तुलसीदास जी से पूछा गया कि आप किसको कथा सुना रहे हैं ? वे बोले कि भाई ! मैं अपने मन को सुना रहा हूँ । तब तो महाराज ! आपका मन बड़ा ऊँचा होगा, जिसको आप प्रभु की कथा सुना रहे हैं ? बोले कि नहीं, मेरे मन का एक ही विशेषण है । क्या ? मेरा मन बड़ा दुष्ट है । शंकरजी ने सुना तो आश्चर्य चकित हो गये । उन्होंने रोक लगा दी थी, दुष्ट को मत सुनाना । उन्होंने सोचा कि मैंनें दुष्टों को सुनाने पर रोक लगायी और इस दुष्ट ने दुष्ट मन को ही श्रोता बनाया, पर गोस्वामीजी का अभिप्राय यह है कि महाराज ! आप कैलाश शिखर की ऊँचाई पर रहते हैं, वहाँ तो दुष्ट जा ही नहीं सकेगा । हम जिस मनोभूमि में रहते हैं, वहाँ तो दुष्टता ही दुष्टता है । इस दुष्टता की मनोभूमि में अगर हम दुष्ट मन को कथा से वंचित करेंगे, तब तो फिर यह शिष्ट बन ही नहीं पायेगा, इसलिए कृपा कीजिए, गंगा जब ऊपर से नीचे आयेंगी, तभी तो इन दुष्टों की दुष्टता दूर होगी ।
No comments:
Post a Comment