Monday, 31 October 2016

ययुग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामचरितमानस में भगवान राम ने हनुमानजी से कहा - तुम मुझे लक्ष्मण से दुगुने प्रिय हो । यद्यपि हनुमानजी ने उसे उस अर्थ में नहीं लिया कि मैं लक्ष्मणजी दुगुना श्रेष्ठ हूँ, परन्तु दूसरी दृष्टि से विचार करके देखें तो हनुमानजी का स्थान श्रेष्ठ है । कैसे ? रामायण में दोनों अनन्य भक्त हैं, हनुमानजी और लक्ष्मणजी । पर दोनों की अनन्यता में भेद है । हमारे भक्ति ग्रन्थों में अनन्यता की दो प्रकार से व्याख्या की गयी है - एक भेदमूलक अनन्यता और दूसरी अभेदमूलक अनन्यता । भेदमूलक अनन्यता के प्रतीक लक्ष्मणजी हैं । विनयपत्रिका में गोस्वामीजी कहते हैं - लक्ष्मणजी रामरुपी श्यामघन के चतुर चातक हैं । श्रीराम को छोड़ किसी पर भी उनकी आस्था नहीं है । पर रामायण में अनन्यता का दूसरा रूप भी बताया गया है और वह है अद्वैतमूलक अनन्यता । इस अनन्यता का उपदेश भगवान राम ने हनुमान को दिया । हनुमानजी ने कहा - महाराज ! मैं तो जानता ही नहीं कि भजन कैसे करना चाहिए । सुनकर भगवान राम बोले - अगर तुम मेरा भजन करना चाहते हो तो तुम्हें यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए -
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत ।
मैं सेवक सचराचर रुप स्वामि भगवंत ।।
- मैं सेवक हूँ और सारा ब्रह्मांड ही मेरे प्रभु का रूप है, ऐसा समझ कर अपने ही प्रभु को सर्वत्र देखना, यह मेरी अनन्य भक्ति है । हनुमानजी और लक्ष्मणजी में अन्तर यही है कि लक्ष्मणजी भगवान में ही भगवान की सेवा कर सकते हैं, अन्यत्र नहीं । और हनुमानजी को भगवान ने बताया कि तुम्हारी अनन्यता यह है कि सारे संसार में मुझे देखकर सबकी सेवा करना ।

Sunday, 30 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गुरु वसिष्ठ और श्रीभरत के दर्शन में बड़ा अन्तर है । गुरु वसिष्ठ कहते हैं - पिता ने तुम्हें राज्य दिया है, तुम राज्य लेने के बाद अगर इसे नहीं रखना चाहते, तो तुम्हें अधिकार है कि तुम इसे किसी दूसरे को दे सकते हो । अभी तुम राज्य ले लो और चौदह बरस बाद जब राम आएँ, तब उन्हें दे देना । पर श्रीभरत ने क्रम को उलट दिया । मानवीय दृष्टि से व्यक्ति में ऐसी दुर्बलता आती है कि एक बार राज्य भोग कर लेने के बाद उसे लौटा देने की स्थिति आए, तो हो सकता है कि व्यक्ति उसमें उलझ जाए । लेकिन भरतजी तो इस दुर्बलता से न केवल मुक्त हैं, बल्कि वे इससे भी बहुत उन्नत हैं । वह इस प्रकार कि जैसे कोई पहले कीचड़ लगा ले और फिर उसे धोए । श्रीभरत का अभिप्राय यह है कि पहले मैं अपने आपको राज्य का स्वामी मानूँ और अपने को स्वामी मान कर राज्य दूसरे को दूँ ? अगर भोगवृत्ति आ जाय तो मैं राज्य न दूँ, और भोगवृत्ति न आए तो राज्य दे दूँ ? तो देने के पश्चात मेरे अन्तःकरण में देने - दान करने - का गर्व होगा या नहीं ? क्या मेरे अन्तःकरण में यह वृत्ति नहीं आएगी कि मैंने इतना बड़ा राज्य राम को दे दिया ? यदि मैं भी अभी राज्य ग्रहण करुँ तो ममताग्रस्त होऊँगा और बाद में जब राज्य दूँगा तो अहंताग्रस्त होऊँगा । तो ऐसी परिस्थिति में सबसे अच्छा यह है कि अहंता और ममता, दोनों को प्रभु के चरणों में अर्पित कर दें और इसीलिए उन्होंने अहंता और ममता को सचमुच चित्रकूट में श्रीराम के चरणों में अर्पित कर दिया । और चित्रकूट से वे क्या लेकर लौटे ? वही, जिससे न अहंता रहे और न ममता । भगवान राम ने कह दिया - भरत, तुम्हें तो लौटकर राज्य चलाना है, प्रजा की, समाज की सेवा करनी है ।

Saturday, 29 October 2016

ययुग तुउसी श्री रामकिंकर उवाच ......

चित्रकूट का लक्षण क्या है ? जब श्रीभरत सारे समाज को लेकर चित्रकूट पहुँचे,  तब सारे लोग अन्तः और बाह्य रोगों से ग्रस्त हैं । वे सब चित्रकूट पहुँचकर क्या देखते हैं ? गोस्वामीजी कहते हैं - अन्न के अभाव में भयभीत और दुखी, त्रिविध तापों से त्रस्त, क्रूर ग्रहों तथा महामारी से पीड़ित प्रजा जैसे किसी उत्तम देश और उत्तम राज्य में जाकर सुखी हो जाती है, श्रीभरत चित्रकूट पहुँचकर वैसे ही प्रसन्न हो जाते हैं । और वहाँ श्रीराम के निवास से वन की सम्पदा ऐसी सुशोभित हो रही है, जैसे अच्छे राजा को पाकर प्रजा सुखी हो जाती है । सुहावना वन ही पवित्र देश है, विवेक उसका राजा और वैराग्य मन्त्री है । ये ही चित्रकूट के लक्षण हैं । सद्गुण जहाँ सैनिक हैं और सुमति तथा शान्ति जहाँ की रानियाँ हैं । और यह चित्रकूट का राज्य बना कब ? सद्गुण के सिपाही जीवन में कब आए ? - मोहरुपी राजा को सेना सहित जीतकर विवेकरुपी राजा निष्कण्टक राज्य कर रहा है । उसके नगर में सुख, सम्पत्ति और सुकाल है । जहाँ पर मोह की पराजय हो चुकी है । श्रीभरत ने अयोध्या के लोगों को दिखा दिया कि जब तक सारा समाज मोह से ग्रस्त रहेगा तब तक वह जो सेवा करेगा, उस सेवा में कुसेवा मिली ही रहेगी । श्रीभरत का अभिप्राय यह है कि इस मोह के विनाश हेतु हमें ईश्वर के सम्मुख होना आवश्यक है ।

Friday, 28 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

श्रीभरत अयोध्या के समस्त नर-नारियों को लेकर चित्रकूट क्यों जाते हैं ? यही चिकित्सा है । श्रीभरत कहते हैं, पहले चित्रकूट चलिए । अयोध्या के समस्त नर-नारियों को, सभी सम्प्रदाय के लोगों को निमन्त्रण देते हैं । भरतजी सब लोगों को लेकर चित्रकूट जाते हैं तो कुछ लोगों को वे हाथी पर बिठा देते हैं, कुछ लोगों को घोड़े पर, कुछ को रथ पर, कुछ को पालकी पर और कुछ  लोग पैदल ही चलते हैं । संक्षेप में इसका अभिप्राय यह है कि हर व्यक्ति एक समान योग्यता और संस्कार का नहीं होता । चलना तो सबको ईश्वर की ओर है । पहुँचना तो सबको चित्रकूट है । जब तक चित्रकूट नहीं पहुँचेंगे, तब तक रोग दूर नहीं होगा । चित्त के संस्कार से ही रोग उद्भूत होता है । चित्रकूट जाने का अर्थ यह है कि अहंकार का त्याग करके मन और बुद्धि को साथ लिये चित्त के राज्य में प्रवेश करें और भगवान का साक्षात्कार करें ।

Thursday, 27 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

सेवा सबसे उत्तम वस्तु है, लेकिन मान लीजिए कोई संक्रामक रोग से ग्रस्त है और भाषण में सेवा की महिमा सुनकर उसके मन में उत्साह उमड़ पड़े कि वह तो लोगों की सेवा करेंगे, तो इसका परिणाम क्या होगा ? उससे पूछा गया कि क्या सेवा करोगे ? बोले, हम प्यासों को जल पिलाएँगे । जल पिलाना, तृप्ति देना एक बहुत बड़ी सेवा है, पर जब तपेदिक का रोगी कोई व्यक्ति प्यासों को जल पिलाएगा तो प्यासे लोग पानी तो वहाँ पी लेंगे, परन्तु यह क्या सच्चे अर्थों में सेवा है ? आपात दृष्टि से तो लगेगा कि जल पिलाने से प्यासे व्यक्ति की प्यास मिट गई, पर जब वह जल पिलाएगा, तो जल के साथ-साथ वह अपना रोगाणु भी तो पिलाएगा । और तब इसका परिणाम क्या होगा ? कुछ दिनों बाद बेचारे जिन लोगों ने उसके हाथ से जल पिया है, वे रोगी हो जाएँगे । यह कर्म तो सेवा के समान दिखाई देते हुए भी सेवा नहीं कुछ और है । अनर्थकारी है । भरतजी का अभिप्राय यह है कि जो स्वयं रोगी है, सच्चे अर्थों में दूसरों की सेवा नहीं कर सकता । वे समाज से यही पूछते हैं - आप किससे सुख पाना चाहते हैं मुझसे ? फिर विनम्रतापूर्वक कहा - आप लोग भी अस्वस्थ हैं और मैं भी । श्रीभरत ने नाड़ी पकड़ कर रोग का निदान कर लिया और देखा कि सब रोगी हो रहे हैं । यहाँ तक कि गुरु वसिष्ठ, जो स्वयं वैद्य हैं, रोगी हो रहे हैं । वैद्य भी कभी-कभी रोगी हो जाया करते हैं । श्रीभरत कहते हैं कि अगर आप लोगों को तथा गुरुदेव वसिष्ठजी को मेरा राज्य स्वीकार कर लेना ही उचित प्रतीत हो रहा हो तो मैं यही समझता हूँ आप सभी मोहग्रस्त हैं । और तब उन्होंने उनकी चिकित्सा की । वे पूरे समाज को लेकर चित्रकूट जाते हैं ।

Wednesday, 26 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

श्रीभरतजी चित्रकूट की यात्रा में कैकेयी को भी साथ लेकर चलते हैं । कैकेयी को साथ ले जाने का क्या तात्पर्य है ? सारी समस्याओं की सृष्टि तथा राम को जीवन से दूर करने की चेष्टा जिन्होंने की, रामाज्ञा में गोस्वामीजी ने उन्हें कलि का प्रतीक बताया, 'कलहरूप कलि कैकेयी' । और इसका अभिप्राय यह है कि कैकेयीजी तब भले ही त्रेतायुग में निवास कर रही हो, पर उस समय वे कलि के समस्त लक्षणों से आक्रांत थीं । और तब श्रीभरत क्या करते हैं ? वे सारे समाज को लेकर चित्रकूट जाते हैं और साथ ही साथ कैकेयी को भी ले जाते हैं । इसके पीछे श्रीभरत का उद्देश्य क्या है ? गुरु वशिष्ठ ने उनसे कहा कि तुम प्रजा की, समाज की सेवा करो । पर उन्होंने गुरु वसिष्ठ के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया । बात बड़ी मनोवैज्ञानिक और बुद्धिगम्य है । वर्तमान युग के सन्दर्भ में हम अपने व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में अनुभव करके देख सकते हैं । आज क्या समाज-सेवकों की कमी है ? क्या समाज की समस्याओं का समाधान करने वालों का अभाव है ? एक कवि ने एक कविता सुनाई, जिसका भावार्थ यह था, " अब बाग में इतने माली हो गये हैं कि फूलों के लिए जगह ही नहीं बची है ।" माली ही माली दिखाई दे रहे हैं, फूल कहीं दिखाई नहीं देते । इतने सेवक होते हुए भी, सेवकों की संख्या निरन्तर बढ़ते जाने पर भी समस्या क्यों बनी हुई है ? श्रीभरत ने इसी ओर ध्यान आकृष्ट किया । गुरु वसिष्ठ कहते हैं कि सबकी सेवा करो । पर श्रीभरत का तात्पर्य यह है कि सेवा करने वाले की भी कुछ योग्यता और कसौटी होना चाहिए ।

Tuesday, 25 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

सभी युगवालों के लिए श्रीभरत जी में प्रेरणा है ; सतयुग वालों के लिए प्रेरणा इसलिए है कि भरत महान योगी हैं, साधक हैं, त्रेतायुग वालों के लिए इसलिए है कि उनके चरित्र में लोकोपकार और सेवा रूपी सर्वश्रेष्ठ यज्ञ भावना है ; द्वापर के लोगों के लिए वे इसलिए प्रेरक हैं कि उनके जैसा पूजा करने वाला भी कोई नहीं है - ह्रदय में असीम प्रेम के लिए वे नित्यप्रति प्रभु की पादुकाओं का पूजन करते हैं । लेकिन गोस्वामीजी कहते हैं कि सबसे अधिक प्रेरक तो श्रीभरत कलियुग के लिए हैं, क्योंकि हमारे युग की समस्याओं का जो समाधान श्रीभरत ने दिया है वह अन्य किसी ने नहीं दिया । वे सावधान कर देते हैं कि आप लोग इसे पुराने युग की गाथा के रूप में न लीजिएगा । 'कलिकाल' का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं - इस कठिन कलियुग में मुझ जैसे दुष्ट को भगवान राम के सम्मुख श्रीभरत ही ले गए । किसी ने पूछ दिया - तो श्रीभरत आपको कैसे ले गए ? उन्होंने कहा - और सब लोगों को देखकर तो मुझे साहस नहीं हुआ कि मैं भी श्रीराम के सामने जाऊँ । जिनमें ज्ञान-भक्ति की उत्कृष्टता थी, उनके साथ जाने में डर लगा, क्योकिं उनके साथ जाने योग्य कोई भी लक्षण मुझमें नहीं है । श्रीभरतजी के साथ जाने वालों में मैंने जब गुरु वसिष्ठ को देखा, बड़े-बड़े ऋषियों को देखा, योग्य मन्त्री और सेनापतियों को देखा, सत्कर्म करने वालों को देखा, तो मुझे साहस नहीं हुआ । लेकिन जब देखा कि वे मन्थरा और कैकेयी को भी साथ लेकर चल रहे हैं तो सोचा कि मैं भी चल सकता हूँ ।

Monday, 24 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

जब सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग कहते हैं तब इसका एक अर्थ तो यह होता है कि इतने वर्ष तक सतयुग, इतने वर्ष तक त्रेता, इतने वर्ष तक द्वापर और इतने वर्ष तक कलियुग रहेगा । पर ये चारों युग सतयुग में भी होते हैं, और त्रेता, द्वापर तथा कलियुग में भी होते हैं । और केवल चारों युगों में ही नहीं बल्कि हमारे आपके जीवन में भी नित्य चारों युग आते हैं । जिस समय हम जिस युग की मनःस्थिति में रहते हैं, उस समय हमारे जीवन में वही युग रहता है । एक ही स्थान पर बैठे हुए अलग-अलग लोगों को अलग-अलग युग की अनुभूति होती है । जो कथा में बैठे हुए हैं, वे किस युग में बैठे हुए हैं ? जिनकी दृष्टि किसी दूसरे के जूते पर लगी हुई है वे कलियुग में ही तो बैठे हुए होंगे । तात्पर्य यह है कि शरीर चाहे जहाँ हो, व्यक्ति का मन जिस युग की मनोभूमि पर होगा वह उसी युग में विद्यमान होगा । तो राम जब अयोध्या से निकाल दिए गये वह क्या त्रेतायुग था ? मन्थरा के द्वारा कैकेयी के अन्तःकरण में जो विकृति उत्पन्न की गई, वह क्या त्रेतायुग का लक्षण है ? वस्तुतः वह त्रेता में कलियुग आ गया था । कलियुग का जैसा लक्षण है वह सारा का सारा वातावरण वहाँ बन गया था । गोस्वामीजी कहते हैं कि श्रीभरत तो कलियुग वालों के लिए हैं । उन्होंने कलियुग की समस्याओं का जो समाधान दिया है वह अन्य किसी ने नहीं दिया ।

Sunday, 23 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

गोस्वामीजी ने युगधर्म का वर्णन करते हुए कहा है कि जब हमारे अन्तःकरण में ध्यान-समाधि की इच्छा जाग्रत हो, अन्तर्मुखता उत्पन्न हो, तो उस समय समझ लेना चाहिए कि हम मन से सतयुग में निवास कर रहे हैं । जिस समय हमारे अन्तःकरण में लोकसेवा, परोपकार तथा यज्ञ की वृत्ति आवे तो समझ लेना चाहिए कि हम त्रेतायुग में हैं । और जिस समय हमारे अन्तःकरण में पूजा और भगवान की अराधना की वृत्ति उदित हो तो समझ लेना चाहिए कि हम मानसिक रूप से द्वापर युग में निवास कर रहे हैं । पर जब मन में दूसरों को कष्ट देने की वृत्ति आए तब ? जब दूसरों को संकट में देखकर हमें प्रसन्नता हो, जब हमारे अन्तःकरण में काम, क्रोध आदि की वृत्तियाँ आएँ तो उस समय समझ लेना चाहिए कि कलियुग में बैठे हुए हैं । फिर इस क्रम में विपर्यय भी होता है । जैसे ऋतुओं के क्रम में आप देखते हैं, शीत ऋतु में ठण्डक की प्रधानता है, ग्रीष्म में गर्मी की और वर्षा ऋतु में वर्षा की । लेकिन इसमें कभी-कभी विपर्यय भी होता है । कभी-कभी शीतऋतु में भी ठण्डक का अनुभव नहीं होता, गर्मी की अनुभूति होती है । उस समय ऋतु का नाम भले ही शीतऋतु हो पर अनुभूति दूसरे ऋतु की होती है । इसी प्रकार ग्रीष्मऋतु में गर्मी पड़ रही है, अचानक वर्षा हो गयी तो ठण्डक आ जाती है । और तब नाम उसका भले ही ग्रीष्मऋतु हो पर उस समय हम शीतलता का अनुभव करते हैं, वर्षा का अनुभव करते हैं, ग्रीष्म का अनुभव नहीं होता है । तो जैसे ऋतुओं के क्रम में विपर्यय होता है, उसी तरह युगों में भी विपर्यय होता है ।

Saturday, 22 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

श्रीभरत त्रेतायुग में आए और उस युग के लोगों ने उनके प्रेम को देखा, उनकी जीवन की साधना और तपस्या को देखा । सुनने वाला अचानक गोस्वामीजी से पूछ बैठता है कि महाराज, ये बातें तो त्रेतायुग वालों के लिए थीं । उस युग में जो समस्याएँ थीं - जो दुख, दरिद्रता और दीनता थी, उनका उन्होंने समाधान दिया, परन्तु आज तो आप केवल उनकी कथा सुना रहे हैं, केवल अतीत का इतिहास सुना रहे हैं । तब अन्तिम पंक्ति में गोस्वामीजी मानो संकेत कर देना चाहते हैं - नहीं, नहीं मैं पुरातन युग की ही बात नहीं कह रहा हूँ, वह तो बिल्कुल वर्तमान से जुड़ा हुआ इसी युग का सत्य है । गोस्वामीजी अपना दृष्टांत देते हुए कहते हैं - मैं तो इस युग का व्यक्ति हूँ । मैं अस्वस्थ था । गोस्वामीजी के जीवन में कितनी तीव्र कामुकता थी, उसका कितना तीव्र आवेग था, इससे आप लोग परिचित हैं । पर अन्त में वे इस रोग से मुक्त हुए, स्वस्थ हुए । किस उपाय से ? आज के युग में इन मानस रोगों से पीड़ित व्यक्ति और समाज को स्वस्थ रहने का उपाय बता देते हैं । आने वाले दिनों में इस उपाय पर चर्चा करेंगे ।

Friday, 21 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान श्रीराम के वन गमन के बाद गुरु वसिष्ठ श्रीभरत से जब यह कहते हैं कि तुम अयोध्या का राज्य-संचालन करो, प्रजा की सेवा करो, माताओं की सेवा करो, समाज की सेवा करो, तो उनका यह प्रस्ताव बड़ा युक्तियुक्त प्रतीत होता है । और इतना ही नहीं, कभी तो ऐसा भी प्रतीत होता है कि अन्त में श्रीभरत को यही करना भी पड़ा । उन्होंने चौदह वर्ष तक राज्य चलाया । अब यह प्रश्न किया जा सकता है कि ऐसी स्थिति में अयोध्या के सारे समाज को, इतने बड़े जनसमूह को लेकर चित्रकूट जाने की क्या आवश्यकता थी ? गुरु वसिष्ठ की आज्ञा मानकर वे प्रजा की सेवा करते और चौदह वर्ष पश्चात श्रीराम के लौट आने पर राज्य उन्हें सौंप देते । लेकिन यहीं पर रामचरितमानस का जीवन-दर्शन निहित है । और यह जीवन-दर्शन विशेष रूप से इसी युग के संदर्भ में प्रासंगिक है। गोस्वामीजी तो एक बहुत बड़ी बात कहते हैं । अयोध्याकाण्ड के अन्त में उन्होंने कहा कि अगर श्रीभरत का जन्म न हुआ होता, तो संसार को कुछ बातों से वंचित रहना पड़ता । उनमें से एक-एक को गिनाते हुए वे कहते हैं - श्रीभरत का जन्म न हुआ होता तो श्रीराम के प्रेम की परिपूर्णता समाज के सामने न आ पाती । बड़े-बड़े तपस्वियों और मुनियों के लिए भी जो साधना कठिन है, उसे अपने जीवन में साकार करके कौन दिखाता । और  अगली पंक्ति में वे और भी महत्व की बात कहते हैं कि समाज में जो दुख, पीड़ा, जलन और दरिद्रता है, उसे दूर करने में श्रीभरत को छोड़कर दूसरा कौन समर्थ है ।

Thursday, 20 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

हम कितने भी समृद्ध क्यों न हों, हमारा परिवार कितना भी बड़ा क्यों न हो, पर जब हम बीमार हो जाते हैं तो सब व्यर्थ प्रतीत होता है, दुखद प्रतीत होता है । ठीक इसी प्रकार जब व्यक्ति और समाज का मन अस्वस्थ हो जाता है तब न तो व्यक्ति सुखी रह पाता है और न समाज । मन का रोगी न तो स्वयं सुख, चैन और शान्ति से रह सकता है और न दूसरों को रहने देता है । आज समाज के चारों ओर जो अव्यवस्था और अशान्ति दिखाई दे रही है, यदि हम गहराई में उसके मूल में पैठकर देखें, तो यही कह सकते हैं कि समाज में मन के रोग इतने अधिक बढ़ गये हैं कि इसके परिणामस्वरूप समाज में चारों ओर विग्रह और अशान्ति दिखाई पड़ रही है । मन के इन रोगों को दूर करने के लिए मन की चिकित्सा करने की आवश्यकता है । भौतिक शरीर की सुरक्षा और स्वस्थता के लिए जैसे चिकित्सा की आवश्यकता है ; शासन की ओर से इसका प्रबन्ध है ; महापुरुषों, आश्रमों और सेवा-प्रतिष्ठानों द्वारा भी उस दिशा में प्रयास होते हैं । परन्तु शरीर की अपेक्षा मन की स्वस्थता अधिक आवश्यक है, उसके लिए भी चिकित्सालय की आवश्यकता है । लेकिन इस चिकित्सालय की व्यवस्था शासनतन्त्र की ओर से सम्भव नहीं है ; बल्कि यह तो संतों के द्वारा ही संभव है । इसका संकेत हमें मानस के अयोध्याकाण्ड में श्रीभरत के चरित्र के माध्यम से मिलता है ।

Wednesday, 19 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामचरितमानस में रामकथा के अन्त में मानस रोगों का वर्णन कुछ विचित्र-सा लगता है । इसलिए कि रामकथा में मधुरता है और रोग का दृश्य तो कोई आकर्षक नहीं होता । जब आप किसी चिकित्सालय में जाकर रोगियों को देखते हैं, तो स्वाभाविक रूप से ही वहाँ का वातावरण आपके लिए कोई उत्साहजनक नहीं होता । पर इतना होते हुए भी अस्वस्थ होने पर चिकित्सालय जाना व्यक्ति की बाध्यता है । व्यक्ति अगर अस्वस्थ हो जाय तो स्वस्थता के लिए रोग-निदान और चिकित्सा की आवश्यकता होती है । ऐसी स्थिति में चिकित्सालय प्रिय भले ही न लगे, पर वह कल्याणकारी तो है ही । रामकथा के समान मधुरता मानस-रोग के प्रसंग में नहीं है, क्योकिं इसमें मन की अवस्थाओं का, सूक्ष्म वासनाओं का ही वर्णन है । यह इतना आवश्यक है कि गोस्वामीजी ने निःसंकोच भाव से रामकथा के बाद मनुष्य के मन के रोगों का वर्णन किया है, और तत्पश्चात उसकी चिकित्सा का वर्णन करके रामकथा का समापन किया है । और यही हमारे आपके जीवन का सत्य है ।

Tuesday, 18 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

गान्धारी की यह ममता कि दुर्योधन मेरा बेटा है, मैं उसे नहीं मरने दूँगी और दुर्योधन ? क्या वह कपड़े उतारकर गया ? उसे तो दूसरों का कपड़ा उतारना ही आता है, अपना कपड़ा उतारना उसे नहीं आता । कपड़े उतारकर चला तो बीच में नारदजी मिल गए । नारदजी ने पूछा - अरे-अरे, यह क्या, कहाँ जा रहे हो ? लज्जा के मारे बिचारा दुर्योधन बैठ गया । तब नारदजी ने कहा कि मेरे सामने जब तुम्हें इस प्रकार से लज्जा आ रही है तो गान्धारी के सामने कैसा लगेगा ? इसलिए ऐसा करो, कमर में एक छोटा-सा कपड़ा लपेट लो । दुर्योधन को नारदजी की सलाह अच्छी लगी । कमर में वस्त्र लपेट कर वह गान्धारी के सामने पहुँच गया ! पतिव्रता गान्धारी ने अपनी आँखों की पट्टी हटाई, उसकी दृष्टि दुर्योधन पर पड़ी और उसका सारा शरीर व्रज का हो गया, केवल कमर कच्ची रह गयी क्योकिं कमर पर पट्टी पड़ी थी । बड़ा विचित्र व्यंग्य है । इससे बढ़कर विडम्बना क्या हो सकती है । पतिव्रता की दृष्टि ने सारे शरीर को तो व्रज का बना दिया, पर एक कपड़े की पट्टी को भेद वह दृष्टि उसके कमर को व्रज नहीं बना पाई । क्यों ? वह दुर्योधन की कमर पर मात्र कपड़ा नहीं था । वह तो ईश्वर का संकल्प था । जो नारद ने कहा था, वह कपड़े के रूप में भगवान का ही संकल्प था । जब भगवान सुने तो हँसकर उन्होंने यही कहा कि देखो, गान्धारी ममता में कितनी अन्धी हो रही है । वह समझ रही थी कि मैं अपने पुत्र को अमर बनाने जा रही हूँ । अमर तो नहीं बना पाई, बल्कि उन्होंने तो मारने का उपाय बता दिया । पहले तो सोचना पड़ता कि दुर्योधन को कहाँ से मारा जाए, पर अब सबको पता चल गया कि वह मरेगा तो कमर पर से ही मरेगा । उसकी कमर ही कमजोर है । कैसा दुर्भाग्य है उसका !
  इसका अभिप्राय यह है कि इतिहास में बड़े-से-बड़े ऐसे भी पात्र हैं, जिनके जीवन में यशस्विता होते हुए भी ममतायुक्त पक्षपात आया, जहाँ ममता का अन्धत्व आया और वहाँ उन पर कलंक भी अवश्य लगा । सच्चे अर्थों में ममता हमारे जीवन को अन्धकार में डाल देती है, भ्रम में डाल देती है । और हमारे जीवन में जब तक स्नेह ममता की आर्द्रता बनी रहेगी, तब तक यह पक्षपात हमारे लिए और समाज के लिए संकट उत्पन्न करती रहेगी ।

Monday, 17 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

महाभारत की गान्धारी भी कैकेयीजी के समान ही परम पतिव्रता थीं । उनका विवाह अन्धे धृतराष्ट्र के साथ हुआ, लेकिन जब उन्होंने देखा कि मेरे पति के पास दृष्टि नहीं है तो उन्होंने भी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली । नेत्र से बढ़कर और कौन-सी वस्तु होगी ? दृष्टि होते हुए भी उन्होंने देखना बन्द कर दिया । सारे संसार में उनकी कीर्ति फैल गई । उनके पातिव्रत की महिमा फैल गई, लेकिन ममता ने किसके यश को धूमिल नहीं किया ? जब गान्धारी ने दुर्योधन को बुलाया और कहा - पुत्र ! मैंने निर्णय किया है कि कुछ समय के लिए मैं अपनी आँखों की पट्टी खोलूँगी । दुर्योधन ने पूछा - क्यों, क्या उद्देश्य है आपका ? गान्धारी ने कहा - मैं पतिव्रता हूँ । आज तक अपनी दृष्टि से संसार को नहीं देखा । ज्योंही पट्टी खोलकर मैं तुम्हें देखूँगी, तुम्हारा शरीर व्रज का हो जाएगा और तब भीम तुम्हें नहीं मार सकेगा । तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी । फिर देखें, पाण्डव तुम्हें कैसे जीत पाते हैं ? दुर्योधन तो सुनकर फूला नहीं समाया, प्रसन्न हो गया । यह समाचार जब गुप्तचरों के द्वारा पाण्डवों के पास पहुँचा, तो वे निराश हो गए । वे पातिव्रत की शक्ति से परिचित थे । सोचने लगे कि अब तो लड़ाई से हार अवश्यंभावी है । भीम भी निराश हो गये और अर्जुन भी । युधिष्ठिर भी घबरा गए । एकमात्र श्रीकृष्ण ही थे, जो सुनकर मुस्कुराने लगे । श्रीकृष्ण को मुस्कुराते देखकर पाण्डव बोले - महाराज ! हम लोग तो इतने घबराए हुए हैं और आप मुस्कुरा रहे हैं ? क्या आपने नहीं सुना कि गान्धारी जैसी पतिव्रता अपनी आँखों की पट्टी हटा रही है । श्रीकृष्ण बोले - पट्टी हटा नहीं रही है, चढ़ा रही है । अभी तक पट्टी केवल कपड़े की थी और अब उन्होंने ममता की पट्टी चढ़ाने का निर्णय लिया है । यह कपड़े की पट्टी तो हट जाएगी पर इस ममता की पट्टी से वह पूरी तरह अन्धी हो जाएँगी । इसलिए तुम लोग निश्चिंत रहो । वस्तुतः न देखने की स्थिति में तो वह अब आई है ।

Sunday, 16 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

लंका से लौटकर भगवान श्रीराम ने कैकेयीजी से पूछा - माँ ! जाते समय मैंने तुमसे कहा था कि तुम्हारा बेटा मैं हूँ, अब तुम्हें विश्वास हुआ कि नहीं ? गोस्वामीजी लिखते हैं - कैकेयीजी प्रसन्न हो गयीं । उनके मन में कोई दुख नहीं रह गया । कई लोग यह कहते हैं कि कैकेयीजी ने भगवान राम से कहा कि भरत से मुझे माँ कहला दो । जो लोग ऐसा कहते हैं वे कैकेयीजी के चरित्र का अनादर करते हैं, वे तो भगवान श्रीराम की भक्ति का भी अनादर करते हैं । जो यह कहते हैं कि कैकेयीजी ने श्रीराम से हठ किया - भरत एक बार मुझे माँ कहकर पुकार दे और साथ-साथ यह भी कह दिया जाता है कि श्रीराम ने भरतजी से कह दिया कि तुम कैकेयीजी को माँ कहकर पुकारो और भरतजी ने कह दिया कि मैं नहीं पुकारुँगा । न तो यह बात भरतजी की मर्यादा के अनुरूप है और न श्रीराम के ही अनुरुप है । बल्कि भगवान राम ने तो भरतजी से कह दिया कि भरत यह बहुत अच्छा हुआ । क्या ? सभी भाइयों में आपस में बँटवारा होता है । इस बँटवारे में एक बहुत बड़ा लाभ यह हुआ कि अभी तक कैकेयीजी के बेटे हम दोनों थे, लेकिन अब उनका नाता तुमसे टूट गया और उन पर पूरा अधिकार केवल मेरा है । अब वे केवल मेरी माँ हैं । मेरे और माँ के बीच अब तुम तीसरे तो नहीं बनोगे ? श्रीभरत ने कहा - नहीं प्रभो ! हम तो यही चाहते हैं कि उनके अन्तःकरण में इसी सत्य का साक्षात्कार होता रहे कि उनके पुत्र तो एकमात्र श्रीराम को छोड़कर अन्य कोई नहीं है और सचमुच यही ममत्वशून्य स्थिति है । उस ममता के द्वारा कैकेयीजी को कलंक लगा और उनकी ममता को मिटाने के लिए ही श्रीभरत ने उनसे इतना शुष्क व्यवहार किया, उनके कलंक का प्रक्षालन किया और अन्त में जब उनके जीवन से ममता मिट गई, तभी उनका कल्याण हुआ ।

Saturday, 15 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

भरतजी जब ननिहाल से लौटकर आए और अयोध्या का समाचार सुना तो समझ गए कि कैकेयीजी को ममता का दाद रोग हो गया है । उन्होंने तुरन्त चिकित्सा प्रारंभ की । बड़े कठोर शब्दों में जोर से फटकारा । बड़ी तीव्र भर्त्सना की ओर उनके इस शुष्क और कठोर व्यवहार का बड़ा सुन्दर परिणाम हुआ । कैकेयीजी ने जब भरत की फटकार सुनी तो भरत तो आँखों से ओझल हो गए और मन की आँखों के सामने राम आ गए । याद आने लगा कि वन जाते समय राम ने क्या कहा था । जिसको मैंने वनवास दिया, उसने मुझे क्या कहा और जिसको राज्य देने के लिए मैंने इतना अनर्थ किया, कुयश लिया, कलंक लिया, विधवा बनी, वह क्या कह रहा है ? राम ने तो मुझे जननी कहकर पुकारा था, कहीं राम का सम्बोधन ही तो ठीक नहीं था ? सचमुच भरत मेरा बेटा नहीं है । सचमुच मैंने पुत्र को पहचानने में भूल की । अब तो सचमुच संसार में मेरा कोई भी अपना नहीं है । पति से परित्यक्ता, समाज से तिरस्कृता, पुत्र के द्वारा सम्बन्ध की अस्वीकृति । सब जगह से उनके नाते टूटे हुए हैं । एक आशा की डोर बँधी हुई थी भरत से ; लेकिन भरतजी ने उसे भी बलपूर्वक तोड़ दिया । नाता तोड़ने देने के बाद भी भरतजी बड़े सावधान थे । उन्होंने जीवन भर कैकेयी को फिर कभी माँ कहकर नहीं पुकारा ? वैद्य मानते हैं कि पथ्य-कुपथ्य सबके अलग-अलग होते हैं । भरतजी ने देखा कि एक बार तो इस ममता के संस्कार ने इतना अनर्थ किया, अब फिर से मैं यदि माँ कहकर पुकारुँगा तो कुपथ्य पाकर रोग फिर से जाग उठेगा । इस रोग का क्या ठिकाना, थोड़ी-सी नमी पाकर फिर उभर सकता है और यदि यह ममता फिर से उभर गई, तो माँ का कल्याण नहीं है । इसलिए निर्णय कर लिया कि माँ के जीवन से ममता को पूरी तरह मिटा देना होगा ।

Friday, 14 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

श्रीभरत यह समझ गए कि कैकेयी के अन्तःकरण में ममता का संस्कार नहीं मिट पा रहा है और जब तक उनका यह ममत्व दूर नहीं होगा, तब तक उनका कल्याण नहीं हो सकता । इसलिए उन्होंने यह निर्णय लिया कि इनके ममत्व को दूर करना ही होगा और उनके इस ममता-दाद की चिकित्सा उन्होंने अपने शुष्क व्यवहार से ही प्रारंभ की । कैकेयीजी के प्रति उनके शुष्क व्यवहार का अभिप्राय यही था कि व्यवहार में आर्द्रता कैकेयीजी के लिए कुपथ्य है । उनमें अहंता की समस्या नहीं है । ये सिंहासन अपने लिए नहीं माँगती । वे चाहती हैं कि मेरा बेटा राजा बने । भरत मेरा बेटा है, भरत सिंहासन पर बैठे । यह ममता ही उनकी समस्या है ।

Thursday, 13 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

भगवान राम ने कैकेयीजी से कहा - माँ, आज सिद्ध हो गया कि तुम मेरी जननी हो । क्यों ? भगवान राम का तात्पर्य यह है कि बालक जब बोलने लगता है, तब तो उसकी भाषा को प्रत्येक व्यक्ति समझ लेता है कि बालक क्या कह रहा है । पर बालक जब बिल्कुल नहीं बोल पाता तब उसकी इच्छाओं और आवश्यकताओं की पूर्ति कौन करता है ? उस न बोलने वाले बालक की भाषा को तो उसे गर्भ में धारण करने वाली माँ ही समझती है । माँ उसकी प्रत्येक भाषा को समझ लेती है । भगवान राम ने कैकेयीजी से कहा - माँ ! तुम मेरी जननी हो, इसका स्पष्ट प्रमाण आज मुझे मिल गया । क्या ? मेरे मन में एक विचार आया, पर डर के मारे मैं बोल नहीं पा रहा था और पूरी अयोध्या में कोई नहीं समझ पाया । केवल तुमने समझा । तुम मेरी जननी न होती तो मेरे मन की बात कैसे जान लेतीं ? भगवान राम का संकेत यह है कि कल ही जब गुरुजी ने कहा कि तुम्हें अयोध्या का राज्य मिलेगा तो मैं दुखी हो गया और सोचने लगा कि इस निर्मल वंश में यही एक अनुचित बात हो रही है कि और सब भाइयों को छोड़कर राज्याभिषेक एक बड़े का होता है । राज्य तो छोटे को ही मिलना चाहिए, पर मैं गुरुजी के डर से नहीं कह पाया । मेरे राज्याभिषेक का समाचार सुनकर कौशल्या अम्बा प्रसन्न हो गयीं । अगर ये मेरी जननी होतीं तो मेरे मन की बात अवश्य समझ लेतीं, पर नहीं समझ पाईं । तुम समझ गयीं, सचमुच तुम्हीं मेरी जननी हो । मैं तो सोच ही रहा था कि भरत राजा होता तो कितना अच्छा होता । और आज तुमने वरदान माँग लिया कि भरत राजा हो । तुमने मेरे ह्रदय की भाषा को समझ लिया । माँ ! विश्वास करो, तुम मेरी माँ ही नहीं, मेरी जननी भी हो । मैं तुम्हारा बेटा हूँ । कैकेयी ने तो भगवान की बातों पर विश्वास नहीं किया, पर श्रीभरत ने इसे सिद्ध करके दिखा दिया कि सचमुच उनके पुत्र तो श्रीराम ही हैं ।

Wednesday, 12 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

जिस समय कैकेयीजी ने भगवान राम को बुला कहा कि राम ! मैंने तुम्हारे पिता से दो वरदान माँगे हैं, क्या तुम उन वरदानों को पूरा कर सकोगे ? भगवान राम ने पूछा - माँ तुमने क्या वरदान माँगा है ? तो उन्होंने कहा - एक तो यह कि मेरा पुत्र भरत राजा हो और दूसरा यह कि तुम चौदह वर्ष के लिए वन जाओ । भगवान श्रीराघवेन्द्र ने कैकेयीजी के चरणों को पकड़ लिया और गदगद कण्ठ से बोले - 'सुनु जननी....' कैकेयीजी को जननी कहा । भगवान श्रीराम का अभिप्राय क्या था ? मानो वे कहना चाहते हैं कि माँ, अगले जन्म में क्यों ? लो, मैं तो अभी से तुम्हारा पुत्र बन गया । तुम मेरी जननी हो । भगवान राम कैकेयीजी को जननी कहकर सावधान करते हैं । उन्होंने उन्हें माँ कहकर नहीं, अपितु जननी कहकर पुकारा । साधारणतया लोग समझते हैं कि माँ और जननी पर्यायवाची शब्द हैं । पर पर्यायवाची शब्दों में भी भावनात्मक अर्थों में भेद रहता है । किसी भी महिला को जिसके प्रति आपके मन में आदरबुद्धि है, आप माँ कहकर पुकार सकते हैं, पर जननी सबको नहीं कह सकते । जननी तो वही है, जिसके गर्भ से हमारा जन्म होता है । भगवान राम ने कैकेयी से कहा कि तुम तो मेरी जननी हो और वे बार-बार कह रहे हैं - आदि में, मध्य में और अंत में भी बारम्बार कहते हैं - माँ ! मेरी जननी तुम हो । मैं तुम्हारा बेटा हूँ । पर कैकेयी तो ममता से ग्रस्त हैं, वे सोचती हैं कि राम इस तरह से बोलकर मुझे भुलावा दे रहे हैं । मुझे फुसलाना चाहते हैं कि किसी तरह से मैं अपने शब्दों को वापस ले लूँ । लेकिन भगवान राम का उद्देश्य क्या था ? वे तो कैकेयीजी के भ्रम को दूर करने की ही चेष्टा कर रहे थे । भगवान राम ने कहा कि तुम्हें जो यह जो भ्रम हो गया है कि तुम भरत की जननी हो, वह भरत के आने पर दूर हो जाएगा और तुम जान लोगी कि वास्तव में तुम भरत की जननी हो या मेरी ।

Tuesday, 11 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

कभी-कभी भावराज्य की सत्यता और मिथ्यात्व की बात उठती है । भक्तों को भावराज्य में जो अनेक अनुभूतियाँ होती हैं, उसे लोग मन की कल्पना कहते हैं । उनकी मान्यता है कि जो वस्तु सबको दिखाई नहीं देती वह वास्तविक नहीं हो सकती । शरीर सत्य है, भाव कल्पित हैं । पर भक्तिशास्त्र की मान्यता है कि शरीर की तो एक सीमा है और उसकी दृष्टि-सामर्थ्य भी सीमित है, पर भाव असीम है और असीम के राज्य में तो भाव ही सत्य है । इसलिए भगवान राम ने कैकेयीजी को उसी जन्म में माँ कहकर पुकारा और अन्ततः कैकेयीजी को स्वीकार करना ही पड़ा कि हाँ, अब मेरा भ्रम दूर हो गया ।

Monday, 10 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

कैकेयीजी ने मन्थरा से यही कहा था कि मैं ब्रह्मा से प्रार्थना करती हूँ कि यदि मेरा अगला जन्म हो तो राम मेरे पुत्र हों । पर क्या कैकेयी का अगला जन्म हुआ ? न उनका अगला जन्म हुआ और न राम उनके पुत्र बने । इसका तात्पर्य क्या हुआ ? कैकेयीजी की इतनी पूजा और प्रार्थना का क्या हुआ ? वह सब कहाँ गया ? उनका फल क्यों नहीं मिला ? यहीं पर कैकेयीजी और भगवान श्रीराम में मतभेद है मतभेद है । कैकेयीजी कहती हैं कि मेरा अगला जन्म हो और राम मेरे पुत्र बनें । किन्तु भगवान राम कहते हैं कि माँ, यदि तुम्हारा अगला जन्म हो गया, तब तो मेरा ईश्वरत्व किसी काम नहीं आया । मेरे ईश्वरत्व में सबको संसार से मुक्ति मिल जाय और तुम्हें न मिले तो यह तो मेरे लिए कलंक की बात होगी और तुम जो यह कहती हो कि अगले जन्म में राम मेरा बेटा बने, तुम्हारा इतना स्नेह और मैं तुम्हें इतने दिनों तक प्रतीक्षा कराऊँ ? अगले जन्म में तुम्हारा बेटा बनूँ तो तुम्हारी पूजा की क्या सार्थकता रह जाएगी ? मुक्ति न मिले तो मेरी सार्थकता नहीं और तत्काल फल न मिले तो तुम्हारी पूजा की सार्थकता नहीं । भगवान राम यह चाहते हैं कि कैकेयीजी यह समझ लें कि मैं उनका ही पुत्र हूँ । पर कैकेयीजी यह समझ नहीं पा रहीं हैं । शरीर को केन्द्र मानकर विचार करने के कारण उन्होंने यह मान लिया है कि राम मेरा बेटा नहीं है । वह जो मुझे माँ कहकर पुकारता है, वह तो एक भाव का नाता है । उसका जन्म मेरे गर्भ से नहीं हुआ है । मेरे गर्भ से भरत का जन्म हुआ है, इसलिए भरत ही मेरा वास्तविक पुत्र है, राम नहीं । कैकेयी ने तो भगवान की बातों पर विश्वास नहीं किया, लेकिन श्रीभरत ने एक सद् वैद्य की भूमिका का निर्वाह करते हुए इसे सिद्ध करके दिखा दिया कि सचमुच उनके पुत्र तो श्रीराम ही हैं ।

Sunday, 9 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

कैकेयीजी बड़ी यशस्विनी थीं । सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी के रूप में उनकी सुन्दरता की कीर्ति फैली हुई थी । वे जितनी सुन्दर थीं, उतनी ही ओजस्विनी और तेजोमयी थीं । महाराज दशरथ जब युद्ध में जाते थे तब अन्य रानियाँ उनके साथ नहीं जाती थीं, पर कैकेयीजी रणक्षेत्र में भी उनका साथ देने के लिए जाती थीं । पति के प्रति उनके मन में प्रगाढ़ अपनत्व दिखाई देता है । उनकी उदारता भी इतनी प्रसिद्ध थी कि सभी लोग यह कहा करते कि सौतिया डाह सभी में पाया जाता है, परन्तु कैकेयीजी इसकी अपवाद हैं । इस तरह कैकेयीजी स्वभाव, शील, शौर्य और सौन्दर्य के लिए तो यशस्विनी थीं, पर यह अनर्थ क्यों हुआ ? ममता के कारण । अगर उनके अन्तःकरण से यह एक चीज मिट गयी होती, तो इतना बड़ा अनर्थ न हुआ होता । वे ममता के संस्कार को नहीं मिटा पाई, इस बात को भूल नहीं पाईं कि भरत मेरा बेटा है । श्रीराम उन्हें माँ कहकर पुकारते हैं । वे अपनी माँ से भी अधिक सम्मान कैकेयी को देते हैं, पर इतना होते हुए भी कैकेयीजी सोचती हैं कि अभी तो राम मेरे नकली बेटे हैं, अगले जन्म में हों तो हों । और अगले जन्म में कब होंगे ? जब मेरे गर्भ से जन्म लेंगे तभी वे मेरे असली बेटे होंगे । यही कैकेयीजी असली की परिभाषा मानती थीं ।

Saturday, 8 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

लंका विजय के पश्चात जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो वे सबसे पहले कैकेयीजी के भवन में हो गए । प्रभु ने जान लिया कि माता कैकेयी लज्जित हो गयी हैं । इसलिए वे पहले उन्हीं के महल में गये और उन्हें समझा-बुझाकर बहुत सुख दिया । फिर अपने महल को गए । रामराज्य बन गया लेकिन गोस्वामीजी गीतावली में एक बड़ी अद्भुत बात लिखते हैं कि कैकेयी जब तक जीवित रहीं तब तक भरतजी ने कभी भी उनको माँ कहकर नहीं पुकारा । पढ़कर बड़ा आश्चर्य होता है । कैकेयीजी ने श्रीराम को पा लिया । उन्होंने रामराज्य में सहयोग दिया । भगवान राम ने कैकेयीजी की प्रशंसा की है । श्रीलक्ष्मण तो कैकेयीजी के चरणों में बारम्बार प्रणाम करते हैं, पर श्रीभरत जैसे उदार सहृदय व्यक्ति जीवन भर अपनी माँ को माँ कहकर न पुकारें, यह सुनकर तो बड़ा विचित्र-सा लगता है । लेकिन श्रीभरत की भूमिका यहाँ पर एक वैद्य की भूमिका है । वे सजग हैं, जानते हैं कि कैकेयी का रोग क्या है और उसे पथ्य क्या देना है । ममता ही कैकेयी का रोग है । ममता दाद के समान है । दाद का गीलेपन से बड़ा सम्बन्ध है । व्यक्ति अगर दाद वाले अंग को बार-बार गीला करेगा, उसे ठीक से सुखाएगा नहीं तो वहाँ फिर से दाद हो जाने की सम्भावना बनी रहेगी । अभिप्राय यह है कि व्यवहार में शुष्कता (रुखापन) मिले तो ममता का गीलापन कम होगा और आर्द्रता (अपनापन) मिले तो गीलापन बढ़ेगा । यही ममता की प्रकृति है । श्रीभरत ने एक सद् वैद्य की भूमिका का पूरा निर्वाह किया ।

Friday, 7 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

ममता के सन्दर्भ में अगर आप मानस के सारे चरित्रों पर, समस्त पात्रों पर विचार करें और मानस ही क्यों, महाभारत के पात्रों को भी लें, तो उन्हें हम और आप अपने वर्तमान जीवन के निकट पाएँगे और हमें स्पष्ट दिखाई देगा कि जब हमारे अन्तर्मन में ममता का उदय होता है, तब हम ऐसे गलत ढंग से पक्षपात करने लगते हैं कि हमारी सारी विचारशीलता, सारी गुणज्ञता व्यर्थ हो जाती है और इस ममता तथा इसके द्वारा जनित पक्षपात के कारण हम श्रेष्ठ व्यक्ति के प्रति आदरदृष्टि नहीं रख पाते । ममता की इस भयंकरता को अगर हम और अधिक स्पष्ट रूप से देखना चाहें तो रामायण और महाभारत के दो ऐसे पात्र हैं जो बड़े यशस्वी थे, परन्तु ममता के कारण उनका यश नष्ट हो गया । रामायण में कैकेयीजी और महाभारत में गान्धारी के चरित्र को लें ।

Thursday, 6 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

ममता को समाप्त करने की प्रक्रिया सबसे अधिक जटिल बताई गयी है । एक प्रसंग में दोषों की गणना करते हुए गोस्वामीजी बताते हैं कि कौन-सा दोष आ जाने पर व्यक्ति कैसा बन जाता है । जैसे कि मोह व्यक्ति को अंधा बना देता है और जब काम आता है - काम व्यक्ति को नचाता है, सभी मनुष्य नारियों के वश में हैं और मदारी के बन्दर की भाँति स्त्रियों के इशारों पर नाचते हैं । तृष्णा ने किसे मतवाला नहीं बनाया और क्रोध ने किसका ह्रदय नहीं जलाया ? संसार में ऐसा कौन ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, विद्वान और गुणी है, जिसकी लोभ ने विडम्बना न की हो । इसी क्रम में गोस्वामीजी ने ममता को बड़े भयावह रूप में देखा और इसके लिये शब्द भी बड़ा भयानक चुना । यह मानसिक दुर्बलताओं के साथ जुड़कर कितना भयंकर परिणाम उत्पन्न करती है, इसकी चर्चा करते हुए वे कहते हैं - संसार में ऐसा कौन व्यक्ति है जिसके जीवन में ममता आकर उसके यश को नष्ट न कर देती हो, उस पर कलंक न लगा देती हो । यह ममता व्यक्ति के जीवन को कलंकित कर देती है ।

Wednesday, 5 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

भक्त कवि दादू का एक बड़ा मधुर वाक्य है । उन्होंने भगवान से कहा - महाराज ! 'तन भी तेरा' यह शरीर भी मेरा नहीं है । 'मन भी तेरा, तेरा पिण्ड परान' - तन, मन, प्राण, यह सब आपका ही है । तो भगवान ने कहा - यह तो तुम्हारी बड़ी उदारता है । अपने लिए कुछ तो रख लिया होता । तो दादूजी कहा - महाराज, मैं उदार बिल्कुल नहीं हूँ । अपने लिए भी एक बचा लिया है । उस एक को छोड़कर बाकी सब आपका है । दादू कहते हैं - जो कुछ भी मेरा था वह सब आपका है, परन्तु आप मेरे हैं बस यही ममत्व की सार्थकता है । यही है ईश्वर को अपनी ममता की डोर में बाँध लेना । अन्य जिन लोगों को हम ममता की डोर से बाँधना चाहते हैं, वे भागने की चेष्टा करते हैं, लेकिन ईश्वर तो इतने उदार हैं कि वे स्वयं बँध जाने के लिए प्रस्तुत हो जाते हैं । कहते हैं - उपाय मैं स्वयं बता रहा हूँ । तुम मुझे बाँध क्यों नहीं लेते ?

Tuesday, 4 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

भगवान राम ममता के उस पक्ष की ओर संकेत करते हैं, जहाँ पर ममता बन्धन का रूप लिये हुए है । विभीषण ने तो ममता को अँधेरी रात के रूप में प्रस्तुत किया पर भगवान राम ममता की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि विभीषण ! मेरी दृष्टि में ममता पतले धागों की तरह है । और ये पतले धागे बिखरे हुए हैं । वास्तव में ममता को इतनी हेय दृष्टि से देखने की आवश्यकता नहीं है । व्यक्ति इस ममता का सदुपयोग भी कर सकता है । भगवान राम ने बड़ी मनोवैज्ञानिक बात कही । यदि व्यक्ति को यह कह दिया जाय कि तुम ममताशून्य हो जाओ, तब तो उसका अन्तःकरण नीरस हो जाएगा । क्योकि व्यक्ति में रस लेने की जो प्रकृति है, वह तो ममता से जुड़ी हुई है । ममता की इस प्रवृत्ति को - इन सब बिखरे धागों को अगर एक साथ एकत्र कर दिया जाय तो वे ही धागे रस्सी में परिणत हो जाएँगे । और तब उस रस्सी से किसे बाँधेंगे ? भगवान राम बड़े उदार हैं । यदि वे यह कहते कि फिर उस रस्सी से चाहे जिसको बाँधों तो और बात थी, पर उन्होंने दूसरों को बाँधने की बात नहीं कही । वे कहते हैं कि रस्सी से तुम चाहो तो मुझे भी बाँध सकते हो । अपने बँधने का उपाय भगवान स्वयं बता रहे हैं - माता-पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र, परिवार इन सबके प्रति ममता के धागों को मिलाने से जो रस्सी बने, उसे मेरे चरणों में बाँध दो । इसका परिणाम क्या होगा ? भगवान कहते हैं कि मैं तुम्हारे ममता के बंधन में बँध जाऊँगा ।

Monday, 3 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

जब विभीषण का भगवान श्रीराम से साक्षात्कार हुआ तब ममता के सन्दर्भ में उन्होंने दो बातें कहीं - प्रभो, अभी तक तो मैं लंका में था और ममता की अँधेरी रात ही मेरे अन्तःकरण में विद्यमान थी । ममता की उस अँधेरी रात में मैं समझता तो यही था कि मैं देख रहा हूँ, पर वस्तुतः मैं वास्तविकता को देख नहीं पा रहा था । इसका अभिप्राय क्या है ? लंका में रावण के द्वारा जो कार्य हो रहे थे, वे तो सब मेरी आँखों के सामने ही हो रहे थे या यह कहना चाहिए कि रावण के सारे कार्य मुझे दिखाई दे रहे थे । पर रावण के कार्य अगर मुझे सचमुच सही अर्थों में दिखाई दे रहे होते तो क्या इतने दिनों तक मैं लंका में रह पाता ? इसका अर्थ तो यही है कि लंका में रहते हुए उस ममता की अँधेरी रात में राग की दृष्टि से देख रहा था । वह राग की दृष्टि थी । व्यक्ति जब राग की दृष्टि से देखता है तब उसे सत्य का साक्षात्कार नहीं होता, बल्कि उसकी प्रकृति उल्टी है । उल्लू रात्रि में तो देखता है, पर दिन में उसे कुछ भी दिखाई नहीं देता । जिस व्यक्ति को राग और द्वेष की दृष्टि से मोह के अँधेरी रात में ही दिखाई दे और ईश्वर का प्रकाश न दिखाई दे, तो इससे बढ़कर उसका दुर्भाग्य और क्या हो सकता है । पर विभीषणजी ने कहा कि उस ममता की अँधेरी रात्रि में अब आपके प्रताप का रवि मेरे अन्तःकरण में उदित हो गया है । इसका परिणाम यह हुआ कि अब मेरे अन्तःकरण में ममता की अँधेरी रात मिट गयी है और मैं आपके चरणों में आ सका हूँ ।

Sunday, 2 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

गोस्वामीजी ममता की तुलना दाद से करते हैं । दाद एक विचित्र रोग है । उसकी एक विशेष प्रकृति है । जिन लोगों को यह रोग होता है, उन्हें लगता है कि दवा के द्वारा तत्काल आराम मिल गया पर उन्हें यह भी अनुभव होगा कि यह बार-बार लौट आता है । कुछ दिन बाद फिर प्रकट हो जाता है । ममता की प्रकृति भी ठीक ऐसी ही है और यह सर्वाधिक चिरस्थायी रोग है । पर समाज में इसके प्रति कोई घृणा नहीं है, उतनी निंदा की वृत्ति नहीं है जितनी अन्य दुर्गुणों के प्रति है । ममता जन-जीवन में बड़ी व्यापक रूप में बैठी हुई है । इसे दूर कर पाना सरल नहीं है । भले ही वह साधारण रोग प्रतीत होती हो परन्तु वस्तुतः ऐसा नहीं है । इसलिए इस प्रसंग में गोस्वामीजी ने ममता की तुलना दाद से की है । लेकिन इसकी विचित्रता की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करने के लिए उन्होंने इसे अन्य प्रसंगों में कई रूप में प्रस्तुत किया है । एक प्रसंग में वे कहते हैं कि ममता अँधेरी रात है, और दूसरे प्रसंग में कहते हैं कि यह बन्धन है । फिर तीसरे प्रसंग में वे कहते हैं कि ममता मल है । ये बड़े कठोर निन्दा के शब्द हैं । परन्तु गोस्वामीजी ऐसा भी मानते हैं कि ममता का अन्त में विनाश होता है । उनका एक प्रसिद्ध पद है, जिसे भक्त बहुधा गाते हैं । गोस्वामीजी व्याकुल होकर बड़े ही निराशा भरे स्वर में गाते हैं - "ममता तू न गई मेरे मन से" - सब तो चला गया पर अरी ममता, तूने अभी तक मेरे मन का परित्याग नहीं किया । और मानस में वे कहते हैं - ममता पूर्ण अँधेरी रात है, वह तभी तक जीव के मन में बसती है जब तक प्रभु के प्रतापरूपी सूर्य का उदय नहीं होता ।

Saturday, 1 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान श्रीराम और लक्ष्मणजी से परशुरामजी का संवाद अहंता और ममता से त्याग का प्रसंग है । सचमुच परशुरामजी ने अपनी अहंता और ममता का त्याग करके दिखाया । उन्होंने भगवान राम और लक्ष्मण को अर्थात ज्ञान और वैराग्य को पहचान लिया और अपने जीवन में उसे स्वीकार किया । ज्ञान और और वैराग्य के प्रतिष्ठित होते ही उनकी अहंता और ममता दूर हो गयी और आगे चलकर उन्होंने ममता को यहाँ तक त्याग दिया कि टूटे हुए धनुष से ममता की तो बात ही क्या - अपने कन्धे पर जो भगवान विष्णु का धनुष था, उससे भी उन्होंने अपनी ममता हटा ली और उसे उतारकर भगवान राम से कहते हैं - उसे तो आपने खण्डित कर दिया, अब इसे खींच लीजिए । अहंता और ममता दोनों के विनष्ट हो जाने पर परशुरामजी सुखी और संतुष्ट हो गए । पराजय की वृत्ति का निवारण हो गया । इसका सीधा-सा तात्पर्य यह है कि हमारे जीवन में सुख और दुख दोनों का सम्बन्ध ममता से है ।