रावण मारा गया । देवता फूल बरसाते हुए भगवान श्रीराम को बधाई देने के लिए आए, पर वहाँ तो बड़ा विचित्र दृश्य था । भगवान बन्दरों से घिरे हुए बैठे उनसे विनोद कर रहे हैं । जब देवता आए, तो बन्दरों ने उन्हें भगवान के निकट पहुँचने के लिए मार्ग ही नहीं दिया । उन्हें दूर से ही खड़े होकर स्तुति करनी पड़ी । अद्भुत दृश्य है ! देवता तो भगवान से दूर हैं और बन्दर बिल्कुल पास में बैठे हुए हैं । उस समय देवता जो स्तुति करते हैं, उसमें एक वाक्य आता है, देवता भगवान से कहते हैं - प्रभो ! हमारे देव-शरीर को धिक्कार है । भगवान बोले कि क्यों ? देवता बोले कि महाराज ! आपकी भक्ति के बिना अभी भी हम लोग भोग में डूबे हुए हैं, इसलिए हमें धिक्कार है । पर इसके साथ अगले वाक्य में उन्होंने अपने ही दूसरे रूप की प्रशंसा करते हुए यह भी कहा कि महाराज ! धन्य तो ये वानर हैं, जो आपके समीप बैठे हुए प्रेमपूर्वक आपके मुख को निरख रहे हैं और हम दूर खड़े हुए हैं । मानो अपने ही एक रूप की स्तुति कर रहे हैं और दूसरे रूप की निन्दा । वानर के रूप में देवता ही हैं । इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि भोगी भगवान तक पहुँचकर भी उनसे दूर है और जो भगवान की सेवा में संलग्न हैं, वे उनके अत्यंत निकट हैं ।
Thursday, 30 November 2017
Wednesday, 29 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
देवताओं के प्रार्थना से भगवान प्रसन्न होकर कहते हैं कि हम अवतार लेकर रावण का वध करेंगे । तब ब्रह्माजी ने देवताओं से कहा कि भगवान ने तो तुमसे कह दिया कि हम तुम्हारे लिए मनुष्य बनेंगे, पर तुम बताओ कि तुम क्या बनोगे ? देवताओं ने कहा कि महाराज ! क्या हम लोगों को भी कुछ बनना पड़ेगा ? ब्रह्मा ने कहा कि समस्या ईश्वर की नहीं, तुम्हारी है, अतः जब ईश्वर नर बन रहा है, तो तुम कम-से-कम वानर तो बनो, तभी ठीक-ठीक मिलन होगा । ब्रह्माजी बड़ा सूत्रात्मक आदेश देते हुए कहते हैं कि बन्दर बनोगे तो पूरे बन्दर ही न हो जाना । बन्दर दोषयुक्त तो है ही, वह बड़ा कामी और भोगी होता है । ब्रह्माजी ने कहा कि स्वर्ग से नीचे उतरो, भोगों का परित्याग करो, वानर शरीर धारण करो और भगवान के चरणों की भक्ति-सेवा करो । इसका अभिप्राय यह है कि पुण्य का उपयोग भोग में नहीं, भक्ति में करो । इस प्रकार ईश्वर जब नर बने, तब वे विविध देवता बन्दरों के रूप में आते हैं ।
Tuesday, 28 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान के रावण वध की घोषणा सुनकर देवता जब शीघ्रता से स्वर्ग की चलने लगे तब ब्रह्माजी ने देवताओं को वापस बुलाया । ब्रह्मा विवेक के देवता हैं । वे देवताओं से बोले कि आप लोग इतने उतावले होकर कहाँ भाग रहे हो ? देवता बोले कि महाराज, अब तो हम लोग निश्चिंत हो गए, क्योंकि भगवान ने तो कह ही दिया है कि हम अवतार लेकर रावण का वध करेंगे । ब्रह्मा ने कहा - तुम लोगों ने ध्यान से नहीं सुना । क्या ? भगवान केवल इतना भी तो कह सकते थे कि हम रावण को मार देंगे, मिटा देंगे, परन्तु उन्होंने ऐसा तो नहीं कहा । रावण को मिटा देना भगवान के लिए कोई प्रयत्नजन्य कार्य थोड़े ही है । वे तो केवल संकल्प मात्र से ही रावण तथा समस्त राक्षसों को मिटा सकते हैं, परन्तु उन्होंने यह जो कहा कि हम अवतार लेकर रावण का वध करेंगे । तुमने उनकी इस बात पर ध्यान नहीं दिया । भगवान ने यह अवश्य कहा कि हम तुम्हारी समस्या का समाधान करेंगे, पर उसमें उन्होंने एक वाक्य और जोड़ दिया है, तुम्हारे लिए हम नर का वेश धारण करेंगे । इसका अर्थ यह है कि उन्होंने रावण का विनाश ईश्वरीय पद्धति से न करके मानवीय पद्धति से करने का निर्णय किया है । इसका अभिप्राय क्या है ? जो सिद्ध सत्य था, उसको साधन का सत्य बनाने के लिए ही भगवान नर रूप लेने वाले थे ।
Monday, 27 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
देवत्व में अपनी असमर्थता का भान होने पर वे तत्काल ब्रह्मा के साथ मिलकर भगवान से प्रार्थना करते हैं और तब आकाशवाणी होती है । इससे बढ़कर साधना का उत्कृष्ट फल और क्या हो सकता है कि किसी की साधना से, प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान अवतार लेने की घोषणा करें । यह देवत्व का बड़ा उज्ज्वल पक्ष है, देवत्व का जो दुर्बल पक्ष है, वह भी समझ लेने योग्य है । उसके लिए गोस्वामीजी ने एक बड़ी सांकेतिक बात कही -
गगन ब्रह्मबानी सुनि काना ।
तुरत फिरे सुर ह्रदय जुड़ाना ।।
यहाँ तुरत शब्द का अभिप्राय यह है कि वे इतने उतावलेपन से स्वर्ग की ओर जाने लगे मानो कैसे जल्दी-से-जल्दी स्वर्ग पहुँचें । इस तुरत शब्द के द्वारा गोस्वामीजी ने देवताओं की मनःस्थिति को प्रगट कर दिया कि मानो वे हड़बड़ी में हों । यही देवताओं का दुर्बल पक्ष है । इसका रहस्य क्या था ? यह कि प्रार्थना से भगवान प्रसन्न हो गए और रावण के वध करने का आश्वासन दिया । देवताओं को लगा कि भगवान ने तो कह दिया है कि वे रावण का वध करेंगे, अब हम लोग शीघ्र चलकर अप्सराओं का नृत्य देखें, विहार करें, अब हमें तो कुछ करना धरना नहीं है । इसका अर्थ है कि भगवान की पूजा के बाद भी मन भोग की ओर ही लगा हुआ है । यह जो भोग की वृत्ति है, वह इस तुरत शब्द के द्वारा व्यक्त की गयी है ।
गगन ब्रह्मबानी सुनि काना ।
तुरत फिरे सुर ह्रदय जुड़ाना ।।
यहाँ तुरत शब्द का अभिप्राय यह है कि वे इतने उतावलेपन से स्वर्ग की ओर जाने लगे मानो कैसे जल्दी-से-जल्दी स्वर्ग पहुँचें । इस तुरत शब्द के द्वारा गोस्वामीजी ने देवताओं की मनःस्थिति को प्रगट कर दिया कि मानो वे हड़बड़ी में हों । यही देवताओं का दुर्बल पक्ष है । इसका रहस्य क्या था ? यह कि प्रार्थना से भगवान प्रसन्न हो गए और रावण के वध करने का आश्वासन दिया । देवताओं को लगा कि भगवान ने तो कह दिया है कि वे रावण का वध करेंगे, अब हम लोग शीघ्र चलकर अप्सराओं का नृत्य देखें, विहार करें, अब हमें तो कुछ करना धरना नहीं है । इसका अर्थ है कि भगवान की पूजा के बाद भी मन भोग की ओर ही लगा हुआ है । यह जो भोग की वृत्ति है, वह इस तुरत शब्द के द्वारा व्यक्त की गयी है ।
Sunday, 26 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
देवता पूज्य हैं, पर पूज्यता के साथ यदि उनमें कोई कमी है, तो उसे भी बताना गीता, रामायण और भागवत का उद्देश्य है । देवता दोनों पक्षों को प्रगट करते हैं । देवत्व का वन्दनीय पक्ष तो सुन्दर है ही । जब देवताओं पर अत्याचार हुआ और व्याकुल होकर उन्होंने भगवान से प्रार्थना की, तो उन्होंने प्रसन्न होकर घोषणा की कि वे अवतार लेंगे । यह देवताओं का बड़ा उत्कृष्ट और प्रशंसनीय पक्ष है । इसका अभिप्राय यह है कि देवता जब यह अनुभव करता है कि हम बुराई को मिटाने में समर्थ नहीं हैं, तो अन्त में उनकी दृष्टि भगवान की ओर जाती है और यही देवता का वन्दनीय पक्ष है । देवता और दैत्य में सबसे बड़ा अन्तर यही है कि दैत्य न तो अपने आप में असमर्थता का अनुभव करता है और न ईश्वर की ओर दृष्टि डालता है, पर देवत्व में जहाँ पर अपनी असमर्थता का भान है, अपनी कमी का ज्ञान है, वहीं पर दृष्टि भगवान की ओर चली जाती है ।
Saturday, 25 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
हमारे शास्त्र बिना किसी संकोच के यह बात कह देते हैं कि पुण्य से देवत्व प्राप्त होता है, पर इसके साथ एक अन्य वाक्य भी जुड़ा हुआ है - *क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति* । आपने पुण्य के द्वारा भोग पाया, पुण्य की पूँजी समाप्त हुई और आप पुनः स्वर्ग से नोचे ओर ढकेल दिए जाएँगे । इसका अभिप्राय यह है कि यह देवत्व भी उत्थान और पतन के क्रम से मुक्त नहीं है । देवत्व वन्दनीय है, परन्तु इस अर्थ में नहीं कि उसमें कोई कमी नहीं है । देवता निन्दनीय भी हैं और प्रशंसनीय भी । हमें बस इतना ही सावधान रहना है कि जहाँ तक वे वन्दनीय हैं, हम उनकी वन्दना करें, यह नहीं कि कहीं पर देवता की निन्दा कर दी गई, तो हम उनकी पूजा करना ही बन्द कर दें ।
Friday, 24 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
इन्द्र आदि देवता वन्दनीय हैं या निन्दनीय ? इसका उत्तर यह है कि मानस में इन्द्र आदि देवताओं की प्रशंसा भी की गई है और निन्दा भी । देवता वन्दनीय क्यों हैं ? क्योंकि हमारी मान्यता है कि जो पुण्यात्मा होते हैं, वे देवत्व को प्राप्त होते हैं । जो विश्व का श्रेष्ठतम पुण्यात्मा है, वे ही अपने समय में इन्द्र-पद को प्राप्त होते हैं । इसका तात्पर्य है कि देवत्व पुण्य का परिणाम है और इन्द्र-पद पुण्य की पराकाष्ठा का परिणाम है । ऐसी स्थिति में पुण्य के साथ कुछ दोष भी होते हैं या नहीं ? पुण्य में भी कुछ कमियाँ होती हैं या नहीं ? बड़ी सीधी-सी बात है - जब कहा जाता है कि पुण्य से देवत्व प्राप्त होता है और उसके बाद स्वर्ग का जो वर्णन किया गया है, उसमें विस्तार से यही तो बताया है कि स्वर्ग में कितनी प्रचुर मात्रा में भोग सुलभ है, तो यह सब बताने का क्या अभिप्राय है ? पुण्य के द्वारा व्यक्ति देवत्व को पाकर भले ही स्वर्ग के प्रचुर भोग प्राप्त कर ले, पर वस्तुतः देवत्व के द्वारा वह भोग को ही तो जीवन का लक्ष्य बनाए हुए है । मर्त्यलोक में भोग के स्थान पर वह कोई उत्कृष्ट कर्म करके देवलोक में जाकर स्वर्ग के भोगों को भोगना चाहता है । ऐसी स्थिति में पुण्य चाहे जितना ऊँचा हो, उसमें भोग की वृत्ति छिपी हुई है और भोग के साथ जो समस्याएँ जुड़ी हुई हैं, वे स्वर्ग में भी आए बिना नहीं रहेंगी ।
Thursday, 23 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
गुण-दोष का वर्णन केवल अपने गुण और दूसरों के दोष देखने के लिए नहीं किया गया है, वह तो अपने ही जीवन में दोषों का त्याग और गुणों का संग्रह करने के लिए है । हमारे जीवन में तो उल्टा ही हो जाता है । दूसरों के दोष देखकर हम उनसे घृणा करने लग जाते हैं, उनकी निन्दा करने लग जाते हैं । इसका अर्थ यह है कि इस विषय में हमारी दृष्टि भ्रान्त है, हम दूसरों का दोष देखते हैं, व्यक्ति को दोषी देखते हैं, पर यह नहीं देखते कि दूसरों का दोष-दर्शन करते हुए, निन्दा करते हुए हम स्वयं भी दोषों में लिपटे हुए हैं । वैसे ही हम गुणों की प्रशंसा तो बहुत करते हैं, पर गुणों को जीवन में लाने की चेष्टा नहीं करते । मानस का तात्पर्य है कि जब हम किसी का गुण देखते हैं, तो उद्देश्य केवल उन गुणों की प्रशंसा करना नहीं है, उद्देश्य तो उन गुणों को जीवन में लाना है । इसी प्रकार जब किसी पात्र के दोषों का वर्णन किया जाता है, तब उसका उद्देश्य भी यही रहता है कि यदि हमारे जीवन में दोष हों तो उसका परित्याग कर देना चाहिए ।
Wednesday, 22 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
निन्दा और प्रशंसा दो प्रकार से की जाती है । एक तरह की निन्दा- प्रशंसा तो की जाती है - द्वेष-राग या आसक्तिवश । जिसके प्रति आपका राग है, उसकी आप प्रशंसा करते हैं और वैसे ही जिसके प्रति हमारे मन में द्वेष या विरोध की भावना है, उसकी हम निन्दा करते हैं, परन्तु हमारी परम्परा के जो महान ग्रन्थ हैं, इनमें जो निन्दा और प्रशंसा है, वह वस्तुतः व्यक्तिपरक नहीं है । मानस में गोस्वामीजी ने कई प्रसंगों में लिखा है कि गुण-दोष मिथ्या है, पर जब उन्होंने सन्त के गुण और असन्तों के दोषों का वर्णन किया, तो किसी ने कहा, महाराज, यह तो आपकी बात स्वयं अपने आप कट गई; एक ओर तो आप गुण-दोष का भेद ही मिथ्या बताते हैं और दूसरी ओर आप इतने विस्तारपूर्वक गुणों और दोषों का वर्णन करते हैं । ऐसा क्यों ? गोस्वामीजी कहते हैं - वस्तुतः ये जो गुण-दोष बताए गए हैं, उसका उद्देश्य यह है कि गुण को जानकर हम अपने जीवन में उसे ग्रहण करें, उनका संग्रह करें और दोषों को जानकर उसका परित्याग करें ।
Tuesday, 21 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
मानस में दो प्रकार के पात्र हैं - बड़े उच्च चरित्र वाले सिद्ध पात्र और अंगद के समान ऐसे पात्र, जो विषय-पारायण हैं । उनके जीवन में साधना और उसके बाद सिद्धि आती है । अंगद का चरित्र सर्वप्रथम किष्किन्धाकाण्ड में उस समय समाने आता है, जब भगवान श्रीराघवेन्द्र बालि के ऊपर बाण चलाते हैं । और बालि गिर जाता है, प्रभु आकर बालि के सामने खड़े हो जाते हैं । बालि भगवान को कुछ उलाहने देता है और कुछ प्रश्न करता है । भगवान बड़े कठोर शब्दों में बालि की भर्त्सना करते हैं और इसकी अन्तिम परिणति यह होती है कि बालि में सहसा एक परिवर्तन आता है तथा अपनी धृष्टता के लिए उनसे क्षमा माँगता है, भगवान की दया एवं करुणा की दुहाई देता है और तब भगवान की करुणा का रुप सामने आता है । भगवान बालि के मस्तक पर हाथ रख प्रस्ताव करते हैं कि वह जीवित रहे । परन्तु बालि बड़ी विनम्रतापूर्वक इस पुरस्कार को अस्वीकार कर देता है । बालि ने सोचा कि इस समय तो शरीर को त्यागने में ही धन्यता है । लेकिन इसके साथ-साथ बालि ने भगवान से कहा - प्रभो, एक रूप में तो मैं आपके धाम में जाकर मुक्ति के आनंद का अनुभव करुँगा, परन्तु दूसरे रूप में सेवा का सुख भी पाना चाहता हूँ । इस तरह बालि ने अन्तिम क्षणों में ज्ञान और भक्ति - दोनों का सुख पा लिया । ज्ञान की चरम परिणति है मुक्ति और भक्ति का चरम लक्ष्य है - भगवान की सेवा ।बालि जीवन के अन्तिम क्षण में अपने पुत्र अंगद को बुलाकर उसे भगवान राम के हाथ में सौंप देता है और भगवान राम अंगद को स्वीकार करते हैं । यह मानस में आने वाला अंगद का पहला चित्र है ।
Monday, 20 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
गोस्वामीजी 'विनय पत्रिका' में एक पद में भगवान की उदारता का वर्णन करते हुए कहते हैं - प्रभु राम के सिवाय अन्य किस स्वामी की ऐसी रीती है, जो अपने विरद के लिए पवित्र जीवों को छोड़कर पामरों से प्रेम करता हो ? गोस्वामीजी एक-एक घटना को गिनाते हुए बताते हैं कि कृष्णावतार में राक्षसी पूतना अपने स्तनों में विष लगाकर उन्हें मारने गई थी, पर उन्होंने उसे माता जैसी गति प्रदान की; काम-मोहित गोपियों पर अतुलित कृपा की; जगत के ब्रह्मा ने भी आपकी चरण-धूलि ग्रहण की; जो शिशुपाल प्रतिदिन नियमपूर्वक गिन-गिनकर गालियाँ देता था, आपने उसे राज्यसभा के भीतर ही स्वयं में विलिन कर लिया, मूढ़ व्याध ने मृग समझकर आपके चरणों में तीर मारा, उसे भी आपने अपनी दयालुता की आदत के अनुसार सशरीर अपने लोक में भेज दिया । इस प्रकार पुरातन काल के बड़े पात्रों के नाम गिनाने के बाद अन्त में इस पद की समाप्ति वे अपने नाम से करते हैं - प्रत्यक्ष पापों के पुंज तुलसीदास को भी जिन्होंने अपनी शरण में रख लिया ।इस पद में लम्बे कथानक को सुनकर कोई व्यक्ति पूछ सकता है कि ये पात्र तो बड़े पुराने युग के हैं, हम इनसे परिचित नहीं हैं; तब वे स्वयं को और हम सभी को आश्वासन देते हुए तत्काल याद दिलाते हैं कि अन्य लोगों में तो पाप और पुण्य दोनों रहे होंगे, पर आप लोग मेरी ओर दृष्टि डालिए, वे कहते हैं - मैं तो साक्षात पातक-पुँज ही था, पर मुझ जैसे व्यक्ति ने भी प्रभु की कृपा प्राप्त कर ली, तो किसी व्यक्ति को निराश होने की आवश्यकता नहीं है ।
Sunday, 19 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
अंगद के प्रारंभिक चरित्र में कुछ कमियाँ हैं और वे उन कमियों को दूर करते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं । ऊँचे चरित्रों को पढ़कर या सुनकर प्रसन्नता और आनन्द की अनुभूति तो होती है, परन्तु उसमें एक यह भय लगा रहता है कि इतनी ऊँचाई तो हमारे जीवन में नहीं है । इतने उत्कृष्ट विचार, इतनी उत्कृष्ट भावना तो हमारे जीवन में नहीं है । साधक के जीवन में इससे एक प्रकार की निराशा सी आ सकती है कि वह इन विशेषताओं को अपने जीवन में ला पाने समर्थ नहीं है । लेकिन जब हम ऐसे पात्रों के विषय में पढ़ते या सुनते हैं, जिनके चरित्र में हमारे ही समान अनेक त्रुटियाँ और कमियाँ विद्यमान हैं, परन्तु वे धीरे-धीरे इन कमियों से मुक्त होते हैं, तब इसके द्वारा हम लोगों को भी यह आश्वासन मिलता है कि निराश होने की कोई बात नहीं है ; जिस स्थिति को इन भक्तों या पात्रों ने अपने जीवन में पाया है, उसी मार्ग पर चलकर हम भी उसे पा सकते हैं । अंगद का चरित्र ठीक इसी प्रकार का चरित्र है ।
Saturday, 18 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
मानस में कुछ चरित्र ऐसे हैं, जो साधना की दृष्टि से बड़े उपयोगी हैं और उनमें से एक है अंगद का चरित्र । अंगद के चरित्र में कुछ उत्कृष्ट गुण हैं, तो उनके साथ कुछ कमियाँ भी हैं । परन्तु उनके चरित्र की यह विशेषता है कि उसमें निरन्तर विकास होता हुआ दिखाई देता है और वे क्रमशः अपनी कमियों से ऊपर उठते हुए भक्ति की चरम स्थिति तक पहुँचने में समर्थ होते हैं । दूसरी ओर मानस में कुछ चरित्रों में उत्कृष्ट-से-उत्कृष्ट गुण विद्यमान हैं । वे सिद्धावस्था तथा परिपूर्णता के चरित्र होते हुए भी हमारे लिए वन्दनीय और आदर्श तो हैं, परन्तु साधना की उन्नति के लिए जिस क्रम की आवश्यकता है, उन चरित्रों में उनका दर्शन नहीं होता है । पर कुछ पात्र ऐसे भी हैं, जिनके चरित्र में गुण और दोष दोनों ही पक्ष विद्यमान हैं । काकभुशुण्डिजी का चरित्र भी उनमें से एक है, जिसमें साधना की दृष्टि से क्रमिक विकास दिख पड़ता है ।
Friday, 17 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
भगवान राम व्यक्ति को न तो हराना चाहते हैं और न स्वयं विजयी होना चाहते हैं । उनका संघर्ष, उनका युद्ध एक वैद्य या डाॅक्टर की तरह रोग रूपी दुर्गुणों से है, विकारों से है । रोग के विरुद्ध लड़ने वाले डॉक्टर के प्रति रोगी का कृतज्ञ होना तो स्वाभाविक ही है । इसलिए भगवान राम की जो विजय है वह सबकी विजय है । यही रामराज्य का दर्शन है । हम जीवन में बाहरी समस्याओं का समाधान तो खोजते ही हैं पर उनका स्थायी निदान खोजने के लिए हमें अपने अन्तःकरण में, अपने मानस में प्रवेश करने की आवश्यकता है । अन्तःकरण के 'पंच विकार' अनेक साधनाओं के होते हुए भी बिना भगवत्कृपा के पूरी तरह नहीं मिट पाते । गोस्वामीजी यह कहकर व्यक्ति को सचेत करते हैं कि हमारे अन्तःकरण में ये जो पाँच विकार भरे हुए हैं उन्हें पलटकर उन पात्रों में हम प्रभु के गुणों को भरकर रखें ।
Thursday, 16 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
परशुरामजी भगवान राम को एक आखिरी कसौटी पर कसना चाहते हैं । वे समझ गए थे कि नवीन अवतार मेरे सामने खड़े हैं । पर वे अपने सन्देह को मिटाने के लिए एक परीक्षा लेना चाहते हैं । उनके पास एक विष्णुजी का धनुष था जिसे वे इतने दिनों तक धारण किए हुए थे । उन्होंने उस धनुष को आगे बढ़ाते हुए भगवान राम से कहा - तुम इस धनुष को लो और इसे चढ़ा दो तो मैं समझ लूँगा कि विष्णु का अवतार हो गया है और फिर मैं अपनी भूमिका समाप्त कर दूँगा । पर आश्चर्य ! भगवान राम ने उस धनुष को लेने के लिए अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाया ! क्यों नहीं बढ़ाया ! अगले ही क्षण इसका उत्तर भी मिल गया । धनुष स्वयं ही परशुरामजी के हाथ से निकलकर भगवान राम के पास चला गया । बड़ी सांकेतिक भाषा है । नेता का अर्थ है - नेय मान - जो अपनी ओर खींच ले, अपनी विशेषताओं के कारण । परशुरामजी का तात्पर्य था कि नये अवतार, नये नेतृत्वदाता नेता का यदि आगमन हो गया है तो वह गुण को अपनी ओर खींच ले । पर भगवान राम के द्वारा हाथ आगे नहीं बढ़ाए जाने के पीछे यही तात्पर्य है कि प्रयासपूर्वक, श्रमपूर्वक अपनी ओर खींचने की चेष्टा में तो श्रम करना पड़ेगा, थकान होगी, पकड़ ढीली होते ही प्रत्यंचा फिर अपने स्थान पर वापस आ जाएगी । अतः प्रयासपूर्वक खींचने की नहीं, स्वयं गुण ही जिसके पास खिंचे चले आएँ, ऐसे नेता की आवश्यकता है ।
Wednesday, 15 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
परशुरामजी भी अवतार हैं । ब्रह्म को निर्गुण कहा जाता है पर परशुरामजी ने सगुण रूप में अवतार लेकर गुणों को अपने जीवन में सचमुच स्वीकार कर लिया । वे बार-बार स्वयं कहते हैं कि मैं ब्राह्मण हूँ, ब्रह्मचारी हूँ, मैंने बड़े-बड़े राजाओं से युद्ध कर उन्हें हराया है । मैंने कई बार पृथ्वी को क्षत्रियों से खाली करके उसे ब्राह्मणों को दान कर दिया है । इतना ही नहीं वे विश्वामित्रजी से भी यही कहते हैं कि इन राजकुमारों को मेरे शौर्य और विजय का इतिहास सुनाओ । पर भगवान राम ऐसा कुछ नहीं कहते । भगवान राम ने कहा - महाराज ! मैं तो अपने आपको आपसे तुलना के योग्य नहीं मानता । आप महान हैं, प्रणम्य हैं और मैं तो बस आपके चरणों में ही प्रणाम कर सकता हूँ । परशुरामजी ने कहा - इन बातों से काम नहीं चलेगा, तुम्हें लड़ना ही पड़ेगा । भगवान राम बोले - महाराज ! लड़ने से क्या होगा ? - एक जीतेगा, दूसरा हारेगा, परशुरामजी बोले । भगवान राम बोले - हार-जीत की ही बात है तब तो मैं पहले ही स्वीकार करता हूँ कि मैं सभी प्रकार से आपसे हारा हुआ हूँ । भगवान राम दूसरों को हराने में विश्वास नहीं करते । इस प्रकार वे हार स्वीकार करके भी जीत जाते हैं ।
Tuesday, 14 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
जनकपुर में परशुरामजी विश्वामित्रजी से मिलते हैं । दोनों में बड़ा स्नेह है । विश्वामित्रजी ने श्रीराम और लक्ष्मण को आगे किया और दोनों भाइयों से परशुरामजी को साष्टांग प्रणाम करवाया । परशुरामजी को दोनों अच्छे लगे । उन्होंने उन्हें आर्शीवाद दिया । पर भगवान राम से वे इतने प्रभावित हुए कि एकटक देखने लगे । जनकजी ने देखा कि आज परशुरामजी शान्त-प्रसन्न दिख रहे हैं । सोचने लगे कि कुछ परिवर्तन दिखाई दे रहा है । पर उसी समय परशुरामजी अचानक सोचने लगे कि मैं किस चक्कर में पड़ गया । क्या मैं रूप-सौंदर्य देखने आया था ? मुझे तो धनुष देखना है । और तब उनकी दृष्टि चली गई खण्डित धनुष पर । और तब उन्हें क्रोध आ गया । गोस्वामीजी ने इन शब्दों से एक बहुत बड़ी बात कह दी । वे कहते हैं कि अखण्ड ज्ञानघन भगवान राम को जब तक परशुरामजी देख रहे थे परम प्रसन्न थे, पर जब उनकी दृष्टि 'अखण्ड' से हटकर खण्डित धनुष पर चली गई तो उन्हें क्रोध आ गया । यही व्यक्ति, समाज और हमारे-आपके जीवन का सत्य है । अखण्ड को देखने से क्रोध शान्त होता है पर खण्ड को - चाहे वह देश, प्रान्त, जाति किसी रूप में क्यों न हो, देखकर क्रोध आना स्वाभाविक ही है । भेद और विभाजन ही क्रोध के मूल में है ।
Monday, 13 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
गोस्वामीजी धनुष-भंग प्रसंग में उस समय के राजाओं की मनःस्थिति का एक व्यंग्यात्मक चित्र प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं कि जिस समय परशुरामजी आए तो उपस्थित सब राजा, जो भगवान राम से युद्ध करना चाहते थे, आतंकित हो गए । पर जब परशुरामजी ने यह पूछा कि धनुष किसने तोड़ा है ? तो यह सुनकर उन्होंने चैन की साँस ली । बात यह थी कि जब ये राजा धनुष तोड़ने के लिए चलते थे तो इष्टदेव से प्रार्थना करते थे कि धनुष हमसे तुड़वा दीजिए । पर जब उनसे धनुष नहीं टूट पाता तो वे लौटकर अपने-अपने इष्टदेवों को उलाहना देते थे कि मैंने आपकी पूजा-प्रार्थना की और आपने यह फल दिया । उन्हें बड़ा दुख होता था । और जब धनुष भगवान राम के हाथों टूट गया तो वे राजा अत्यधिक दुखी हो गए कि हमसे धनुष टूटा नहीं और एक छोटी अवस्था के राजकुमार ने तोड़ दिया । इस प्रकार वे सब राजा अपने-अपने इष्ट देवताओं से बहुत नाराज थे । पर जब परशुरामजी ने पूछा तो सभी राजा बड़े प्रसन्न हुए और अपने-अपने इष्ट देवों को धन्यवाद देने लगे कि आपने अच्छा किया जो हमसे धनुष नहीं तुड़वाया ! यदि तुड़वा दिया होता तो आज हमारा सिर अवश्य ही कट गया होता ! यही मनुष्य का स्वभाव है । अच्छे-बुरे की परिभाषा उसके स्वार्थ के अनुसार बदलती रहती है ।
Sunday, 12 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
जनकपुर की सभा में गोस्वामीजी भगवान राम और परशुरामजी महाराज दोनों की उपस्थिति का जो वर्णन करते हैं उसमें एक विलक्षणता दिखाई देती है । दोनों ही अवतार हैं । दोनों ही प्रकाशमय हैं । परशुरामजी जब आते हैं तो गोस्वामीजी लिखते हैं कि भृगुकुल के सूर्य आए । और भगवान राम जब धनुष तोड़ने के लिए खड़े हुए तो गोस्वामीजी उनको भी सूर्य बताते हैं । परशुरामजी सूर्य हैं और भगवान राम भी सूर्य हैं, पर दोनों सूर्यों में एक भिन्नता है । सूर्य में प्रकाश है और ताप भी है । शीतकाल में हम बड़ी आतुरता से सूर्य की प्रतीक्षा करते हैं कि कब सूर्य निकले जिससे हमारी शीत की पीड़ा का निवारण हो । पर जेठ की दुपहरी में जब सूर्य का प्रकाश और ताप सबसे अधिक होता है, तब हम उसका स्वागत करने के स्थान पर उससे भयभीत हो जाते हैं और प्रयास करते हैं कि इस सूर्य से दूर किसी अँधेरे स्थान पर छिपकर अपने आपको बचावें ! इसका अभिप्राय है कि सूर्य जब प्रकाश देता है, शीत का निवारण करता है, तब वह हमारे लिए प्रिय हो जाता है पर जब वह हमें तप्त करने लगता है तो हमारे लिए भय का कारण बन जाता है । इसी प्रकार भगवान राम और परशुरामजी, दोनों ही सूर्य हैं पर अन्तर यही है कि परशुरामजी जेठ की दुपहरी वाले सूर्य हैं और भगवान राम शरद्कालीन प्रातःकाल के सूर्य हैं ।
Saturday, 11 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
जब भगवान राम ने लक्ष्मण से कहा कि मैंने निर्णय किया है कि जिस बाण से मैंने बालि का वध किया था, मूर्ख सुग्रीव का भी वध उसी बाण से कर दूँगा । सुनकर लक्ष्मणजी ने प्रभु से कहा - महाराज ! यह कार्य आप मुझे करने दीजिए । जब बड़े भाई ने अपराध किया तो आपने दण्ड दिया, अब छोटे भाई के अपराध का दण्ड छोटा भाई दे, यही उचित होगा । लक्ष्मणजी धनुष-बाण चढ़ाकर चलने लगे । तब भगवान राम ने उनका हाथ पकड़ लिया और समझाने लगे - लक्ष्मण ! ऐसा न हो कि कहीं जाकर उसे मार ही डालो ! - प्रभु आप ही ऐसा कह रहे थे ! प्रभु बोले - मेरा उद्देश्य उसे मारना नहीं था, बस उसे डराना था । वह भय के मारे मेरा भक्त बना था । बालि के मरने से उसका भय जाता रहा, इसलिए वह मुझे भूल गया । अतः उसे मारना नहीं है । तुम जाकर उसे थोड़ा-सा भय दिखा दो, वह पुनः मेरा भक्त बन जायेगा । लक्ष्मणजी ने कहा - मैं आपकी बात ठीक से समझ नहीं पा रहा हूँ पर आपका आदेश है तो जाकर उसे डराता हूँ । लक्ष्मणजी चलने लगे तो प्रभु ने फिर कहा - लक्ष्मण ! एक बात और याद रखना । वह जितना बड़ा डरपोक है उतना ही बड़ा 'भगोड़ा' भी है । अतः तुम उसे इस ढंग से डराना कि वह भागकर कहीं दूर न चला जाय, इधर ही आए । गोस्वामीजी कहते हैं कि भगवान राम के भय के पीछे भी उनकी कृपा दिखाई देती है ।
Friday, 10 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
मानस में वर्णन आता है कि सुग्रीव राज्य प्राप्त करने के बाद आमोद-प्रमोद में इतना डूब गए कि 'श्रीसीताजी का पता लगाना है' इस बात का उन्हें स्मरण ही नहीं रहा । प्रभु ने उस समय क्रोध का बहुत बढ़िया अभिनय किया । प्रभु बोले - लक्ष्मण ! देख रहे हो न ! सुग्रीव राजपाट पाकर मुझे भुल गया । अतः मैंने निर्णय किया है कि जिस बाण से मैंने बालि का वध किया था, मूर्ख सुग्रीव का भी वध उसी बाण से कल कर दूँगा । सुनकर लक्ष्मणजी को थोड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरी भाषा बोलने का अभ्यास प्रभु को है नहीं ! फिर प्रसन्नता हुई कि बहुत अच्छा है कि प्रभु को क्रोध तो आया ! पर एक बात उन्हें अच्छी नहीं लगी कि 'प्रभु कल मारुँगा' क्यों कह रहे हैं ? क्या हमें सुग्रीव को मारने के लिए कोई सेना इकठ्ठी करनी है ? पर इस कल शब्द से ही भगवान राम के चरित्र की विशेषता प्रगट होती है । मानो वे बताना चाहते हैं कि यदि क्रोध आ जाय तो उसकी प्रतिक्रिया के रूप में जो कार्य करना चाहते हैं उसे तुरन्त ही क्रियान्वित न करके 'कल' पर टाल दीजिए ।
Thursday, 9 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
मानस में कहा गया है कि भगवान राम की प्रशंसा शत्रु भी करते हैं । इसका संक्षेप में सूत्र यही है कि हमारी सफलता का अर्थ है, दूसरे की असफलता और हमारी विजय का अर्थ है दूसरी की पराजय । सृष्टि में यह द्वन्द समाज में दिखाई देता है । इसीलिए समाज में अधिकांशतः जो दुख दिखाई देता है वह अभावजन्य न होकर ईर्ष्याजन्य है कि हमसे अधिक हमारे पड़ोसी के पास क्यों है । हमारे चिन्तन की दिशा ठीक नहीं है । हम यह मानकर चलते हैं कि दूसरों का दुख, दूसरों का अभाव ही हमारा सुख है, हमारी सम्पन्नता है । इस चिन्तन में परिवर्तन की आवश्यकता है । भगवान राम बन पाना यद्यपि हमारे लिए सम्भव नहीं है पर उस चिन्तन का एक बिन्दु भी हमारे जीवन में आ सके तो जीवन धन्य हो सकता है ।
Wednesday, 8 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
भगवान राम के चरित्र की विशिष्टता के सन्दर्भ में महाराज दशरथ गुरु वसिष्ठ से जो वाक्य कहते हैं वह बड़े महत्व का है । महाराज दशरथ के मन में जब यह बात आई कि श्रीराम को युवराज पद पर अभिषिक्त करें, तो वे गुरु वसिष्ठ के पास गए और कहा कि मैं यह दावा नहीं करता कि मेरे विरोधी नहीं हैं, शत्रुता का भाव रखनेवाले नहीं हैं । वे कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति हैं जो मुझसे प्रेम करते हैं, मित्रता रखते हैं । कुछ ऐसे व्यक्ति भी हैं जो वैर-विरोध रखते हैं और कुछ ऐसे व्यक्ति भी हैं जो न तो मित्रता ही रखते हैं और न ही विरोध करते हैं । पर मैंने एक बात अनुभव किया है कि जहाँ तक राम का संबंध है वे सभी राम से उतना ही प्रेम करते हैं जितना प्रेम मैं करता हूँ । यह गुण मुझमें नहीं है, जो राम में है । मानस में यह भी कहा गया कि 'बैरिहु राम बड़ाई करिही' भगवान राम की प्रशंसा शत्रु भी करते हैं ।
Tuesday, 7 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
गोस्वामीजी के लिए राम एक प्रतीक नहीं हैं, 'मिथ' नहीं हैं, माध्यम नहीं हैं । वे तो उनके आराध्य हैं । गोस्वामीजी भगवान राम की विजय गाथा का मानस में वर्णन करते हैं तो संसार के व्यक्तियों या राजाओं की 'जय' से वे इसे भिन्न रूप में देखते हैं । संसार में एक व्यक्ति या एक राजा की विजय का अर्थ होता है दूसरे व्यक्ति या राजा की पराजय । पर भगवान राम की विजय का अर्थ दूसरे की पराजय न होकर सबकी विजय है । श्रीराम की जय में सबकी जय है ।
Monday, 6 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
कई बार लोग कह देते हैं कि जगत् के कल्याण के लिए गोस्वामीजी ने भगवान राम के चरित्र का वर्णन किया । पर यह बात मुझे ठीक नहीं लगती । जैसा कि साधारणतया मान लिया जाता है कि किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए कोई एक माध्यम का आश्रय लिया जाता है उसी प्रकार से श्रीराम उनके लिए एक माध्यम नहीं हैं । उन्होंने लोक-कल्याण की बात कहने के उद्देश्य से भगवान राम को माध्यम बनाया, ऐसी बात नहीं है । वे यह मानकर भगवान राम के विषय में नहीं लिखते कि यह समाज के लिए उपादेय होगा । इसे हम इस तरह कह सकते हैं कि उनका लिखना एक बाध्यता है । भगवान राम से उनका एक अटूट नाता है । गोस्वामीजी से लोग पूछते थे कि तुम बता सकते हो कि तुम्हारे भीतर राम की भक्ति कब से आई ! गोस्वामीजी विनय-पत्रिका में कहते हैं कि तुलसी तुम्हारा राम से परिचय नया नहीं है, जन्म-जन्मान्तर से तुम केवल राम के हो । राम के विषय में ही तुम कुछ कह सकते हो, अन्य के विषय में कुछ कह नहीं सकते ।
Sunday, 5 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
किसी ने गोस्वामीजी से पूछा कि आपने भी जब सरस्वतीजी को बुलाया तो उनके आने पर उन्हें स्नान कराया या नहीं ? उनकी थकान मिटाई या नहीं ? गोस्वामीजी ने कहा कि मैंने ब्रह्मलोक की सरस्वती को बुलाने का साहस ही नहीं किया । गोस्वामीजी ने एक और सरस्वती का परिचय देते हुए कहा कि मैंने एक दूसरी सरस्वती को बुलाया जो 'काठ की पुतली' हैं और जिनका निवास भगवान राम के पास है । वे कहते हैं कि यह सरस्वती चेतन न होकर एक कठपुतली है, जिसके सूत्रधार प्रभु ही हैं । वे ही इसे नचाते हैं । प्रभु जिस पर कृपा कर देते हैं उसके ह्रदय में प्रभु इस सरस्वती को नचाते हैं । और वह कवि बन जाता है । वस्तुतः कवि की वाणी पर यह जो काव्य होता है, वह सरस्वती का नृत्य ही तो है । गोस्वामीजी से पूछा गया कि आपने भगवान राम के द्वारा संचालित-नियंत्रित 'कठपुतली' सरस्वती को ही क्यों बुलाया ? ब्रह्मलोक की सरस्वती को बुलाते ! गोस्वामीजी ने कहा कि संसार में जितने नाचनेवाले हैं, या ब्रह्मलोक की सरस्वती है, वे सब नाचते हैं तो नाचते-नाचते थक जाते हैं । पर एकमात्र 'कठपुतली' का नृत्य ही ऐसा होता है जिसमें नाचनेवाली कठपुतली नहीं थकती, अपितु उसे नचानेवाला थकता है । मानो वे इसके द्वारा संकेत देते हैं कि कवि के रूप में दिखाई देने पर भी असली कवि तो प्रभु ही हैं ।
Saturday, 4 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
गोस्वामीजी ने मानस के प्रारंभ में सरस्वतीजी का स्मरण किया । सरस्वतीजी को हम विद्या और काव्य की देवी मानते हैं । और जब कोई उनकी वन्दना करता है, स्मरण करता है तो वे ब्रह्मा के लोक को छोड़कर, उतावली हो दौड़ी चली आती हैं । गोस्वामीजी बड़ी मीठी बात कहते हैं कि जब सरस्वती इतनी दूर से दौड़कर आती हैं तो स्वाभाविक रूप से उनमें थकान आ जाएगी । और ऐसी स्थिति में यदि उनसे सीधे कह दिया जाय कि आप कविता बनाने के काम में लग जाइए तो यह तो बड़ी अभद्रता होगी । क्योंकि हमारे निमन्त्रण पर आने वाले सामान्य अतिथि से भी हम ऐसा व्यवहार नहीं करते । हम पहले उसकी थकान मिटाने तथा भोजन आदि की व्यवस्था करते हैं और तब उससे काम की बात करते हैं । गोस्वामीजी कहते हैं कि सरस्वतीजी को भी पहले विश्राम तो दीजिए और इसके लिए उन्हें स्नान कराइए - रामचरित्र के सरोवर में स्नान कराने से उनकी थकान मिट जाएगी । सरस्वतीजी भी मानो ईश्वर के गुणानुवाद से, ईश्वर की वंदना से काव्य का प्रणयन प्रारंभ करती हैं । पर कुछ लोग ऐसा नहीं करते । वे भगवान राम का स्मरण नहीं करते और सीधे ही कविता बनाने का कार्य सरस्वतीजी को सौंप देते हैं । गोस्वामीजी कहते हैं कि मैं उस रचना को कविता नहीं मानता ।
Friday, 3 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
प्राचीनकाल में यह परंपरा थी कि काव्य या किसी ग्रन्थ के निर्माण से पूर्व मंगलाचरण के रूप में देवताओं की स्तुति की जाती थी । कई लोगों को लगता है कि यह तो व्यर्थ की बात है । देवताओं की वन्दना नहीं करेंगे तो क्या ग्रन्थ पूरा नहीं होगा ? क्या इसके बिना अच्छे ग्रन्थ की रचना नहीं होगी ? तो इसका उत्तर तो यही है कि हाँ ! हो सकती है ! पर वन्दना की आवश्यकता के पीछे जो भाव है वह दूसरा है । जब हम किसी देवता की वन्दना करते हैं, स्तुति करते हैं तो हम उससे शक्ति चाहते हैं कि जिससे हम उस ग्रन्थ का निर्माण कर सकें ! और इस प्रकार उस रचना के पीछे हम अपनी शक्ति न देखकर देवता की शक्ति को देखते हैं । और तब हमारे मन में रचनाकार के अहं के स्थान पर देवता के प्रति कृतज्ञता का भाव जागृत होता है । हम अहंकार से बच जाते हैं ।
Thursday, 2 November 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
पुराणों में ब्रह्माजी को सृष्टि का निर्माता माना जाता है । परन्तु गोस्वामीजी अपनी साहित्यिक शैली में दर्शन की बड़ी ऊँची बात कह देते हैं । वे कहते हैं कि जनकपुर में भगवान राम और श्री सीताजी का विवाह हो रहा है । उस विवाह को देखने के लिए ब्रह्माजी, भगवान शंकर और अन्य सभी देवतागण आए हुए हैं । ब्रह्माजी यह सोचकर कि यह विवाह मेरे द्वारा बनाए गए संसार में संपन्न हो रहा है । एक गौरव की अनुभूति हो रही है । पर जब वे जनकपुर पहुँचकर चारों ओर देखने लगे तो उन्हें एक भी वस्तु अपनी बनाई हुई नहीं दिखी । वे बड़े आश्चर्य में पड़ गए । पर अब वे किससे कहें ? भगवान शंकर उनकी समस्या समझ गए । ब्रह्माजी बुद्धि के देवता हैं और शंकरजी मूर्तिमान 'विश्वास' हैं । इसका संकेत यही है कि जब बुद्धि भ्रमित हो गई तब विश्वास बोल पड़ा । और यह सूत्र है कि जहाँ समाधान बुद्धि से न मिले, वहाँ विश्वास का आश्रय लेना चाहिए । भगवान शंकर ने सीधे ब्रह्माजी को कोई उपदेश नहीं दिया । वे कहते हैं कि यहाँ केवल आँखों से देखने की वस्तु नहीं है, यहाँ ह्रदय से विचार करने की आवश्यकता है । क्योंकि यहाँ किसी संसारी स्त्री-पुरुष का विवाह नहीं, श्री सीता-राम का विवाह हो रहा है । मानो शंकर जी का ब्रह्माजी को यह बड़ा मधुर संकेत था कि हे महान रचियता ! आप संसार के निर्माता के रूप में प्रसिद्ध हैं यह ठीक है । पर इस विवाह में आकर आप यह मत खोजिए कि मैंने क्या बनाया है ! यहाँ तो आप यह ढूँढ़िए कि आपको किसने बनाया है ।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
'अनादित्व' ही रामायण का मूल दर्शन है । भगवान शंकर रचियता होने का कोई दावा नहीं करते । हम सब गोस्वामीजी को 'मानस' का रचियता भले ही मानते हों पर वे कहते हैं कि जो कथा मैंने अपने गुरुजी के द्वारा सुनी उसे ही भाषाबद्ध कर रहा हूँ । वे भी अपने आपको रचियता नहीं मानते । बड़ी अद्भुत-सी बात है । भगवान शंकर से लेकर गोस्वामीजी तक अपने आपको निर्माता न मानकर बस एक माध्यम ही मानते हैं । पर हमारी बिडम्बना यह है कि हम इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि हमने सृजन किया है । वस्तुतः कोई व्यक्ति एक माध्यम ही होता है जिसके द्वारा कोई कृति संसार के सामने आती है ।
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