही प्रभु को सर्वत्र देखना, यह मेरी अनन्य भक्ति है । हनुमानजी और लक्ष्मणजी में अन्तर यही है कि लक्ष्मणजी भगवान में ही भगवान की सेवा कर सकते हैं, अन्यत्र नहीं । और हनुमानजी को भगवान ने बताया कि तुम्हारी अनन्यता यह है कि सारे संसार में मुझे देखकर सबकी सेवा करना ।