भगवान श्रीराघवेन्द्र ने महर्षि भरद्वाज के चरणों में प्रणाम किया और बड़ी ही विनम्रता से अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हुए कहा कि आप मुझे बतायें कि मैं किस मार्ग से जाऊँ ? भगवान श्रीराम का प्रश्न सुनकर महर्षि मन ही मन हँसे और सबसे पहले उन्होंने यही कहा कि मैं तुम्हारे लिए कौन सा मार्ग बताऊँ ? क्योंकि तुम्हारे लिए तो सभी मार्ग सुगम हैं । किन्तु भगवान राम की जिज्ञासा तथा महर्षि के द्वारा कहा जाने वाला यह वाक्य कि सभी मार्ग तुम्हारे लिए सुगम हैं, इसके पीछे सुगम और अगम का बड़ा ही अनोखा सूत्र विद्यमान है । कभी-कभी व्यक्ति के मन में यह जिज्ञासा होती है कि कौन सा मार्ग सुगम है और कौन सा अगम है । कौन सा मार्ग कठिन है और कौन सा सरल है । और कहीं-कहीं यह भी आग्रह मिलता है कि अमुक मार्ग अत्यंत सरल है । परन्तु इस समस्या का समाधान भगवान राम अपने चरित्र के द्वारा बड़े ही अद्भुत ढंग से देते हैं ।
Friday, 31 March 2017
Thursday, 30 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
विश्वामित्र जी के यज्ञ की रक्षा करने के बाद भगवान राम की विदेह नगर की यात्रा होती है, जो ज्ञान योग का मार्ग है । फिर अयोध्या से आगे बड़ी लम्बी यात्रा होती है । जिस यात्रा में कभी जल मार्ग की यात्रा होती है जब केवट की नाव पर बैठकर गंगा पार करते हैं । कभी पैदल चित्रकूट की यात्रा पूरी करते हैं । कहीं रथ पर बैठकर भगवान राम चले । कहीं घोड़े पर बैठकर भगवान राम ने यात्रा की । रावण को हराकर जब लौटे तो पुष्पक विमान पर बैठकर यात्रा की । भगवान राम कभी जल मार्ग से कभी थल मार्ग से तो कभी नभ मार्ग से यात्रा करते हैं । कभी नदी को पार करते हैं, कभी समुद्र को पार करते हैं, कभी पर्वत को पार करते हैं और कभी वन को पार करते हैं । इसका आध्यात्मिक अभिप्राय है कि जीवन में यही विविध मार्ग हैं और इन मार्गों में जो समस्याएँ आती हैं, भगवान राम ने प्रत्येक समस्या को स्वीकार किया, तथा प्रत्येक समस्या का समाधान किया । भगवान राम अपने चरित्र के द्वारा कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग आदि सभी मार्गों की शिक्षा देते हैं ।
Wednesday, 29 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
भगवान राम साक्षात ईश्वर होते हुए भी जीवन भर किसी न किसी के मार्गदर्शन में चलते रहे । यही महाभारत का भी सूत्र है । क्योंकि युधिष्ठिर से जब पूछा गया कि हम मार्ग का निर्णय कैसे करें ? तो युधिष्ठिर ने यही उत्तर दिया कि हम महापुरुष के पीछे चलें । पहली यात्रा में भगवान श्रीराघवेन्द्र विश्वामित्र के साथ चल रहे हैं । यज्ञ और विश्वामित्र का बड़ा घनिष्ठ संबंध है । विश्वामित्र माने जो सारे संसार का मित्र है । यज्ञ-कर्म माने, जो सम्पूर्ण संसार के कल्याण के लिये किया जाता है, वह यज्ञ-कर्म है । तथा जो केवल अपने स्वार्थ के लिये किया जाता है वह स्वार्थ-कर्म है । भगवान यज्ञ-कर्म करने के लिये जा रहे हैं । यदि प्रश्न किया जाय कि जब आप यज्ञकर्म करेंगे तो विध्न आवेंगे या नहीं ? तो भगवान ने अपने चरित्र के द्वारा बता दिया कि विध्न अवश्य आवेंगे । इस कार्य के लिये जब भगवान बढ़े तो ताड़का आयी, मारीच आया और सुबाहु आया । भगवान राम ने तीनों से अलग-अलग व्यवहार किया । ताड़का को प्रभु ने मार दिया, मारीच को दूर फेंक दिया और सुबाहु को जला दिया । इसका अभिप्राय था कि यज्ञ-कर्म की दिशा में जब हम चलेंगे, तो ताड़का, मारीच और सुबाहु आयेंगे । और तीनों से हम कैसा व्यवहार करें, यह भगवान राम स्पष्ट करते हैं । इस प्रकार यह कर्म मार्ग की यात्रा है ।
Tuesday, 28 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
भगवान राम की जो क्रमशः यात्राएँ हैं, उनके अलग-अलग नाम हैं । विश्वामित्र के साथ उनके आश्रम तक की यात्रा *कर्मयोग* है । इसका सूत्र गीता के कर्मयोग के प्रसंग में आपको मिलेगा, जहाँ भगवान कहते हैं कि अर्जुन ! एक ओर तो कर्मयोग का त्याग संभव नहीं है और दूसरी समस्या यह है कि यदि कर्म करते हैं तो कर्म के बंधन में पड़ते हैं । परन्तु समस्या का समाधान देते हुए भगवान कहते हैं - अर्जुन ! तुम जीवन में यज्ञ-कर्म का आश्रय लो, क्योंकि जब यज्ञ-कर्म हो जायेगा तब उसका परिणाम होगा कि कर्म होते हुए भी व्यक्ति कर्म बन्धन में नहीं बँधेगा । भगवान राम की पहली यात्रा यज्ञ की रक्षा के लिए होती है । इस प्रकार यह यात्रा गीता का यज्ञकर्म ही है ।
Monday, 27 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
भगवान राम दूल्हे के रूप में जब घोड़े की पीठ पर बैठे तो किसी ने जानना चाहा कि यह घोड़ा कौन है ? तो गोस्वामीजी ने कहा कि आज तो ऐसा लग रहा है, जैसे काम ही घोड़ा है और उस काम के अश्व रथ पर भगवान राम आसीन हैं । और जब हनुमान जी की पीठ पर बैठे, तो किसी ने मानो जानना चाहा कि हनुमान जी तो भगवान शंकर के अवतार हैं तथा शंकर जी कामारि हैं । तो क्या आपके लिए यह काम और कामारि दोनों बराबर हैं, जो काम के कन्धे पर भी सवार होते हैं तथा कामारि के कन्धे पर भी आरूढ़ हो जाते हैं । प्रभु ! दोनों पर आरूढ़ होने का क्या अभिप्राय है ? भगवान ने कहा - नहीं भाई ! यद्यपि दोनों की पीठ पर मैं सवार था पर एक अन्तर था । क्योंकि जब मैं काम की पीठ पर बैठा तो लगाम पकड़ ली पर कामारि के कन्धे पर बैठते समय किसी लगाम की आवश्यकता नहीं रह गयी । इसका अभिप्राय है कि भगवान दोनों रुपों में ही व्यक्ति को स्वीकार करते हैं ।
Sunday, 26 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
हनुमान जी में किसी जाति या वर्ण का अभिनिवेश बिल्कुल नहीं है । वे हर वर्ण का सदुपयोग करते हैं । पहले ब्राह्मण बनकर प्रभु को पहचान लिया । प्रभु से कथा और व्यथा कहकर वार्तालाप समाप्त किया । इसके बाद फिर बन्दर बन गये । आश्चर्य होता है कि अभी-अभी ब्राह्मण के रूप में दिखायी दे रहे थे, पर अब बन्दर कैसे बन गये ? किन्तु हनुमान जी बड़े चतुर हैं इसलिए बन्दर बनकर प्रस्ताव किया कि - महाराज ! आप दोनों मेरी पीठ पर बैठ जाइये । वे जानते हैं कि अगर मैंने ब्राह्मण के रूप में पीठ पर बैठाने का प्रस्ताव किया तो न तो वह उचित रहेगा और न ही प्रभु उसे स्वीकार करेंगे । इसीलिए तुरन्त कह दिया - प्रभु ! पशु के कन्धे पर बैठने में तो कोई संकोच नहीं करता, मैं तो पशु हूँ । बैठ जाइये न ! हनुमान जी को जब राक्षसों के विरूद्ध लड़ना होता है, तब क्षत्रिय बनकर क्षात्रधर्म का निर्वाह करते हैं । आगे चलकर सुग्रीव से भगवान को लेन-देन की बातें करते हुए सुनकर वे कहते हैं कि प्रभु ! लेन-देन का व्यापार (वैश्य कर्म) अगर करना हो तो आपसे ही करेंगे । शूद्र का धर्म अगर सेवा कार्य है तो शूद्र बनकर आपके चरणों की सेवा करेंगे । इस प्रकार समस्त वर्णों की सार्थकता, हनुमान जी के चरित्र में हमें दिखायी देती है ।
Saturday, 25 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
श्रीभरत और श्रीलक्ष्मण दोनों भगवान श्रीराम के अत्यंत प्रिय हैं । लेकिन दोनों की अवस्थिति भिन्न है । श्रीभरत की भक्ति में ज्ञान की प्रधानता है, तथा श्रीलक्ष्मण की भक्ति में भावना की प्रधानता है । और दोनों की मान्यताएँ भी अलग-अलग हैं । श्रीभरत की मान्यता है कि सारे संसार में भगवान हैं । और लक्ष्मण जी की मान्यता है कि हमारे प्रभु में ही सारा संसार है । भरत जी यह मानकर चलते हैं कि अगर सबकी सेवा करो तो प्रभु की सेवा हो जायेगी और लक्ष्मण जी मानते हैं कि यदि प्रभु की सेवा करो तो संसार की सेवा हो जायेगी । और भगवान राम दोनों के इस अन्तर को जानते हैं । इसीलिए भगवान राम कहते हैं - लक्ष्मण ! अगर तुम पास रहकर मेरी सेवा करना चाहते हो तो जागकर पहरा दो । और भरत से कहते हैं - तुम तो सारे संसार में मुझे देखते हो, अतः लौटकर जाओ और उसी रूप में मेरी सेवा करो । श्रीभरत जी ने भगवान श्रीराघवेन्द्र से कहा - महाराज ! आप मुझे लौटा रहे हैं, तो कुछ तो दीजिए । प्रभु ने पादुका उठाकर दे दी । श्रीभरत जी ने पादुका सिर पर रख लिया । जब श्रीभरत से लोगों ने पूछा - प्रभु ने आपको यह पादुका क्यों दे दी ? श्रीभरत ने कहा - भई ! यह पादुका नहीं दी । तब ? बोले - *भरत मुदित अवलंब लहे ते । अस सुख जस सिय रामु रहे तें ।।* - भगवान राम का उद्देश्य था - भरत ! एक रूप में तो मैं वन में रुक रहा हूँ और पादुका के रूप में तुम्हारे साथ लौट रहा हूँ । किसी ने पूछ दिया - महाराज ! पादुका यहाँ छोड़ दीजिए और श्रीभरत के साथ इस रूप में लौट जाइए । तो प्रभु ने कहा - भई ! इसमें अन्तर यह है कि संसार के जो प्राणी हैं, अगर वे मुझमें ही मुझको पहचान लें, तो भी बड़ी बात है, परन्तु पादुका में भी मुझे पहचानने की दृष्टि तो भरत के ही पास है ।
Friday, 24 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
श्री हनुमान जी के जीवन में ज्ञान, कर्म और भक्ति की समग्रता विद्यमान है, वे तो महान ज्ञानी, महान कर्मयोगी तथा महान भक्त हैं । हनुमान जी के चरित्र में शरीर का सर्वोच्च सदुपयोग है, भावना का भी सर्वश्रेष्ठ उपयोग है और विवेक का भी उत्कृष्ट प्रयोग है । रामायण में भगवान श्रीराघवेन्द्र उनके इन तीनों योगों का सदुपयोग करते हैं । उनके विचार का सदुपयोग करते हैं, उनकी भावना का सदुपयोग करते हैं तथा उनके शरीर के द्वारा भी निरन्तर उनसे सेवा लेते हैं ।
Thursday, 23 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
राज्याभिषेक के पश्चात भगवान राम अन्य सभी बन्दरों को कहते हैं - अब तुम घर जाओ, लेकिन श्री हनुमान जी को भेजने की आवश्यकता भगवान राम नहीं समझते हैं । उनके सन्दर्भ में प्रभु दूसरी बात सोचते हैं । कई लोग ऐसे होते हैं कि जिनमें सामीप्य के कारण रस का अभाव हो जाता है । अधिक पास रहने से उन्हें बहुत लाभ नहीं होता । क्योंकि पास रहने से लाभ उठाने वाले मैंने विरले ही व्यक्ति देखे हैं, बहुधा हानि उठाने वाले ही अधिक देखे हैं । लोग बहुधा आश्चर्य करते हैं कि बड़े-बड़े महात्माओं के अत्यंत पास रहने वाले व्यक्तियों का स्वभाव बड़ा विचित्र होता है । बड़े-बड़े तीर्थों में रहने वाले व्यक्तियों का आचरण तीर्थ के आदर्श से बिल्कुल भिन्न होता है । इसका रहस्य यही है कि जैसे कोई व्यक्ति प्रतिदिन किसी एक ही वस्तु का भोजन करे तो धीरे-धीरे उसे उस वस्तु का स्वाद आना बन्द हो जाता है । इसी प्रकार से कोई व्यक्ति अगर बहुत लम्बे समय तक किसी महापुरुष के साथ रहे अथवा किसी तीर्थ में रहे तो वह उससे प्रेरणा ग्रहण नहीं कर पाता और जो थोड़े समय के लिए जाते हैं वे नयी प्रेरणा ग्रहण करके लौटते हैं । निरन्तर समीप बने रहने वालों में रस की यह भावना समाप्त होकर सांसारिक वृत्ति जाग्रत होते देखी गयी है । जिससे कि वे बदलकर सांसारिक दिखायी देने लगते हैं । ऐसे व्यक्ति अधिक पास न रहकर थोड़ा दूर बने रहकर अगर पास आने की चेष्टा करें तभी उनका कल्याण होगा । पर श्री हनुमान जी के संबंध में ऐसी बात नहीं है । हनुमान जी चाहे दूर रहे, चाहे पास रहें, वे तो सदैव राम-रस में ही निमग्न रहते हैं ।
Wednesday, 22 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
अयोध्या में राज्याभिषेक के पश्चात भगवान राम बन्दरों से कहते हैं - तुम घर जाओ । बन्दरों ने कहा - महाराज ! यह तो आप ऊपर से नीचे उतार रहे हैं । क्योंकि घर से अयोध्या जायँ यह तो उन्नति हुई पर अगर अयोध्या से लौटकर घर चले गये, तब तो ऊपर से नीचे उतर जायेंगे । भगवान राम ने कहा - नहीं, हम तुम्हें ऊपर से नीचे नहीं ले जा रहे हैं, अपितु तुम्हें और भी ऊपर पहुँचा रहा हूँ । भगवान ने कहा - मित्रों ! विद्यार्थी जब पढ़ता है, तब उसकी परीक्षा तो साल में ही होती है । तुम लोगों ने भी इतने लम्बे समय तक जो पाठ पढ़ा है, मैं भी उसकी परीक्षा ले रहा हूँ । इसीलिए दोहे में जो शब्द है उसे देखिए - *अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम ।* - तुम्हारी परीक्षा तो तब होगी । क्योंकि यहाँ पास में रहकर अगर मेरी याद रहे, तो काहे की याद है । इस याद को मैं याद नहीं मानता । तुम्हारी दृढ़ता की परीक्षा तो तभी है जब कि शरीर से दूर जाने पर भी याद बनी रहे । वस्तुतः मैं देखना चाहता हूँ कि घर में जाकर भी तुम मेरी स्मृति में डूबे रहते हो कि नहीं ? भगवान ने कहा - अब तो तुम्हारी भक्ति और भी व्यापक हो गयी । क्योंकि अभी तक तुम अयोध्या में थे, मैं भी यहीं था और तब तुम मेरी सेवा कर रहे थे । पर अब तुम घर में जाकर जब मेरी भक्ति करोगे, तब प्रत्येक देश अयोध्या बन जायेगा, प्रत्येक काल त्रेता बन जायेगा और संसार का प्रत्येक व्यक्ति मेरा रूप बन जायेगा । यही समझकर तुम सबकी सेवा करो ।
Tuesday, 21 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
भगवान राम ने जब निषादराज के गाँव में चलना अस्वीकार कर दिया, तो निषादराज ने कहा - महाराज ! कुछ तो सेवा स्वीकार कीजिए । भगवान राम ने कहा - मित्र ! ऐसा कीजिये कि इस वृक्ष के नीचे मेरे सोने का प्रबंध कर दीजिये । निषादराज जी ने पत्ते बिछाकर ऊपर से कुश बिछा दिया तथा उसी शय्या पर भगवान राम सो गये । इसका अर्थ है कि जो निष्काम है उससे भगवान कहते हैं कि मुझे सुला दो और तुम पहरा दो । मैं दोनों तरह से तैयार हूँ । सचमुच इतना उदार भला कौन होगा जो पहरेदार बनने को भी तैयार है और पहरेदार बनाने को भी तैयार है । गोस्वामीजी ने लिखा है कि भगवान राम जब सो गये तब निषादराज तथा लक्ष्मण जी अपने-अपने अस्त्र लेकर जागकर पहरा देने लगे । उस समय दोनों जागने वालों का संवाद हो गया और कथा चलती रही । - कहते-कहते सबेरा हो गया । और भई ! कथा की सार्थकता भी यही है कि जीवन में अँधेरा मिट कर सबेरा हो जाय । और भगवान ऐसे जाग्रत श्रोता और वक्ता का भी आनंद लेते हैं ।
Monday, 20 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
भगवान राम ने तीन को मित्र बनाया और तीनों मित्र भिन्न-भिन्न जाति के हैं, भिन्न-भिन्न भूभाग के हैं । उत्तरी भाग के निषादराज हैं, मध्य भाग के वानरराज तथा दक्षिण भाग के निशाचरराज । एक निषाद, दूसरे बन्दर तथा तीसरे राक्षस । पर भगवान राम की विशेषता यह है कि वे प्रत्येक को उसी के अनुरूप उपदेश देते हैं और मात्र उपदेश ही नहीं देते बल्कि स्वयं को भी उसी रूप में व्यक्त करते हैं । इसका दूसरा सांकेतिक अभिप्राय है कि मानो प्रभु ने हम लोगों को आश्वस्त कर दिया कि चाहे आप विषयी हों चाहे साधक हों या सिध्द हों, परन्तु आप मेरे मित्र हैं । उपनिषद् भी कहते हैं कि ब्रह्म और जीव दोनों सखा हैं । किन्तु समस्या यह है कि हम भटककर अपने सखा से दूर आ गये हैं । जीव को अपने मित्र के संबंध की विस्मृति हो गयी है । परन्तु भगवान इन मित्रों के माध्यम से मानो संसार के समस्त प्राणियों को निमंत्रण देते हैं ।
Sunday, 19 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
......कल से आगे......
आगे चलकर भगवान राम जब विभीषण से मिलते हैं तो प्रभु ने उनसे तुरन्त कहा - लंका के राजा कहिये । उस समय प्रभु का वाक्य सुनकर विभीषण जी संकोच में पड़ गये । उन्हें लगा कि अरे ! मेरे मन की चोरी तो प्रभु ने पकड़ ली, मेरे मन में जो वासना आ गयी थी प्रभु उसको जान गये । विभीषण जी ने कहा प्रभु ! मैं छिपाऊँगा नहीं, सचमुच मेरे मन में इच्छा तो एक क्षण के लिए आयी थी, पर ज्योंही मैंने आपके चरणों के दर्शन किये वह बिल्कुल समाप्त हो गयी । प्रभु ! अब तो मुझे बिल्कुल राज्य नहीं चाहिए । पर भगवान श्रीराघवेन्द्र क्या कहते है ? यदि कहीं कह देते कि ह्रदय में कामना है और चले हैं निष्काम बनने, तब तो यह उनकी सर्वज्ञता होती । पर वे तुरन्त मुस्कराकर कहते हैं - अरे मित्र ! तुम्हारे मन में वासना है या नहीं इसमें तो मुझे सन्देह है, पर मेरे मन में तो वासना है ही । विभीषण ने कहा - महाराज ! आप ये राज्य क्या मेरी वासना को देखकर दे रहे हैं । भगवान ने कहा - बिल्कुल नहीं अपितु मैं तो अपनी वासना से दे रहा हूँ । विभीषण जी ने पूछा - महाराज ! देने वाले में वासना होती है कि लेने वाले में ? प्रभु ने कहा - देने वाले में ! भगवान राम का तात्पर्य था कि मित्र ! राज्य की कामना तो कामना है ही, पर उससे भी बड़ी कामना कीर्ति की है । जिसके मन में लेने की कामना है, वह तो बेचारा छोटी कामना वाला है । पर जो दे कर कीर्ति कमाना चाहता है वह बड़ी कामना वाला है । प्रभु कहते हैं - मित्र ! मेरे विषय में यह बड़ा प्रसिद्ध हो गया है कि मैं उदार हूँ, इसीलिए मैं अपना नाम बचाने के लिए तुम्हें दे रहा हूँ, तुम्हारी वासना देखकर नहीं दे रहा हूँ ।
आगे चलकर भगवान राम जब विभीषण से मिलते हैं तो प्रभु ने उनसे तुरन्त कहा - लंका के राजा कहिये । उस समय प्रभु का वाक्य सुनकर विभीषण जी संकोच में पड़ गये । उन्हें लगा कि अरे ! मेरे मन की चोरी तो प्रभु ने पकड़ ली, मेरे मन में जो वासना आ गयी थी प्रभु उसको जान गये । विभीषण जी ने कहा प्रभु ! मैं छिपाऊँगा नहीं, सचमुच मेरे मन में इच्छा तो एक क्षण के लिए आयी थी, पर ज्योंही मैंने आपके चरणों के दर्शन किये वह बिल्कुल समाप्त हो गयी । प्रभु ! अब तो मुझे बिल्कुल राज्य नहीं चाहिए । पर भगवान श्रीराघवेन्द्र क्या कहते है ? यदि कहीं कह देते कि ह्रदय में कामना है और चले हैं निष्काम बनने, तब तो यह उनकी सर्वज्ञता होती । पर वे तुरन्त मुस्कराकर कहते हैं - अरे मित्र ! तुम्हारे मन में वासना है या नहीं इसमें तो मुझे सन्देह है, पर मेरे मन में तो वासना है ही । विभीषण ने कहा - महाराज ! आप ये राज्य क्या मेरी वासना को देखकर दे रहे हैं । भगवान ने कहा - बिल्कुल नहीं अपितु मैं तो अपनी वासना से दे रहा हूँ । विभीषण जी ने पूछा - महाराज ! देने वाले में वासना होती है कि लेने वाले में ? प्रभु ने कहा - देने वाले में ! भगवान राम का तात्पर्य था कि मित्र ! राज्य की कामना तो कामना है ही, पर उससे भी बड़ी कामना कीर्ति की है । जिसके मन में लेने की कामना है, वह तो बेचारा छोटी कामना वाला है । पर जो दे कर कीर्ति कमाना चाहता है वह बड़ी कामना वाला है । प्रभु कहते हैं - मित्र ! मेरे विषय में यह बड़ा प्रसिद्ध हो गया है कि मैं उदार हूँ, इसीलिए मैं अपना नाम बचाने के लिए तुम्हें दे रहा हूँ, तुम्हारी वासना देखकर नहीं दे रहा हूँ ।
Saturday, 18 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
भगवान विभीषण को भी मित्र कहकर पुकारते हैं तथा उनसे भी एक अनोखा नाता जोड़ते हैं । विभीषण जी न तो निषादराज के समान हैं और न ही सुग्रीव के समान । क्योंकि निषादराज अत्यंत ऊँचाई पर हैं और सुग्रीव का चरित्र अत्यंत निम्न धरातल पर स्थित है । परन्तु विभीषण जी के जीवन में कुछ त्याग भी है, पर वासना पूरी तरह से नहीं मिटी है । यद्यपि विभीषण जी जब चले तो राज्य सम्पत्ति और परिवार इत्यादि सब छोड़कर चले । अगर त्याग करने की क्षमता उनमें न होती तो कैसे इतना बड़ा त्याग कर पाते ? पर इतना होते हुए भी वे पूर्णरूपेण वासना शून्य नहीं थे । जब लंका से चले तो मार्ग में विचार करने लगे कि प्रभु मुझे शरण में लेंगे या नहीं ? और तब उन्हें सुग्रीव की याद आयी कि मुझसे पहले जब सुग्रीव को शरण में लिया है तो मुझे भी लेंगे । सुग्रीव और मेरी स्थिति एक ही प्रकार की है । सुग्रीव अपने बड़े भाई के द्वारा संत्रस्त थे, मैं भी बड़े भाई से सताया गया हूँ । और फिर बुद्धि ने तुरन्त तुलना करते हुए कहा कि प्रभु ने सुग्रीव को शरण में लिया तो बालि का वध किया, इसी प्रकार मुझे शरण में लेंगे तो रावण का वध करेंगे । और जब इतनी दूर तक तुलना हो गयी तो धीरे से अत्यंत सुक्ष्म वासना बोल पड़ी कि जब राम ने बालि को मारा तो सुग्रीव को राज्य मिला, और जब रावण को मारेंगे तो तुम्हें ही तो राज्य मिलेगा । यद्यपि यह मुख्य धारणा उनकी नहीं थी, वे कोई लंका के राज्य के लोभ में श्रीराम की शरण में नहीं आये थे । पर चलते-चलते यह बात भी मन में आ गयी ।
.....आगे कल ......
.....आगे कल ......
Friday, 17 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
भगवान बालि के ऊपर जब बाण का प्रहार करते हैं तब बालि उलाहना देता हुआ कहता है कि मैं बैरी हो गया और सुग्रीव आपको प्यारा हो गया । इसीलिए आपने मेरे ऊपर प्रहार किया । किन्तु क्या सचमुच भगवान बालि को मारना चाहते थे ? बालि का वाक्य सुनकर प्रभु ने कहा - बालि ! तुम्हारे ऊपर तो मुझे बाध्य होकर बाण चलाना पड़ा । वस्तुतः मेरे बाण चलाने का अभिप्राय यही है कि जैसे फोड़ा हो जाने पर चिकित्सक को अस्त्र का भी प्रयोग करना पड़ता है, उसी प्रकार अभिमान भी एक फोड़ा है, और यदि अभिमान का फोड़ा व्यक्ति को हो जाय, तो रामायण में एक नन्हें बालक का दृष्टांत देकर उसका उपचार बताते हुए गोस्वामीजी कहते हैं - जैसे बालक के शरीर में फोड़ा होने पर माँ कठोर बनकर उस फोड़े को चिरवाने का प्रयत्न करती है ठीक उसी तरह भगवान ने भी बालि के मन में जो अभिमान का फोड़ा हो गया था, उसको काट दिया । और जैसे ही फोड़ा ठीक हुआ, त्योंही भगवान बालि से कहने लगे - तुम जीवित रहो । लेकिन बालि ने कहा - महाराज ! अब तो मैं जीवित नहीं रहना चाहता । क्योंकि मेरे जीवन की सार्थकता तो हो गयी । तो भगवान ने तुरन्त कहा - अच्छा भई ! तुम अगर यहाँ नहीं रहना चाहते हो तो जाओ तुम मेरे धाम पर अधिकार कर लो । तुम्हारा धाम मैंने सुग्रीव को दे दिया है इसीलिए मेरा धाम तुम ले लो ।
Thursday, 16 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
रामचरितमानस में बालि और सुग्रीव प्रसंग को पढ़कर बड़ा अटपटा सा लगता है । क्योंकि बालि और सुग्रीव दो भाई आये भगवान के सामने । इनमें से एक पर भगवान ने बाण चलाया तथा दूसरे को बचाया । पर अगर विचार करके देखें तो हमें यह स्पष्ट प्रतीत होगा कि भगवान तो बालि का भी कल्याण चाहते हैं । परन्तु वह तो सुग्रीव से भिन्न स्थान में रहने वाला है । सुग्रीव बेचारे तो शरीर में ही स्थित हैं । पर यह बालि तो अभिमान के नगर में स्थित है । और भगवान का सामंजस्य है कि वे सुग्रीव को पहले मिठाई देते हैं, बाद में दवाई । और बालि को प्रभु ने पहले दवाई दी, तथा बाद में मिठाई । सचमुच प्रभु के व्यवहार में यह बड़ी अनोखी पद्धति है । बालि पर पहले बाण चला दिया । किन्तु यह बाण- बाण नहीं, अपितु प्रभु की कड़वी दवा है । इसलिए प्रभु ने लक्ष्मणजी से कहा कि मैं सुग्रीव पर भी वही बाण चलाऊँगा जो बालि पर चलाया था । लक्ष्मणजी ने कहा - प्रभु ! न तो आपके पास बाणों की कमी है और न ही मेरे पास, तो कोई और बाण चलाइये न ! किन्तु भगवान ने कहा कि नहीं लक्ष्मण ! जो दवा एक बार परखी हुई हो उसका प्रयोग करने में निश्चिन्तता रहती है । मैंने यह दवा बालि पर चलाकर देख ली है कि इसके लगते ही बालि का अभिमान दूर हो गया था, बालि बिल्कुल बदल गया था । इससे लगता है कि यह दवा तो बहुत बढ़िया है ।
Wednesday, 15 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
भगवान श्रीराम सुग्रीव को सकाम रूप में देखते हैं, और सकाम सुग्रीव के सामने प्रभु सकामता को महत्व देते हैं । कभी-कभी भगवान श्रीराघवेन्द्र से अगर कोई भक्त पूछ देता है कि महाराज ! आप सुग्रीव जैसे व्यक्तियों को इतना सम्मान क्यों देते हैं ? तो भगवान कहते हैं कि भाई ! मैं तो अपने नियम का ही पालन करता हूँ । महाराज ! आपका नियम क्या है ? तो प्रभु ने कहा - भई ! मेरा नियम है कि जो मेरा जिस भाव से भजन करते हैं मैं भी उनका उसी भाव से भजन करता हूँ । लेकिन महाराज ! आप सम्मान क्यों देते हैं ? तो भगवान ने कहा कि मेरा सारा सम्मान तो उन्ही की कृपा पर निर्भर है । क्योंकि जो निष्काम भक्त हैं उनसे उनकी स्वयं की महिमा तो बहुत बढ़ती है पर मेरी महिमा नहीं बढ़ती । मेरी महिमा को तो ये सकाम भक्त ही अधिक बढ़ाते हैं । भगवान ने कहा कि निष्काम भक्त के विषय में लोग प्रशंसा करते हुए यही कहते हैं कि ये कितना निष्काम है जो कि भगवान से भी कुछ नहीं चाहता । पर सकाम भक्त को देखकर लोग कहेंगे कि भगवान कितने उदार हैं कि जो सकाम को भी चाहते हैं । तो भई ! मेरी कीर्ति तो इन्हीं की कृपा पर बनी हुई है इसीलिए मैं इनको अधिक चाहता हूँ । पर इसका मुख्य तात्पर्य यह है कि जैसे प्रत्येक बालक की चाहना के अनुकूल ही माँ उससे व्यवहार करती है उसी तरह भगवान भी सुग्रीव को मिठाई देते हैं । पर केवल मिठाई ही देते हों ऐसी बात नहीं, आवश्यकता पड़ने पर दवाई भी देते हैं ।
Tuesday, 14 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
रामायण में यह कहा गया है कि तीन प्रकार के व्यक्ति होते हैं - सिध्द, साधक और विषयी । निषादराज सिध्द श्रेणी में । वे भावना और भक्ति की दृष्टि से इतने ऊपर उठे हुए हैं कि शरीर में रंचमात्र भी उनकी आसक्ति नहीं रह गयी है । इस बात का पता तब चलता है जब भरतजी सेना सहित आ रहे हैं । कहाँ अयोध्या की सेना और कहाँ निषादराज का छोटा सा गाँव ? पर जब निषादराज अपने गाँव वालों को एकत्र करके कहते हैं कि - *सनमुख लोह भरत सन लाऊँ । जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ ।।* - मानो शरीर से वे सर्वथा ऊपर उठे हुए हैं । अपने शरीर को वे भगवान राम की सेवा में समर्पित कर देते हैं । अगर कोई पूछ दे कि क्या श्री भरत से लड़कर आप जीत सकते हैं ? तो निषादराज ने कहा कि पशु अगर मारा जाय तो भी उसके चमड़े से जूता बनता है । और जूता जिसके चरण में आता है उसको काँटों से बचाता है । उसी प्रकार से अगर हम मरकर भी प्रभु को काँटों से बचा सकें तो हमारी मृत्यु की सार्थकता है । यह वृत्ति देह से ऊपर उठकर विदेह की वृत्ति है । उनमें इतनी निष्कामता है कि भगवान से पाने की कोई आकांक्षा नहीं है । और भगवान श्री राघवेन्द्र भी उन्हें मित्र के रूप में सम्मान देते हैं, तथा मित्रता के प्रति यह सम्मान राज्याभिषेक के पश्चात भी ज्यों का त्यों बना हुआ है ।
Monday, 13 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
गोस्वामीजी ने एक ऐसी बात कही जो सुनने में उल्टी लगती है, पर आप उसका उल्टा अर्थ बिल्कुल मत लीजियेगा, वरन उसके सही तात्पर्य को लेने की आप चेष्टा कीजियेगा । गोस्वामीजी ने विनय पत्रिका के एक पद में कह दिया कि - भगवान कभी-कभी पुण्यत्माओं की अपेक्षा पापियों से अधिक प्रीति करते हैं । और भई ! मैं तो यही कहूँगा कि आप लोग पापी बनने की चेष्टा न कीजियेगा । क्योंकि पापी बनाने के लिए इस पद में प्रोत्साहन दिया जा रहा हो ऐसी कोई बात नहीं है । पर गोस्वामीजी जिस उद्देश्य से यह बात कहते हैं उसे आप समझें । एक बालक स्वस्थ है तथा एक रोगी । माँ रोगी बालक को चिपटाये हुए सो रही है, स्वस्थ बालक को उसने अपने से थोड़ा दूर कर दिया है । इससे स्पष्ट यही है कि उसके मन में उस समय रोगी के प्रति अधिक ममता है । पर इसका अर्थ यह नहीं है कि माँ यह चाहती है कि बच्चे रोगी बनें । बल्कि वह तो यही चाहती है कि बालक स्वस्थ हो, पर माँ की विशेषता यह है कि जब वह बालक को अस्वस्थ देखती है तो उसे लगता है कि यह अधिक ममता और वात्सल्य का अधिकारी है, क्योंकि इसके रोग को दूर करने के लिए अधिक प्रेम की आवश्यकता है । इसी प्रकार भगवान दीन पर अधिक प्रेम करते हैं, यह बात जो कही जाती है उसका भी तात्पर्य यही है ।
Sunday, 12 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
निषादराज के चरित्र में केन्द्र भावना है । और सुग्रीव का जो चरित्र है, उसमें केन्द्र शरीर है । और भगवान राम दोनों से बिल्कुल उसी प्रकार का व्यवहार करते हैं । क्या यह बहुत विलक्षण सी बात नहीं है ? अगर इसको आप समझना चाहें तो अपने दैनिक व्यवहार के माध्यम से समझ सकते हैं । आप अपने परिवार में छोटे लड़के और बड़े लड़के से एक ही प्रकार की आशा रखते हैं क्या ? अगर बड़ा लड़का आपको कुछ द्रव्य लाकर दे दे, और छोटा लड़का आपसे कुछ पैसे माँग ले, तो क्या आप अपने छोटे लड़के को यह कहकर फटकारेंगे कि तू तो बड़ा सकाम है, जो सर्वदा माँगता रहता है ? वस्तुतः यह बात आपके मन में कभी नहीं आयेगी । अपितु वास्तविकता तो यह है कि जिसने भेंट लाकर दी है, उसको भी आप स्वीकार करेंगे, उसे प्रोत्साहित करने के लिए उसके पुरुषार्थ की प्रशंसा तो करेंगे ही, पर साथ-साथ जो माँग रहा है उसके वात्सल्य तथा अपनत्व के लिए उसकी भी प्रशंसा करेंगे ।
Saturday, 11 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
रामायण में निषादराज और भगवान राम की मित्रता का पूरा प्रसंग ही वर्णित है, पर बड़ी विचित्र बात है कि मैंने आज तक लोगों को इस प्रसंग से पंक्ति उद्धृत करते नहीं देखा । इसका अभिप्राय है कि जो हजारों पंक्तियाँ हैं, वे तो लोगों को महत्वपूर्ण प्रतीत नहीं होती हैं, लेकिन किसी संदर्भ विशेष में अगर एक भिन्न प्रकार की पंक्ति कह दी गयी तो यह आग्रह किया जा रहा है कि गोस्वामीजी का सिध्दांत यही है । निषादराज जाति की दृष्टि से चाहे जो हों पर भगवान राम की विशेषता यह है कि वे जिससे मिलते हैं उसी से कह देते हैं कि हम तो बिल्कुल तुम्हारी तरह ही हैं । मित्रता तो बहुधा बराबरी में होती है । अगर इस दृष्टि से मित्रता करें तो भगवान राम की क्षत्रियों से मित्रता होनी चाहिए, राजकुमारों से मित्रता होनी चाहिए । लेकिन भगवान राम निषादराज को ह्रदय से लगाकर कहते हैं - मित्र ! आपसे बढ़कर मित्र कौन होगा, जो मित्र के संकट के समय सहायता करने के लिए इतना व्यग्र हो जाय । और कहा - भई ! तुम तो मेरे बड़े सुजान सखा हो । निषादराज संकोच में पड़ गये - महाराज ! कहाँ मैं मल्लाह और कहाँ आप । भला मेरी आपकी क्या मित्रता ? भगवान ने कहा - नहीं मित्र ! हमारा और तुम्हारा कार्य एक ही है । तुम्हारा भी कार्य पार उतारना है और मेरा भी कार्य पार उतारना है । हम दोनों एक ही जाति के हैं इसीलिए हमारी ओर तुम्हारी मित्रता में रंचमात्र भी सन्देह नहीं होना चाहिए । इस प्रकार भगवान राम उनकी निष्कामता का सम्मान करते हैं । उनको मित्र कहकर पुकारते हैं । क्योंकि निषादराज शरीर से चाहे जिस जाति के हों, पर अन्तःकरण की दृष्टि से वे शरीर से सर्वथा ऊपर उठे हुए हैं । वे भावना के राज्य में रहने वाले हैं, उनका चरित्र भावप्रधान है ।
Friday, 10 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
सुग्रीव का राज्य छिना हुआ है, पत्नी से अलग हैं, तथा डरे हुए हैं । और जब भगवान श्रीराघवेन्द्र निषादराज से मिले तब प्रभु अयोध्या के राज्य का परित्याग करके आये हुए हैं । और दोनों में अन्तर कितना है ? सुग्रीव के मन में आकांक्षा है कि मेरा राज्य और मेरी पत्नी मुझे मिले, और निषादराज के मन में इतनी निष्कामता है कि वे कन्द, मूल और फल का भेंट लेकर प्रभु के पास जाते हैं तथा भगवान से कुछ माँगते नहीं हैं । बल्कि भगवान श्रीराघवेन्द्र से अनुरोध करते हैं कि मेरे ऊपर कृपा कीजिए । अब कृपा के दो रूप हो गये । एक के प्रति कृपा का रूप यह है कि प्रभु ने उसकी सम्पत्ति, राज्य तथा पत्नी को मिला दिया और दूसरा कहता है - महाराज ! कृपा करके आप मेरे गाँव चलिये । इस वाक्य के पीछे निषादराज की भावना यह थी कि हमारे प्रभु अयोध्या का राज्य छोड़कर आये हुए हैं इसलिए प्रभु की सेवा ही करनी चाहिए । इस प्रकार सुग्रीव तथा निषादराज में बहुत अन्तर है । पर प्रभु दोनों को समान पद देते हैं तथा दोनों को एक ही शब्द *सखा* कहकर सम्बोधित करते हैं । निषादराज से प्रभु ने यही कहा - वाह मित्र ! तुमने तो बहुत बढ़िया बात कही, पर मुझे पिताजी ने दूसरी आज्ञा दी है इसलिए ऐसा आग्रह मत कीजिए क्योंकि मैं गाँव में चलने में असमर्थ हूँ । अब आप विचार करके देखिए निषादराज भला जाति की दृष्टि से कहाँ है ? मैं तो आश्चर्य करता हूँ कि लोग आजकल रामायण की सिर्फ एक पंक्ति को इतना महत्व देने लग जाते हैं और एक-एक पात्र के संदर्भ में इतने विस्तृत प्रसंग हैं उन पर दृष्टि कैसे नहीं जाती ?
Thursday, 9 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
भगवान राम के यद्यपि बहुत से मित्र रहे होंगे, पर रामायण में उनके तीन मित्र प्रसिद्ध हैं, उन पर जरा दृष्टि डालिये । भगवान श्रीराघवेन्द्र के एक मित्र हैं - निषादराज, दूसरे मित्र हैं सुग्रीव जी और प्रभु के तीसरे मित्र हैं - विभीषण जी । और इस मित्रता में विलक्षणता यह है कि ये तीनों ही व्यक्ति सर्वथा भिन्न-भिन्न चरित्र और भिन्न-भिन्न स्वभाव वाले हैं । पर भगवान तीनों को मित्रों का सम्मान देते हैं । अगर भगवान चुनाव करते हुए इनमें से एक को बड़ा पद देते और दूसरे को छोटा तब तो ऐसा लगता कि भगवान ने योग्यता तथा चरित्र देखकर उन्हें अलग-अलग पद दिया । पर ऐसा नहीं हुआ । अपितु भगवान श्रीराघवेन्द्र ने तो तीनों को ही मित्र कहकर पुकारा । यद्यपि तीनों की मनःस्थिति की दृष्टि से बहुत भिन्नता है ।
Wednesday, 8 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
भगवान किसी को सम्पत्ति देते हैं, किसी को सुख और समृद्धि देते हैं, यह भगवान की कृपा है कि नहीं ? कुछ लोग ऐसे हैं जो कहेंगे कि नहीं । और कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो कहेंगे कि भई ! भगवान की कृपा तो बस यही है । पर वस्तुतः यह बात यथार्थ नहीं है । यदि हम विचार करके देखें तो हमें यह दिखायी देगा कि भगवान की कृपा तो हमारे जीवन में भिन्न-भिन्न रूपों में उसी प्रकार से होती है जैसे एक नन्हें बालक को माँ जब प्रेम से मिठाई खिलाती है तो क्या आप समझते हैं कि केवल मिठाई खिलाने में ही माँ का प्यार है ? यद्यपि माँ जब मिठाई खिलाती है, बच्चे को खिलौने देती है, बालक को वस्त्रों से सजाती है, तो उसमें भी बालक के प्रति माँ का अत्यंत अनुराग है और इसके द्वारा बालक को माँ के स्नेह का भान होता है, बालक के मन में बड़ी प्रसन्नता होती है कि माँ मुझसे इतना स्नेह करती है कि इतनी बढ़िया मिठाई खिलायी, इतना सुन्दर खिलौना लाकर मुझे दिया है । इसमें कोई सन्देह नहीं कि माँ जब ये वस्तुएँ देती हैं तब भी माँ का स्नेह और वात्सल्य बालक के प्रति है । लेकिन माँ का वात्सल्य केवल इतना ही नहीं है । माँ के वात्सल्य का एक दूसरा पक्ष यह भी है कि अगर एक बालक अस्वस्थ हो जाय, और वैद्य या डाक्टर बालक को ऐसी दवा दें जो खाने में अत्यंत कड़वी हो, उस समय भी माँ के मन में बालक के प्रति उतना ही प्रेम होता है । इसका अभिप्राय है कि केवल यह मानना ही उपयुक्त नहीं है कि दवा देना ही माँ का प्रेम है, और न ही यह मानना ही उपयुक्त है कि मिष्ठान्न देना ही माँ का प्यार है, वरन माँ चाहे मिठाई दे या दवाई दे, दोनों के मूल में बालक के प्रति हित की भावना, बालक के प्रति स्नेह ही विद्यमान है । और हम सब भगवान के बालक ही तो हैं ।
Tuesday, 7 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
मार्ग की भिन्नता के मूल में मान्यता यह है कि वैसे तो अनगिनत प्रकार के व्यक्ति संसार में विद्यमान हैं लेकिन हमारे शास्त्रों ने उन्हें तीन भागों में बांटा है । शास्त्रों में जिस प्रकार का विभाजन किया गया उसका तात्पर्य है कि जितने व्यक्ति हैं, उतने ही *शरीर, मन और बुद्धि* भी होगी । क्योंकि व्यक्ति शरीर, मन और बुद्धि के द्वारा विस्तृत रूप में हमारे समक्ष दिखायी देता है । और भिन्नता यह है कि कुछ लोग शरीर प्रधान हैं जो शरीर नगर में निवास करते हैं । कुछ लोग ऐसे हैं जो बुद्धि प्रधान हैं, जो बुद्धिलोक में निवास करते हैं । शास्त्रों ने बड़ा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण इस रूप में प्रस्तुत किया । क्योंकि जो व्यक्ति शरीर में स्थित है, शरीर के प्रति ही जिसमें ममत्व बुद्धि अधिक है, मन और बुद्धि जिसके जीवन में गौण हैं, उसके जीवन में साधना का जो श्रीगणेश होगा, वह भी स्वाभाविक रूप से शरीर और कर्म के माध्यम से ही होगा । जो मनः प्रधान है, भावना प्रधान है उनके जीवन में भक्ति की मुख्यता होती है । और जो बुद्धि प्रधान व्यक्ति हैं, जिनमें शरीर और मन गौण होते हैं, जो प्रत्येक वस्तु को तर्क और बुद्धि के द्वारा ह्रदयंगम करने की चेष्टा करते हैं, ऐसे लोगों के लिए ज्ञान मार्ग श्रेयस्कर है । इस प्रकार वेदों तथा हमारी समस्त संस्कृति की जो परंपरा है उसमें मनुष्यों के तीन प्रकार के विभाजन करके इन तीन मार्गों का संकेत किया गया है ।
Monday, 6 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
किष्किन्धाकाण्ड में जब हनुमान जी भगवान राम को पहचान कर उनके चरणों को कसकर पकड़ लेते हैं, और हनुमान जी को उठाकर प्रभु ह्रदय से लगा लेते हैं और उपदेश देते हुए कहते हैं कि हनुमान ! मेरा अनन्य भक्त वही है जो समस्त ब्रह्मांड के कण-कण में मुझे देखे और अपने को दास मानकर सबकी सेवा करे । पर यह पाठ हनुमान जी को ही दिया जाने वाला पाठ है । यह पाठ सुग्रीव को नहीं दे सकते । हनुमान जी के समान जो निष्काम है, उनसे कहते हैं कि तुम सारे संसार की सेवा करो और जो सुग्रीव की तरह सकाम है उनसे कहते हैं कि मैं तुम्हें राज्य दे रहा हूँ, सम्पत्ति दे रहा हूँ, पत्नी दे रहा हूँ, जाकर राज्य का संचालन करो । पर उसमें भी एक समन्वय का सूत्र देते हुए कह दिया कि यह मत भूल जाना कि मेरी प्रिया को भी तुम्हें मिलाना है । वैसे सुग्रीव बेचारे क्या मिलायेंगे ? पर भगवान कहते हैं कि सकाम बनते हो तो संसार का सारा व्यवहार करते हुए भी भक्ति देवी का पता लगाना है, यह संकल्प लेकर व्यवहार चलाओ । और बाल-ब्रह्मचारी हनुमान जी से कहते हैं - तुम ब्रह्मचारी हो, और मैं ब्रह्म, कितना बढ़िया नाता है हमारा-तुम्हारा । और सुग्रीव से कहते हैं - हमारा-तुम्हारा तो बहुत बढ़िया नाता है, क्योंकि हम भी गृहस्थ हैं और तुम भी गृहस्थ हो । भगवान तो वस्तुतः सबके लिए हैं । कहीं वे तपस्वी के रूप में दिखायी दे रहे हैं, कहीं गृहस्थ के रूप में, तो कहीं ब्रह्म के रूप में । और प्रभु प्रत्येक व्यक्ति से कहते हैं कि आप अपने जीवन में एक मार्ग निश्चित करके उसी के द्वारा मुझे पाने और प्रसन्न करने की चेष्टा करें, तो इतने मात्र से ही मुझे पा लेंगे ।
Sunday, 5 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
सुग्रीव जी के कहने पर हनुमान जी जब ब्राह्मण बनकर भगवान राम के पास गये तो जाते ही उन्होंने प्रभु को प्रणाम किया । और जब भगवान श्रीराघवेन्द्र का राज्याभिषेक हो गया तो प्रभु ने एक दिन एकान्त में हनुमान जी से पूछा - हनुमान ! नाटक में तो जो बने उसका पूरी तरह से निर्वाह करना चाहिए । किन्तु तुम जब पहली बार ब्राह्मण बनकर आये और मैं क्षत्रिय के रूप में था तो तुम्हें यह चाहिए था कि तुम यह आशा करते कि क्षत्रिय मुझे प्रणाम करे परन्तु तुमने मुझे प्रणाम क्यों कर दिया ? वस्तुतः प्रभु तो हनुमान जी के भाव की उज्जवलता को प्रकट करने के लिए ही ऐसा प्रश्न कर रहे थे । वैसे तो प्रभु सब जानते ही हैं । प्रभु का प्रश्न सुनकर हनुमान जी ने भगवान के चरणों को कसकर पकड़ लिया और कहा - प्रभु ! यह बताइए कि ब्राह्मण की क्या यही परिभाषा है कि जो किसी को प्रणाम न करे, वह ब्राह्मण है ? जो कभी सिर न झुकावे वह ब्राह्मण है । नहीं-नहीं महाराज ? शास्त्र ब्राह्मण की यह परिभाषा नहीं करता है । अपितु शास्त्र ने तो ब्राह्मणत्व की परिभाषा करते हुए यह कहा कि जो ब्रह्म को जान ले वही ब्राह्मण है । तो महाराज ! जब मैंने आपको प्रणाम किया तो ब्रह्म समझकर प्रणाम किया था, क्षत्रिय समझकर नहीं । तो वस्तुतः सच्चा ब्राह्मण तो वही है जो ब्रह्म को पहचान ले न कि अकड़कर खड़ा हो जाये कि मैं तो ब्राह्मण हूँ । हनुमान जी ने कहा प्रभु ! उस दिन ब्राह्मणत्व का जितना सदुपयोग हुआ उतना कभी नहीं हुआ ।
Saturday, 4 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
वर्णन आता है कि जब चार महिने तक सुग्रीव भगवान से मिलने नहीं आये तब प्रभु ने कहा - लक्ष्मण ! मैंने निश्चय किया है कि सुग्रीव का वध भी मैं कल उसी बाण से कर दूँगा जिससे मैंने बालि का वध किया था । लक्ष्मणजी ने कहा - महाराज ! मुझे आज्ञा दीजिये, मैं अभी जाकर यह कार्य पूरा कर देता हूँ । प्रभु ने कहा - लक्ष्मण ! उसे मारने की आवश्यकता नहीं है । क्योंकि वह तो बड़े डरपोक स्वभाव का था, मैंने डर छुड़ा दिया तो मुझे भी भूल गया । इसलिए तुम जाकर फिर थोड़ा सा डर पैदा कर दो तो फिर से मेरे पास आ जायेगा - बस यही है डर का सदुपयोग । भगवान राम ने कितनी मनोवैज्ञानिक बात कही ? लक्ष्मणजी ने कहा - मैं अभी जाकर डराता हूँ । तो तुरंत हाथ पकड़ लिया भगवान ने । प्रभु का तात्पर्य था कि सावधानी से डराना । क्योंकि वह जितना डरने वाला, उतना ही भागने वाला भी है, तो कहीं ऐसा न डराना कि मुझसे दूर भाग जाय । इसलिए ऐसा डराना कि भाग कर इधर ही आये कहीं उधर न भाग जाये । इसका अभिप्राय है कि अगर कोई पलायन करके भगवान की ओर भागे तो वह पलायन (भागने) का सदुपयोग है ।
Friday, 3 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
जब सुग्रीव ने भगवान राम और लक्ष्मण जी को आते देखा तो उन्होंने हनुमान जी से कहा कि आप जरा ब्राह्मण का रूप बनाकर जाइये और देखकर मुझे वहीं से संकेत कर दीजियेगा कि यह कौन है ? हनुमान जी ने पूछा कि अगर बालि के भेजे हुए हैं तो आप क्या करेंगे ? सुग्रीव ने कहा - बस अपने पास तो एक ही कला है । क्या ? बोले - मैं यहाँ से भाग जाऊँगा । इस प्रसंग में बड़ी अनोखी सी बात यह है कि हनुमान जी कभी न भागने वाले, और सुग्रीव जी बड़े भगोड़े हैं तो अब दोनों में किसका मार्ग ठीक है ? इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि भागने का भी सदुपयोग होना चाहिए और न भागने का भी । इसलिए सुग्रीव यद्यपि बड़े डरपोक हैं और हनुमान जी में डर का लेश भी नहीं है । पर भगवान राम की महानता यह है कि उन्होंने निडर और डरपोक दोनों को ही स्वीकार किया । निर्भीक हनुमान जी तो उनके महान सेवक हैं ही, पर भगवान ने सुग्रीव के भय का भी सदुपयोग कर लिया ।
Thursday, 2 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
जब सुग्रीव ने भगवान राम को आते देखा तो सुग्रीव तो बेचारे बड़े ही भयभीत स्वभाव के थे । वे हनुमान जी से कहने लगे कि उन दोनों राजकुमारों को देखो । मुझे तो लग रहा है कि बालि ने इन दोनों को मुझे मारने के लिए भेजा है । परन्तु आप वेष बदलकर यह पता लगाइए कि ये कौन है ? सुग्रीव का तात्पर्य था कि हनुमान जी आपकी तो यह विशेषता है कि आप मनचाहा वेष बदल सकते हैं । यद्यपि हनुमान जी को छोड़कर अन्य बन्दरों में यह चमत्कार नहीं है, पर हनुमान जी के ज्ञान की विशेषता है कि जिस समय व्यवहार में जिस रूप की आवश्यकता होती है, हनुमान जी वही रूप बना लेते हैं । पर किसी रूप विशेष को हनुमान जी पकड़े नहीं रहते । इस दृष्टि से भी विचार करके देखेंगे तो आपको लगेगा कि हनुमान जी कहीं छोटे बन जाते हैं, कहीं अत्यंत बड़े बन जाते हैं, कहीं बहुत भारी बन जाते हैं और कहीं हल्के बन जाते हैं । इसका अभिप्राय है कि जिसके जीवन में किसी वस्तु का अभिमान आ जाता है, वह सदा वही बना रहना चाहता है । पर जिसके जीवन में किसी वस्तु की पकड़ नहीं है, वह जिस समय जिस वस्तु की आवश्यकता देखता है, वही बन जाता है । पर बन जाने के बाद भी वह उससे बंधता नहीं है ।
Wednesday, 1 March 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
हनुमान जी से प्रभु ने लेन-देन की बात नहीं की । क्योंकि जानते हैं कि हनुमान जी देना ही देना जानते हैं । लेने का तो प्रश्न ही नहीं है इनके जीवन में । इसलिए इनसे लेन-देन की बात क्यों करें ? और सचमुच एक महान व्यक्तित्व है हनुमान जी का । हनुमान जी के लिए शब्द आता है कि वे ज्ञानियों में अग्रगण्य हैं । तो ज्ञानी का लक्षण क्या है ? इस संबंध में रामायण में एक बड़ा सुन्दर सूत्र देते हुए कहा गया है कि - ग्यान मान जहँ एकहु नाहीं । प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको कुछ न कुछ मान बैठा है कि मैं यह हूँ, मैं यह हूँ । और जो व्यक्ति इस प्रकार की मान्यताओं से घिरा हुआ है वह अभिमानी है तथा जो इन मान्यताओं से ऊपर उठ गया वह अभिमान से मुक्त हो गया । क्योंकि जो व्यक्ति कोई मान्यता मान लेगा वह इस प्रकार का अभिमान पाले बिना नहीं रहेगा । हम लोगों के जीवन में बहुधा यही होता है कि जो मान्यताएँ हम मानते हैं उसका लाभ कम लेते हैं और उसकी हानि अधिक उठाते हैं । आप चाहे जो मानिये अपने आपको । चाहे देश के अभिनिवेश से मानिये, चाहे मनुष्यत्व के अभिनिवेश से मानिये, चाहे वर्ण के अभिनिवेश से मानिये, पर होना यह चाहिए कि हम उसका सदुपयोग करें, दुरूपयोग न करें । वर्ण धर्म का जो सर्वश्रेष्ठ उपयोग है व्यक्ति उसे अपने जीवन में स्वीकार करे तथा उसका जो अभिमानमूलक पक्ष है उसका त्याग करे । जैसे ब्राह्मणत्व के द्वारा अगर हमारे जीवन में विवेक का उदय हो, तब तो वह ब्राह्मणत्व का सदुपयोग हुआ । पर अगर ब्राह्मणत्व के द्वारा व्यक्ति के जीवन में अभिमान की इतनी वृद्धि हो जाय कि वह सबको तुच्छ तथा अपने आपको बड़ा मानने लगे तो इसका अभिप्राय हुआ कि उसकी जो मान्यता थी वह उसके लिए कल्याणकारी नहीं रही ।
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