रामायण में पार्वतीजी ने भगवान शंकर से कहा कि आप ईश्वर के स्वभाव का अधिक वर्णन न किया करें । क्यों ? बोलीं कि महाराज ! ईश्वर का स्वभाव सुनकर तो लोगों को मनमानी करने की ईच्छा होगी । लोग अगर सुन लेंगे कि ईश्वर तो बड़ा उदार है, क्षमाशील है, वे जीव के अपराध कभी देखते ही नहीं, तो वे यही समझेंगे कि फिर तो हमें सब कुछ करने की छूट है । इस पर भगवान शंकर ने कहा कि पार्वती ! भगवान के स्वभाव का वर्णन व्यक्ति को पाप करने की प्रेरणा देने के लिए नहीं है । तो फिर किसलिए है ? शंकरजी ने सूत्र देते हुए कहा कि भगवान के स्वभाव का वर्णन करने पर भी भला कितने लोग उनके स्वभाव को जान पाते हैं ? बिरले ही कोई जान पाते हैं और जो जान लेते हैं, उसकी कसौटी क्या है ? भगवान के स्वभाव को जान लेने पर तो जीव ऐसा कृतज्ञ हो जाता है कि उसे भगवान का भजन छोड़कर कुछ अच्छा ही नहीं लगता ।
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