भगवान ने यह जो तीन रूप बालि को दिखाया, इसका अभिप्राय क्या है ? वे बालि को अवसर देते हैं। बालि कहता है कि ब्रह्म सम है। भगवान सुग्रीव को भेजकर उसे अवसर देते हैं कि अगर तुम समझते हो कि ब्रह्म सम है तो तुम भी समत्व में आरूढ़ हो जाओ, पर तुम्हारे अन्तःकरण में तो भेदबुद्धि है। इस भेदबुद्धि से प्रेरित होकर तुमने जो कर्म किया, इसका परिणाम भी मैंने कर्मसिद्धान्त के ईश्वर के रूप में तुम्हें दे दिया और अब अंदर तुम्हें भक्ति का भगवान चाहिए तो लो मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूं। भक्ति भगवान की कृपा का पक्ष है, करुणा का पक्ष है। ज्ञान और कर्म का ईश्वर निराकार है, पर भक्ति का ईश्वर साकार है। वहाँ छिपना नहीं, प्रत्यक्ष होना ही ईश्वर का स्वरूप है। करुणासागर भगवान बालि के सामने खड़े हो गये। बालि पहले तो शास्त्रार्थ करता है, बड़ा तर्क - वितर्क करता है, पर जब भगवान के चुनाव करने का अवसर आया, तब उसने वेदांत के ब्रह्म और कर्मसिद्धान्त के ईश्वर के स्थान पर भक्ति के भगवान का ही चुनाव किया।
Thursday, 31 December 2015
Wednesday, 30 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
भगवान ने बड़ा अनोखा कार्य किया था। बालि की छाती पर जब बाण लगा और वह गिर पड़ा, तब प्रभु उसके सामने आ गये। यह उनकी कृपा का स्वरूप है। सामने आना कोई आवश्यक नहीं था। कर्म का फल दे दिया, वृक्ष की आड़ में खड़े रहते और बालि की मृत्यु हो जाती। भगवान का चुनाव भी बड़ा अद्भुत होता है। बालि के शिर पर बाण नहीं मारा। उसका शिर नहीं काटा। ह्रदय पर बाण मारा - यह सांकेतिक भाषा है। इसका अभिप्राय क्या है ? भगवान ने सोचा कि इसका शिर तो ठीक है अर्थात बुद्धि ठीक है, बातें तो ज्ञान की करता है, पर ह्रदय में अभिमान है। अभिमान नष्ट करना है, इसलिए ह्रदय पर बाण मारा और जैसे ही अभिमान नष्ट हुआ, वे प्रकट हो गये। अब वे वेदांत के ब्रह्म और कर्मसिद्धान्त के ईश्वर नहीं, बल्कि कृपालु ईश्वर भक्तों के भगवान के रूप में प्रकट हो गये। ये ईश्वर भक्तों के लिए अवतरित होते हैं, मनुष्यरूप में अवतार लेते हैं। बालि ज्यों ही गिरा। भगवान राघवेन्द्र तुरंत सामने प्रकट हो गये।
Tuesday, 29 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
सुग्रीव के जीवन में भगवान ने अपने दो रूपों का परिचय दिया, लेकिन बालि के सामने उन्होंने तीन रूपों का परिचय दिया। भगवान बालि के सामने नहीं गये, उन्होंने वृक्ष की आड़ से बाण चलाया। इसका अभिप्राय क्या है ? भगवान यह बताना चाहते थे कि कर्मसिद्धान्त का जो ईश्वर है, वह बिना सामने आये ही बाण चलाता है। भगवान का बाण क्या है ? गोस्वामीजी लंकाकाण्ड के प्रारंभ में कहते हैं - काल का धनुष, समय का बाण और उसको चलाने वाला है ईश्वर। यह ईश्वर छिपा हुआ है। सामने प्रत्यक्ष नहीं है। वृक्ष की आड़ में बाण चलाता है। यह वृक्ष क्या है ? वृक्ष की व्याख्या गोस्वामीजी ने विनयपत्रिका में की है - संसार एक घनघोर वन है और व्यक्ति के कर्म ही उसके वृक्ष हैं और इसका तात्पर्य यह है कि कर्मसिद्धान्त की मान्यता है कि ईश्वर कर्म का फल कर्म की आड़ से देता है। वह कालरूपी धनुष-बाण के माध्यम से जीव को कर्म का फल देता है। कर्म का फल देने वह प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आता। कर्मसिद्धान्त में यही ईश्वर का स्वरूप है। इसलिए जब बालि ने पूछा कि आपने मुझे छिपकर क्यों मारा ? सामने क्यों नहीं आये ? तो प्रभु ने कहा कि जब तुम कर्मसिद्धान्त को मानते हो और मुझे ईश्वर समझते हो, तो धर्मशास्त्र में तो यही कहा गया है कि ईश्वर कर्म की आड़ में फल देता है। वह फल देने के लिए प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आता। अतः मैंने तुम्हें कर्म की आड़ से तुम्हारे कर्म का फल दिया।
Sunday, 27 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
भगवान सुग्रीव को भी इसी प्रसंग में शिक्षा देते हैं। भगवान ने जब बालि को मारने की प्रतिज्ञा की तो सुग्रीव के मन में क्षणिक ज्ञान-वैराग्य आ गया। उन्होंने भगवान राम से कहा कि महाराज ! मैं तो समझता हूँ कि यह संसार मिथ्या है और अब मेरे मन में कोई भेद नहीं रह गया है। इसलिए अब ऐसी कृपा कीजिए कि सब कुछ छोड़कर मैं आपका भजन करूँ। भगवान को बड़ी हँसी आयी कि कहाँ तो मैं वेदांत के ब्रह्मपद को छोड़कर भक्तों के लिए अवतार लेकर आया हूँ, पक्षपाती बना हूँ और ये बन गये वेदान्ती। बड़ी विचित्र बात है, कह रहे हैं कि शत्रु-मित्र में कोई भेद नहीं रह गया। भगवान ने कहा कि जरा कसौटी पर कसकर देखें कि इसका ज्ञान-वैराग्य कितना पक्का है। बाद में बालि का मुक्का पड़ा। भगवान तो यही परीक्षा ले रहे थे कि मुक्का पड़ने पर भी अगर वैराग्य बना रहता है, तब तो वह पक्का है, पर उस मुक्के से सुग्रीव का ज्ञान-वैराग्य हवा हो गया। वास्तव में वह तो क्षणिक वैराग्य था। जब लौटकर आये तो भगवान ने कहा कि क्या करूँ ? इसमें भगवान का एक दूसरा व्यंग्य यह भी था कि भई ! एक वेदान्ती तो तुम्हारा भाई बालि है, जो कह रहा है कि ब्रह्म सम है और दूसरे वैराग्यवान तुम हो, जिसकी दृष्टि में शत्रु-मित्र में कोई भेद नहीं है। तो मैं भी ऐसे दो महान ज्ञानी और वैरागी में भला भेद क्यों करूँ ? तुम दोनों का हाल बिल्कुल एक जैसा है। इसलिए मैंने तुम दोनों के बीच हस्तक्षेप बिल्कुल नहीं किया, पर सुग्रीव के चरित्र में यही एक अच्छा पक्ष है कि वे अपनी भूल को तुरंत स्वीकार कर लेते हैं। कहते हैं - प्रभु ! यह मेरा भाई नहीं, शत्रु है, मेरा काल है, मेरी रक्षा कीजिए। सुग्रीव तुरन्त ज्ञानी से भक्त बन गये और श्रीराम वेदांत के ब्रह्म से भक्त के भगवान बन गये।
Saturday, 26 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
जब तारा ने बालि से कहा कि सुग्रीव आपको जो चुनौती दे रहा है, इस घटना के पीछे बल किसका है ? जरा इस पर तो ध्यान दीजिए। तो बालि ने कहा कि मैं जानता हूँ कि इसके पीछे भगवान श्रीराम का बल है। तब तारा ने कहा कि तब तो आपको और भी सावधान रहना चाहिए। उसने कहा कि तुम राम का नाम सुनकर घबरा गयीं, तुम नहीं जानती पर मुझे राम का ज्ञान है। तुम भीरू हो, डर जाती हो, तुम्हें सच्चा ज्ञान नहीं है। भगवान राम तो समदर्शी हैं। भगवान राम के समत्व का प्रतिपादन करके जब बालि चलने लगा तो गोस्वामीजी से किसी ने कहा कि वेदांत की कितनी बढ़िया बात आज बालि ने कही है, कम से कम आज तो इसे ज्ञानी की उपाधि दे दीजिए। गोस्वामीजी ने कहा कि यह ज्ञानी नहीं है ? बोले - यह महा अभिमानी है। अभिप्राय यह है कि अगर उसे सच्चा ज्ञान हो जाता तो समझ लेता कि वस्तुतः सुग्रीव में और मुझमें रंचमात्र भी भेद नहीं है। ज्ञान हो जाने पर तो उसमें ब्रह्म का समत्व आ जाता, पर उसमें यह वृत्ति आ गयी कि हम सुग्रीव को सतायेंगे और भगवान कुछ नहीं बोलेंगे।
Friday, 25 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
ईश्वर समदर्शी तो है, पर इस ज्ञान की प्रतिक्रिया या फल हमारे जीवन में क्या होना चाहिए ? यह होना चाहिए कि ब्रह्म समदर्शी है और हम ब्रह्म के अंश हैं। जीव ब्रह्म से अभिन्न है, ऐसा बोध होने पर अगर हमारे अन्तःकरण में समत्व आ जाय तो ब्रह्म के समत्व का ज्ञान बड़ा सार्थक और कल्याणकारी हो, पर यदि हम उल्टा अर्थ ले लें, तब तो यह समत्व का ज्ञान बड़ा खतरनाक है। क्यों ? पता चल गया कि भगवान सम है, पाप और पुण्य, दोनों में तटस्थ है तो प्रसन्न हो गये कि खूब पाप करो, क्योंकि जब वे सम हैं तब तो वे पाप और पुण्य में भेद करेंगे नहीं। बालि ने यही अर्थ लिया। भगवान अगर सम हैं तो मैं सुग्रीव पर प्रहार करता रहूँगा और भगवान देखते रहेंगे। इसका अभिप्राय यह है कि ब्रह्म के समत्व का ज्ञान अगर किसी व्यक्ति को समाज में अत्याचारी बना दे और उस समत्व ज्ञान की आड़ में व्यक्ति मनमाना आचरण करने लगे तो उसका क्या परिणाम होगा ? उसका परिणाम दिखाई देता है बालि के जीवन में।
Thursday, 24 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्......
प्रभु की कृपादृष्टि बालि और सुग्रीव दोनों पर है। वे दोनों का कल्याण कर रहे हैं। एक ओर सुग्रीव हैं, जिन्हें भगवान राम युद्ध के लिए प्रेरित कर रहे हैं और उनकी दुर्बलताओं को धीरे - धीरे दूर कर रहे हैं और दूसरी ओर तो बड़ी अनोखी बात देखने में आती है। सुग्रीव को वे यह कहकर युद्ध करने भेज देते हैं कि बालि को वे मारेंगे, पर उस युद्ध में जब बालि सुग्रीव पर प्रहार करता है तब भगवान कोई हस्तक्षेप नहीं करते। बड़ा अनोखा कार्य है प्रभु का। बेचारे सुग्रीव बालि के मर्मान्तक प्रहार से अत्यधिक कष्टिक होकर अपने स्वभाव के अनुसार भागे और भगवान के पास आकर उलाहना देते हुए बोले कि महाराज! आपने तो कहा था - मैं एक ही बाण से बालि को मारूँगा , पर बालि मुझ पर प्रहार करता रहा और आपने उसे नहीं मारा, तो इस पर भगवान ने कहा कि समस्या यह हो गयी- मैं पहचान नहीं पाया कि कौन बालि है और कौन सुग्रीव। इसलिए मैंने नहीं मारा। यह वेदांत का ब्रह्म है। यहाँ पर भगवान ने बालि को अपने तीन रूपों का दर्शन कराया- वेदांत का ब्रह्म, कर्म सिध्दांत का ईश्वर और भक्ति का भगवान। और वे इन तीन रूपों में से किसी एक रूप को चुनने की उसे स्वतंत्रता दे देते हैं कि इनमें से जो रूप तुम्हें अभीष्ट हो उसे स्वीकार कर लो।
Wednesday, 23 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
गीता और रामायण दोनों का दर्शन यही है। गीता में भगवान अर्जुन को इसी सत्य का साक्षात्कार कराते हैं। महाभारत के रणांगन में उन समस्त योद्धाओं को किसने मारा ? मारा तो भगवान ने। क्योंकि भगवान ने अर्जुन को अपने विराट रूप का दर्शन कराया, तो उसमें अर्जुन ने देखा कि सारे योद्धा मरे पड़े हैं। अर्जुन ने पूछा कि महाराज! इन्हें मारा किसने ? भगवान बोले , मैंने। तो अब मुझे नहीं मारना पड़ेगा। बोले कि नहीं, पर लड़ना तो तुम्हें ही पड़ेगा। मैंने भले ही इन्हें पहले से ही मार दिया है, पर युद्ध तो तुम्हें ही करना है और यही भगवान की प्रेरणा है। कर्म तुम करो, पर परिणाम तो मैं ही दूँगा। लड़ना कर्म है और अन्त में परिणाम विजय है। अगर मैं जीव से कह दूँ कि तुम मत लड़ो, तब तो वह तमोगुणी और निष्क्रिय हो जायेगा और यदि वह यह जान ले कि विजय भी उसके बस की बात है, तो उसके अन्तःकरण में अभिमान आ जायेगा।
Tuesday, 22 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
पहले भगवान श्री राघवेन्द्र सुग्रीव को बालि से लड़ने भेजते हैं। वहाँ भी बड़ी अनोखी दार्शनिक और मधुर बात आती है। क्या ? भगवान ने प्रतिज्ञा की - मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि बालि को एक ही बाण से मारूँगा। सुग्रीव बड़े प्रसन्न हुए, पर भगवान ने बड़ी अनोखी लीला की। क्या ? सुग्रीव से कहा कि तुम गर्जना करके बालि को चुनौती दो और उससे युद्ध करो। सुग्रीव तो आश्चर्य से मुँह ताकने लगे। बोले कि महाराज ! बालि को मारेगा कौन ? प्रभु बोले कि मैं मारूँगा , लेकिन लड़ोगे तुम। यह तो बड़ी विचित्र बात है, पर यही तो दर्शन है। यह बड़े महत्व की बात है। जब भगवान ने प्रतिज्ञा की कि वे बालि को मारेंगे तो उन्हें चाहिए था कि वे स्वयं बालि को चुनौती देते, युद्ध करते और उसे मार डालते, पर भगवान कहते हैं कि लड़ना तो तुम्हें ही है और मारना मुझे है। यह सत्य केवल सुग्रीव के संदर्भ में नहीं, यह तो सबके जीवन का सत्य है। अभिप्राय यह है कि वास्तव में बालि के विजेता तो भगवान राम ही हैं, पर सुग्रीव उसके निमित्त बने। सुग्रीव इस दर्शन को स्वीकार कर लेते हैं। यह बोध ही भक्ति का स्वरूप है, जिसे भगवान सुग्रीव के जीवन में क्रमशः विकसित करते हैं।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्........
पहले भगवान श्री राघवेन्द्र सुग्रीव को बालि से लड़ने भेजते हैं। वहाँ भी बड़ी अनोखी दार्शनिक और मधुर बात आती है। क्या ? भगवान ने प्रतिज्ञा की - मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि बालि को एक ही बाण से मारूँगा। सुग्रीव बड़े प्रसन्न हुए, पर भगवान ने बड़ी अनोखी लीला की। क्या ? सुग्रीव से कहा कि तुम गर्जना करके बालि को चुनौती दो और उससे युद्ध करो। सुग्रीव तो आश्चर्य से मुँह ताकने लगे। बोले कि महाराज ! बालि को मारेगा कौन ? प्रभु बोले कि मैं मारूँगा , लेकिन लड़ोगे तुम। यह तो बड़ी विचित्र बात है, पर यही तो दर्शन है। यह बड़े महत्व की बात है। जब भगवान ने प्रतिज्ञा की कि वे बालि को मारेंगे तो उन्हें चाहिए था कि वे स्वयं बालि को चुनौती देते, युद्ध करते और उसे मार डालते, पर भगवान कहते हैं कि लड़ना तो तुम्हें ही है और मारना मुझे है। यह सत्य केवल सुग्रीव के संदर्भ में नहीं, यह तो सबके जीवन का सत्य है। अभिप्राय यह है कि वास्तव में बालि के विजेता तो भगवान राम ही हैं, पर सुग्रीव उसके निमित्त बने। सुग्रीव इस दर्शन को स्वीकार कर लेते हैं। यह बोध ही भक्ति का स्वरूप है, जिसे भगवान सुग्रीव के जीवन में क्रमशः विकसित करते हैं।
Monday, 21 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
बड़ी विलक्षण बात है। जब तक बालि विजेता रहा, तब तक वह सत्य से दूर रहा और जब उसके जीवन में पराजय हुई तब उस पराजय के क्षण में उसके समक्ष सत्य का, तत्वज्ञान का उदय हुआ। इस पूरे प्रसंग में बालि के चरित्र का क्रमिक विकास दिखाई देता है। यह ज्ञान का संदर्भ है। शरीर का परित्याग करते समय बालि को रंचमात्र भी दुःख नहीं होता। यह बालि के चरित्र का चरम विकास है, उसके जीवन की सर्वोत्कृष्ट परिणति है। कहीं तो वह रावण को पराजित करके उसे मित्र बना लेता है, कहीं दुन्दुभि को मारकर भी वह पुरस्कार के स्थान पर शाप पा लेता है। अनगिनत विजय प्राप्त करके उसके अभिमान की ही वृद्धि होती चली जाती है, यह है सत्कर्म के साथ जुड़ी हुई समस्या। बालि सत्कर्म और पुण्य का प्रतीक है। सत्कर्म और पुण्य के साथ आने वाली समस्याओं को बालि के चरित्र के माध्यम से प्रकट किया गया है।
Sunday, 20 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
बालि ने अनेक राक्षसों को मारा, लेकिन उसकी विजय संसार के लिए कल्याणकारी न होकर उसके अहंकार को बढ़ाने वाली ही होती थी। इससे संबंधित एक सांकेतिक कथा है। ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव रहते थे। उनसे प्रभु ने पूछा कि बालि जब सर्वत्र तुम्हारा पीछा करता रहा, तो यहाँ क्यों नहीं आया ? सुग्रीव ने बताया कि बालि को शाप है कि वह इस पर्वत पर नहीं आ सकेगा। यह बड़ी सांकेतिक कथा है। दुन्दुभि नाम के एक राक्षस ने बालि को चुनौती दी थी। बालि ने युद्ध में उसे मार डाला। इसी प्रसंग में मुनियों ने उसे शाप दिया था। इससे बढ़कर दुर्भाग्य की बात क्या हो सकती है ? राक्षस का नाश करने वाले को मुनियों से साधुवाद और आशीर्वाद मिलना चाहिए या शाप ? पर कथा बड़ी सांकेतिक है। राक्षस को मारने के बाद तो बालि को आशीर्वाद अवश्य मिला होता, पर राक्षस को मारने के बाद उसने जो किया, वह उसके लिए दुर्भाग्यपूर्ण हो गया। क्यों ? बालि ने सोचा कि मैंने दुन्दुभि को मार तो डाला, पर देखा किसने ? तो ऐसा करें कि जरा लोग देखें। ऋष्यमूक पर्वत पर बहुत से ऋषि-मुनि रहते थे। इस शव को वहीं फेंक दें, ताकि लोग देख लें कि हमने कितनी बड़ी विजय पायी है। और उसने दुन्दुभि का शव उठाकर ऋषि-मुनियों के आश्रम में फेंक दिया। परिणाम क्या हुआ ? मुनियों का सारा आश्रम अपवित्र हो गया। इससे क्रुद्ध होकर ऋषियों ने शाप दे दिया कि जिस व्यक्ति ने ऐसा किया है, वह यदि इस पर्वत पर आयेगा तो उसकी मृत्यु हो जायेगी। बड़ा सूक्ष्म संकेत है। सत्कर्म में अगर दम्भ और अभिमान सम्मिलित हो जाय, व्यक्ति अगर सत्कर्म को भी प्रदर्शन की वस्तु बना ले, तब क्या होगा ? जो लोग सत्कर्म करके दिखावा करते हैं, वे अन्यत्र तो सम्मान प्राप्त करने के अधिकारी हैं, पर ऋष्यमूक पर्वत पर जाने के अधिकारी नहीं हैं। वे तो वस्तुतः शाप और मृत्यु के ग्रास बनने के अधिकारी हैं।
Saturday, 19 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
दो शब्द हैं - मुक्ति और जीवनमुक्ति। मुक्ति तो रावण की भी हुई, पर कब ? जब उसके शरीर का नाश हुआ। इसका अभिप्राय यह है कि उसने अपने को शरीर की सीमा में घेर रखा था। शरीर से अलग होने पर ही रावण मुक्त हुआ, पर गीधराज की विशेषता यह है कि जीवित रहते हुए भी शरीर में रहते हुए भी वे मुक्त हैं, क्योंकि शरीर के बंधन को उन्होंने स्वीकार ही नहीं किया। उन्होंने भगवान से कह दिया कि अब इस शरीर को रखने की आवश्यकता नहीं है। इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि एक ओर तो मृत्यु का विजेता रावण है, जो मृत्यु का ग्रास होने जा रहा है और दूसरी ओर मृत्यु का ग्रास बन जाने वाले गीधराज हैं, जो मृत्यु के पूर्व ही मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। वे जानते हैं कि शरीर तो नाशवान है, अनित्य है। नित्य और अनित्य के भेद को जान लेने के कारण अपने विवेक से उन्होंने काल के दुःख को जीत लिया। इसलिए उनके होंठों पर हँसी आ गयी। सामने मृत्यु खड़ी होने पर भी उन्हें दुःख नहीं है।
Friday, 18 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
जब भगवान गीधराज से यह प्रस्ताव करते हैं - मेरे विचार से आप कुछ दिन और जीवित रहें। आप इस पुत्र की सेवा का सुख देखें और मुझे पिता का आनन्द दें। गोस्वामीजी ने यहाँ बड़ी अनोखी बात कही है। ईश्वर सच्चिदानन्द है, आनन्दघन है और जीव के जीवन में हर्ष-विषाद, सुख-दुःख आदि लगे रहते हैं, परन्तु यहाँ तो दृश्य ही उल्टा है - ईश्वर रो रहे हैं और जीव हँस रहा है। इससे बढ़कर विचित्र दृश्य और क्या होगा ? भगवान राम आँसू बहा रहे हैं और गीधराज जिनके पंख कटे हुए हैं, इतने कष्ट में हैं, भगवान उनसे जीवित रहने का प्रस्ताव करते हैं। सुनकर उन्हें हँसी आ गयी। भगवान का प्रस्ताव उन्होंने स्वीकार नहीं किया। इसका तात्पर्य क्या है ? प्रभु श्रीराम ने कहा कि आप कुछ दिन और जीवित रहिए। इसका अर्थ है कि उसके बाद मरिए। तो कभी न कभी मरना ही पड़ेगा। मृत्यु तो अवश्सम्भावी है, तो फिर आज मैं इस सार्थक मृत्यु को क्यों छोड़ दूँ ? इस शरीर का जो सर्वश्रेष्ठ उपयोग हो सकता था, वह हो गया। पवित्र कार्य में मेरा शरीर उत्सर्ग हो गया और इस समय मुझे आपका दर्शन हो रहा है। जिनका नाम स्मरण करना भी कठिन है, उनका साक्षात दर्शन हो रहा है। ऐसी विलक्षण मृत्यु को छोड़ दूँ, तो मुझसे बढ़कर अभागा और कौन होगा ?
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
जब भगवान गीधराज से यह प्रस्ताव करते हैं - मेरे विचार से आप कुछ दिन और जीवित रहें। आप इस पुत्र की सेवा का सुख देखें और मुझे पिता का आनन्द दें। गोस्वामीजी ने यहाँ बड़ी अनोखी बात कही है। ईश्वर सच्चिदानन्द है, आनन्दघन है और जीव के जीवन में हर्ष-विषाद, सुख-दुःख आदि लगे रहते हैं, परन्तु यहाँ तो दृश्य ही उल्टा है - ईश्वर रो रहे हैं और जीव हँस रहा है। इससे बढ़कर विचित्र दृश्य और क्या होगा ? भगवान राम आँसू बहा रहे हैं और गीधराज जिनके पंख कटे हुए हैं, इतने कष्ट में हैं, भगवान उनसे जीवित रहने का प्रस्ताव करते हैं। सुनकर उन्हें हँसी आ गयी। भगवान का प्रस्ताव उन्होंने स्वीकार नहीं किया। इसका तात्पर्य क्या है ? प्रभु श्रीराम ने कहा कि आप कुछ दिन और जीवित रहिए। इसका अर्थ है कि उसके बाद मरिए। तो कभी न कभी मरना ही पड़ेगा। मृत्यु तो अवश्सम्भावी है, तो फिर आज मैं इस सार्थक मृत्यु को क्यों छोड़ दूँ ? इस शरीर का जो सर्वश्रेष्ठ उपयोग हो सकता था, वह हो गया। पवित्र कार्य में मेरा शरीर उत्सर्ग हो गया और इस समय मुझे आपका दर्शन हो रहा है। जिनका नाम स्मरण करना भी कठिन है, उनका साक्षात दर्शन हो रहा है। ऐसी विलक्षण मृत्यु को छोड़ दूँ, तो मुझसे बढ़कर अभागा और कौन होगा ?
Thursday, 17 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
पूर्व विषय के आगे .....
गीधराज जटायु और रावण का युद्ध हुआ और उस युद्ध में ऐसा लगा जैसे रावण जीत गया और जटायु हार गये। रावण ने अपने कृपाण से उनके पंख काट दिये और वे पृथ्वी पर गिर पड़े, लेकिन कितनी विलक्षण बात है। जीता कौन और हारा कौन ? देखने में तो यही लगता है कि रावण जीत गया और गीधराज हार गये, किन्तु यदि अंतरंग में पैठकर देखें तो एक दूसरा ही सत्य सामने आता है। गीधराज गिरकर जमीन पर पड़े हैं। पक्षी का पंख कट जाना माने उसके जीवन में व्यर्थ हो जाना है, लेकिन गोस्वामीजी कहते हैं कि यहाँ तो दूसरा दृश्य है। क्या ? कुछ देर बाद जटायु ने देखा कि भगवान राम चले आ रहे हैं। गदगद हो गये। सोचा कि चलो पंख कटना भी सार्थक हो गया। कैसे ? पंख होता तो मुझे उड़कर भगवान के पास जाना पड़ता। अब पंख नहीं हैं तो प्रभु स्वयं चलकर मेरे पास आ रहे हैं। पंख की सार्थकता अर्थात साधना की सार्थकता ईश्वर को पाने में है, पर जहाँ साधना और पुरुषार्थ की सीमा समाप्त हो गयी तो भगवान स्वयं कृपा करके आ गये।
Wednesday, 16 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
तुलसीदासजी से किसी ने पूछा कि घोड़े पर बैठे हुए श्रीराम को देखने के लिए कौन-कौन आया ? तो उन्होंने कहा कि भई ! श्रीराम की इस झाँकी का दर्शन करने के लिए वैसे तो देवता, मुनि तथा मनुष्य आदि सभी आये, किन्तु सबसे विशेष बात यह है कि प्रभु के इस रूप का साक्षात्कार करने के लिए भगवान शंकर भी आये जो कि सर्वदा समाधि में लीन रहते हैं। गोस्वामीजी का तात्पर्य है कि भगवान शंकर ने विचार किया कि अब इस मन को एकाग्र करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि जब भगवान को भी चंचल घोड़े की आवश्यकता है तो फिर हम इस चंचल को अचंचल क्यों बनायें ? आगे अश्व का वर्णन करते हुए गोस्वामीजी कहते हैं कि यह कोई साधारण घोड़ा नहीं है। अपितु यह तो साक्षात कामदेव ही घोड़े के वेश बनाकर प्रभु की सेवा में आ गया है। गोस्वामीजी इस प्रसंग के माध्यम से मानो यह बताना चाहते हैं कि जिस काम ने आज तक संसार पर शासन किया, उस मनोज की लगाम हमें ईश्वर के हाथों में सौंप देना चाहिए। हमारे अन्तःकरण में यदि कहीं यह दूल्हा सचमुच आ जाये, तथा आकर हमारे मन और मनोज के घोड़े पर बैठ उसकी लगाम को कसकर पकड़ ले तो हमारे अन्तःकरण की चंचलता का भी सदुपयोग हो सकता है।
Tuesday, 15 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
रामचरितमानस में गोस्वामीजी ने भगवान श्री राघवेन्द्र तथा विदेहनन्दिनी श्रीसीताजी के विवाह का बड़ा ही मधुर चित्र प्रस्तुत किया। किन्तु अनोखापन यह है कि उस वर्णन में वे अपनी लेखनी के माध्यम से एक ओर तो दिव्य रस की सृष्टि करते हैं, तथा दूसरी ओर वे उसमें अपनी दार्शनिक शैली को अवश्य जोड़ देते हैं। यह भगवान श्रीराम का विवाह जो त्रेतायुग का सत्य है, उसे हम केवल त्रेतायुग या भूतकाल के सत्य के रूप में ही देखने की चेष्टा न करें, अपितु प्रयत्न तो यह करना चाहिए कि भूतकाल का यह सत्य हमारे वर्तमान जीवन का सत्य बन जाय। त्रेतायुग में महाराज श्री जनक के मण्डप में संपन्न होने वाले उस विवाह की समग्र प्रक्रिया हमारे जीवन में ही संपन्न हो जाय। हम स्वयं जनक बन जायँ, सुनयना बन जायँ, अथवा जनकपुरवासिनी स्त्रियों में से कोई भावमयी स्त्री बनकर भगवान से नाता जोड़ सकें।
गोस्वामीजी कहते हैं कि वस्तुतः श्रीराम को दूल्हा बनाने में लाभ-ही-लाभ है। आपने देखा होगा कि विवाह की एक परम्परा है कि दूल्हा घोड़े पर बैठकर चलता है। जब दूल्हे के रूप में श्रीराम का साक्षात्कार हुआ तो तुलसीदासजी कहते हैं कि अब बहुत अच्छा दुल्हा मिला; बस ! इनको तुरन्त ही घोड़े पर बैठा दो। एक पाठक ने गोस्वामीजी से पूछा कि महाराज ! जरा यह तो बता दीजिए कि यह घोड़ा अयोध्या का है कि जनकपुर का ? तो उन्होंने कहा कि भई! यह घोड़ा न तो जनकपुर का है और न ही अयोध्या का, अपितु यह घोड़ा तो प्रभु को हम लोगों ने ही दिया है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति के पास एक-एक घोड़ा विद्यमान है तथा हम यदि प्रभु का विवाह अपने अन्तःकरण के मण्डप में संपन्न कराना चाहें तो भगवान श्रीराघवेन्द्र को उस अश्व पर विराजमान कर सकते हैं। जब दूल्हा के वेश में श्रीराम ड्योढ़ी पर खड़े थे तो तुलसीदासजी ने ने तुरन्त अपने मन का घोड़ा श्रीराघवेन्द्र के समक्ष खड़ा कर दिया तथा कहा कि महाराज इस अवसर पर आपको चंचल घोड़ा ही तो चाहिए इसलिए इस चंचल मन के घोड़े पर बैठ जाइये न ! इस घोड़े अर्थात मन को हम वश में करने का प्रयास करें इसके स्थान पर यदि आप ही इसे अपने वश में कर लें तो सबसे अच्छा रहेगा।
गोस्वामीजी कहते हैं कि वस्तुतः श्रीराम को दूल्हा बनाने में लाभ-ही-लाभ है। आपने देखा होगा कि विवाह की एक परम्परा है कि दूल्हा घोड़े पर बैठकर चलता है। जब दूल्हे के रूप में श्रीराम का साक्षात्कार हुआ तो तुलसीदासजी कहते हैं कि अब बहुत अच्छा दुल्हा मिला; बस ! इनको तुरन्त ही घोड़े पर बैठा दो। एक पाठक ने गोस्वामीजी से पूछा कि महाराज ! जरा यह तो बता दीजिए कि यह घोड़ा अयोध्या का है कि जनकपुर का ? तो उन्होंने कहा कि भई! यह घोड़ा न तो जनकपुर का है और न ही अयोध्या का, अपितु यह घोड़ा तो प्रभु को हम लोगों ने ही दिया है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति के पास एक-एक घोड़ा विद्यमान है तथा हम यदि प्रभु का विवाह अपने अन्तःकरण के मण्डप में संपन्न कराना चाहें तो भगवान श्रीराघवेन्द्र को उस अश्व पर विराजमान कर सकते हैं। जब दूल्हा के वेश में श्रीराम ड्योढ़ी पर खड़े थे तो तुलसीदासजी ने ने तुरन्त अपने मन का घोड़ा श्रीराघवेन्द्र के समक्ष खड़ा कर दिया तथा कहा कि महाराज इस अवसर पर आपको चंचल घोड़ा ही तो चाहिए इसलिए इस चंचल मन के घोड़े पर बैठ जाइये न ! इस घोड़े अर्थात मन को हम वश में करने का प्रयास करें इसके स्थान पर यदि आप ही इसे अपने वश में कर लें तो सबसे अच्छा रहेगा।
Monday, 14 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
आज अगहन मास शुक्ल पक्ष चतुर्थी है, कल पंचमी भगवान श्री सीताराम का विवाह है, इसलिए विषयांतर होते हुए आइये परम पूज्य गुरुदेव भगवान की दृष्टि से विवाह प्रसंग में प्रवेश करें -
विवाह का तात्पर्य है संबंध की स्थापना। जिस समय जनकपुरवासिनी स्त्रियों की दृष्टि भगवान श्रीराम के सौन्दर्य पर जाती है उस समय उन सबके अन्तःकरण में एक बड़ी विचित्र आकांक्षा उत्पन्न होती है। यद्यपि किसी आकर्षक वस्तु को देखकर उसे प्राप्त करने की अभिलाषा अस्वाभाविक नहीं कही जा सकती, और यदि गोस्वामीजी ऐसा लिखते कि भगवान श्री राघवेन्द्र के सौन्दर्य को देखकर जनकपुरवासिनी स्त्रियाँ सम्मोहित हो गयीं तथा उनके अन्तर्मन में श्रीराम के प्रति आकर्षण उत्पन्न हुआ, तो स्वाभाविक ही होता। लेकिन तुलसीदासजी उसे एक भिन्न रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि श्रीराम का सौन्दर्य देखकर जनकपुरवासिनी स्त्रियों को विदेहनन्दिनी के सौन्दर्य की स्मृति हो जाती है, तथा प्रत्येक स्त्री के अन्तःकरण में यही संकल्प स्फुरित होता है कि यदि श्रीराम का विवाह सीता से हो जाय तो कितना अच्छा हो। जब उनसे पूछा गया कि यदि सीता का श्रीराम से विवाह हो जायेगा तो इससे आप लोगों को क्या लाभ होगा ? तब उन सखियों ने यही कहा कि इसमें लाभ-हानि का प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि हमारे अन्तःकरण में तो केवल इनसे संबंध जोड़ने की आकांक्षा है। किसी रसिक भक्त ने प्रश्न कर दिया कि यदि सीताजी से विवाह होगा तब तो विदेहनन्दिनी से श्रीराम का नाता जुड़ेगा, तुम्हारा संबंध तो जुड़ेगा नहीं; और आप लोगों को तो स्वयं का नाता जोड़ना चाहिए, न कि जनकनन्दिनी का ? तो सखियाँ कहती हैं कि ना-ना ! इन्हें देखकर तो हमारे अन्तःकरण में यह निश्चय हो गया कि इनसे सीधे नाता नहीं जोड़ना चाहिए, अपितु श्रीराम से संबंध तो विदेहनन्दिनी के माध्यम से ही जोड़ना उचित रहेगा। जनकपुरवासिनी स्त्रियों को यह भलीभाँति ज्ञात है कि ईश्वर से यदि संबंध जुड़ेगा तो श्रीसीताजी के नाते से ही जुड़ेगा, सीधे हमारे नाते से नहीं। अगर भक्ति-स्वरूपा श्रीजानकीजी से हमारा नाता नहीं होगा तो समस्त विशेषताओं के होते हुए भी हम लोग प्रभु को आकृष्ट करने में समर्थ नहीं होंगे। इस विवाह का मुख्य तात्पर्य है जीव और ईश्वर में संबंध स्थापित करना, और संबंध स्थापित करने के लिए जिस मूल केन्द्र की अपेक्षा है वही जनकनन्दिनी श्रीसीता हैं।
विवाह का तात्पर्य है संबंध की स्थापना। जिस समय जनकपुरवासिनी स्त्रियों की दृष्टि भगवान श्रीराम के सौन्दर्य पर जाती है उस समय उन सबके अन्तःकरण में एक बड़ी विचित्र आकांक्षा उत्पन्न होती है। यद्यपि किसी आकर्षक वस्तु को देखकर उसे प्राप्त करने की अभिलाषा अस्वाभाविक नहीं कही जा सकती, और यदि गोस्वामीजी ऐसा लिखते कि भगवान श्री राघवेन्द्र के सौन्दर्य को देखकर जनकपुरवासिनी स्त्रियाँ सम्मोहित हो गयीं तथा उनके अन्तर्मन में श्रीराम के प्रति आकर्षण उत्पन्न हुआ, तो स्वाभाविक ही होता। लेकिन तुलसीदासजी उसे एक भिन्न रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि श्रीराम का सौन्दर्य देखकर जनकपुरवासिनी स्त्रियों को विदेहनन्दिनी के सौन्दर्य की स्मृति हो जाती है, तथा प्रत्येक स्त्री के अन्तःकरण में यही संकल्प स्फुरित होता है कि यदि श्रीराम का विवाह सीता से हो जाय तो कितना अच्छा हो। जब उनसे पूछा गया कि यदि सीता का श्रीराम से विवाह हो जायेगा तो इससे आप लोगों को क्या लाभ होगा ? तब उन सखियों ने यही कहा कि इसमें लाभ-हानि का प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि हमारे अन्तःकरण में तो केवल इनसे संबंध जोड़ने की आकांक्षा है। किसी रसिक भक्त ने प्रश्न कर दिया कि यदि सीताजी से विवाह होगा तब तो विदेहनन्दिनी से श्रीराम का नाता जुड़ेगा, तुम्हारा संबंध तो जुड़ेगा नहीं; और आप लोगों को तो स्वयं का नाता जोड़ना चाहिए, न कि जनकनन्दिनी का ? तो सखियाँ कहती हैं कि ना-ना ! इन्हें देखकर तो हमारे अन्तःकरण में यह निश्चय हो गया कि इनसे सीधे नाता नहीं जोड़ना चाहिए, अपितु श्रीराम से संबंध तो विदेहनन्दिनी के माध्यम से ही जोड़ना उचित रहेगा। जनकपुरवासिनी स्त्रियों को यह भलीभाँति ज्ञात है कि ईश्वर से यदि संबंध जुड़ेगा तो श्रीसीताजी के नाते से ही जुड़ेगा, सीधे हमारे नाते से नहीं। अगर भक्ति-स्वरूपा श्रीजानकीजी से हमारा नाता नहीं होगा तो समस्त विशेषताओं के होते हुए भी हम लोग प्रभु को आकृष्ट करने में समर्थ नहीं होंगे। इस विवाह का मुख्य तात्पर्य है जीव और ईश्वर में संबंध स्थापित करना, और संबंध स्थापित करने के लिए जिस मूल केन्द्र की अपेक्षा है वही जनकनन्दिनी श्रीसीता हैं।
Sunday, 13 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
रावण की तरह असुरों की भाँति अगर कोई व्यक्ति काल को जितने की चेष्टा करेगा तो वह कालजन्य दुःख को कभी नहीं जीत पायेगा। कालजन्य दुःख को जीतने में विवेक ही सहायक है। जिस व्यक्ति में विवेक है, वही कालजन्य दुःख से बच सकता है। इसलिए रामचरितमानस में सर्वत्र यह संकेत दिया गया है कि कालजन्य दुःख पर विजय पाने के लिए देह को अमर बनाने की चेष्टा सही उपाय नहीं है, वह तो देहासक्ति से ऊपर उठकर ही प्राप्त की जा सकती है। इस प्रयास में जहाँ रावण के जीवन में असफलता दिखाई देती है, वहीं रामायण के ऐसे दो पात्र हैं, जिनके सामने यह प्रस्ताव रखा गया कि वे जीवित रहें, पर उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। वे दो पात्र हैं गीधराज जटायु और बालि।
Saturday, 12 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
रामायण में बड़ी अच्छी बात कही गयी है। विभिषण ने भगवान राम से कहा कि प्रभो ! रावण यज्ञ कर रहा है। तो यह तो बड़ी अच्छी बात है। जो यज्ञ नष्ट करता था, अब वह यज्ञ कर रहा है, पर विभिषण आगे कहते हैं - अगर उसका यज्ञ सिद्ध हो गया, तो वह अभागा मरेगा नहीं। पढ़कर बड़ा विचित्र लगता है। नहीं मरेगा तो भाग्यवान है कि अभागा है ? कोई चिरायु होता है तो लोग कहते हैं कि वह बड़ा भाग्यवान है। कोई अल्पायु होता है तो कहते हैं, उसका भाग्य अल्प था, पर विभिषण बड़ी सार्थक बात कहते हैं। विभिषण के कहने का अभिप्राय यह है कि जिस मृत्यु से मनुष्य को मुक्ति मिलने वाली है, उस मृत्यु को टालते जाना कितना दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे बढ़कर दुर्भाग्य रावण का और क्या होगा कि मुक्तिदाता के रूप में साक्षात श्रीराम खड़े हैं और रावण को शरीर से मुक्त करना चाहते हैं, पर रावण तो उस देह के बंधन में और अधिक बँधता जा रहा था। इससे बढ़कर दुर्भाग्य की पराकाष्ठा रावण के लिए और क्या होगी ?
Friday, 11 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
रामचरितमानस में एक ओर रावण जैसा पात्र है, जो शरीर को अमर बनाने की चेष्टा करता है और अन्त में मृत्यु का ग्रास बन जाता है। इतना ही नहीं, बल्कि जिस शरीर को रावण अमर बना लेना चाहता है, उस शरीर की अन्तिम परिणति क्या है ? उस ओर इंगित करते हुए बड़ी सांकेतिक भाषा में कहा गया है कि लंका का रणांगन रावण के शिर और भुजाओं से पटा पड़ा है। इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि रावण ने अमरता का अर्थ ले लिया शरीर की अमरता से और भगवान शंकर को शिर चढ़ाकर उनसे यह वरदान प्राप्त कर लिया कि शिर कटने के बाद फिर नया शिर निकल आये। यह वरदान पाकर वह बड़ा प्रसन्न हुआ और सोचने लगा कि अब तो मैंने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लिया, काल की समस्या का समाधान मिल गया। क्योंकि व्यक्ति के शिर कटने पर उसकी मृत्यु हो जाती है, पर मेरा शिर कटने पर नया शिर निकल आयेगा और मेरी मृत्यु नहीं होगी, लेकिन रावण का गणित उल्टा सिद्ध हुआ। रावण जब भगवान से युद्ध करता है तो भगवान उसका शिर काट देते हैं, पर जैसे ही उसका शिर कटता, एक नया शिर निकल आता। रावण पर इसका क्या प्रभाव पड़ा ? उसने कहा कि बस, राम इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। अधिक से अधिक यह शिर ही काट सकता है, पर शिर काटने से तो मैं मरा नहीं, मेरा नया शिर निकल आया, तब इस मूढ़ता के कारण रावण के शव की ऐसी दुर्दशा हुई, वैसी तो सारी सृष्टि में साधारण से साधारण व्यक्ति की भी नहीं होती। लंका का सारा रणांगन रावण के शिर और भुजाओं से पट गया। मंदोदरी बड़े दुखपूर्वक देखती है कि चील-गीध मँडरा रहे हैं, सियार-कुत्ते दौड़ रहे हैं और रावण के शिर और भुजाओं को नष्ट कर रहे हैं। इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि शरीर तो अनित्य है ही, पर उसे अमर बनाने की चेष्टा में उसकी अन्तिम परिणिति अतीव विभत्स हो सकती है, बड़ी दुर्गति हो सकती है। रावण के लिए वरदान भी अभिशाप बन गया।
Thursday, 10 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
एक प्रकार का दुःख है मृत्यु, जिसे हम कालजन्य दुःख कह सकते हैं। वैसे तो काल शब्द का अर्थ बड़ा व्यापक है, पर दृष्टांत के लिए यहाँ समझें कि कालकृत दुःख का अभिप्राय है मृत्यु का दुःख। अब इस दुःख पर विचार करें। मृत्यु अवश्सम्भावी है। जन्म लेने पर मृत्यु अवश्य होगी। यह अत्यंत स्वाभाविक है। इससे बचा नहीं जा सकता। इस दुःख को दूर करने का प्रयास व्यक्ति दो प्रकार से कर सकता है। एक तरह से रावण ने भी इस दुःख पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न किया। यह असुरों की पद्धति है। असुरों ने सोचा कि अगर हम अमर हो जायँ, हमारा शरीर अमर हो जाय, तो हम काल पर विजय प्राप्त कर लेंगे। शरीर को अमर बनाने के लिए स्वस्थ रहने का प्रयत्न करें। वेदों में भी कहा गया कि व्यक्ति सौ वर्षों तक जीवित रहने की आकांक्षा करे। स्वथ्य रहकर सत्कर्मों के द्वारा सौ वर्षों के जीवन का सदुपयोग करे, पर इस सौ वर्षों तक जीवित रहने की इच्छा का अर्थ क्या है ? इसमें भी एक सीमा है। इसका अभिप्राय यह है कि व्यक्ति भूल से भी सदा-सर्वदा के लिए शरीर को जीवित रखने की आकांक्षा न पाल ले। क्योंकि व्यक्ति जब भी शरीर को अमर बना लेने का प्रयत्न करेगा, तो उसे जीवन में उसी प्रकार निराशा मिलेगी जैसा कि असुरों के साथ हुआ था।
Wednesday, 9 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
रामचरितमानस में मानस-रोगों का विश्लेषण करते हुए कहा गया है कि व्यक्ति के जीवन में दुःख चार रूपों में आते हैं। रामराज्य के संदर्भ में गोस्वामीजी कहते हैं - रामराज्य में सब प्रकार के दुःखों का अभाव हो गया। कौन-कौन से ? - काल, कर्म, स्वभाव और गुणजन्य दुःखों का। वैसे तो गिनती में हजारों प्रकार के दुःख हैं, लेकिन उन समस्त को चार भागों में बाँटा जा सकता है। कुछ दुःख तो कालजन्य हैं, कुछ कर्मजन्य, कुछ गुणजन्य और कुछ स्वभावजन्य। ये चार प्रकार के दुःख हैं, जिनका वर्णन रामचरितमानस में मानस-रोग के अंतर्गत भिन्न-भिन्न रूपों में किया गया है। रामायण के विभिन्न प्रसंगों में विभिन्न पात्रों के माध्यम से इन दुःखों की उत्पत्ति का कारण और उसका समाधान प्रस्तुत किया गया है। अलग-अलग प्रकार के दुःख हैं, उनके लिए अलग-अलग प्रकार के समाधान के संकेत हैं। किस प्रकार के दुःख आने पर हमारे अन्तःकरण की भूमिका क्या होनी चाहिए ? किस प्रकार से उनका सामना करना चाहिए ? किस प्रकार उन पर विजय प्राप्त करना चाहिए ? इसे आने वाले दिनों में रामायण के दृष्टान्तों के माध्यम से देखेंगे।
Tuesday, 8 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
व्यक्ति का मन अगर रोगी है, तो ऐसे व्यक्ति की समस्या यह है कि वह सुखों से घिरे रहने पर भी सुखी नहीं रह पाता। अब ऐसे व्यक्ति के दुःख को दूर करने का क्या उपाय है ? गोस्वामीजी बड़ी अनोखी बात कहते हैं - दूसरों के सुख को देखकर जो दुःख होता है, वह अभावजन्य दुःख तो है नहीं, तो फिर यह कैसा दुःख है ? यह रोगजन्य दुःख है। मन के इस रोग की तुलना गोस्वामीजी शरीर के राजयक्ष्मा रोग से करते हैं। दूसरों के सुख को देखकर मन में जलन होना, यही मन का राजयक्ष्मा रोग है। कैसी विचित्र विडम्बना है ! व्यक्ति दुःख नहीं चाहता। सुखी रहना चाहता है और दूसरों का सुख देखकर जलना क्या है ? यह कोई अभावजन्य दुःख तो है नहीं, कह सकते हैं रोगजन्य दुःख है, पर उससे भी कहीं अधिक उपयुक्त होगा कि इसे स्वभावजन्य दुःख कहा जाय। व्यक्ति को सुख उपलब्ध होते हुए भी वह अपने स्वभाव के कारण अनजाने ही स्वयं दुःख की सृष्टि करता है। वस्तु का अभाव हो तो उसे वस्तु से दूर किया जा सकता है, पर स्वभावजन्य दुःख ? यदि स्वभाव ही हो दूसरों के सुख को देखकर दुखी हो जाना, तो इसे स्वभाव को बदलकर ही दूर किया जा सकता है।
Monday, 7 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
.....कल से आगे .......
जैसे घर में विभिन्न प्रकार के खाने की स्वादिष्ट वस्तुएँ हैं, लेकिन रोगी व्यक्ति कुछ खा नहीं पाता और इसी कारण दुःखी रहता है। ऐसे व्यक्ति की समस्या यह है कि वस्तु होने पर भी उसका दुःख घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है। क्योंकि यदि वे वस्तुएँ न हों तो क्षणभर के लिए संतोष कर ले कि वस्तुएँ ही नहीं हैं तो क्या करें ? पर जब वह देखता है कि दूसरे लोग हमारे सामने सुस्वादु व्यंजन का आनन्द ले रहे हैं और हम नहीं ले पा रहे हैं, तब वह जिस दुःख का अनुभव करता है, वह सचमुच बड़ा विचित्र प्रकार का दुःख है। यह अभावजन्य दुःख नहीं, बाध्यताजन्य दुःख है। इसे रामचरितमानस में कहा गया है - यदि शरीर रोगी है तो सारे भोग व्यर्थ हैं। अभिप्राय यह है कि अभावजन्य दुःख तो दूर होगा वस्तु की उपलब्धि से, लेकिन रोगजन्य दुःख ? वह तो उपलब्धि से नहीं, स्वथ्यता से दूर होगा। अगर रोगी व्यक्ति स्वस्थ हो जाय, तो जो वस्तुएँ उसे प्राप्त हैं उनका आनंद लेने में वह समर्थ होगा। शरीर के संदर्भ में यह जितना सत्य है, उससे अधिक सत्य यह मन के संदर्भ में है। बल्कि यों कहें कि मन के संदर्भ में यह सबसे बड़ा सत्य है।
जैसे घर में विभिन्न प्रकार के खाने की स्वादिष्ट वस्तुएँ हैं, लेकिन रोगी व्यक्ति कुछ खा नहीं पाता और इसी कारण दुःखी रहता है। ऐसे व्यक्ति की समस्या यह है कि वस्तु होने पर भी उसका दुःख घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है। क्योंकि यदि वे वस्तुएँ न हों तो क्षणभर के लिए संतोष कर ले कि वस्तुएँ ही नहीं हैं तो क्या करें ? पर जब वह देखता है कि दूसरे लोग हमारे सामने सुस्वादु व्यंजन का आनन्द ले रहे हैं और हम नहीं ले पा रहे हैं, तब वह जिस दुःख का अनुभव करता है, वह सचमुच बड़ा विचित्र प्रकार का दुःख है। यह अभावजन्य दुःख नहीं, बाध्यताजन्य दुःख है। इसे रामचरितमानस में कहा गया है - यदि शरीर रोगी है तो सारे भोग व्यर्थ हैं। अभिप्राय यह है कि अभावजन्य दुःख तो दूर होगा वस्तु की उपलब्धि से, लेकिन रोगजन्य दुःख ? वह तो उपलब्धि से नहीं, स्वथ्यता से दूर होगा। अगर रोगी व्यक्ति स्वस्थ हो जाय, तो जो वस्तुएँ उसे प्राप्त हैं उनका आनंद लेने में वह समर्थ होगा। शरीर के संदर्भ में यह जितना सत्य है, उससे अधिक सत्य यह मन के संदर्भ में है। बल्कि यों कहें कि मन के संदर्भ में यह सबसे बड़ा सत्य है।
Sunday, 6 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
मानस-रोग प्रसंग के प्रारंभ में ही एक सूत्र दिया गया है और वह यह है कि व्यक्ति के सामने अगर कोई सबसे बड़ी समस्या है तो वह सुख और दुःख की ही है। व्यक्ति सदा सुखी रहना चाहता है। वह समग्र सुख पाना चाहता है। वह चाहता है कि उसके जीवन में दुःख कभी न आये, पर ऐसी आकांक्षा होते हुए भी व्यक्ति के जीवन में अगणित दुःख आते रहते हैं। इन दुःखों का प्रमुख कारण क्या है ? गोस्वामीजी मनोरोगों को ही दुःखों का प्रमुख कारण बताते हैं। एक दुःख होता है वस्तु के अभाव में, जिसे अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। इस सत्य की स्वीकृति मानस में इन शब्दों में की गयी है - नहीं दरिद्र सम दुःख जग माहीं। जहाँ तक व्यक्ति के जीवन में अभावजन्य दुःखों का प्रश्न है, व्यक्ति उन अभावों को दूर करके दुःख दूर करने का प्रयत्न कर सकता है, लेकिन मन तथा शरीर दोनों के संदर्भ में एक बात समान रूप से दिखाई देता है कि जब हम रूग्ण हो जाते हैं, तब हमारा रोग अभावजन्य नहीं रह जाता।
.......आगे कल ........
.......आगे कल ........
Saturday, 5 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
......कल से आगे ......
जब बुद्धि के द्वारा दोषों का समर्थन किया जाता है, तब व्यक्ति समझता है कि लोभ के साथ जीवन में व्यक्ति और समाज की बहुत सी आवश्यकताएँ जुड़ी हुई हैं, इसलिए लोभ करना चाहिए और कोई दूसरा हमारी वस्तु को छीन न ले, इसलिए निरन्तर दूसरों को ढकेलते रहना चाहिए। ये वृत्तियाँ एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और समाज में व्याप्त हैं और जब हम बुद्धि के द्वारा इनका समर्थन करते हैं, तब यह रोग असाध्य हो जाता है। इसलिए स्वथ्यता के मूल में सत्य यह है कि पहले हम बुद्धि के द्वारा समझें यह रोग है, यह दोष है, यह बुराई है, तभी उसकी चिकित्सा होगी।
जब बुद्धि के द्वारा दोषों का समर्थन किया जाता है, तब व्यक्ति समझता है कि लोभ के साथ जीवन में व्यक्ति और समाज की बहुत सी आवश्यकताएँ जुड़ी हुई हैं, इसलिए लोभ करना चाहिए और कोई दूसरा हमारी वस्तु को छीन न ले, इसलिए निरन्तर दूसरों को ढकेलते रहना चाहिए। ये वृत्तियाँ एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और समाज में व्याप्त हैं और जब हम बुद्धि के द्वारा इनका समर्थन करते हैं, तब यह रोग असाध्य हो जाता है। इसलिए स्वथ्यता के मूल में सत्य यह है कि पहले हम बुद्धि के द्वारा समझें यह रोग है, यह दोष है, यह बुराई है, तभी उसकी चिकित्सा होगी।
Friday, 4 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
मंथरा अपने पक्ष में धर्म की ही आढ़ लेते हुए कहती है कि भरत को राज्य दिलाना मेरा धर्म है और भरत के राज्य को सुरक्षित रखने के लिए राम को वन भेज देना मेरी विशेष बुद्धिमता है। इस तरह उसने अपनी ईर्ष्यावृत्ति को समर्थन कर लिया। पहले लोभ, उसके बाद ईर्ष्या, फिर दूसरे के सुख को मिटाने के लिए कुटिल वृत्ति और उसका बुद्धि द्वारा समर्थन। इस तरह उसका रोग असाध्य हो जाता है। इसलिए मंथरा की स्वथ्यता के बारे में आगे चलकर कुछ नहीं कहा गया है। कैकेयी तो बाद में स्वस्थ हो जाती है, पर मंथरा कभी स्वस्थ हुई यह नहीं कहा गया। इसका सांकेतिक तात्पर्य यह है कि कैकेयी की बुद्धि में दुर्बलताएँ अवश्य हैं, पर अन्त में उन्होंने अपनी भूल स्वीकार कर ली और वे स्वस्थ हो गयीं, पर मंथरा तो कभी भी नहीं समझ पायी कि उससे कोई भूल हो रही है। जब शत्रुध्नजी उसकी चोटी पकड़कर घसीटने लगे, तो मंथरा ने यह नहीं कहा कि मुझसे भूल हो गया, बल्कि उसने शत्रुध्नजी से यही कहा कि मैं तो भला करने चली थी और मेरे साथ कैसा व्यवहार हो रहा है। इसका अभिप्राय यह है कि
........आगे कल........
........आगे कल........
Thursday, 3 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................
मंथरा को श्रीराम के राज्याभिषेक का समाचार मिला। बुद्धि तो उलटी हुई ही है। अब उसकी वह उलटी बुद्धि बड़ी तीव्रता से सक्रिय हो गयी। उसमें बड़ा पैनापन आ गया। राम को राज्य मिलेगा। राम कितने प्रसन्न होंगे, कौसल्या कितनी प्रसन्न होगी। बस, ह्रदय जलने लगा। तब उसने सोचा कि नहीं, ऐसा नहीं होने दूँगी। राम का राज्याभिषेक नहीं होने दूँगी और वह ऐसा क्यों नहीं होने देना चाहती ? उसकी युक्ति और तर्क देखिए। बुद्धि जब विकृत होती है तो वह निष्क्रिय नहीं, बल्कि अधिक सक्रिय हो उठती है और अपने पक्ष के समर्थन में शास्त्र, धर्म और ईश्वर सबका उपयोग कर लेती है। वह धर्म की एक नयी और अद्भुत व्याख्या कर लेती है। वह कहती है कि मैं रामराज्य में बाधा उपस्थित करके कोई अधर्म थोड़े ही कर रही हूँ। मैं तो अपने धर्म का पालन कर रही हूँ। मैं कैकेयी की दासी हूँ। सेवक का धर्म यही है कि वह स्वामी के हित की रक्षा करे। मेरे रहते मेरी स्वामिनि की इतनी उपेक्षा ? कैकेयी के पुत्र को छोड़कर कौसल्या के पुत्र को राज्य मिले, तो फिर मैं किस दिन काम आऊँगी ? महाराज ने तो मुझे भेजा ही इसलिए है कि विशेष रूप से मैं निरन्तर सजग रहकर कैकेयी के हितों की रक्षा करूँ। इसलिए मैं जो कुछ कर रही हूँ, वह धर्मसंगत और न्यायसंगत है।
Wednesday, 2 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
किसी ने गोस्वामीजी से पूछ दिया कि महाराज ! आप स्वर्ग की इतनी निन्दा क्यों करते हैं ? तो उन्होंने कहा कि स्वर्ग में सारे भोग तो मिल जाते हैं, पर एक समस्या वहाँ भी बनी रहती है। क्या ? स्वर्ग में भी सौतिया डाह नहीं मिटती। अपने अगल-बगल वालों को देखते हैं कि उसके पास कितनी अप्सराएँ और कितने भोग हैं। उसकी तुलना में हमारे पास कितना कम है तब दूसरों से ईर्ष्या होती है। लोभ में तो अपने ही सुख की लालसा है, पर दूसरों के सुख को देखकर जो हमारे अन्तःकरण में जलन हो रही है, इस दुःख का क्या इलाज है ? तब वह सुखी व्यक्ति को दुखी बनाने की चेष्टा करता है। यही क्रम मंथरा के जीवन में दिखाई देगा।
Tuesday, 1 December 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................
कैकेयी और मंथरा के संदर्भ में मूल कारण किसको कहा गया है ? देवताओं ने बुद्धि की देवी सरस्वती से निवेदन किया कि वे किसी तरह कैकेयी और मंथरा की बुद्धि को उलट दें। इसका अभिप्राय क्या है ? अच्छे और बुरे का निर्णय कौन करती है ? बुद्धि। और जिसकी बुद्धि ही उलट दी जाय, तो उसे सब उलटा दिखेगा। अच्छाई में बुराई और बुराई में अच्छाई दिखायी देने लगेगी। कैकेयी और मंथरा के जीवन में यही क्रम आपको दिखायी देगा। यह मंथरा कौन है ? मंथरा लोभ की प्रतीक है। लोभ से उसकी बुद्धि विकृत हो गयी है। पहले अपने लिए संग्रह, उसके बाद दूसरे के सुख को देखकर जलन। जब तक अपने सुख के लिए संग्रह का लोभ है, तब तक लोभ साध्य है ; पर जब दूसरों का सुख देखकर ईर्ष्या होने लगती है, तब वह कितना बड़ा अनर्थ कर बैठती है, यह मंथरा के जीवन में दिखायी देता है।
Monday, 30 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................
कुछ रोग ऐसे हैं जो मुख्य रूप से बुद्धि से जुड़े हुए हैं। सिद्धियाँ आकर बुद्धि को लोभ दिखाती हैं। बुद्धि लोभ का अधिष्ठान है। साधक जब साधना पथ पर अग्रसर होता है, तो सिद्धियाँ आकर लोभ दिखाती हैं। अब साधक के सामने समस्या है कि वह चमत्कारों को स्वीकार करे या न करें। अधिकांश साधक तो स्वीकार कर लेते हैं और उनकी साधना में प्रगति रुक जाती है और उस प्रलोभन से बुद्धि जब रोगग्रस्त हो जाती है, तब हम अपने को क्या कहकर भुलावा देते हैं ? यह कि हम सिद्धियों का दुरुपयोग थोड़े ही करेंगे, अच्छे कामों में लगायेंगे और इसका परिणाम क्या होता है ? लोककल्याण और आत्मप्रदर्शन ऐसा कुछ घुल-मिल जाता है कि साधक की बुद्धि बड़ी सरलता से उसके प्रलोभन में आ जाती है, पर अगर बुद्धि सयानी हुई तो साधक उनकी ओर आँखें उठाकर भी नहीं देखता। जानता है कि इसमें मेरा हित नहीं है। साधक की सफलता इसी में है कि कितनी भी बढ़िया बात क्यों न हो, कितनी भी बुद्धिसंगत बात क्यों न हो, उन सिद्धियों को, उन चमत्कारों को साधक अस्वीकार कर दे। यही संकेत उत्तरकाण्ड में ज्ञानदीपक प्रसंग में किया गया है।
Sunday, 29 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
गीता में काम के संबंध में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - इन्द्रिय, मन और बुद्धि - ये सब काम के निवास स्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ही ज्ञान को ढ़ँककर जीवात्मा को मोहित करता है। अभिप्राय यह है कि यदि मन और बुद्धि दोनों ही विकारग्रस्त हो जायँ, मन में काम आ जाय और बुद्धि उसका समर्थन करने लग जाय, तब उसको दूर करने का क्या उपाय है ? काम मुख्य रूप से मन से जुड़ा है और बुद्धि अगर उसे दोष या बुराई या रोग के रूप देख रही है, तो उसे दूर करने की चेष्टा करती है।
Saturday, 28 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
बुराइयाँ और दुर्बलताएँ तो हमारे मन में भी हैं, किन्तु क्या हम अपनी बुराइयों को बुराई के रूप में देख पा रहे हैं ? बुराई में अगर हमें बुराई दिख रही है तो उससे बचने की पूरी संभावना है, पर जब हमें बुराई में भी अच्छाई दिखने लगे, तब उन बुराइयों को दूर करने का कोई उपाय नहीं है, तब वह असाध्य हो जाती है।
Friday, 27 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
गोस्वामीजी अपनी काव्यमयी भाषा में लिखते हैं कि जब किसी व्यक्ति को भीषण रोग हो जाता है और साधारण दवा से वह ठीक नहीं होता, तो उसे सोना-हीरा-मोती का भस्म बनाकर दिया जाता है। रावण का रोग भी असाध्य हो चुका है। उसे हीरे-मोती-सोने का भस्म देना होगा। लंका जलवाने के पीछे प्रभु का मानो संकेत था, हनुमानजी के लिए कि रावण के लिए भस्म लेने और कहाँ जाओगे। उसके चार सौ कोस की लंका में बहुत हीरा-मोती और सोना भरा पड़ा है। उसे ही फूँककर भस्म बनाओ और रावण को खिलाओ। शायद इससे वह ठीक हो जाय, किन्तु इतने प्रयत्नों के बाद भी रावण का रोग क्या दूर हुआ ? वही सूत्र कि रोगी अपने को रोगी ही न माने, वैद्य की बात न माने, दवा का सेवन न करे, तो वह स्वस्थ कैसे होगा ? रावण तो अपने को कभी रोगी मानता ही नहीं, उल्टे वैद्य की ही हँसी उड़ाता है। अब ऐसे रोगी को शंकरजी के समान श्रेष्ठतम वैद्य भी कैसे ठीक कर सकते हैं ?
Thursday, 26 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
लंका को जलाने के पीछे प्रभु का उद्देश्य क्या था ? कई लोग साधारणतया यह अर्थ ले लेते हैं कि रावण नगरों को जला देता था, इसलिए प्रभु ने भी उसके नगर को जलवा दिया, पर ऐसा भाव तो भगवान राम के चरित्र में है ही नहीं। बदले की भावना नहीं, यहाँ तो चिकित्सा है। बदले की वृत्ति का, हिंसा-प्रतिहिंसा का चक्र कभी समाप्त नहीं होता, पर जहाँ पर उद्देश्य सामने वाले का कल्याण है, वहाँ तो उसकी कठोरता में भी हित छिपा हुआ है। भगवान राम चाहते थे लंका जलाने के पीछे जो उनका उद्देश्य है, उसे रावण समझ ले। इससे उसका कल्याण होगा। रावण समझ बैठा था कि समस्त देवी-देवता और प्रकृति उसके अधिन हैं। अग्नि, जल, वायु और इन्द्र आदि सब उसके इशारे पर चलते हैं। प्रभु चाहते थे कि उसका भ्रम दूर हो और इस सत्य को समझ ले कि समस्त तत्वों का स्वामी वह नहीं, कोई और है। हनुमानजी ने लंका में आग लगा दी। लंका जलने लगी। जोरों से हवा चलने लगी। आग तेजी से फैल गयी। रावण ने मेघों को आदेश दिया कि वर्षा करके आग बुझाओ। वर्षा होने लगी, पर उससे क्या आग बुझी ? वह तो और भड़क उठी, मानो घी-तेल की वर्षा हो रही थी। लंका जलकर भस्म हो गयी। रावण उसे बचा नहीं पाया। तब क्या रावण को अपनी असमर्थता का बोध हुआ ? यही रावण की सबसे बड़ी समस्या है। श्रेष्ठतम वैद्य हो, श्रेष्ठतम औषध हो, पर रोगी उसे सेवन न करे, तब क्या होगा ?
Wednesday, 25 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
प्रभु तो रावण जैसे लोगों से भी अपना काम करा लेते हैं। रावण को हनुमानजी के पूँछ नष्ट करने का क्या उपाय सूझा - पहले इसकी पूँछ में कपड़ा लपेटो, फिर घी-तेल डालो और आग लगा दो। हनुमानजी ने प्रभु को मन ही मन प्रणाम किया और कहा कि त्रिजटा का स्वप्न ही सत्य है। लंका जलाने की योजना प्रभु की ही है और प्रबंध तो उनका और भी विलक्षण है। लंका जलाने का प्रबंध आप रावण से ही करा रहे हैं। बताइए ! भला मैं कहाँ से घी, तेल एवं कपड़ा लाता। सारी व्यवस्था आप ही कराये दे रहे हैं और जिससे कराना है, उससे आप वह करा लेते हैं। व्यक्ति की व्यर्थ धारणा बनी हुई है कि कार्य करने वाला मैं हूँ। वस्तुतः कार्य कराने वाले तो वे ही हैं। जिससे जो चाहते हैं, करा लेते हैं।
Tuesday, 24 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
हनुमानजी के चरित्र में एक बड़ी विचित्र बात है। उनके चरित्र में पग-पग पर विचार है। हनुमानजी ने जब लंका को जला दिया तो भगवान ने उनसे पूछा कि सारे कार्य तो तुम विचारपूर्वक करते हो, लेकिन लंका जलाने के पूर्व तुमने जरा भी विचार नहीं किया। हनुमानजी ने कहा प्रभो ! जो कुछ मुझे करना था, वह मैंने विचारपूर्वक किया और जो मुझसे करवाया गया। वह करवाने वाला विचार करेगा या मैं करूँगा ? अभिप्राय क्या है ? हनुमानजी ने कहा कि मैं तो बँधकर ही गया था, यह देखने के लिए कि आप मुझसे क्या कराना चाहते हैं ? बँधे हुए से तो आप ही काम ले सकते हैं। रावण ने कहा कि इस बन्दर को मार डालो, पर हनुमानजी ने अपने को बचाने की कोई चेष्टा नहीं की। प्रभो ! आप कह सकते हैं कि तुम तो वाटिका में बड़े दाँव-पेंच दिखा रहे थे। अब यहाँ भी कुछ कला दिखाते। महाराज ! जहाँ खुला हुआ था, वहाँ कला का प्रयोग किया, पर यहाँ तो बँधा हुआ हूँ, अब तो कला का प्रयोग आप ही को करना है। अब मैं अपने को बचानेवाला नहीं हूँ। अब तो आप जानें और आपका काम जाने। प्रभु ने विभिषण को भेज दिया। विभिषण ने कहा कि मत मारिए और रावण मान गया, पर कुछ न कुछ दण्ड तो देना ही होगा, अतः इस बन्दर की पूँछ को नष्ट कर दो। अब पूँछ नष्ट करने में क्या कठिनाई थी ? कह देता कि तलवार से पूँछ काट दो, लेकिन प्रभु तो रावण जैसे लोगों से भी अपना काम करा लेते हैं। रावण को पूँछ नष्ट करने का क्या उपाय सूझा - पहले इसकी पूँछ में कपड़ा लपेटो, फिर घी-तेल डालो और आग लगा दो। हनुमानजी ने कहा, प्रभु ! लंका जलाने की योजना तो आपकी ही थी और प्रबंध तो बड़ा ही विलक्षण था।
Monday, 23 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
लंका में अशोक वाटिका में मेघनाद ने जब हनुमानजी पर ब्रह्मास्त्र चलाया, तब हनुमानजी ने उससे यही कहा कि मैं चाहूँ तो न बँधू, ब्रह्मास्त्र का भी मुझ पर कोई प्रभाव नहीं होगा, लेकिन ब्रह्मास्त्र की जो महिमा है, उसे मैं स्वेच्छा से स्वीकार करता हूँ और इस बंधन को स्वीकार करने के पीछे तो हनुमानजी का एक बड़ा दूरगामी उद्देश्य था। हनुमानजी ने जब रावण की वाटिका के फलों को खाया, तब वे खुले हुए थे, पर रावण की सभा में गये, तो बँधकर गये। क्यों ? हनुमानजी के सामने एक समस्या आ गयी थी। त्रिजटा ने श्रीसीताजी और समस्त राक्षसियों से कहा कि मैंने एक स्वप्न देखा कि एक बंदर आया है, वह लंका को जलायेगा। अब हनुमानजी बड़े सोच में पड़ गये कि भगवान ने तो मुझे लंका जलाने का आदेश दिया नहीं है और त्रिजटा लंका जलाने की बात कह रही है। अब किसकी बात मानें, भगवान की या सन्त की ? दोनों बड़े महत्व के हैं। तब उन्होंने ने यही निर्णय लिया कि अब तक मैंने वही किया जिसका मुझे प्रत्यक्ष आदेश मिला था, इसलिए अब तक मैं खुला था। अब आगे का कार्य तो, जो परोक्ष आदेश से होने वाला है, वहाँ तो कराने वाला ही जाने। इसलिए बँधकर ही चलूँ, करानेवाला चाहे जो करा ले।
Sunday, 22 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.................
.......कल से आगे .......
हनुमानजी बँधे हुए हैं, पर उस बंधन में भी कैसे अद्भुत सत्य की ओर संकेत करते हैं ? बड़ा महत्वपूर्ण सूत्र है। हनुमानजी बँधे हुए हैं और रावण मुक्त है। संकेत क्या है ? जैसे कोई व्यक्ति कारागार में हो तो उसे देखकर लोग कहते हैं कि वह बन्दी है, लेकिन जो घरों में रहते हैं, उन्हें देखकर यह नहीं लगता कि वह बन्दी है। अब अगर कोई गहराई से देखे, तो पता चलेगा कि वास्तविक कैदी तो वे हैं, जो बंदी के रूप में नहीं दिखाई देते। क्यों ? क्योंकि जो लोग जेल में हैं उनका तो एक निश्चित समय है कि इतने समय के बाद वे जेल से मुक्त हो जायेंगे, लेकिन इस घर के जेल में जो लोग बँधे हुए हैं, इससे कब मुक्त होंगे ? इसका तो कोई निश्चित समय नहीं है। यह तो बड़ी विडम्बना है। कैसा विरोधाभास है ? हनुमानजी यही तो बताना चाहते थे कि रावण जो मुक्त प्रतीत हो रहा है, वह वास्तव में कितना बँधा हुआ है और जिसने लोक कल्याण हेतु स्वेच्छा से बंधन स्वीकार किया है, वह तो नित्यमुक्त है चाहे तो क्षणभर में सारे बंधन उतारकर फेंक सकता है।
हनुमानजी बँधे हुए हैं, पर उस बंधन में भी कैसे अद्भुत सत्य की ओर संकेत करते हैं ? बड़ा महत्वपूर्ण सूत्र है। हनुमानजी बँधे हुए हैं और रावण मुक्त है। संकेत क्या है ? जैसे कोई व्यक्ति कारागार में हो तो उसे देखकर लोग कहते हैं कि वह बन्दी है, लेकिन जो घरों में रहते हैं, उन्हें देखकर यह नहीं लगता कि वह बन्दी है। अब अगर कोई गहराई से देखे, तो पता चलेगा कि वास्तविक कैदी तो वे हैं, जो बंदी के रूप में नहीं दिखाई देते। क्यों ? क्योंकि जो लोग जेल में हैं उनका तो एक निश्चित समय है कि इतने समय के बाद वे जेल से मुक्त हो जायेंगे, लेकिन इस घर के जेल में जो लोग बँधे हुए हैं, इससे कब मुक्त होंगे ? इसका तो कोई निश्चित समय नहीं है। यह तो बड़ी विडम्बना है। कैसा विरोधाभास है ? हनुमानजी यही तो बताना चाहते थे कि रावण जो मुक्त प्रतीत हो रहा है, वह वास्तव में कितना बँधा हुआ है और जिसने लोक कल्याण हेतु स्वेच्छा से बंधन स्वीकार किया है, वह तो नित्यमुक्त है चाहे तो क्षणभर में सारे बंधन उतारकर फेंक सकता है।
Saturday, 21 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
गोस्वामीजी बड़ी साहित्यिक भाषा में लिखते हैं कि हनुमानजी ने रावण का रोग पकड़ लिया और कहा कि तुम इस वस्तु को छोड़ दो - रावण तुम्हारी सबसे बड़ी समस्या है मोह। तुम मोहग्रस्त हो। सत्य को जानकर भी तुम अपने जीवन में उसे अस्वीकार करने के अभ्यस्त हो गये हो। यही तुम्हारे अन्तःकरण का मोह है। इस मोह का परिणाम यह हुआ है कि तुम्हारे अन्तःकरण में घोर अभिमान हो गया है। इसलिए इसे दूर करने के लिए अब मैं दवा दे रहा हूँ - भगवान की भक्ति करो। भगवान की भक्ति ही संजीवनी औषध है, लेकिन यहाँ वैद्य और रोगी की क्या स्थिति है ? हनुमानजी ने बड़ा विचित्र व्यंग्य किया। यह समझने योग्य है। रावण हँस रहा है। हनुमानजी बँधे हुए हैं। और रावण सिंहासन पर तनकर बैठा हुआ है। रावण ने कहा कि मैंने यह तो सुना था कि गुरु शिष्य के बंधन को खोलकर उसे मुक्त कर देता है। शिष्य बंधन में होता है और गुरु मुक्त होते हैं और वे शिष्य को भी मुक्ति प्रदान करते हैं, पर इस बन्दर को तो देखो, खुद तो बँधा हुआ है और अपने को गुरु समझ रहा है। अपने को तो छुड़ा नहीं पाया और मुझे छुड़ाने आया है। देखो ! भला कैसी बात है ?
........ आगे कल ......
........ आगे कल ......
Friday, 20 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
आगे चलकर भगवान शंकर रावण के पास हनुमानजी के रूप में गये। शिष्य नहीं आया, तो स्वयं गुरु गये। शिष्य कैसा भी हो, करुणानिधान गुरु उसके हित के लिए अपनी प्रभुता त्याग कर, वानर शरीर धारण कर स्वयं पहुँच गये। भगवान श्रीराम का भी वही उद्देश्य था। वे भी युद्ध को टालना चाहते थे। चाहते थे कि रावण स्वथ्य हो जाय। बन्दरों में से किसी को भी लंका नहीं भेजा। वे सोच रहे थे कि दवा से ही अगर बीमारी ठीक हो जाय तो आगे नहीं बढ़ना चाहिए। चिकित्सा भी दो प्रकार की होती है। अगर दवा से बीमारी ठीक नहीं हुई, तो शल्य चिकित्सा करनी पड़ती है। इसलिए वे हनुमानजी को भेजकर पहले दवा वाली चिकित्सा कराना चाहते हैं। दवा से अगर रावण और लंका स्वथ्य हो जाय, तो अच्छा है। वे कहते हैं कि हनुमान ! तुम वैद्य बनकर जाओ, रावण स्वथ्य हो जाय, राज्य करे, प्रजा का पालन करे, सेवा करे, इससे बढ़कर अधिक प्रसन्नता मुझे और क्या होगी ?
Thursday, 19 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
रावण अपने को बड़ा बुद्धिमान समझता है। उसके मन में यह प्रश्न आया कि कहीं श्रीराम सचमुच ईश्वर तो नहीं हैं ? तब उसे लगता है कि क्या भगवान ने अवतार ले लिया है ? जब उसके मन यह प्रश्न आया, तो इसके समाधान का बड़ा सरल उपाय था। वह अपने गुरु शंकरजी के पास चला जाता और अपने सन्देह को उनके सामने रख देता। शंकरजी बता देते और समाधान हो जाता, पर रावण की समस्या क्या है ? वह अपने को भगवान शंकर से भी अधिक बुद्धिमान मानता है। उसका अपना गणित है - उनको मैंने गुरु बना लिया इसका अर्थ थोड़े ही हुआ कि वे मुझसे अधिक बुद्धिमान हैं। उनके तो पाँच (पंचानन) शिर हैं और मेरे दश। मेरे पास दुगुनी बुद्धि है। मुझे उनके पास जाने की क्या आवश्यकता है ? मैं जितना समझता हूँ, उतना वे क्या समझेंगे और मुझे क्या बतायेंगे ? मुझसे अधिक बुद्धिमान कोई है ही नहीं। यही रावण की समस्या है।
Wednesday, 18 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
दोष दो तरह के होते हैं - एक बाह्य और आन्तरिक। जैसे पीतल के बर्तन में खटाई लग जाय तो उसमें दोष आ जाता है, लेकिन एक दोष और होता है, जो बाहर नहीं भीतर ही होता है, बर्तन में ही दोष होता है। उसे धातुगत दोष कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि पीतल के लोटे को आप कितना ही माँजिए, इससे बाहरी दोष तो दूर हो जाता है, पर उसका धातुगत दोष अर्थात पीतल होने का दोष कभी दूर नहीं होता। अन्त में यह जो सतीजी का शरीरत्याग है, इसका अभिप्राय क्या है ? शंकरजी समझ गये कि सती के और दोषों को मिटाना संभव है, पर दक्षपुत्री के रूप में उनका जो मूल संस्कार है, उसे मिटाना संभव नहीं है। उन्हें तो धातु ही बदलनी पड़ेगी, तब जाकर इनका रोग दूर होगा।
Tuesday, 17 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
सती को दक्षपुत्री होने के कारण अपनी बुध्दिमता पर बड़ा अहंकार है। उन्होंने अपनी भूल स्वीकार नहीं की। भगवान की परीक्षा लेने चल पड़ी। सती के रोग को दूर करने के लिए बड़ी लम्बी चिकित्सा करनी पड़ी। सती दोनों का तिरस्कार करती चली गयीं, वैद्य का भी और औषध का भी। शंकरजी सतगुरु हैं, वैद्य हैं और रामकथा औषध है। सतीजी अगत्स्य के आश्रम में गयीं तो रामकथा का तिरस्कार किया। इसका तात्पर्य यह है कि उन्होंने दवा स्वीकार नहीं की और शंकरजी की बात नहीं मानी। इस तरह के रोगी जिसे वैद्य और दवा दोनों पर विश्वास न हो, तो उस रोगी का क्या होगा, आप कल्पना कर सकते हैं। सती को अपने रोग निवारण के लिए बड़ी लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा और अन्त में अपने सती शरीर को छोड़ना भी पड़ा।
Monday, 16 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
रोगी अपने को रोगी न माने, स्वथ्य माने, तब ? सती और रावण के जीवन की यही समस्या है कि उन्हें अपनी बुध्दिमता पर बड़ा अभिमान है। वे दक्ष की पुत्री हैं। दक्ष माने चतुर। चतुर की पुत्री होने के नाते उन्हें अपनी चतुराई का इतना अहंकार है कि भगवान शिव की बात भी उन्हें सही नहीं लगती। मानो वे अपने पति की बात को मानना तो चाहती है, पर उनकी बुद्धि उन्हें मानने की अनुमति नहीं देती। बड़ी विडम्बना है। इतने बड़े वैद्य की पत्नी ऐसे असाध्य रोग से ग्रस्त हो गयीं। तब भगवान शंकर को स्वीकार करना पड़ा कि केवल वैद्य ही सब कुछ नहीं होता, रोगी की भी कुछ विशेषताएँ होती हैं। क्या डॉक्टर या वैद्य के घर में कोई बीमार नहीं पड़ता ? यह तो संसार में दिखाई देता है। बड़े - बड़े महात्माऔं के सभी शिष्य क्या स्वथ्य हो जाते हैं ? सभी स्वस्थ नहीं हो पाते। कभी-कभी तो लोग आश्चर्य करते हैं कि इतने बड़े महात्मा के पास रहकर भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ और कभी-कभी तो दूसरों की कौन कहे, स्वयं वैद्य बीमार हो जाते हैं। लोग बड़े आश्चर्य से पूछते हैं कि अरे ! क्या आप बीमार पड़ गये ? अरे भई ! बीमारी तो ऐसी वस्तु है कि चाहे वैद्य हो या कोई भी हो, जो कुपथ्य करेगा, वह बीमार पड़ेगा। जब व्यक्ति को अपनी बुध्दिमता पर अभिमान हो जाता है, तब वह कुपथ्य कर बैठता है। यह समस्या दोनों की है, सती की और रावण की भी।
Sunday, 15 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
भगवान शंकर त्रिभुवन गुरु हैं। वैद्य हैं। वे विष को भी अमृत बना देते हैं, पर विडम्बना तो यह है कि योग्य से योग्य वैद्य प्राप्त होने मात्र से क्या रोगी स्वथ्य हो जाता है ? भगवान शंकर के समान महान वैद्य के प्रयास करने पर भी कुछ ऐसे रोगी हैं, जो स्वथ्य नहीं हुए। सती और नारद के ह्रदय में संशय यह बताने के लिए हुआ कि यदि कोई महान गुरु, एक महान वैद्य या डॉक्टर को पा ले, तो मात्र इतने से ही रोगी स्वथ्य हो जायेगा यह मानना ठीक नहीं है। उसके साथ कुछ बातें जीवन से जुड़ी हुई हैं, जो जीवन में ठीक-ठीक आनी चाहिए, तब कहीं जाकर रोग दूर होता है, स्वथ्यता आती है। पहली बात तो यह है कि रोगी अपने रोग का अनुभव कर रहा है या नहीं ? अगर रोगी अपने को रोगी अनुभव करता है, तो वैद्य के पास जायेगा। वैद्य जो औषध और पथ्य बतायेंगे, उनका वह सेवन करेगा, अनुकूल आचरण करेगा तब जाकर स्वस्थ होगा।
Saturday, 14 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
समुद्र मंथन से जब विष निकला, तब भगवान विष्णु ने कहा था कि इस विष को भगवान शंकर के पास ले जाओ और तब शंकरजी ने क्या किया ? शंकरजी को जब विष दिया गया और ज्यों ही उन्होंने उसे अपने मुँह में लिया, त्यों ही उनके मुख से निकला राम। लोगों ने पूछा कि महाराज ! यह विष के साथ आप राम क्यों जोड़ रहे हैं ? शंकरजी ने कहा कि भई ! विष के साथ राम को जोड़ देने से विश्राम बन जाता है। यह सबसे बढ़िया बात है। विष के साथ राम को जोड़कर उन्होंने उसे बना दिया- अखिल लोक दायक विश्रामा। नाम महिमा में यही कहा गया है - जो समस्त लोक के प्राणियों को विश्राम देने वाला है। भगवान शंकर का अभिप्राय क्या है ? विष में राम को मिला दीजिए तो विष भी विश्राम में परिणत हो जायेगा, लेकिन दुर्भाग्य की बात तो यह है कि ऐसे भी अभागे लोग हैं, जो विश्राम से राम को निकाल देते हैं और विश्राम को भी अपने जीवन में विष बना लेते हैं। ऐसे लोगों के जीवन में विष को छोड़कर, दुःख एवं मृत्यु को छोड़कर और कुछ भी शेष नहीं रह जाता।
Friday, 13 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
भगवान शंकर सर्पों का आभूषण धारण करते हैं। आयुर्वेद में बहुत-सी औषधियाँ हैं, जो सर्प-विष के द्वारा बनायी जाती हैं। अब प्रश्न यह है कि सर्प मारक है या जीवन देने वाला ? तो अन्यत्र तो सर्प मारक है, पर भगवान शंकर के हाथ में वह मारक नहीं है। सर्प माने क्या ? विषधर। विष से मृत्यु हो जाती है। उस विषधर को भी वे अपना आभूषण बना लेते हैं और उससे भी आगे, यह जो समुद्र से निकला हुआ विष है, जिससे कि सारा संसार जल रहा है, उसे पीकर वे आनन्दविभोर हो गये। भगवान विष्णु क्या बताना चाहते हैं ? जो लोग अमृत पीकर अमर होना चाहते हैं, उसकी दृष्टि अपूर्ण है। जो विष पीकर अमृतत्व की सृष्टि करना चाहते हैं, उन्हीं की दृष्टि पूर्ण है।
Thursday, 12 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
आयुर्वेदशास्त्र में एक बड़ा प्रसिद्ध वाक्य है, जिसमें कहा गया है कि संसार में ऐसा कोई वनस्पति या कोई पदार्थ नहीं है, जिससे कोई दवा न बने। आवश्यकता है तो उसमें छिपे हुए औषधीय गुण जानने की। नयी-नयी खोजें होती रहती हैं। आप अगणित वस्तुओं के बारे में सुनते रहते हैं कि इस वस्तु से एक नयी दवा निकल आयी। आज भी चिकित्सा-पद्धति में यह यह सुनने और पढ़ने को मिलता है कि फफूँद लगी हुई वस्तु में भी औषध का निर्माण हो गया है। फफूँद को हम विकृति मानते हैं, पर खोज की गयी तो पाया गया कि उस विकृति में भी औषधीय तत्व छिपा हुआ है। भगवान शंकर की सबसे बड़ी विलक्षणता यही है। वे गुरु हैं और गुरु का कार्य यही है कि वह शिष्य के गुणों का तो सदुपयोग करे ही, पर साथ ही उसके दोषों को भी गुणों में परिवर्तित कर दें। यही गुरु की विलक्षणता है और यही विलक्षणता शंकरजी में विद्यमान है।
Wednesday, 11 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
श्री भरत जब भगवान राम के चरण की रेखाओं को देखते हैं, तो उनको ऐसा लगता है कि यह तो पारस है। जिस पारस के स्पर्श से जड़ अहिल्या चेतन हो गयी। तब उसमें पाप नष्ट होकर पवित्रता का संचार हो गया। यह तो परखा हुआ पारस है। श्री भरत इस पारस को अपने ह्रदय से, अपने शरीर से स्पर्श कराते हैं। आगे चलकर गोस्वामीजी ने कहा कि जब भरतजी चित्रकूट से लौटकर अयोध्या आये, तो वहाँ वे निरन्तर तपस्या करने लगे। लोगों ने पूछा कि महाराज ! आपको तपस्या की क्या आवश्यकता है ? तपस्या के समग्र फल के रूप में राम को तो आप पा ही चुके हैं। श्री भरत बोले कि मैं तो लोहा था, पर वे तो पारस हैं। उनके स्पर्श से लोहा भी सोना हो जाता है। मैं भी संभवतः उनके स्पर्श से सोना हो गया हूँ, पर बार-बार परखकर देखता रहता हूँ कि कहीं फिर से लोहा तो नहीं हो गया। इसमें भरतजी का संकेत यही है कि यह मन का लोहा एक बार सोना बनने के बाद पता नहीं कब फिर से लोहा बन जाय ! इसका कोई ठिकाना नहीं। यह मन इतनी तेजी से बदलता है कि निरन्तर सजग न रहने वाला व्यक्ति उसके द्वारा कभी भी छला जा सकता है। मन में एक बार सद्गुण और सद्भाव आ जाने पर भी निश्चिन्त होना ठीक नहीं है कि अब मेरा मन ठीक हो गया है, अब पतित नहीं होगा। इसलिए श्री भरत जीवनभर निरन्तर मन को कसकर देखते हैं, हर क्षण सावधान रहते हैं।
Tuesday, 10 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
रामायण में श्री भरत अपनी बड़ी निन्दा करते हैं। भगवान श्रीराम ने भरत की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम्हारे समान सन्त और गुणवान संसार में और कोई नहीं है। यह कहने के बाद उन्होंने भरतजी से पूछा कि मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वह ठीक है या नहीं ? भरतजी ने कहा प्रभो ! यह कहने का महान दुस्साहस भला कौन करेगा कि आपने ठीक नहीं कहा ! श्रीराम ने कहा कि अगर मैं ठीक कह रहा हूँ तो भरत ! तुम्हारा कहना सही नहीं है ! तुम जो यह कहते हो कि मैं सबसे बड़ा पापी हूँ, यह बात अब फिर कभी न कहना ! भरतजी ने कहा कि महाराज ! आप जो कह रहे हैं, वह तो सत्य है ही, पर मैं जो कह रहा हूँ वह भी तो असत्य नहीं है। यह कैसे हो सकता है कि दोनों विपरीत बातें एक साथ सत्य हों ! या तो तुम्हारी बात सत्य होगी या फिर मेरी ! तो श्रीभरतजी ने कहा कि महाराज ! जैसे लोहे का एक टुकड़ा तो लोहा ही है। उसे कोई भी परीक्षा करके यही कहेगा कि यह लोहा है, पर यदि कोई यदि पारस के पास ले जाकर कहे कि आप इसकी परीक्षा करके बताइए कि यह क्या है ? तब क्या होगा ? उसकी परीक्षा करने के लिए पारस जैसे ही उसे अपने हाथ में लेगा, उसके स्पर्श से लोहा तुरन्त सोना हो जायेगा। तो यह लोहे का चमत्कार है कि पारस का ? श्रीभरतजी कहते हैं कि प्रभो ! था तो मैं लोहा ही, पर अब लगता है कि पारस का स्पर्श हो गया है।
Monday, 9 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
वर्णन आता है कि समुद्र मंथन से जो विष निकला, भगवान शंकर ने उस विष को पी लिया और वह विष उनके लिए अमृत के समान हो गया। विष अमृत हो गया इसका अभिप्राय क्या है ? यही उत्कृष्ट वैद्य की कसौटी है। साधारण विभाजन तो वनस्पतियों में भी है, वस्तुओं में भी है। जैसे हम कहेंगे कि दूध पौष्टिक पदार्थ है, दूध पीने पर व्यक्ति स्वथ्यता का अनुभव करता है और संखिया विष है, उसे खाने से मृत्यु हो जाती है। सामान्य व्यवहार में दोनों में प्रभेद है, एक ग्राह्य है और एक त्याज्य है, पर वैद्य की विशेषता क्या है ? एक ओर तो वे रोगी के लिए दूध का पथ्य देते हैं और दूसरी ओर संखिया तथा अन्य विषों का भस्म बनाकर, औषध बनाकर, उसकी मारकता को नष्टकर, उसमें जो अमृतत्व छिपा हुआ है, उसे प्रकट करते हैं। फिर उसे रोगी को औषध के रूप में देकर उसको स्वथ्य करते हैं। यह बड़ा तात्विक संकेत है। इसका अभिप्राय यह है कि जीवन में जिसे हम अच्छाई कहते हैं, उसमें तो अच्छाई है ही, लेकिन जिसे हम बुराई समझते हैं, उसमें भी अमृतत्व छिपा हुआ है। रामचरितमानस में मानस-रोगों के चिकित्सा के संदर्भ में वैद्य की बात कही गयी है, गोस्वामीजी कहते हैं - सद्गुरू ही वैद्य हैं। वैद्य जैसे शरीर के रोगों को दूर करते हैं वैसे ही सद्गुरू हमारे जीवन के विष को अमृत, अमंगल को मंगल और कुरुप को सुरुप बना देते हैं।
Sunday, 8 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............,..
भगवान राम ने हनुमानजी को जब रावण के पास भेजा, तो उसके पीछे उनका उद्देश्य क्या था ? लंका का रोगग्रस्त समाज, मोहग्रस्त रावण स्वथ्य हो जाय। लंका का सारा समाज रूग्ण है और उन सबके मूल में है रावण। गोस्वामीजी रावण को मोह का प्रतीक मानते हैं। समस्त व्याधियों के मूल में मोह है और समस्त राक्षसों के मूल में रावण। रावण सहित लंका का सारा समाज रोगग्रस्त है और हनुमानजी हैं उत्कृष्टतम वैद्य। वे तो भगवान शंकर के अवतार हैं न। किसी ने गोस्वामीजी से पूछ दिया कि हनुमानजी तो वैद्य बनकर गये थे, फिर उन्होंने लंका को क्यों जला दिया ? तो गोस्वामीजी बड़े भावनात्मक पद्धति से कहते हैं कि यह हनुमानजी की बड़ी विलक्षण चिकित्सा पद्धति है। वे लंका को जलाकर औषध तैयार कर रहे थे। कैसे ? वे बोले आयुर्वेदशास्त्र की मान्यता है कि जब साधारण जडी-बूटियों से काम न चले, तब सोना-रत्न आदि का भस्म बनाकर रोगी को देना चाहिए। उससे रोगी स्वथ्य हो जाता है। भगवान राम ने हनुमानजी से यही कहा कि भई ! तुमसे अच्छा वैद्य और कौन होगा ? विष में भी अमृतत्व खोज निकालने वाले उत्कृष्टतम वैद्य तो भगवान शंकर ही हैं।
Saturday, 7 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
लोभ का सीधा संबंध बुद्धि से है और यह निश्चित है कि जिस विकार का संबंध बुद्धि से होगा, वह बड़ी गंभीर समस्या उत्पन्न करेगा। इसे यों समझ लीजिए कि अगर किसी के शरीर में रोग हो जाय और वह उस रोग को जानकर, अपने को रोगी मानकर चिकित्सक के पास जाय, औषध ले और स्वस्थ होने की चेष्टा करे, तब तो कोई समस्या नहीं है, पर यदि कोई रोगी होने पर भी रोग का अनुभव न करे, अपने को रोगी न माने तो ? और मन के संदर्भ में यही सत्य है। मन में विकार आने पर, मन के रोगी होने पर यदि हमारी बुद्धि स्वथ्य बनी रहे, बुद्धि में ठीक-ठीक यह अनुभव होता रहे कि हमारे मन में विकार है, यह रोग हो गया है, तब तो हम उस रोग से निवृत्ति की चेष्टा करेंगे, पर कहीं ऐसा हो कि मन के रोगों को बुद्धि का समर्थन प्राप्त हो जाय और बुद्धि यह कहने लगे कि यह रोग नहीं, यह तो स्वथ्यता का लक्षण है, तो ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से वह रोग दूर होने के स्थान पर अचल होकर बैठ जायेगा। चाहे वह काम हो, क्रोध हो या लोभ ; जब भी हम उस विकार का बुद्धि के द्वारा समर्थन करेंगे, तर्क-युक्ति से उसका पक्ष लेंगे, तो निश्चित रूप से उस रोग को दूर करना असंभव हो जायेगा।
Friday, 6 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
चार प्रमुख रोग हैं, जो हमारे अन्तःकरण को आक्रांत कर विविध रूपों में प्रकट होते हैं, इन सब रोगों के निदान में यह विभाजन सहायक सिद्ध होता है। कुछ रोग काम प्रधान होते हैं, तो कुछ क्रोध प्रधान और कुछ लोभ प्रधान। जैसे आसक्ति काम प्रधान रोग होता है और इसका केन्द्र है मन। हिंसा क्रोध प्रधान रोग है और इसका केन्द्र है अहंकार। स्वार्थपरक वृत्तियाँ लोभ से जुड़ी हुई हैं, जहाँ कि बुद्धि की प्रधानता है। इस तरह अनगिनत व्याधियों से हमारा अन्तःकरण आक्रांत है और हमारा अन्तःकरण ही नहीं, बल्कि सारा समाज इन व्याधियों से आक्रांत है।
Thursday, 5 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
जितने भी मन के रोग हैं, उनके मूल में मोह है। इस मोह से ही रोगों की श्रृंखला शुरू होती है। जैसे शरीर के संदर्भ में वात, पित्त और कफ है, उसी तरह मन के संदर्भ में काम, क्रोध और लोभ है। मोह दोनों संदर्भों में समान रूप से जुड़ा हुआ है। गोस्वामीजी इन चारों को ही अधिक महत्व देते हैं और अगर हम देखें तो पायेंगे कि हमारे अन्तःकरण के चारों भाग इन चारों के एक-एक अधिष्ठान हैं। जैसे काम का अधिष्ठान है मन। इसलिए काम का एक नाम मनोज भी है। काम मन को आक्रांत करता है। काम का संबंध मुख्य रूप से व्यक्ति के मन से है। लोभ का केन्द्र है बुद्धि, क्रोध का अहंकार और मोह का अधिष्ठान है चित्त। इस तरह इन एक-एक व्याधियों का हमारे अन्तःकरण के एक-एक भाग से संबंध है। क्रोध का अहंकार से घनिष्ठ संबंध है। क्रोध जब भी आयेगा, कहीं न कहीं अहंकार से अवश्य जुड़ा होगा।
Wednesday, 4 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
रामचरितमानस में मन के रोगों के जो लक्षण बताये गये हैं, निदान और चिकित्सा की जो पद्धति प्रस्तुत की गयी है, उनके द्वारा यदि हम अपने अन्तर्जीवन में विद्यमान रोगों को ठीक-ठीक समझ सकें और उससे मुक्त होने के लिए उस चिकित्सा-पद्धति को ह्रदयंगम कर सके, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे जीवन के अधिकांश मानस-रोगों का उपशमन हो जायेगा।
मानस-रोग कहने पर साधारणतया केवल मन के रोगों का अर्थ ही ध्वनित होता है, लेकिन यहाँ पर मन बड़े व्यापक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। मनुष्य के अन्तःकरण को चार भागों में विभक्त किया गया है, जिन्हें मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार कहते हैं। इन चारों के समुच्चय को अन्तःकरण-चतुष्टय कहते हैं। मानस-रोगों के संदर्भ में मन इस समग्र अन्तःकरण-चतुष्टय का बोधक है। इसलिए वे मानस-रोग जो मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को केन्द्र बनाकर प्रकट होते हैं, मानस-रोग कहलाते हैं। मानस-रोगों के स्वरूप को समझने के लिए अन्तःकरण पर भी एक दृष्टि डालना उपयोगी होगा। जो संकल्प-विकल्प का केन्द्र है अर्थात जहाँ से संकल्प-विकल्प उठते हैं उसे मन कहते हैं। जिसके द्वारा हम निर्णय करते हैं, किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं वह बुद्धि है। जो स्वीकृति देने वाला है वह अहंकार है और इन सबके पीछे जहाँ जन्मान्तर के संस्कार संग्रहीत हैं वह चित्त है। इनमें एक, दो या सभी विकारग्रस्त हो जाते हैं, जिस पर रामचरितमानस में मानस-रोग के रूप में चर्चा की गयी है।
मानस-रोग कहने पर साधारणतया केवल मन के रोगों का अर्थ ही ध्वनित होता है, लेकिन यहाँ पर मन बड़े व्यापक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। मनुष्य के अन्तःकरण को चार भागों में विभक्त किया गया है, जिन्हें मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार कहते हैं। इन चारों के समुच्चय को अन्तःकरण-चतुष्टय कहते हैं। मानस-रोगों के संदर्भ में मन इस समग्र अन्तःकरण-चतुष्टय का बोधक है। इसलिए वे मानस-रोग जो मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को केन्द्र बनाकर प्रकट होते हैं, मानस-रोग कहलाते हैं। मानस-रोगों के स्वरूप को समझने के लिए अन्तःकरण पर भी एक दृष्टि डालना उपयोगी होगा। जो संकल्प-विकल्प का केन्द्र है अर्थात जहाँ से संकल्प-विकल्प उठते हैं उसे मन कहते हैं। जिसके द्वारा हम निर्णय करते हैं, किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं वह बुद्धि है। जो स्वीकृति देने वाला है वह अहंकार है और इन सबके पीछे जहाँ जन्मान्तर के संस्कार संग्रहीत हैं वह चित्त है। इनमें एक, दो या सभी विकारग्रस्त हो जाते हैं, जिस पर रामचरितमानस में मानस-रोग के रूप में चर्चा की गयी है।
Tuesday, 3 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्....................
........कल से आगे.........
मंथरा कैकेयी से कहती है कि राजा से केवल यही वरदान न माँगना कि भरत को राज्य मिले। क्यों ? क्योंकि भरत को राज्य मिलने पर केवल आपको आनन्द ही तो मिलेगा, पर इससे कौसल्या को दुःख तो नहीं मिलेगा। आनन्द तो तभी आयेगा, जब हमें आनन्द और कौसल्या को दुःख मिले। मंथरा कहना चाहती है कि कौसल्या बड़ी प्रसन्न हो रही है, बड़ा उत्सव मना रही है, बड़ा दान बाँट रही है, उन्हें जरा सबक सिखाना है, इसलिए ऐसा वरदान माँगिए जैसा मैं कह रही हूँ। यही है राजयक्ष्मा के साथ कोढ़। ईर्ष्यावृत्ति के साथ दुष्टता का योग और वह इस सीमा तक पहुँच जाती है कि वह केवल अपने लोभ की पूर्ति ही नहीं चाहती, बल्कि दूसरे को लाभ से वंचित करके उसे उत्पीड़ित भी करना चाहती है। ये रोग कैकेयी में नहीं है, पर रोगी मंथरा के पास वे थोड़ी देर बैठ गयीं और सारा रोग ज्यों का त्यों कैकेयी में आ गया, तो ये रोग संक्रामक भी है। इस प्रकार लोभ, ईर्ष्या और कुटिलता रूपी मन के ये जो रोग हैं, ये ही रामराज्य में व्यवधान उत्पन्न कर देते हैं और आज के समाज में भी यह रोग अत्यंत व्यापक रूप में फैला हुआ है।
मंथरा कैकेयी से कहती है कि राजा से केवल यही वरदान न माँगना कि भरत को राज्य मिले। क्यों ? क्योंकि भरत को राज्य मिलने पर केवल आपको आनन्द ही तो मिलेगा, पर इससे कौसल्या को दुःख तो नहीं मिलेगा। आनन्द तो तभी आयेगा, जब हमें आनन्द और कौसल्या को दुःख मिले। मंथरा कहना चाहती है कि कौसल्या बड़ी प्रसन्न हो रही है, बड़ा उत्सव मना रही है, बड़ा दान बाँट रही है, उन्हें जरा सबक सिखाना है, इसलिए ऐसा वरदान माँगिए जैसा मैं कह रही हूँ। यही है राजयक्ष्मा के साथ कोढ़। ईर्ष्यावृत्ति के साथ दुष्टता का योग और वह इस सीमा तक पहुँच जाती है कि वह केवल अपने लोभ की पूर्ति ही नहीं चाहती, बल्कि दूसरे को लाभ से वंचित करके उसे उत्पीड़ित भी करना चाहती है। ये रोग कैकेयी में नहीं है, पर रोगी मंथरा के पास वे थोड़ी देर बैठ गयीं और सारा रोग ज्यों का त्यों कैकेयी में आ गया, तो ये रोग संक्रामक भी है। इस प्रकार लोभ, ईर्ष्या और कुटिलता रूपी मन के ये जो रोग हैं, ये ही रामराज्य में व्यवधान उत्पन्न कर देते हैं और आज के समाज में भी यह रोग अत्यंत व्यापक रूप में फैला हुआ है।
Monday, 2 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................
पहले तो मंथरा में लोभ और ईर्ष्या की वृत्ति है। श्रीराम के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर उसका ह्रदय राजयक्ष्मा से जलने लगा, फिर उसके बाद उसके मन को कोढ़ भी हो गया। अगर मंथरा यह सोचकर शांत हो जाती कि राम को राज्य मिले या चाहे जिसको मिले, मुझे क्या लेना-देना है ! यह भी एक विवेक की बात होती और उसे ईर्ष्या हो ही गयी, तो मन में यह भी सोच लेती कि राम को राज्य मिल रहा है, बुरा तो लग रहा है, पर मैं कर ही क्या सकती हूँ ? इसे रोकना मेरे बस की बात नहीं है, तो भी बुराई आगे नहीं बढ़ पाती, परन्तु उस राजयक्ष्मा के साथ कोढ़ (कुटिलता और दुष्टता) ने मिलकर अयोध्या में एक असाध्य रोगी उत्पन्न किया, जिससे रामराज्य में बाधा उत्पन्न हो जाती है। अब एक रात बची हुई है, क्या उपाय करूँ कि राम सिंहासन पर न बैठ सकें ! वह योजना बनाती है। कितनी भयंकर षड्यंत्रकारिणी थी वह और इतना ही नहीं, उसकी कुटिलता और दुष्टता पराकाष्ठा तक पहुँच जाती है, जब वह कैकेयी से कहती है कि राजा से केवल यही वरदान न माँगना कि भरत को राज्य मिले। क्यों ?
.........आगे कल.........
.........आगे कल.........
Sunday, 1 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
लोभ और ईर्ष्या दोनों का बड़ा घनिष्ठ संबंध है। दूसरों का सुख देखकर जलने की वृत्ति मुख्यतः लोभ से जुड़ी हुई है। इस वृत्ति के दृष्टांत के रूप में मानस में इस रोग से ग्रस्त मंथरा को प्रस्तुत किया गया। यह वृत्ति मंथरा के चरित्र में दिखाई देती है। मंथरा महारानी कैकेयी की प्रियसेविका है, कैकयनरेश की कृपापात्र है, पर इतना होते हुए भी लोभ की वृत्ति उसके अन्तःकरण में दबी पड़ी है और उसका अतिरेक ईर्ष्या भी उसके चरित्र में दिखाई देता है। मंथरा नगर में घूमने निकली। नगर सजाया जा रहा था। उसने पूछा कि नगर क्यों सजाया जा रहा है ? तो समाचार मिला कि कल अयोध्या के राजसिंहासन पर श्रीराम का तिलक होने वाला है। श्रीराम का राजतिलक की बात सुनकर उसका ह्रदय जलने लगा। गोस्वामीजी ने कहा कि इस जलन की भी मात्रा होती है। अगर लोभ कफ हो और उस कफ से साधारण खाँसी आवे तो वह जल्दी ठीक हो सकती है, पर यदि खाँसी यक्ष्माजन्य हो, तब तो उसका ठीक होना बड़ा कठिन है और इस राजयक्ष्मा रोग से जुड़ा हुआ एक अन्य रोग है कोढ़। वैसे उनका आपसी संबंध समझ में नहीं आता, क्योंकि शरीर के संदर्भ में इस संबंध को कोई महत्व नहीं दिया जाता पर मन के संदर्भ में ये दोनों गहराई से जुड़े हुए हैं। मन की कुटिलता और दुष्टता ही मन का कोढ़ है और दूसरों के सुख को देखकर जलना ही उसका राजयक्ष्मा है।
Saturday, 31 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
ज्ञानियों ने, भक्तों ने और धर्मशास्त्र ने लोभ-ईर्ष्या आदि निकृष्ट वृत्तियों को लिए समाधान देने की चेष्टा की, पर इस समाधान के बावजूद व्यक्ति के मन के ये रोग इतने उलझे हुए हैं कि वह इन समाधानों का भी दुरुपयोग कर बैठता है। जैसे यह जो डर का सिद्धांत है, रोगी मन इसका दुरुपयोग कर सकता है या नहीं ? कर सकता है। कैसे ? यदि वह ईश्वर का डर दूसरों को दिखावे और स्वयं डर से मुक्त रहे, दूसरों को त्याग की शिक्षा दे और अपने जीवन में संग्रह कर ले ; और व्यवहार में ऐसा दिखाई भी देता है। व्यक्ति सिद्धांत की बात तो करता है, पर वह स्वयं के जीवन में उसका दुरुपयोग करता है। इसलिए समस्या के किसी एक पक्ष को लेकर उसका जो समाधान होगा, वह एकांगी होगा। समाधान की समग्रता तो तभी होगी, जब उसमें सभी पक्षों का समन्वय होगा। अगर कहा जाय कि केवल भीतर का सुख ढूढ़ों, बाहर देखो ही मत, तो यह अतिरेक होगा और केवल बाहर के सुख को महत्व दें, भीतर बिल्कुल न देखें तो क्या होगा ? अगर केवल अंतरंग सुख के महत्व दिया गया, तो परिणाम यह होगा कि जीवनयापन के लिए बाह्य आवश्यकता की जो वस्तुएँ हैं, उनका अभाव हो जायेगा और यदि केवल बाह्य सुख को महत्व दिया गया, तो उसका परिणाम होगा कि समाज की बहिरंग दरिद्रता तो मिट जायेगी, पर इस लोभ और ईर्ष्या की वृत्ति की कोई सीमा नहीं रह जायेगी। भौतिक पदार्थों के साथ तो यह समस्या जुड़ी ही रहती है कि जितनी भी हमारी आवश्यकताएँ पूरी होती जाती हैं, लोभ उतना ही बढ़ता जाता है, मन की भूख बढ़ती जाती है। जिनके पास भोग है वे और अधिक का लोभ करते हैं और जिनके पास नहीं है, वे ईर्ष्या करते हैं। यह लोभ और ईर्ष्या दोनों एक दूसरे की पूरक वृत्तियाँ हैं। लोभ से ईर्ष्या उत्पन्न होती है और ईर्ष्यालु व्यक्ति स्वयं लोभी बन जाता है।
Friday, 30 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
निकृष्ट वृत्तियों के लिए या तो धर्म का मार्ग है, या भक्ति अथवा ज्ञान का। ज्ञान का मार्ग क्या है ? यहाँ सुख की परिभाषा बदल दी गयी। कहा गया कि सुख वैभव में नहीं, विषयों में नहीं, वह तो आत्मा में ही उपलब्ध है। वस्तुतः सुख तो अपने भीतर है। बाहर के सुख में तो बँटवारे का झगड़ा है, पर भीतर का जो सुख है, आत्मा का जो सुख है, उसमें बँटवारे का कोई झगड़ा नहीं, कोई छीना-झपटी नहीं। जब हम अपने बाहरी जीवन में संग्रह करते हैं, तो लोभ के कारण अधिक संग्रह कर लेते हैं। उसे देखकर अन्य लोगों को ईर्ष्या होती है और इससे टकराव उत्पन्न होता है। ऐसी स्थिति में संतों ने सुख को अपने भीतर खोजने की, अन्तर के आनन्द को ढूँढने की प्रेरणा दी। संतों ने कहा कि वास्तविक सुख पदार्थ और वैभव में नहीं है, वह तो आत्मसुख में है। इस तरह उन्होंने इस सुख के वितरण का समाधान दिया। जब यह ज्ञात हो गया कि बहिरंग पदार्थों में सुख नहीं है, सुख तो अपने अन्तर में है, तब उस अन्तर के सुख को पाकर बाह्य सुख के लोभ को छोड़ें और अपने संग्रह को उन लोगों में वितरित कर दें, जिन्हें उसकी आवश्यकता है। इससे संग्रहजन्य लोभ-ईर्ष्या आदि की जो वृत्तियाँ हैं और जिनके कारण समाज में टकराव की वृत्ति बनती है, उनका समाधान होगा।
Thursday, 29 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
एक व्यंग्य भरी कथा आपने सुनी होगी। किसी सज्जन ने एक महात्मा को एक शाल ओढ़ा दिया। महात्मा ने कहा कि मुझे नहीं चाहिए। आप इसे वापस ले लीजिए। उस सज्जन ने कहा कि महाराज ! यह शाल मैंने आपको दी थोड़े ही है, वह तो मैंने व्यापार किया है। क्या व्यापार किया है ? बोले कि मैं तो इस एक शाल के बदले कई शाल ले लूँगा। आप जैसे महात्मा को एक शाल दूँगा, तो मुझे अगले जन्म में इसका हजार गुना मिलेगा। महात्माजी भी बड़े विनोदी थे, उन्होंने शाल उतारकर कहा कि भई ! एक तो अभी ले जाओ। बाकी नौ सौ निन्यानवे अगले जन्म में ले लेना। इस तरह लोभ की वृत्ति से भी व्यक्ति दान में प्रवृत्त होता है। यद्यपि यह कोई बहुत ऊँची वृत्ति नहीं है, पर शास्त्र तो हर सोपान पर निकृष्ट वृत्तियों का निवारण कर उच्चतर और उच्चतम सोपानों तक व्यक्ति को उठाने के लिये प्रयत्नशील है।
Wednesday, 28 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
सुग्रीव के मन में क्रमशः एक महान परिवर्तन आता है, अंगद के प्रति उनके मन में उदार वृत्ति का उदय होता है और भय के कारण वे भोगों से विरत हो पाते हैं। तो धर्मशास्त्र में नरक के भय से और भक्ति में भगवान के भय से व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन आता है, स्वार्थपरता और भोग की वृत्ति नियंत्रित होती है। मृत्यु का भय व्यक्ति के संग्रह की वृत्ति को नियंत्रित करता है। व्यक्ति चाहे जितना संग्रह करे, मृत्यु के बाद सब छूट जाता है। अगर सही अर्थों में यह ईश्वर और मृत्यु का भय व्यक्ति के जीवन में आ जाय तो वह समझने लग जाता है कि जीवन में केवल भोग ही नहीं, त्याग की भी अपेक्षा है, केवल लोभ ही नहीं, दान की भी अपेक्षा है। और इसी प्रकार से धर्म में प्रलोभन की बात कही गयी। उसमें कहा गया कि व्यक्ति जो कुछ यहाँ दूसरों को देता है, वही कई गुना होकर उसे स्वर्ग में और अगले कई जन्मों में मिलता रहता है। इसका अभिप्राय यह है कि निरन्तर अपने स्वार्थ का ही चिन्तन करने वाला भोगी व्यक्ति, त्याग की दिशा में स्वयं कभी प्रवृत्त नहीं होता और त्याग के बिना पूर्ण सुख-शांति और जीवन की सार्थकता वह प्राप्त नहीं कर सकता।
Tuesday, 27 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
भगवान लक्ष्मणजी से कहते हैं कि मेरे सखा सुग्रीव को भय दिखाकर यहाँ ले आओ और लक्ष्मणजी यही करते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि कभी-कभी जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु को सहजता से नहीं छोड़ पाता, भोग और वासनाओं को नहीं छोड़ पाता, भय एक ऐसी वृत्ति है जिससे सब छुड़ाया जा सकता है। यह बात शरीर के रोगों के संदर्भ में भी दिखाई देती है और मन के रोगों के संदर्भ में भी। शरीर के रोगों में तो डराने वाले ये डॉक्टर और वैद्य हैं, अगर कह दिया कि नमक खाओगे तो मर जाओगे। अब बेचारा मरीज, जो नमक नहीं छोड़ पा रहा था, मृत्यु के डर से उसका नमक खाना छूट गया। इस तरह भय की भी सार्थकता है। इस संदर्भ में एक बात पर विचार करके देखें। जैसे मृत्यु या रोग के भय से हम कुपथ्य छोड़ देते हैं, उसी तरह अगर ईश्वर से डरकर हम पाप और असत्कर्म छोड़ दें, तो डर की इससे अच्छी सार्थकता और क्या होगी ? और इस प्रसंग में हुआ भी यही। सुग्रीव डर गये। इस डर का परिणाम यह हुआ कि वे पुनः लौटकर भगवान के चरणों में आ गये और सच्चे अर्थों में उन्होंने जनकनन्दिनी सीताजी का पता लगाया और इतना ही नहीं, अंगद के प्रति भी उन्होंने अत्यंत उदारता का परिचय दिया। भगवान जैसा चाहते थे, आगे चलकर सुग्रीव के चरित्र का वैसा ही विकास हुआ और उनके जीवन में सामंजस्य आया।
Monday, 26 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
सुग्रीव जब राज्य पाकर भोगों में लिप्त होकर भगवान को भूल गये, तब भगवान राम ने लक्ष्मणजी से कहा कि सुग्रीव पहले से डरा हुआ था, इसलिए मेरी शरण में आया और जब मैंने उसका भय दूर कर दिया, तो उलटा वह मुझे ही भूल गया। तुम जाओ, लेकिन उसे मारने की आवश्यकता नहीं है, बस उसमें फिर से थोड़ा भय उत्पन्न कर दो। लक्ष्मणजी उठकर बोले कि मैं अभी उसे डरा देता हूँ। यह तो मेरा प्रिय कार्य है। मैं स्वयं आपसे डरता हूँ और चाहता हूँ कि जीव भी आपसे निरन्तर डरता रहे। भगवान ने तुरन्त लक्ष्मणजी का हाथ पकड़ लिया और धीरे से बोले कि देखो ! ध्यान रखना ! उसमें दो बड़ी दुर्बलताएँ हैं, एक तो वह डरपोक है और दूसरे भगोड़ा। उसे डराना, पर देखना कि कहीं वह डरकर भाग न जाय। उसे डराकर यहीं ले आना। पहले तो वह संसार से डरकर भागा हुआ मेरे पास आया, यह तो डरकर भागने की सार्थकता है, पर अब कहीं ऐसा न हो कि मुझसे डरकर वह संसार की ओर भाग जाय। यह तो डर का दुरुपयोग हो जायेगा। इसलिए तुम डर का सदुपयोग करना।
Sunday, 25 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.................
भगवान श्रीराघवेन्द्र ने कामकाज और रामकाज का श्रेष्ठतम सूत्र सुग्रीव को दिया, पर सुग्रीव उसे पूरी तरह से ह्रदयंगम नहीं कर पाये। वे राज्य पाकर कामकाज में और उससे भी अधिक भोगों में डूब जाते हैं। भगवान को वे भूल गये, कई दिनों तक भगवान से मिलने ही नहीं आये। कभी याद आने पर वे अपने आपको यह सोचकर भुलावा देते रहे कि भगवान ने सीताजी का पता लगाने अवश्य कहा है, पर इसमें उन्होंने समय का कोई बंधन तो नहीं लगाया है। हम लोग भी प्रायः यही सोचते हैं कि भक्ति और भगवान की बात फिर कभी कर लेंगे, अभी जल्दी क्या है ? और तब भगवान किसको याद करते हैं ? पहले तो अपने बाण की याद करते हैं। कहते हैं कि लक्ष्मण ! मैंने सोचा है कि जिस बाण से मैंने बालि के ऊपर प्रहार किया था, उसी बाण का प्रहार मैं सुग्रीव पर भी करूँगा। बड़ी विचित्र गुत्थी है। सीधे कह सकते थे कि मैं सुग्रीव को मारूँगा। जिस बाण से बालि को मारा, उसी बाण से सुग्रीव को मारूँगा यह कहने की क्या आवश्यकता थी ? भगवान का तात्पर्य यह था कि मेरे पास दो रोगी आये थे। एक को मैंने मीठी दवा दी और दूसरे को कड़वी। राज्य देकर मैंने सुग्रीव को मीठी दवा और बालि के छाती पर बाण चलाकर उसे कड़वी दवा दी, लेकिन बड़ी विचित्र बात है, जिसे मैंने मीठी दवा दी, वह तो फिर रोगी हो गया और जिसे कड़वी दवा दी, वह निरभिमान होकर मेरे धाम में पहुँच गया। तो लगता है कि कड़वी दवा में कुछ अधिक चमत्कार है। इसलिए उसी दवा का प्रयोग जरा सुग्रीव पर भी करके देखें।
Saturday, 24 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
राज्य पाकर सुग्रीव जब पूछते हैं कि अब मेरे लिए क्या आदेश है ? तब श्रीराम जो कहते हैं, वह बड़ा महत्वपूर्ण सूत्र है और वह केवल सुग्रीव के ही संदर्भ में नहीं, बल्कि हमारे, आपके एवं सबके लिए बड़े महत्व का है। वह सूत्र क्या है ? हमारे जीवन में एक प्रश्न आता है कि हम अपना कामकाज करें कि रामकाज करें ? संसार का व्यवहार देखें या भक्ति करें ? तो भगवान राम एक सूत्र देते हैं जिसमें कामकाज और रामकाज का सुन्दर सामंजस्य है। उन्होंने कहा कि जाओ ! राज्य चलाओ !! यह राज्य चलाना तो कामकाज है, पर साथ है उन्होंने यह भी कह दिया कि इस कामकाज में व्यस्त होकर रामकाज को न भूल जाना, याद रखना। जनकनन्दिनी सीताजी का पता लगाना है। अभिप्राय यह है कि भेदरहित होकर व्यवहार का निर्वाह करते हुए, इस सत्य को अच्छी तरह से समझकर निरन्तर ध्यान में रखें कि भक्ति और भगवान को पाना ही जीवन का लक्ष्य है। इसके बिना जीवन किसी भी तरह पूर्ण नहीं होगा।
Friday, 23 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
भगवान राम ने सुग्रीव को राज्य तो दिया, पर उनके चरित्र का दर्शन क्या है ? परम्परा यह है कि राजा के पुत्र को ही राज्य मिलता है, लेकिन भगवान राम को यह परम्परा स्वीकार नहीं है। उन्होंने राजा सुग्रीव को बनाया और उत्तराधिकारी का पद अंगद को दिया, सुग्रीव के बेटे को नहीं। यही सुन्दर सामंजस्य है। राज्य पाकर सुग्रीव जब पूछते हैं कि अब मेरे लिए क्या आदेश है ? तब भगवान ने आदेश दिया कि जाओ ! राज्य चलाओ, लेकिन राज्य तुम अकेले, अपनी इच्छा से मत चलाना। तो कैसे चलाना - याद रखना ! बालि ने यह भूल की थी, उसने भाई और बेटे में भेद किया था। बालि के चरित्र में यह दुर्बलता थी। मान लीजिए ! बालि के मंत्रियों ने सुग्रीव के स्थान पर अंगद को सिंहासन पर बिठा दिया होता और बालि लौटकर आते, तो क्या वे अंगद से भी वही व्यवहार करते, जो उन्होंने सुग्रीव के साथ किया ? बिल्कुल नहीं। तब तो उन्हें संतोष हो जाता कि चलो, कोई बात नहीं, मेरा बेटा ही तो सिंहासन पर बैठा हुआ है, पर उसने भाई और बेटे में भेद किया। यह भेदवृत्ति बालि के चरित्र की दुर्बलता है, जो उसके परिवार में अशांति और कलह की सृष्टि करती है और यही हमारे और आपके जीवन में भी दिखाई देती है और उसका परिणाम भी हम देख रहे हैं। भगवान श्री राघवेन्द्र कामकाज का सूत्र देते हुए सुग्रीव से कह देते हैं - सुग्रीव ! इस बात को तुम अच्छी तरह याद रखना कि राज्य तुम अकेले नहीं चलाओगे ! बालि ने जो भूल की उसे तुम दुहराना मत ! अंगद के साथ मिलकर, उसकी सलाह लेकर, दोनों एक मत होकर राज्य चलाना। यही मेरा आदेश है।
Thursday, 22 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
ईश्वर परिणाम में सम है, पर व्यवहार में भक्तों का पक्ष लेते हुए दिखाई देता है। बालि और सुग्रीव के संदर्भ में भी यही बात है। भगवान भक्त का अर्थात सुग्रीव का पक्ष लेते हैं और बालि का वध करते हैं, पर अगर परिणाम की दृष्टि से देखें तो गोस्वामीजी कहते हैं कि परिणाम दोनों का समान है। कैसे ? यहाँ पर भगवान की बड़ी विचित्र भूमिका है। दो भाइयों बालि और सुग्रीव के बीच झगड़ा है। अब इसमें भगवान राम की भूमिका क्या है ? वे किष्किन्धा का राज्य बालि से छीनकर सुग्रीव को दे देते हैं। और बालि को ? - राम बालि निज धाम पठावा। - भगवान राम ने बालि को अपना धाम दे दिया। व्यवहार में पक्षपात दिखाई देते हुए भी, एक के गले में माला और दूसरे के छाती पर प्रहार दिखाई देते हुए भी, परिणाम दोनों के जीवन में समान है। एक को मीठी दवा और एक को कड़वी दवा, पर परिणाम की दृष्टि से दोनों के प्रति कल्याण की भावना है। सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य प्राप्त होता है, तो बालि को अपना धाम प्रदान कर वे पक्षपात और समता दोनों का निर्वाह करते हैं।
Wednesday, 21 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................
भगवान श्रीराम बालि का वध करते हैं। यह प्रसंग अपने आप में बड़ा विचित्र है, पर हम विचार करके देखेंगे कि इसके पीछे दर्शन क्या है ? भगवान ने सुग्रीव का पक्ष लिया और बालि को दण्ड दिया। यहाँ पर उनके चरित्र का दर्शन बड़े सांकेतिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रश्न उठता है कि भगवान को हम किस रूप में देखें ? वेदांत की मान्यता है कि ब्रह्म सम है और भक्तों की मान्यता है कि भगवान पक्षपाती है, अब दोनों में सही बात कौन-सी है ? ईश्वर सम है कि विषम ? इसका सांकेतिक उत्तर यह है कि एक साथ दोनों की रक्षा करना ही ईश्वर की विलक्षणता है। एक दृष्टांत के द्वारा हम इसे आपके सामने रखते हैं। मान लीजिए एक वैद्य के पास दस रोगी आये हुए हैं। अब वैद्य का कर्तव्य क्या है ? यही है कि वह समस्त रोगियों के प्रति सम हो। समता का एक अर्थ तो यह हुआ कि जितने रोगी आये हुए हैं उन सबको एक ही दवा दे दें, एक ही पथ्य बता दें और कह दें कि हम तो सब के प्रति सम हैं। अगर चिकित्सक ऐसी समता दिखाने लगें, तो बेचारे रोगियों की क्या दशा होगी ? इसे समझना कठिन नहीं है, तो समता का अभिप्राय है परिणाम में सम होना, व्यवहार में नहीं। व्यवहार में जिसको कड़वी दवा दी, उसे देखकर लगेगा कि उसके प्रति द्वेष भाव है, पर दोनों का परिणाम क्या हुआ ? यही महत्वपूर्ण है। व्यवहार में एक को मीठी और दूसरे को कड़वी दवा दी गयी, पर उसके पीछे वैद्य की भावना यही है कि परिणाम दोनों का सम हो। दोनों स्वस्थ हो जायँ।
Tuesday, 20 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
ईश्वर के पद-चिह्नों का संरक्षण अर्थात मर्यादा का संरक्षण। इसका अभिप्राय क्या है ? मर्यादा माने क्या ? भगवान श्रीराम को सूचना दी गयी कि कल आप अयोध्या के राजसिंहासन पर बैंठेंगे और उस सूचना को सुनकर भगवान राम के मन में जो प्रतिक्रिया हुई, वही भगवान राम की बनायी हुई वह रेखा, वह पदचिह्न है, जिसे उन्होंने अपने व्यवहार और चरित्र के माध्यम से समाज के समक्ष प्रकट किया। व्यक्ति राज्य और सत्ता पाने के लिए निरन्तर व्यग्र रहता है। इसके लिए अन्याय और अधर्म करने में भी वह रंचमात्र संकोच नहीं करता, पर राज्य पाने की सूचना पाकर भगवान राम के मन में जो प्रतिक्रिया हुई, यही भगवान राम के चरित्र का दर्शन है। समाचार सुनकर प्रभु उदास हो गये। यद्यपि राम कुछ बड़े हैं, पर सोचते हैं कि हम चारों भाइयों का जन्म एक साथ हुआ, साथ खेले, उपनयन और विवाह भी एक साथ हुआ, उदास क्यों हो गये ? भगवान राम उदास होकर सोचने लगे कि इस पवित्र सूर्यवंश में यही परम्परा बड़ी बुरी है कि छोटे को छोड़कर बड़े को राज्य दिया जाता है। मानस की इस पंक्ति का तात्पर्य यह नहीं है कि इसे पढ़कर लोग गदगद हो जायँ, यह सोचकर आँखों में आँसू आ जायँ कि भगवान राम दूसरों का कितना ध्यान रखते हैं। गोस्वामीजी तुरन्त कहते हैं कि भगवान राम के ह्रदय में यह जो भावना है, उससे प्रेरित होकर यदि हम अपने से छोटों के प्रति ध्यान रखें, तो हम सही अर्थों में भगवान राम के पदचिह्नों को बचाकर उन्हें ठीक-ठीक अपने जीवन में स्वीकार कर पायेंगे। इस प्रसंग को पढ़ने के बाद भी अगर हममें दूसरों के सुख-साधनों को छीनकर स्वयं सुखी होने की वृत्ति बनी रही, तब तो हम भगवान के पदचिह्नों को नहीं बचा पाये। इसे पढ़ने के बाद तो परिणाम यह होना चाहिए- हमारी स्वार्थपरता, कुटिलता और सठता की वृत्ति दूर हो जाय।
Monday, 19 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
पहला सूत्र है आगे राम और दूसरा है सभीता। जनकनन्दिनी सीताजी और लक्ष्मण, दोनों भगवान राम के पीछे चलते हैं और दोनों अत्यंत डरे हुए हैं। यह बड़ी विलक्षणता है। जनकनन्दिनी श्रीसीता का श्रीराम से डरना तो स्वाभाविक लगता है। वे भक्ति हैं। वे चलती हुई एक-एक पग डरती हुई रखती हैं कि कहीं ऐसा न हो कि श्रीराम के चरणचिह्नों पर मेरे पाँव पड़ जायँ और वे मिट जायँ, पर लक्ष्मणजी तो दोहरे डरे हुए हैं। सीताजी तो केवल श्रीराम के चरणचिह्नों को बचाकर चल रही हैं, लेकिन लक्ष्मणजी के सामने तो दो के चरणचिह्न हैं और उन्हें उन दोनों को बचाने की चिन्ता लगी है। वे दोनों को बचाते हुए सभीत और सजग भाव से चल रहे हैं। सीताजी महाशक्ति हैं और लक्ष्मणजी शेष हैं अर्थात कालतत्व। ये दोनों भगवान राम से क्यों डरते हैं ? एक बार भगवान श्रीराम ने लक्ष्मणजी से पूछ दिया - लक्ष्मण ! तुम तो शेष हो, अनन्त काल हो, तुम मुझसे क्यों डरते हो ? लक्ष्मणजी ने कहा कि महाराज ! मैं चाहता हूँ कि लोग समझ लें कि मैं अनन्त शेष होकर भी ईश्वर से डरता हूँ। जब मुझे ही ईश्वर से डर लगता है, तो आप सामान्य लोग ईश्वर से निर्भय रहें, यह मर्यादा का संरक्षण नहीं है। ईश्वर के पद-चिह्नों का संरक्षण अर्थात मर्यादा का संरक्षण।
Sunday, 18 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................
........कल से आगे..........
लक्ष्मण और इन्द्र के संदर्भ में बड़ी प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग किया गया है। भगवान राम विष्णु के अवतार हैं। लक्ष्मणजी ने उन्हें बड़े भाई के रूप में देखा और उन्हें आगे करके चल रहे हैं, परन्तु भगवान ने जब इन्द्र से पूछा तो उन्होंने कहा कि आप मेरे छोटे भाई बनिए ! क्यों ? इन्द्र स्वर्ग का राजा है, भोगी है और लक्ष्मणजी मूर्तिमान वैराग्य हैं। इसका तात्त्विक तात्पर्य यह है कि जो वैराग्यवान है, वह भगवान के पीछे चलता है, पर जो भोगी है, वह तो ईश्वर को पीछे ही रखता है। उसे यही चिन्ता रहती है कि भगवान यदि बड़े भाई बन गये तो उनकी बात माननी पड़ेगी और छोटे भाई बने रहेंगे तो उन्हें हमारे पीछे आना पड़ेगा, हम जो कहेंगे उसे मानना पड़ेगा। हम ईश्वर की बात नहीं मानना चाहते, ईश्वर के पीछे चलना नहीं चाहते। हम तो ईश्वर को अपने छोटे भाई की तरह पीछे-पीछे आने के लिए, हम जो कहें उसे मानने के लिए कहते हैं।
लक्ष्मण और इन्द्र के संदर्भ में बड़ी प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग किया गया है। भगवान राम विष्णु के अवतार हैं। लक्ष्मणजी ने उन्हें बड़े भाई के रूप में देखा और उन्हें आगे करके चल रहे हैं, परन्तु भगवान ने जब इन्द्र से पूछा तो उन्होंने कहा कि आप मेरे छोटे भाई बनिए ! क्यों ? इन्द्र स्वर्ग का राजा है, भोगी है और लक्ष्मणजी मूर्तिमान वैराग्य हैं। इसका तात्त्विक तात्पर्य यह है कि जो वैराग्यवान है, वह भगवान के पीछे चलता है, पर जो भोगी है, वह तो ईश्वर को पीछे ही रखता है। उसे यही चिन्ता रहती है कि भगवान यदि बड़े भाई बन गये तो उनकी बात माननी पड़ेगी और छोटे भाई बने रहेंगे तो उन्हें हमारे पीछे आना पड़ेगा, हम जो कहेंगे उसे मानना पड़ेगा। हम ईश्वर की बात नहीं मानना चाहते, ईश्वर के पीछे चलना नहीं चाहते। हम तो ईश्वर को अपने छोटे भाई की तरह पीछे-पीछे आने के लिए, हम जो कहें उसे मानने के लिए कहते हैं।
Saturday, 17 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.................
रामचरितमानस में प्रसंग आता है कि तीन यात्री वन के मार्ग में चले जा रहे हैं - भगवान श्रीराम, जनकनन्दिनी श्रीसीताजी और श्री लक्ष्मण। गोस्वामीजी इन तीनों यात्रियों का वर्णन करने के बाद कहते हैं कि जिसने भी इन्हें चलते हुए देखा है, या इन्हें ह्रदय में धारण किया है, वह व्यक्ति संसार - पथ को बड़ी सरलता से पार कर लेता है। इन तीनों यात्रियों के क्रम में तीन संकेत हैं। पहला संकेत है - आगे राम और इसका अभिप्राय क्या है ? यह कि हम जीवनपथ में हम अकेले न चलें, अपितु ईश्वर को साथ लेकर चलें। अधिकांश व्यक्ति कह सकते हैं कि हम तो जब भी यात्रा प्रारंभ करते हैं, ईश्वर का स्मरण कर लेते हैं। हम तो निरन्तर ईश्वर को साथ लेकर चलते हैं। गोस्वामीजी तुरन्त एक शब्द कहकर सावधान कर देते हैं- आगे राम। ईश्वर को साथ लेकर चलते हैं पर आगे या पीछे ? इसका अभिप्राय यह है कि हम ईश्वर से यही कहते हैं कि हमारा जहाँ स्वार्थ है, जहाँ वासना है, वहाँ हम जा रहे हैं, आप भी हमारे पीछे-पीछे आइये। आगे-आगे चलकर सही दिशा हम बतायेंगे, आप हमारा अनुगमन करें। गोस्वामीजी कहते हैं - पीछे नहीं, आगे राम। कोई पूछ सकता है कि ईश्वर तो साथ में हैं, फिर आगे हैं या पीछे, इससे क्या फर्क पड़ता है ? नहीं, इसमें बहुत बड़ा अन्तर है।
......,आगे कल.......
......,आगे कल.......
Friday, 16 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
लोभ और ईर्ष्या एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान है। अब इसका समाधान क्या है ? इस समस्या के समाधान के लिए कई बातें सोची गयीं, वेदांत ने प्रयास किया, भक्ति और कर्मशास्त्र के द्वारा प्रयत्न हुआ तथा शासन भी इसके समाधान की चेष्टा करता है। इस लोभ और ईर्ष्या के समाधान के लिए शासनतंत्र के दण्ड का भय रहे तो उनमें लोभ और संग्रह की वृत्ति न आकर दान की वृत्ति आयेगी। कर इत्यादि के रूप में शासन इसे नियंत्रित करने की चेष्टा करता है। इस तरह भय की वृत्ति भी एक उपाय है। धर्म में भी उस भय का प्रयोग किया गया, पर दूसरे रूप में और उसके साथ प्रलोभन भी जोड़ दिया गया। धर्म में एक ओर तो यह भय दिखाया गया कि अन्याय तथा भ्रष्टाचार के द्वारा तुम जो कुछ भी संचय करोगे। वह सब अन्त में छोड़कर खाली हाथ जाना होगा। इस प्रकार धर्म में मृत्यु और पुनर्जन्म का भय दिखाया गया और भक्तों ने भगवान का भय दिखाया। अतः भय की वृत्ति के द्वारा भी भ्रष्टाचार से बचा जा सकता है।
Thursday, 15 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
आजकल भ्रष्टाचार की आलोचना बड़ी व्यापक है। हर मंच में, समाचार पत्रों में, जहाँ देखिए वहीं भ्रष्टाचार की बड़ी चर्चा है, लेकिन बड़ी विचित्र बात है कि भ्रष्टाचार पर इतना विचार किया जाता है, इतना कहा जाता है, पर भ्रष्टाचार मिटता क्यों नहीं ? इसका रहस्य यह है कि वस्तुतः झगड़ा अगर भ्रष्टाचार मिटाने का हो तो भ्रष्टाचार मिट जाए, पर यह झगड़ा भ्रष्टाचार मिटाने का नहीं, भ्रष्टाचार के बँटवारे का है। असल में हम जो झगड़ते हैं, वह इस बात पर कि इस भ्रष्टाचार में हमें कम भाग मिल रहा है और दूसरे अधिक ले रहे हैं। ये सारी वृत्तियाँ एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और इसके मूल में लोभ और ईर्ष्या है। प्रत्येक व्यक्ति में ये विद्यमान है। लोभ के कारण वह सारी सुख-सुविधा की वस्तुएँ अपने लिए एकत्र कर लेना चाहता है और ईर्ष्या के कारण वह दूसरों का सुख एवं समृद्धि देखकर असंतुष्ट होता है।
Wednesday, 14 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
लोभ और ईर्ष्या की वृत्ति में कितना निकट का संबंध है, इस ओर मैं आपका ध्यान आकृष्ट करूँगा। अगर व्यक्ति के मन में निर्विवाद रूप से किसी वस्तु की माँग है तो वह है सुख की माँग। यद्यपि सुख की व्याख्या को लेकर मतभेद है, क्योंकि सुख की व्याख्या अलग-अलग रूपों में की जाती है, लेकिन अधिकांश व्यक्ति भौतिक पदार्थों की उपलब्धि को ही सुख के रूप में देखते हैं और समाज में जो यह इतनी छीना-झपटी है, वह सुख को लेकर है। प्रत्येक व्यक्ति को एक ही बात की चिन्ता बनी रहती है कि सुख की अधिक से अधिक सामग्री हमारे पास एकत्रित हो जाय और दूसरों के पास हमसे अधिक न होने पाये। यह सुख की सामग्री एकत्रित करना लोभ है और दूसरे के पास मुझसे अधिक सुख न होने पाये यह ईर्ष्या है। ये दोनों वृत्तियाँ एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई हैं। यह जो व्यक्ति, परिवार और समाज में इतनी आपा-धापी, झगड़ा और संघर्ष है, सब सुख की वस्तुओं के बँटवारे को ही लेकर है।
Tuesday, 13 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................
शरीर के संदर्भ में जैसे पेट के रोगों का संबंध बहुधा पित्त से होता है और श्वासतंत्र से संबंधित रोगों का कफ से। इसी प्रकार मन के संदर्भ में क्रोध की तुलना गोस्वामीजी पित्त से करते हैं - अहंकार होने के कारण क्रोध आता है। क्रोध अहंकार की ही अभिव्यक्ति है। क्रोध क्यों आता है ? जैसे पित्त की विकृति से पेट रूग्ण हो जाता है, भोजन का पचना कठिन हो जाता है इसी प्रकार अहंकार को चोट पहुँचने पर क्रोध आता है। क्रोध और अहंकार बड़ी गहराई से जुड़े हुए हैं। इसी प्रकार श्वासतंत्र से जुड़ा हुआ है - कफ और अब हम जिस रोग की चर्चा करने जा रहे हैं, वह है राजयक्ष्मा। आपने देखा होगा कि जो यक्ष्मा के रोगी हैं, उन्हें बहुधा कफ निकला करता है और उस कफ में रोग के कीटाणु विद्यमान रहते हैं। उसका ह्रदय उस कफ से आक्रांत रहता है और उससे वह दुखी रहता है। इसे ही गोस्वामीजी मन के संदर्भ में कहते हैं - दूसरों के सुख को देखकर ह्रदय में जलन होना, यही मन की यक्ष्मा है। यह मूलतः लोभ की शाखा का रोग है। जैसे काम के साथ आसक्ति जुड़ी हुई है, कामी व्यक्ति के जीवन में काम के परिणाम स्वरूप आसक्ति का जन्म होगा। उसी तरह लोभ के साथ ईर्ष्या के साथ ईर्ष्या जुड़ी हुई है। लोभी व्यक्ति ईर्ष्यालु अवश्य होगा। लोभी व्यक्ति में लोभ जितना अधिक होगा, वह ईर्ष्यालु भी उतना ही अधिक होगा।
Monday, 12 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
मोह ही समस्त व्याधियों का मूल है। फिर चाहे वह शरीर की ब्याधि हो या मन की, इसी एक मोह से प्रभावित होती हैं। मन और शरीर को विकृत करने में समान रूप से कारण - यह मोह तीन वस्तुओं को विकृत कर अगणित ब्याधियाँ उत्पन्न करता है, वे शरीर के संदर्भ में वात, पित्त और कफ हैं तथा मन के संदर्भ में काम, क्रोध और लोभ। प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में वात, पित्त और कफ विद्यमान है, पर आयुर्वेद में इनके और अधिक सूक्ष्म अध्ययन की दृष्टि से इन्हें पुनः तीन भागों में विभाजित किया गया है। यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में ये तीनों विद्यमान रहते हैं, पर किसी शरीर में वात की प्रधानता होती है, तो किसी में पित्त की और किसी में कफ की। इन तीनों की प्रधानता को दृष्टि में रखकर मनुष्यों का विभाजन किया गया है - वातप्रधान, पित्तप्रधान और कफप्रधान। अब इसी सूत्र को गोस्वामीजी मन के संदर्भ में जोड़ देते हैं। वे कहते हैं कि ठीक शरीर के तत्व की ही भाँति मन में भी काम, क्रोध और लोभ विद्यमान रहते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति के मन में काम की प्रधानता रहती है, किसी में क्रोध की और किसी में लोभ की और यह स्पष्ट दिखाई भी देता है कि व्यक्ति इन तीनों में से किसी एक से ग्रस्त रहता है, घिरा हुआ रहता है।
Sunday, 11 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............,,,,
गोस्वामीजी ने लिखा है -
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला।
तिन्ह के पुनि उपजहिं बहु सूला।।
मोह ही समस्त ब्याधियों का मूल है और उससे ही अगणित रोग उत्पन्न होते हैं। यह मोह क्या है ? मोह की व्याख्या की गयी - मोहश्चित्त विषर्यय: - चित्त में विपरीतता की स्थिति उत्पन्न हो जाना - यही मोह की वृत्ति का लक्षण है। यद्यपि मन और शरीर का संदर्भ अलग-अलग है, पर मोह की वृत्ति दोनों संदर्भों में समान रूप से प्रेरक है। शरीर के संदर्भ में स्वस्थ रहने का उपाय हम जानते हैं। स्वस्थता के लिए नियम, संयम और पथ्य आदि सब हम जानते हैं, पर बड़ी विचित्र विडम्बना है कि व्यक्ति पथ्य और कुपथ्य का भेद जानकर भी कुपथ्य को अस्वीकार नहीं कर पाता। कुपथ्य को जानबूझकर ग्रहण कर लेता है। यही मोह की स्थिति है। मन के संदर्भ में भी यही सत्य है कि जिन सच्चाइयों को हम जानते हैं, उनकी भी जानबूझकर अवहेलना करते हैं। इसी मोह की वृत्ति के कारण हमारा मन अस्वस्थ हो जाता है और जीवन में अनेक दुर्गुण-दुर्विचार आ जाते हैं।
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला।
तिन्ह के पुनि उपजहिं बहु सूला।।
मोह ही समस्त ब्याधियों का मूल है और उससे ही अगणित रोग उत्पन्न होते हैं। यह मोह क्या है ? मोह की व्याख्या की गयी - मोहश्चित्त विषर्यय: - चित्त में विपरीतता की स्थिति उत्पन्न हो जाना - यही मोह की वृत्ति का लक्षण है। यद्यपि मन और शरीर का संदर्भ अलग-अलग है, पर मोह की वृत्ति दोनों संदर्भों में समान रूप से प्रेरक है। शरीर के संदर्भ में स्वस्थ रहने का उपाय हम जानते हैं। स्वस्थता के लिए नियम, संयम और पथ्य आदि सब हम जानते हैं, पर बड़ी विचित्र विडम्बना है कि व्यक्ति पथ्य और कुपथ्य का भेद जानकर भी कुपथ्य को अस्वीकार नहीं कर पाता। कुपथ्य को जानबूझकर ग्रहण कर लेता है। यही मोह की स्थिति है। मन के संदर्भ में भी यही सत्य है कि जिन सच्चाइयों को हम जानते हैं, उनकी भी जानबूझकर अवहेलना करते हैं। इसी मोह की वृत्ति के कारण हमारा मन अस्वस्थ हो जाता है और जीवन में अनेक दुर्गुण-दुर्विचार आ जाते हैं।
Saturday, 10 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
रामचरितमानस के अंत में गरूड़जी द्वारा काकभुशुण्डिजी से सात प्रश्न किये गये। उनमें से सातवें और अन्तिम प्रश्न के उत्तर में काकभुशुण्डिजी ने मानस-रोगों का वर्णन किया तथा उनकी चिकित्सा पध्दति बतायी। उन्होंने यह विश्लेषण आयुर्वेद की पद्धति से किया। आयुर्वेद की मान्यता यह है कि व्यक्ति के शरीर मे रोग चाहे जितने उत्पन्न हों, पर उन सबके मूल में केवल तीन ही वस्तुएँ हैं - कफ, वात एवं पित्त और इन तीनों के मूल में भी प्रेरक वस्तु एक ही है। उसी एक से तीन और उस तीन से न जाने कितने रोग सहस्रों रूपों में सक्रिय हो जाते हैं। इसमें जो एक क्रम है, मानस-रोगों में भी गोस्वामीजी ने उसी क्रम को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि मन में जितने भी विकार हैं, उनके मूल में मोह की वृत्ति ही विद्यमान है। यही मोह की प्रवृत्ति क्रमशः काम, क्रोध एवं लोभ - तीन रूपों में प्रकट होती है और इन्हीं से अगणित मानसिक विकार उत्पन्न होकर मानस जीवन पर शासन करने लग जाते हैं।
Friday, 9 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
भक्तिशास्त्र के अनुसार मन ही व्यक्ति की समस्या है - मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। मन ही केन्द्र है। इसलिए भक्त कहते हैं कि मन का पुनर्निर्माण हो। इसे चाहे रोग कह लीजिए, चाहे राक्षस कह लीजिए, चाहे दुर्गुण-दुर्विचार कह लीजिए और चाहे अवस्था। रामचरितमानस में सभी केन्द्रों का उत्तर दिया गया है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार सभी का समाधान दिया गया है और अन्त में मन के रोगों का विश्लेषण करते हुए यह कहा गया कि आयुर्वेद की पद्धति से जैसे शरीर के रोगों का विश्लेषण किया जाता है तथा उसे मिटाने की चेष्टा की जाती है, उसी तरह से मन के रोगों का भी विश्लेषण करके उसे भिन्न पध्दतियों से मिटाने का प्रयत्न किया जाता है।
Thursday, 8 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
मारीच प्रसंग में गोस्वामीजी गीतावली रामायण में कहते हैं - लखन ललित लिये मृगछाला - लक्ष्मणजी जब लौटे तो उन्होंने मृगचर्म को बगल में दबा रखा था। लंका के सुवेल शैल पर लक्ष्मणजी ने इसी मृगचर्म का आसन बिछाकर भगवान राम को बिठाया। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की समवेत कृपा से निर्मित यह मृगचर्म जिसकी चंचलता मिट चुकी है, जो शान्त और विरक्त है, ऐसे मन पर आसीन होने के बाद ही रावण के विरुद्ध भगवान का युद्ध प्रारंभ होता है और उस युद्ध में रावण का विनाश होता है। यह मानो अन्तःकरण में मन का जो निर्माण है, वहाँ हमारी असमर्थता की स्थिति में भगवान स्वयं आकर हमारी प्रार्थना को स्वीकार करें, बुराइयों को नष्ट करें, यही इस ध्यान का समग्र रहस्य है।
Wednesday, 7 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
सीताजी मृग रूपी मारीच को देखकर कहती हैं कि इस मृग का चमड़ा बड़ा सुन्दर है, और साथ-साथ कह दिया - प्रभु प्रहार करके इसका वध कीजिए। यह कैसी विचित्र माँग है ? पर उनका अभिप्राय क्या है ? प्रभु! आप इसकी चंचलता मिटा दीजिए। जो मन अपनी चंचलता मिटाने में समर्थ नहीं है, उसकी चंचलता आप अपने प्रहार से मिटा दीजिए और तब भगवान श्रीराघवेन्द्र तुरन्त मारीच के पीछे चले। भक्ति ने प्रेरणा दी, ज्ञान मायामृग के पीछे भगा और मन इतना अधिक चंचल है कि भगवान राम ने कठिन बाण से उसे मारा। यह ज्ञान का प्रहार है - माया के ऊपर, ज्ञान का प्रहार मन की चंचलता के ऊपर और अन्त में जो बचा हुआ काम था, वह किसने पूरा किया ? वह लक्ष्मणजी ने पूरा किया। पूरा करने का यह तीसरा कार्य क्या है ? मृग से जब चमड़ा अलग किया जायेगा, रक्त-मांस को अलग कर दिया जायेगा और उसे पूरी तौर से सुखा लिया जायेगा, तब वह चमड़ा आसन के रूप में उपयोग किया जा सकेगा और इसका अभिप्राय क्या है ? जब तक मन में राग का रक्त बना रहेगा तब तक वह भगवान के बैठने योग्य नहीं होगा। उसके राग का रक्त निकाल दिया जाय और उसे पूरी तरह से सुखा दिया जाय, तब वह भगवान के बैठने योग्य होगा। यह भूमिका भगवान ने वैराग्य को, लक्ष्मणजी को सौंपी। भाई! चमड़े से रक्त को अलग करना, उसको सुखाना और राग को मिटाना तुम्हारा काम है।
Tuesday, 6 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.................
लंका में सुवेल शैल पर भगवान जिस आसन पर बैठते हैं, इस आसन के निर्माण में तीनों का हाथ है - भगवान राम का, सीताजी का और लक्ष्मणजी का। इसका सांकेतिक तात्पर्य यह है कि यह जो त्रयी है - ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की - उसका एक क्रम है। मन का निर्माण कैसे हुआ ? मारीच सबसे पहले सीताजी के सामने आया। पहले वह श्रीराम के सामने नहीं गया, क्योंकि उसको उनके बाण का पुराना अनुभव था। श्रीराम ने बाण मारकर उसे दूर फेंक दिया था। ज्ञान ने तो वही किया जो उसका स्वभाव है। अब इस समय जरा भक्ति की करुणा का आश्रय लें। भक्ति की कृपालुता का आश्रय लेने से शायद प्रभु मुझे पास बुला लें। भगवान ने मन के दोषों के रूप में मारीच को (महर्षि विश्वामित्रजी के यज्ञ की रक्षा करते समय ) दूर फेंक दिया था और जब मारीच अपने को नकली मृग के रूप में सीताजी के सामने ले जाता है, तब भक्तिदेवी की दृष्टि उस पर पड़ती है और तुरन्त उन्होंने भगवान राम से कहा - एहि मृग कर अति सुन्दर छाला। सीताजी जब मृग की प्रशंसा करने लगीं, तो किसी ने पूछ दिया कि आप सब कुछ जानते हुए भी उस मृग की प्रशंसा कैसे कर रही हैं ? इस पर उन्होंने क्या कहा ? प्रशंसा में उन्होंने यह नहीं कहा कि मृग बड़ा सुन्दर है। उनके शब्द हैं - इस मृग का चमड़ा बड़ा सुन्दर है। इन दोनों उक्तियों में अन्तर है। अभिप्राय यह है कि जब तक यह जीवित है, तब तक सुन्दर नहीं है, परन्तु जब वह मर जायेगा तब सुन्दर है और इसका तात्पर्य यह है कि मन की चंचलता जब तक जीवित है, तब तक वह सुन्दर नहीं है।
Monday, 5 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................
लंका में सुवेल शिखर पर लक्ष्मणजी समतल भूमि खोजकर उस पर भगवान के लिए आसन बिछाते हैं। पहले सुन्दर कोमल-कोमल पत्ते बिछाते हैं। पत्तों के ऊपर फूल की पंखुड़ियाँ बिखरते हैं और उसके ऊपर मृगचर्म बिछाते हैं, उसी आसन के ऊपर भगवान राम आसीन हैं। सिंहासन तो धर्म का आसन है, वरासन ज्ञान का आसन है और कुशासन भक्ति का, पर यह मृगचर्म ? यह कौन सा आसन है ? यह जो हमारे-आपके जीवन में बड़ी गहराई से जुड़ा हुआ सत्य है, उसे गोस्वामीजी ने मृगचर्म के माध्यम से प्रकट किया। यह मृगचर्म कौन सा है ? कहाँ से आया ? वस्तुतः यह मारीच का चमड़ा है जिसे लक्ष्मणजी ने भगवान के लिए बिछाया। मानो भगवान का संकेत यह है कि लंका में रावण ने आसन भले न दिया हो, पर मारीच को भेजा तो उसी ने था। तो उससे जो आसन बना, लंका में उसी आसन पर भगवान बैठे हैं। यह मारीच कौन है ? मारीच वस्तुतः व्यक्ति के घोर तमोमय चंचल मन का प्रतीक है, जो रावण के शासन में रहता है। ऐसा मन जो मोह के वशीभूत हो। मारीच को मारकर उसका आसन स्वयं ईश्वर को बनाना पड़ा। आज उसी आसन पर वे बैठे हुए हैं। इसका अभिप्राय यह है कि जो लोग अपने अन्तःकरण को ईश्वर के आसीन होने योग्य बना सकें, वे तो बना लें। लेकिन कभी किसी को अनुभव हो कि हम अपने अन्तर्मन को इस योग्य नहीं बना पा रहे हैं, उसमें अयोध्या के सिंहासन, मिथिला के वरासन और चित्रकूट के कुशासन जैसे निर्माण की क्षमता हममें नहीं है, तो उनके लिए प्रार्थना ही उपाय है, शरणागति ही उपाय है। उनसे प्रार्थना करें कि आज हम इस परिस्थिति में आ गये हैं कि हम चाहकर भी स्वयं को बदलने में समर्थ नहीं हैं। आप आकर स्वयं अपना आसन बनायें।
Sunday, 4 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
........कल से आगे......
लंका में भगवान के लिए लक्ष्मणजी ने स्थान का चुनाव किया एक शिखर पर, जहाँ पर कुछ समतल भूमि दिखाई पड़ी। बड़ी सांकेतिक भाषा है। जहाँ पर शिखर है वहाँ पर समता ढूँढना तो कठिन ही है, लेकिन लक्ष्मणजी ढूँढ लेते हैं। यही नहीं, लंका कितनी भी बुरी क्यों न हो, कहीं न कहीं कोई कोना अच्छा मिल ही जाता है। प्रत्येक व्यक्ति की यही स्थिति है। भले ही हमारे अन्तर्जीवन पर रावण का शासन हो, दुर्गुणों का शासन हो, पर ऐसा नहीं हो सकता कि जीवन का कोई कोना खाली न पड़ा हो। जिन तीन शिखरों पर लंका बसी हुई है, वे हैं - सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के शिखर। रजोगुण और तमोगुण के शिखरों पर रावण सक्रिय है और सत्व का शिखर खाली पड़ा है। रावण ने इसे व्यर्थ समझकर छोड़ रखा है। इसका अभिप्राय यह है कि रावण शासित जीवन या तो रजोगुण द्वारा संचालित है अथवा तमोगुण द्वारा। सत्व भी वहाँ पर है, भले ही वह सक्रिय न हो। उस सत्य में लक्ष्मणजी कहीं न कहीं समतल भूमि खोज लेते हैं और उस पर भगवान के लिए आसन बिछाते हैं।
लंका में भगवान के लिए लक्ष्मणजी ने स्थान का चुनाव किया एक शिखर पर, जहाँ पर कुछ समतल भूमि दिखाई पड़ी। बड़ी सांकेतिक भाषा है। जहाँ पर शिखर है वहाँ पर समता ढूँढना तो कठिन ही है, लेकिन लक्ष्मणजी ढूँढ लेते हैं। यही नहीं, लंका कितनी भी बुरी क्यों न हो, कहीं न कहीं कोई कोना अच्छा मिल ही जाता है। प्रत्येक व्यक्ति की यही स्थिति है। भले ही हमारे अन्तर्जीवन पर रावण का शासन हो, दुर्गुणों का शासन हो, पर ऐसा नहीं हो सकता कि जीवन का कोई कोना खाली न पड़ा हो। जिन तीन शिखरों पर लंका बसी हुई है, वे हैं - सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के शिखर। रजोगुण और तमोगुण के शिखरों पर रावण सक्रिय है और सत्व का शिखर खाली पड़ा है। रावण ने इसे व्यर्थ समझकर छोड़ रखा है। इसका अभिप्राय यह है कि रावण शासित जीवन या तो रजोगुण द्वारा संचालित है अथवा तमोगुण द्वारा। सत्व भी वहाँ पर है, भले ही वह सक्रिय न हो। उस सत्य में लक्ष्मणजी कहीं न कहीं समतल भूमि खोज लेते हैं और उस पर भगवान के लिए आसन बिछाते हैं।
Saturday, 3 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................
भगवान राम को जब कोई बुलाता है तो उसके लिए आसन की व्यवस्था करता है। अयोध्या में भगवान का आसन है - सिंहासन। जब रामराज्य बनता है तब भगवान सिंहासन पर बैठते हैं। मिथिला में महाराज जनक ने उन्हें वरासन पर बिठाया और चित्रकूट में जनकनन्दिनी सीताजी ने वट वृक्ष की छाया में बड़ी सुन्दर वेदी बनाकर उस पर कुशासन बिछाया, जिस पर भगवान राम विराजमान हैं। यह बड़ी सांकेतिक भाषा है। सिंहासन धर्म का आसन है। यहीं से रामराज्य का संचालन होता है। वरासन ज्ञान का आसन है। महाराज जनक महान तत्वज्ञ हैं, उनके लिए ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ है, सर्वश्रेष्ठ ही वरणीय है और चित्रकूट में जो वेदी है वह साक्षात भक्तिदेवी की बनायी हुई है। ये तीन स्थानों पर ये तीन आसन हैं। लेकिन लंका वाला आसन ! न सिंहासन, न वरासन और न कुशासन। यहाँ तो भगवान को लक्ष्मण के कान में कहना पड़ा कि लंका चलना है, आसन भी साथ ही ले चलें। वहाँ हमें कोई आसन देने वाला नहीं है। गोस्वामीजी ने यहाँ पर साधना की एक बड़ी ही मार्मिक और तात्विक व्याख्या की है -
......आगे कल ......
......आगे कल ......
Thursday, 1 October 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
.......कल से आगे.......
जब भगवान राम ने गोस्वामीजी से पूछा कि सारी पद्धतियों में, सारे रूपों में हमारा कौन सा रूप तुम्हें सबसे अधिक प्रिय है। तो गोस्वामीजी ने धीरे से अपना पक्षपात प्रकट कर दिया। भगवान राम जब लंका में आकर सुवेल शैल पर आसीन हुए तो गोस्वामीजी ने उनका एक चित्र प्रस्तुत किया और उसके साथ अपना पक्षपात जोड़ दिया। वे कहने लगे -
एहि विधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन।
धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लवलीन।।
धन्य हैं वे लोग, जो भगवान के इस ध्यान में डूबे हुए हैं। गोस्वामीजी से भगवान पूछ सकते हैं कि मिथिला की इतनी मधुर झाँकी, चित्रकूट का इतना सुन्दर वेश, उनके साथ तुमने यह शब्द नहीं जोड़ा, इस लंका की झाँकी में ऐसा कौन सा आकर्षण है जो तुमने ऐसा कह दिया ? गोस्वामीजी ने कहा कि महाराज ! मेरे सामने एक ही समस्या है। क्या ? अगर अयोध्या की झाँकी ह्रदय में लाना चाहें तो पहले ह्रदय को अयोध्या बनाना पड़ेगा। अगर मिथिला की झाँकी, दूल्हे के रूप में आपको लाना चाहें, तो ह्रदय को पहले मिथिला बनाना पड़ेगा। अगर चित्रकूट की झाँकी लाना चाहें, तो उसे चित्रकूट बनाना तो कठिन है, पर जब से मैंने सुना है कि आप लंका में भी आ सकते हैं, तो ह्रदय को लंका बनाना नहीं है, वह तो बनी-बनायी पड़ी है, इसलिए मैं सोचता हूँ कि हमारे लिए यही झाँकी अच्छी है।
जब भगवान राम ने गोस्वामीजी से पूछा कि सारी पद्धतियों में, सारे रूपों में हमारा कौन सा रूप तुम्हें सबसे अधिक प्रिय है। तो गोस्वामीजी ने धीरे से अपना पक्षपात प्रकट कर दिया। भगवान राम जब लंका में आकर सुवेल शैल पर आसीन हुए तो गोस्वामीजी ने उनका एक चित्र प्रस्तुत किया और उसके साथ अपना पक्षपात जोड़ दिया। वे कहने लगे -
एहि विधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन।
धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लवलीन।।
धन्य हैं वे लोग, जो भगवान के इस ध्यान में डूबे हुए हैं। गोस्वामीजी से भगवान पूछ सकते हैं कि मिथिला की इतनी मधुर झाँकी, चित्रकूट का इतना सुन्दर वेश, उनके साथ तुमने यह शब्द नहीं जोड़ा, इस लंका की झाँकी में ऐसा कौन सा आकर्षण है जो तुमने ऐसा कह दिया ? गोस्वामीजी ने कहा कि महाराज ! मेरे सामने एक ही समस्या है। क्या ? अगर अयोध्या की झाँकी ह्रदय में लाना चाहें तो पहले ह्रदय को अयोध्या बनाना पड़ेगा। अगर मिथिला की झाँकी, दूल्हे के रूप में आपको लाना चाहें, तो ह्रदय को पहले मिथिला बनाना पड़ेगा। अगर चित्रकूट की झाँकी लाना चाहें, तो उसे चित्रकूट बनाना तो कठिन है, पर जब से मैंने सुना है कि आप लंका में भी आ सकते हैं, तो ह्रदय को लंका बनाना नहीं है, वह तो बनी-बनायी पड़ी है, इसलिए मैं सोचता हूँ कि हमारे लिए यही झाँकी अच्छी है।
Wednesday, 30 September 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
अहंकार को केन्द्र बनाकर समाज को स्वस्थ बनाने की पद्धति धर्म की पद्धति है। बुद्धि को केन्द्र बनाकर समाज की स्वथ्यता ज्ञान की पद्धति है। चित्त को केन्द्र बनाकर योग की पद्धति है। ह्रदय और मन को स्वस्थ बनाकर समाज बनाने की जो प्रक्रिया है, यही भक्ति की प्रक्रिया है। इसका सांकेतिक रूप से गोस्वामीजी ने रामचरितमानस में बहुत ही मधुर पद्धति में वर्णन प्रस्तुत किया है। उन्होंने मानस में भगवान राम के विविध चित्र प्रस्तुत किये, जो बड़े मधुर और आकर्षक हैं, लेकिन जब भगवान राम ने उनसे पूछा कि इन सारी पद्धतियों में, सारे रूपों में हमारा कौन सा रूप तुम्हें सबसे अधिक प्रिय है ?
.......आगे कल.......
.......आगे कल.......
Tuesday, 29 September 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
कई लोगों के मन में पध्दति के प्रति इतना अधिक आग्रह हो जाता है कि वह भी एक समस्या बन जाती है। आग्रह ही नहीं होगा तो साधना आगे नहीं बढ़ेगी, पर आग्रह का अतिरेक भी कभी-कभी व्यक्ति को सत्य से वंचित कर देता है। जैसे किसी रोगी को किसी एक चिकित्सा-पद्धति के प्रति ही इतना अधिक आग्रह हो जाय कि उस पद्धति से लाभ न होने पर भी वह उसे न छोड़े, तो यह तो रोग से भी बड़ी समस्या है। मुख्य लक्ष्य क्या है ? स्वथ्यता। तो पद्धति के चुनाव के लिए सबसे बड़ी कसौटी क्या है ? यही कि जिस पद्धति से हमें स्वथ्यता का लाभ हो वही पद्धति हमारे लिए ठीक है। शास्त्र या किसी व्यक्ति के कहने से कि यह पद्धति श्रेष्ठ है, कोई आवश्यक थोड़े है कि वह सबके लिए समान रूप से लाभदायक हो। गोस्वामीजी से पूछा गया कि ये जितने उपाय कहे गये हैं, इनमें सही कौन सा है ? उन्होंने कहा कि सब सत्य है। झूठ तो कुछ है ही नहीं। मैं मानता हूँ कि समस्त ऋषि-मुनियों का, समस्त आचार्यो का अनुभव सत्य है। विभिन्न चिकित्सा-पद्धतियों के द्वारा अगणित लोग स्वस्थ हो रहे हैं, उसी तरह भिन्न-भिन्न साधना-पद्धतियों से लोग स्वस्थ हो रहे हैं तो हम कैसे कहें कि यह पद्धति वैज्ञानिक है और यह अवैज्ञानिक।
Monday, 28 September 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................
......कल से आगे.......
सीताजी मूर्तिमती भक्ति हैं। त्रिजटा और सीताजी का संवाद भक्ति के संदर्भ में है। भक्तिशास्त्र की मान्यता यह है कि ह्रदय-परिवर्तन के द्वारा ही मोह का विनाश होगा। इसलिए वहाँ पर ह्रदय को केन्द्र बनाकर बात कही गयी और यहाँ संवाद अखण्ड-ज्ञानघन भगवान और जीवरुपी विभिषण के बीच है। नाभिकुण्ड का अभिप्राय क्या है? यही संस्कारों का अमृतकुण्ड है। साधक जिन बुराइयों को मिटाना चाहता है, वे फिर से नये सिरे से रावण की सृष्टि करने में समर्थ होती है, इसलिए विभिषण भगवान से कहते हैं कि आप उसकी नाभि पर बाण का प्रहार कर उसके अमृतकुण्ड को सुखा दीजिए। यह योग का मार्ग है। योगाग्नि के द्वारा चित्त की वृत्तियाँ निरुद्ध हो जाती है, वह निर्विकल्प हो जाता है। चित्त का निर्विकल्प हो जाना ही रावण की मृत्यु है। इस तरह से इन अलग-अलग प्रसंगों में अलग-अलग रूपों में एक ही समस्या के भिन्न-भिन्न समाधान प्रस्तुत किये गये हैं और ये सभी समाधान बड़े उपयोगी हैं, पर मुख्य बात यही है कि इनमें से कौन सी चिकित्सा - पध्दति हमारे लिए ठीक है, हम कहाँ से प्रारंभ करें, इसका चुनाव हमें करना है।
सीताजी मूर्तिमती भक्ति हैं। त्रिजटा और सीताजी का संवाद भक्ति के संदर्भ में है। भक्तिशास्त्र की मान्यता यह है कि ह्रदय-परिवर्तन के द्वारा ही मोह का विनाश होगा। इसलिए वहाँ पर ह्रदय को केन्द्र बनाकर बात कही गयी और यहाँ संवाद अखण्ड-ज्ञानघन भगवान और जीवरुपी विभिषण के बीच है। नाभिकुण्ड का अभिप्राय क्या है? यही संस्कारों का अमृतकुण्ड है। साधक जिन बुराइयों को मिटाना चाहता है, वे फिर से नये सिरे से रावण की सृष्टि करने में समर्थ होती है, इसलिए विभिषण भगवान से कहते हैं कि आप उसकी नाभि पर बाण का प्रहार कर उसके अमृतकुण्ड को सुखा दीजिए। यह योग का मार्ग है। योगाग्नि के द्वारा चित्त की वृत्तियाँ निरुद्ध हो जाती है, वह निर्विकल्प हो जाता है। चित्त का निर्विकल्प हो जाना ही रावण की मृत्यु है। इस तरह से इन अलग-अलग प्रसंगों में अलग-अलग रूपों में एक ही समस्या के भिन्न-भिन्न समाधान प्रस्तुत किये गये हैं और ये सभी समाधान बड़े उपयोगी हैं, पर मुख्य बात यही है कि इनमें से कौन सी चिकित्सा - पध्दति हमारे लिए ठीक है, हम कहाँ से प्रारंभ करें, इसका चुनाव हमें करना है।
Sunday, 27 September 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
भगवान राम विभिषण से पूछते हैं कि विभिषण बताओ ! रावण कैसे मरेगा ? बड़ी विचित्र शैली है गोस्वामीजी की। लोग तो इस बात का बड़ा ध्यान रखते हैं कि आगे-पीछे की बात एक दूसरे से कटनी नहीं चाहिए। इस दृष्टि से तो गोस्वामीजी को विभिषण के द्वारा वही उत्तर दिलवाना चाहिए था, जो त्रिजटा ने सीताजी को दिया, पर बड़ी अद्भुत बात है, जो उत्तर त्रिजटा ने सीताजी को दिया, वही विभिषण ने भगवान राम को नहीं दिया। उन्होंने यह नहीं कहा कि आप रावण के ह्रदय पर प्रहार करेंगे, तब रावण की मृत्यु होगी। बल्कि उन्होंने एक नयी बात कह दी। इसका अभिप्राय क्या है ? मानो गोस्वामीजी बताना चाहते हैं कि त्रिजटा का सत्य भी सत्य है और विभिषण का सत्य भी सत्य है। इन सबमें कोई न कोई सामंजस्य है। इनमें से किस केन्द्र के माध्यम से हम रावण की मृत्यु को मुख्यता देते हैं, इसका निर्णय हम स्वयं अपनी साधना-पध्दति से करें। अन्त में सबका सामंजस्य तो होना ही है।
भगवान राम विभिषण से पूछते हैं कि बताओ ! रावण कैसे मरेगा ? इसके उत्तर में विभिषण ने न तो सिर को केन्द्र बताया और न ह्रदय को। उन्होंने तो नाभि को केन्द्र बताया। वे बोले कि महाराज ! रावण की नाभि में अमृतकुण्ड है और जब तक यह अमृतकुण्ड नहीं सूखेगा, तब तक रावण न तो सिर काटने से मरेगा, न भुजा काटने से, बल्कि हर बार उसके सिर और भुजाएँ उत्पन्न होती जायेंगी।
.........आगे कल ......
भगवान राम विभिषण से पूछते हैं कि बताओ ! रावण कैसे मरेगा ? इसके उत्तर में विभिषण ने न तो सिर को केन्द्र बताया और न ह्रदय को। उन्होंने तो नाभि को केन्द्र बताया। वे बोले कि महाराज ! रावण की नाभि में अमृतकुण्ड है और जब तक यह अमृतकुण्ड नहीं सूखेगा, तब तक रावण न तो सिर काटने से मरेगा, न भुजा काटने से, बल्कि हर बार उसके सिर और भुजाएँ उत्पन्न होती जायेंगी।
.........आगे कल ......
Saturday, 26 September 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.................
अपनी समस्या को जीव समझता है और जब ईश्वर और जीव का मिलन होता है तभी समस्या का समाधान होता है। यह सामंजस्य रामायण में बताया गया है -
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा ।
जौं एहि भाँति बनै संयोगा ।।
इसका अभिप्राय यह है कि व्यक्ति का प्रयत्न - उसकी तीव्र आकांक्षा और भगवान की कृपा, दोनों का जब सामंजस्य होता है, तभी समस्या का समाधान होता है। इन दोनों में अगर एक की भी कमी रह जाय, व्यक्ति के जीवन में अगर केवल भगवान की कृपा कहने की वृत्ति आ जाय, तो उसमें तमोगुण, आलस्य और निष्क्रियता की वृत्ति भी आ जायेगी और अगर उसमें केवल पुरुषार्थ की वृत्ति आ जाय तो उसके अन्तःकरण में अभिमान की वृत्ति भी आ जायेगी। निष्क्रियता और अभिमान इन दोनों से बचने का उपाय यह है कि पुरुषार्थ व्यक्ति के तमोगुण को दूर करे और भगवान की कृपा उसके अभिमान का नाश करे और इस तरह जीवन में एक सामंजस्य स्थापित हो।
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा ।
जौं एहि भाँति बनै संयोगा ।।
इसका अभिप्राय यह है कि व्यक्ति का प्रयत्न - उसकी तीव्र आकांक्षा और भगवान की कृपा, दोनों का जब सामंजस्य होता है, तभी समस्या का समाधान होता है। इन दोनों में अगर एक की भी कमी रह जाय, व्यक्ति के जीवन में अगर केवल भगवान की कृपा कहने की वृत्ति आ जाय, तो उसमें तमोगुण, आलस्य और निष्क्रियता की वृत्ति भी आ जायेगी और अगर उसमें केवल पुरुषार्थ की वृत्ति आ जाय तो उसके अन्तःकरण में अभिमान की वृत्ति भी आ जायेगी। निष्क्रियता और अभिमान इन दोनों से बचने का उपाय यह है कि पुरुषार्थ व्यक्ति के तमोगुण को दूर करे और भगवान की कृपा उसके अभिमान का नाश करे और इस तरह जीवन में एक सामंजस्य स्थापित हो।
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