कुछ रोग ऐसे हैं जो मुख्य रूप से बुद्धि से जुड़े हुए हैं। सिद्धियाँ आकर बुद्धि को लोभ दिखाती हैं। बुद्धि लोभ का अधिष्ठान है। साधक जब साधना पथ पर अग्रसर होता है, तो सिद्धियाँ आकर लोभ दिखाती हैं। अब साधक के सामने समस्या है कि वह चमत्कारों को स्वीकार करे या न करें। अधिकांश साधक तो स्वीकार कर लेते हैं और उनकी साधना में प्रगति रुक जाती है और उस प्रलोभन से बुद्धि जब रोगग्रस्त हो जाती है, तब हम अपने को क्या कहकर भुलावा देते हैं ? यह कि हम सिद्धियों का दुरुपयोग थोड़े ही करेंगे, अच्छे कामों में लगायेंगे और इसका परिणाम क्या होता है ? लोककल्याण और आत्मप्रदर्शन ऐसा कुछ घुल-मिल जाता है कि साधक की बुद्धि बड़ी सरलता से उसके प्रलोभन में आ जाती है, पर अगर बुद्धि सयानी हुई तो साधक उनकी ओर आँखें उठाकर भी नहीं देखता। जानता है कि इसमें मेरा हित नहीं है। साधक की सफलता इसी में है कि कितनी भी बढ़िया बात क्यों न हो, कितनी भी बुद्धिसंगत बात क्यों न हो, उन सिद्धियों को, उन चमत्कारों को साधक अस्वीकार कर दे। यही संकेत उत्तरकाण्ड में ज्ञानदीपक प्रसंग में किया गया है।
Monday, 30 November 2015
Sunday, 29 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
गीता में काम के संबंध में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - इन्द्रिय, मन और बुद्धि - ये सब काम के निवास स्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ही ज्ञान को ढ़ँककर जीवात्मा को मोहित करता है। अभिप्राय यह है कि यदि मन और बुद्धि दोनों ही विकारग्रस्त हो जायँ, मन में काम आ जाय और बुद्धि उसका समर्थन करने लग जाय, तब उसको दूर करने का क्या उपाय है ? काम मुख्य रूप से मन से जुड़ा है और बुद्धि अगर उसे दोष या बुराई या रोग के रूप देख रही है, तो उसे दूर करने की चेष्टा करती है।
Saturday, 28 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
बुराइयाँ और दुर्बलताएँ तो हमारे मन में भी हैं, किन्तु क्या हम अपनी बुराइयों को बुराई के रूप में देख पा रहे हैं ? बुराई में अगर हमें बुराई दिख रही है तो उससे बचने की पूरी संभावना है, पर जब हमें बुराई में भी अच्छाई दिखने लगे, तब उन बुराइयों को दूर करने का कोई उपाय नहीं है, तब वह असाध्य हो जाती है।
Friday, 27 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
गोस्वामीजी अपनी काव्यमयी भाषा में लिखते हैं कि जब किसी व्यक्ति को भीषण रोग हो जाता है और साधारण दवा से वह ठीक नहीं होता, तो उसे सोना-हीरा-मोती का भस्म बनाकर दिया जाता है। रावण का रोग भी असाध्य हो चुका है। उसे हीरे-मोती-सोने का भस्म देना होगा। लंका जलवाने के पीछे प्रभु का मानो संकेत था, हनुमानजी के लिए कि रावण के लिए भस्म लेने और कहाँ जाओगे। उसके चार सौ कोस की लंका में बहुत हीरा-मोती और सोना भरा पड़ा है। उसे ही फूँककर भस्म बनाओ और रावण को खिलाओ। शायद इससे वह ठीक हो जाय, किन्तु इतने प्रयत्नों के बाद भी रावण का रोग क्या दूर हुआ ? वही सूत्र कि रोगी अपने को रोगी ही न माने, वैद्य की बात न माने, दवा का सेवन न करे, तो वह स्वस्थ कैसे होगा ? रावण तो अपने को कभी रोगी मानता ही नहीं, उल्टे वैद्य की ही हँसी उड़ाता है। अब ऐसे रोगी को शंकरजी के समान श्रेष्ठतम वैद्य भी कैसे ठीक कर सकते हैं ?
Thursday, 26 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
लंका को जलाने के पीछे प्रभु का उद्देश्य क्या था ? कई लोग साधारणतया यह अर्थ ले लेते हैं कि रावण नगरों को जला देता था, इसलिए प्रभु ने भी उसके नगर को जलवा दिया, पर ऐसा भाव तो भगवान राम के चरित्र में है ही नहीं। बदले की भावना नहीं, यहाँ तो चिकित्सा है। बदले की वृत्ति का, हिंसा-प्रतिहिंसा का चक्र कभी समाप्त नहीं होता, पर जहाँ पर उद्देश्य सामने वाले का कल्याण है, वहाँ तो उसकी कठोरता में भी हित छिपा हुआ है। भगवान राम चाहते थे लंका जलाने के पीछे जो उनका उद्देश्य है, उसे रावण समझ ले। इससे उसका कल्याण होगा। रावण समझ बैठा था कि समस्त देवी-देवता और प्रकृति उसके अधिन हैं। अग्नि, जल, वायु और इन्द्र आदि सब उसके इशारे पर चलते हैं। प्रभु चाहते थे कि उसका भ्रम दूर हो और इस सत्य को समझ ले कि समस्त तत्वों का स्वामी वह नहीं, कोई और है। हनुमानजी ने लंका में आग लगा दी। लंका जलने लगी। जोरों से हवा चलने लगी। आग तेजी से फैल गयी। रावण ने मेघों को आदेश दिया कि वर्षा करके आग बुझाओ। वर्षा होने लगी, पर उससे क्या आग बुझी ? वह तो और भड़क उठी, मानो घी-तेल की वर्षा हो रही थी। लंका जलकर भस्म हो गयी। रावण उसे बचा नहीं पाया। तब क्या रावण को अपनी असमर्थता का बोध हुआ ? यही रावण की सबसे बड़ी समस्या है। श्रेष्ठतम वैद्य हो, श्रेष्ठतम औषध हो, पर रोगी उसे सेवन न करे, तब क्या होगा ?
Wednesday, 25 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
प्रभु तो रावण जैसे लोगों से भी अपना काम करा लेते हैं। रावण को हनुमानजी के पूँछ नष्ट करने का क्या उपाय सूझा - पहले इसकी पूँछ में कपड़ा लपेटो, फिर घी-तेल डालो और आग लगा दो। हनुमानजी ने प्रभु को मन ही मन प्रणाम किया और कहा कि त्रिजटा का स्वप्न ही सत्य है। लंका जलाने की योजना प्रभु की ही है और प्रबंध तो उनका और भी विलक्षण है। लंका जलाने का प्रबंध आप रावण से ही करा रहे हैं। बताइए ! भला मैं कहाँ से घी, तेल एवं कपड़ा लाता। सारी व्यवस्था आप ही कराये दे रहे हैं और जिससे कराना है, उससे आप वह करा लेते हैं। व्यक्ति की व्यर्थ धारणा बनी हुई है कि कार्य करने वाला मैं हूँ। वस्तुतः कार्य कराने वाले तो वे ही हैं। जिससे जो चाहते हैं, करा लेते हैं।
Tuesday, 24 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
हनुमानजी के चरित्र में एक बड़ी विचित्र बात है। उनके चरित्र में पग-पग पर विचार है। हनुमानजी ने जब लंका को जला दिया तो भगवान ने उनसे पूछा कि सारे कार्य तो तुम विचारपूर्वक करते हो, लेकिन लंका जलाने के पूर्व तुमने जरा भी विचार नहीं किया। हनुमानजी ने कहा प्रभो ! जो कुछ मुझे करना था, वह मैंने विचारपूर्वक किया और जो मुझसे करवाया गया। वह करवाने वाला विचार करेगा या मैं करूँगा ? अभिप्राय क्या है ? हनुमानजी ने कहा कि मैं तो बँधकर ही गया था, यह देखने के लिए कि आप मुझसे क्या कराना चाहते हैं ? बँधे हुए से तो आप ही काम ले सकते हैं। रावण ने कहा कि इस बन्दर को मार डालो, पर हनुमानजी ने अपने को बचाने की कोई चेष्टा नहीं की। प्रभो ! आप कह सकते हैं कि तुम तो वाटिका में बड़े दाँव-पेंच दिखा रहे थे। अब यहाँ भी कुछ कला दिखाते। महाराज ! जहाँ खुला हुआ था, वहाँ कला का प्रयोग किया, पर यहाँ तो बँधा हुआ हूँ, अब तो कला का प्रयोग आप ही को करना है। अब मैं अपने को बचानेवाला नहीं हूँ। अब तो आप जानें और आपका काम जाने। प्रभु ने विभिषण को भेज दिया। विभिषण ने कहा कि मत मारिए और रावण मान गया, पर कुछ न कुछ दण्ड तो देना ही होगा, अतः इस बन्दर की पूँछ को नष्ट कर दो। अब पूँछ नष्ट करने में क्या कठिनाई थी ? कह देता कि तलवार से पूँछ काट दो, लेकिन प्रभु तो रावण जैसे लोगों से भी अपना काम करा लेते हैं। रावण को पूँछ नष्ट करने का क्या उपाय सूझा - पहले इसकी पूँछ में कपड़ा लपेटो, फिर घी-तेल डालो और आग लगा दो। हनुमानजी ने कहा, प्रभु ! लंका जलाने की योजना तो आपकी ही थी और प्रबंध तो बड़ा ही विलक्षण था।
Monday, 23 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
लंका में अशोक वाटिका में मेघनाद ने जब हनुमानजी पर ब्रह्मास्त्र चलाया, तब हनुमानजी ने उससे यही कहा कि मैं चाहूँ तो न बँधू, ब्रह्मास्त्र का भी मुझ पर कोई प्रभाव नहीं होगा, लेकिन ब्रह्मास्त्र की जो महिमा है, उसे मैं स्वेच्छा से स्वीकार करता हूँ और इस बंधन को स्वीकार करने के पीछे तो हनुमानजी का एक बड़ा दूरगामी उद्देश्य था। हनुमानजी ने जब रावण की वाटिका के फलों को खाया, तब वे खुले हुए थे, पर रावण की सभा में गये, तो बँधकर गये। क्यों ? हनुमानजी के सामने एक समस्या आ गयी थी। त्रिजटा ने श्रीसीताजी और समस्त राक्षसियों से कहा कि मैंने एक स्वप्न देखा कि एक बंदर आया है, वह लंका को जलायेगा। अब हनुमानजी बड़े सोच में पड़ गये कि भगवान ने तो मुझे लंका जलाने का आदेश दिया नहीं है और त्रिजटा लंका जलाने की बात कह रही है। अब किसकी बात मानें, भगवान की या सन्त की ? दोनों बड़े महत्व के हैं। तब उन्होंने ने यही निर्णय लिया कि अब तक मैंने वही किया जिसका मुझे प्रत्यक्ष आदेश मिला था, इसलिए अब तक मैं खुला था। अब आगे का कार्य तो, जो परोक्ष आदेश से होने वाला है, वहाँ तो कराने वाला ही जाने। इसलिए बँधकर ही चलूँ, करानेवाला चाहे जो करा ले।
Sunday, 22 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.................
.......कल से आगे .......
हनुमानजी बँधे हुए हैं, पर उस बंधन में भी कैसे अद्भुत सत्य की ओर संकेत करते हैं ? बड़ा महत्वपूर्ण सूत्र है। हनुमानजी बँधे हुए हैं और रावण मुक्त है। संकेत क्या है ? जैसे कोई व्यक्ति कारागार में हो तो उसे देखकर लोग कहते हैं कि वह बन्दी है, लेकिन जो घरों में रहते हैं, उन्हें देखकर यह नहीं लगता कि वह बन्दी है। अब अगर कोई गहराई से देखे, तो पता चलेगा कि वास्तविक कैदी तो वे हैं, जो बंदी के रूप में नहीं दिखाई देते। क्यों ? क्योंकि जो लोग जेल में हैं उनका तो एक निश्चित समय है कि इतने समय के बाद वे जेल से मुक्त हो जायेंगे, लेकिन इस घर के जेल में जो लोग बँधे हुए हैं, इससे कब मुक्त होंगे ? इसका तो कोई निश्चित समय नहीं है। यह तो बड़ी विडम्बना है। कैसा विरोधाभास है ? हनुमानजी यही तो बताना चाहते थे कि रावण जो मुक्त प्रतीत हो रहा है, वह वास्तव में कितना बँधा हुआ है और जिसने लोक कल्याण हेतु स्वेच्छा से बंधन स्वीकार किया है, वह तो नित्यमुक्त है चाहे तो क्षणभर में सारे बंधन उतारकर फेंक सकता है।
हनुमानजी बँधे हुए हैं, पर उस बंधन में भी कैसे अद्भुत सत्य की ओर संकेत करते हैं ? बड़ा महत्वपूर्ण सूत्र है। हनुमानजी बँधे हुए हैं और रावण मुक्त है। संकेत क्या है ? जैसे कोई व्यक्ति कारागार में हो तो उसे देखकर लोग कहते हैं कि वह बन्दी है, लेकिन जो घरों में रहते हैं, उन्हें देखकर यह नहीं लगता कि वह बन्दी है। अब अगर कोई गहराई से देखे, तो पता चलेगा कि वास्तविक कैदी तो वे हैं, जो बंदी के रूप में नहीं दिखाई देते। क्यों ? क्योंकि जो लोग जेल में हैं उनका तो एक निश्चित समय है कि इतने समय के बाद वे जेल से मुक्त हो जायेंगे, लेकिन इस घर के जेल में जो लोग बँधे हुए हैं, इससे कब मुक्त होंगे ? इसका तो कोई निश्चित समय नहीं है। यह तो बड़ी विडम्बना है। कैसा विरोधाभास है ? हनुमानजी यही तो बताना चाहते थे कि रावण जो मुक्त प्रतीत हो रहा है, वह वास्तव में कितना बँधा हुआ है और जिसने लोक कल्याण हेतु स्वेच्छा से बंधन स्वीकार किया है, वह तो नित्यमुक्त है चाहे तो क्षणभर में सारे बंधन उतारकर फेंक सकता है।
Saturday, 21 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
गोस्वामीजी बड़ी साहित्यिक भाषा में लिखते हैं कि हनुमानजी ने रावण का रोग पकड़ लिया और कहा कि तुम इस वस्तु को छोड़ दो - रावण तुम्हारी सबसे बड़ी समस्या है मोह। तुम मोहग्रस्त हो। सत्य को जानकर भी तुम अपने जीवन में उसे अस्वीकार करने के अभ्यस्त हो गये हो। यही तुम्हारे अन्तःकरण का मोह है। इस मोह का परिणाम यह हुआ है कि तुम्हारे अन्तःकरण में घोर अभिमान हो गया है। इसलिए इसे दूर करने के लिए अब मैं दवा दे रहा हूँ - भगवान की भक्ति करो। भगवान की भक्ति ही संजीवनी औषध है, लेकिन यहाँ वैद्य और रोगी की क्या स्थिति है ? हनुमानजी ने बड़ा विचित्र व्यंग्य किया। यह समझने योग्य है। रावण हँस रहा है। हनुमानजी बँधे हुए हैं। और रावण सिंहासन पर तनकर बैठा हुआ है। रावण ने कहा कि मैंने यह तो सुना था कि गुरु शिष्य के बंधन को खोलकर उसे मुक्त कर देता है। शिष्य बंधन में होता है और गुरु मुक्त होते हैं और वे शिष्य को भी मुक्ति प्रदान करते हैं, पर इस बन्दर को तो देखो, खुद तो बँधा हुआ है और अपने को गुरु समझ रहा है। अपने को तो छुड़ा नहीं पाया और मुझे छुड़ाने आया है। देखो ! भला कैसी बात है ?
........ आगे कल ......
........ आगे कल ......
Friday, 20 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
आगे चलकर भगवान शंकर रावण के पास हनुमानजी के रूप में गये। शिष्य नहीं आया, तो स्वयं गुरु गये। शिष्य कैसा भी हो, करुणानिधान गुरु उसके हित के लिए अपनी प्रभुता त्याग कर, वानर शरीर धारण कर स्वयं पहुँच गये। भगवान श्रीराम का भी वही उद्देश्य था। वे भी युद्ध को टालना चाहते थे। चाहते थे कि रावण स्वथ्य हो जाय। बन्दरों में से किसी को भी लंका नहीं भेजा। वे सोच रहे थे कि दवा से ही अगर बीमारी ठीक हो जाय तो आगे नहीं बढ़ना चाहिए। चिकित्सा भी दो प्रकार की होती है। अगर दवा से बीमारी ठीक नहीं हुई, तो शल्य चिकित्सा करनी पड़ती है। इसलिए वे हनुमानजी को भेजकर पहले दवा वाली चिकित्सा कराना चाहते हैं। दवा से अगर रावण और लंका स्वथ्य हो जाय, तो अच्छा है। वे कहते हैं कि हनुमान ! तुम वैद्य बनकर जाओ, रावण स्वथ्य हो जाय, राज्य करे, प्रजा का पालन करे, सेवा करे, इससे बढ़कर अधिक प्रसन्नता मुझे और क्या होगी ?
Thursday, 19 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
रावण अपने को बड़ा बुद्धिमान समझता है। उसके मन में यह प्रश्न आया कि कहीं श्रीराम सचमुच ईश्वर तो नहीं हैं ? तब उसे लगता है कि क्या भगवान ने अवतार ले लिया है ? जब उसके मन यह प्रश्न आया, तो इसके समाधान का बड़ा सरल उपाय था। वह अपने गुरु शंकरजी के पास चला जाता और अपने सन्देह को उनके सामने रख देता। शंकरजी बता देते और समाधान हो जाता, पर रावण की समस्या क्या है ? वह अपने को भगवान शंकर से भी अधिक बुद्धिमान मानता है। उसका अपना गणित है - उनको मैंने गुरु बना लिया इसका अर्थ थोड़े ही हुआ कि वे मुझसे अधिक बुद्धिमान हैं। उनके तो पाँच (पंचानन) शिर हैं और मेरे दश। मेरे पास दुगुनी बुद्धि है। मुझे उनके पास जाने की क्या आवश्यकता है ? मैं जितना समझता हूँ, उतना वे क्या समझेंगे और मुझे क्या बतायेंगे ? मुझसे अधिक बुद्धिमान कोई है ही नहीं। यही रावण की समस्या है।
Wednesday, 18 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
दोष दो तरह के होते हैं - एक बाह्य और आन्तरिक। जैसे पीतल के बर्तन में खटाई लग जाय तो उसमें दोष आ जाता है, लेकिन एक दोष और होता है, जो बाहर नहीं भीतर ही होता है, बर्तन में ही दोष होता है। उसे धातुगत दोष कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि पीतल के लोटे को आप कितना ही माँजिए, इससे बाहरी दोष तो दूर हो जाता है, पर उसका धातुगत दोष अर्थात पीतल होने का दोष कभी दूर नहीं होता। अन्त में यह जो सतीजी का शरीरत्याग है, इसका अभिप्राय क्या है ? शंकरजी समझ गये कि सती के और दोषों को मिटाना संभव है, पर दक्षपुत्री के रूप में उनका जो मूल संस्कार है, उसे मिटाना संभव नहीं है। उन्हें तो धातु ही बदलनी पड़ेगी, तब जाकर इनका रोग दूर होगा।
Tuesday, 17 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
सती को दक्षपुत्री होने के कारण अपनी बुध्दिमता पर बड़ा अहंकार है। उन्होंने अपनी भूल स्वीकार नहीं की। भगवान की परीक्षा लेने चल पड़ी। सती के रोग को दूर करने के लिए बड़ी लम्बी चिकित्सा करनी पड़ी। सती दोनों का तिरस्कार करती चली गयीं, वैद्य का भी और औषध का भी। शंकरजी सतगुरु हैं, वैद्य हैं और रामकथा औषध है। सतीजी अगत्स्य के आश्रम में गयीं तो रामकथा का तिरस्कार किया। इसका तात्पर्य यह है कि उन्होंने दवा स्वीकार नहीं की और शंकरजी की बात नहीं मानी। इस तरह के रोगी जिसे वैद्य और दवा दोनों पर विश्वास न हो, तो उस रोगी का क्या होगा, आप कल्पना कर सकते हैं। सती को अपने रोग निवारण के लिए बड़ी लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा और अन्त में अपने सती शरीर को छोड़ना भी पड़ा।
Monday, 16 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
रोगी अपने को रोगी न माने, स्वथ्य माने, तब ? सती और रावण के जीवन की यही समस्या है कि उन्हें अपनी बुध्दिमता पर बड़ा अभिमान है। वे दक्ष की पुत्री हैं। दक्ष माने चतुर। चतुर की पुत्री होने के नाते उन्हें अपनी चतुराई का इतना अहंकार है कि भगवान शिव की बात भी उन्हें सही नहीं लगती। मानो वे अपने पति की बात को मानना तो चाहती है, पर उनकी बुद्धि उन्हें मानने की अनुमति नहीं देती। बड़ी विडम्बना है। इतने बड़े वैद्य की पत्नी ऐसे असाध्य रोग से ग्रस्त हो गयीं। तब भगवान शंकर को स्वीकार करना पड़ा कि केवल वैद्य ही सब कुछ नहीं होता, रोगी की भी कुछ विशेषताएँ होती हैं। क्या डॉक्टर या वैद्य के घर में कोई बीमार नहीं पड़ता ? यह तो संसार में दिखाई देता है। बड़े - बड़े महात्माऔं के सभी शिष्य क्या स्वथ्य हो जाते हैं ? सभी स्वस्थ नहीं हो पाते। कभी-कभी तो लोग आश्चर्य करते हैं कि इतने बड़े महात्मा के पास रहकर भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ और कभी-कभी तो दूसरों की कौन कहे, स्वयं वैद्य बीमार हो जाते हैं। लोग बड़े आश्चर्य से पूछते हैं कि अरे ! क्या आप बीमार पड़ गये ? अरे भई ! बीमारी तो ऐसी वस्तु है कि चाहे वैद्य हो या कोई भी हो, जो कुपथ्य करेगा, वह बीमार पड़ेगा। जब व्यक्ति को अपनी बुध्दिमता पर अभिमान हो जाता है, तब वह कुपथ्य कर बैठता है। यह समस्या दोनों की है, सती की और रावण की भी।
Sunday, 15 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
भगवान शंकर त्रिभुवन गुरु हैं। वैद्य हैं। वे विष को भी अमृत बना देते हैं, पर विडम्बना तो यह है कि योग्य से योग्य वैद्य प्राप्त होने मात्र से क्या रोगी स्वथ्य हो जाता है ? भगवान शंकर के समान महान वैद्य के प्रयास करने पर भी कुछ ऐसे रोगी हैं, जो स्वथ्य नहीं हुए। सती और नारद के ह्रदय में संशय यह बताने के लिए हुआ कि यदि कोई महान गुरु, एक महान वैद्य या डॉक्टर को पा ले, तो मात्र इतने से ही रोगी स्वथ्य हो जायेगा यह मानना ठीक नहीं है। उसके साथ कुछ बातें जीवन से जुड़ी हुई हैं, जो जीवन में ठीक-ठीक आनी चाहिए, तब कहीं जाकर रोग दूर होता है, स्वथ्यता आती है। पहली बात तो यह है कि रोगी अपने रोग का अनुभव कर रहा है या नहीं ? अगर रोगी अपने को रोगी अनुभव करता है, तो वैद्य के पास जायेगा। वैद्य जो औषध और पथ्य बतायेंगे, उनका वह सेवन करेगा, अनुकूल आचरण करेगा तब जाकर स्वस्थ होगा।
Saturday, 14 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
समुद्र मंथन से जब विष निकला, तब भगवान विष्णु ने कहा था कि इस विष को भगवान शंकर के पास ले जाओ और तब शंकरजी ने क्या किया ? शंकरजी को जब विष दिया गया और ज्यों ही उन्होंने उसे अपने मुँह में लिया, त्यों ही उनके मुख से निकला राम। लोगों ने पूछा कि महाराज ! यह विष के साथ आप राम क्यों जोड़ रहे हैं ? शंकरजी ने कहा कि भई ! विष के साथ राम को जोड़ देने से विश्राम बन जाता है। यह सबसे बढ़िया बात है। विष के साथ राम को जोड़कर उन्होंने उसे बना दिया- अखिल लोक दायक विश्रामा। नाम महिमा में यही कहा गया है - जो समस्त लोक के प्राणियों को विश्राम देने वाला है। भगवान शंकर का अभिप्राय क्या है ? विष में राम को मिला दीजिए तो विष भी विश्राम में परिणत हो जायेगा, लेकिन दुर्भाग्य की बात तो यह है कि ऐसे भी अभागे लोग हैं, जो विश्राम से राम को निकाल देते हैं और विश्राम को भी अपने जीवन में विष बना लेते हैं। ऐसे लोगों के जीवन में विष को छोड़कर, दुःख एवं मृत्यु को छोड़कर और कुछ भी शेष नहीं रह जाता।
Friday, 13 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
भगवान शंकर सर्पों का आभूषण धारण करते हैं। आयुर्वेद में बहुत-सी औषधियाँ हैं, जो सर्प-विष के द्वारा बनायी जाती हैं। अब प्रश्न यह है कि सर्प मारक है या जीवन देने वाला ? तो अन्यत्र तो सर्प मारक है, पर भगवान शंकर के हाथ में वह मारक नहीं है। सर्प माने क्या ? विषधर। विष से मृत्यु हो जाती है। उस विषधर को भी वे अपना आभूषण बना लेते हैं और उससे भी आगे, यह जो समुद्र से निकला हुआ विष है, जिससे कि सारा संसार जल रहा है, उसे पीकर वे आनन्दविभोर हो गये। भगवान विष्णु क्या बताना चाहते हैं ? जो लोग अमृत पीकर अमर होना चाहते हैं, उसकी दृष्टि अपूर्ण है। जो विष पीकर अमृतत्व की सृष्टि करना चाहते हैं, उन्हीं की दृष्टि पूर्ण है।
Thursday, 12 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
आयुर्वेदशास्त्र में एक बड़ा प्रसिद्ध वाक्य है, जिसमें कहा गया है कि संसार में ऐसा कोई वनस्पति या कोई पदार्थ नहीं है, जिससे कोई दवा न बने। आवश्यकता है तो उसमें छिपे हुए औषधीय गुण जानने की। नयी-नयी खोजें होती रहती हैं। आप अगणित वस्तुओं के बारे में सुनते रहते हैं कि इस वस्तु से एक नयी दवा निकल आयी। आज भी चिकित्सा-पद्धति में यह यह सुनने और पढ़ने को मिलता है कि फफूँद लगी हुई वस्तु में भी औषध का निर्माण हो गया है। फफूँद को हम विकृति मानते हैं, पर खोज की गयी तो पाया गया कि उस विकृति में भी औषधीय तत्व छिपा हुआ है। भगवान शंकर की सबसे बड़ी विलक्षणता यही है। वे गुरु हैं और गुरु का कार्य यही है कि वह शिष्य के गुणों का तो सदुपयोग करे ही, पर साथ ही उसके दोषों को भी गुणों में परिवर्तित कर दें। यही गुरु की विलक्षणता है और यही विलक्षणता शंकरजी में विद्यमान है।
Wednesday, 11 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
श्री भरत जब भगवान राम के चरण की रेखाओं को देखते हैं, तो उनको ऐसा लगता है कि यह तो पारस है। जिस पारस के स्पर्श से जड़ अहिल्या चेतन हो गयी। तब उसमें पाप नष्ट होकर पवित्रता का संचार हो गया। यह तो परखा हुआ पारस है। श्री भरत इस पारस को अपने ह्रदय से, अपने शरीर से स्पर्श कराते हैं। आगे चलकर गोस्वामीजी ने कहा कि जब भरतजी चित्रकूट से लौटकर अयोध्या आये, तो वहाँ वे निरन्तर तपस्या करने लगे। लोगों ने पूछा कि महाराज ! आपको तपस्या की क्या आवश्यकता है ? तपस्या के समग्र फल के रूप में राम को तो आप पा ही चुके हैं। श्री भरत बोले कि मैं तो लोहा था, पर वे तो पारस हैं। उनके स्पर्श से लोहा भी सोना हो जाता है। मैं भी संभवतः उनके स्पर्श से सोना हो गया हूँ, पर बार-बार परखकर देखता रहता हूँ कि कहीं फिर से लोहा तो नहीं हो गया। इसमें भरतजी का संकेत यही है कि यह मन का लोहा एक बार सोना बनने के बाद पता नहीं कब फिर से लोहा बन जाय ! इसका कोई ठिकाना नहीं। यह मन इतनी तेजी से बदलता है कि निरन्तर सजग न रहने वाला व्यक्ति उसके द्वारा कभी भी छला जा सकता है। मन में एक बार सद्गुण और सद्भाव आ जाने पर भी निश्चिन्त होना ठीक नहीं है कि अब मेरा मन ठीक हो गया है, अब पतित नहीं होगा। इसलिए श्री भरत जीवनभर निरन्तर मन को कसकर देखते हैं, हर क्षण सावधान रहते हैं।
Tuesday, 10 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
रामायण में श्री भरत अपनी बड़ी निन्दा करते हैं। भगवान श्रीराम ने भरत की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम्हारे समान सन्त और गुणवान संसार में और कोई नहीं है। यह कहने के बाद उन्होंने भरतजी से पूछा कि मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वह ठीक है या नहीं ? भरतजी ने कहा प्रभो ! यह कहने का महान दुस्साहस भला कौन करेगा कि आपने ठीक नहीं कहा ! श्रीराम ने कहा कि अगर मैं ठीक कह रहा हूँ तो भरत ! तुम्हारा कहना सही नहीं है ! तुम जो यह कहते हो कि मैं सबसे बड़ा पापी हूँ, यह बात अब फिर कभी न कहना ! भरतजी ने कहा कि महाराज ! आप जो कह रहे हैं, वह तो सत्य है ही, पर मैं जो कह रहा हूँ वह भी तो असत्य नहीं है। यह कैसे हो सकता है कि दोनों विपरीत बातें एक साथ सत्य हों ! या तो तुम्हारी बात सत्य होगी या फिर मेरी ! तो श्रीभरतजी ने कहा कि महाराज ! जैसे लोहे का एक टुकड़ा तो लोहा ही है। उसे कोई भी परीक्षा करके यही कहेगा कि यह लोहा है, पर यदि कोई यदि पारस के पास ले जाकर कहे कि आप इसकी परीक्षा करके बताइए कि यह क्या है ? तब क्या होगा ? उसकी परीक्षा करने के लिए पारस जैसे ही उसे अपने हाथ में लेगा, उसके स्पर्श से लोहा तुरन्त सोना हो जायेगा। तो यह लोहे का चमत्कार है कि पारस का ? श्रीभरतजी कहते हैं कि प्रभो ! था तो मैं लोहा ही, पर अब लगता है कि पारस का स्पर्श हो गया है।
Monday, 9 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
वर्णन आता है कि समुद्र मंथन से जो विष निकला, भगवान शंकर ने उस विष को पी लिया और वह विष उनके लिए अमृत के समान हो गया। विष अमृत हो गया इसका अभिप्राय क्या है ? यही उत्कृष्ट वैद्य की कसौटी है। साधारण विभाजन तो वनस्पतियों में भी है, वस्तुओं में भी है। जैसे हम कहेंगे कि दूध पौष्टिक पदार्थ है, दूध पीने पर व्यक्ति स्वथ्यता का अनुभव करता है और संखिया विष है, उसे खाने से मृत्यु हो जाती है। सामान्य व्यवहार में दोनों में प्रभेद है, एक ग्राह्य है और एक त्याज्य है, पर वैद्य की विशेषता क्या है ? एक ओर तो वे रोगी के लिए दूध का पथ्य देते हैं और दूसरी ओर संखिया तथा अन्य विषों का भस्म बनाकर, औषध बनाकर, उसकी मारकता को नष्टकर, उसमें जो अमृतत्व छिपा हुआ है, उसे प्रकट करते हैं। फिर उसे रोगी को औषध के रूप में देकर उसको स्वथ्य करते हैं। यह बड़ा तात्विक संकेत है। इसका अभिप्राय यह है कि जीवन में जिसे हम अच्छाई कहते हैं, उसमें तो अच्छाई है ही, लेकिन जिसे हम बुराई समझते हैं, उसमें भी अमृतत्व छिपा हुआ है। रामचरितमानस में मानस-रोगों के चिकित्सा के संदर्भ में वैद्य की बात कही गयी है, गोस्वामीजी कहते हैं - सद्गुरू ही वैद्य हैं। वैद्य जैसे शरीर के रोगों को दूर करते हैं वैसे ही सद्गुरू हमारे जीवन के विष को अमृत, अमंगल को मंगल और कुरुप को सुरुप बना देते हैं।
Sunday, 8 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............,..
भगवान राम ने हनुमानजी को जब रावण के पास भेजा, तो उसके पीछे उनका उद्देश्य क्या था ? लंका का रोगग्रस्त समाज, मोहग्रस्त रावण स्वथ्य हो जाय। लंका का सारा समाज रूग्ण है और उन सबके मूल में है रावण। गोस्वामीजी रावण को मोह का प्रतीक मानते हैं। समस्त व्याधियों के मूल में मोह है और समस्त राक्षसों के मूल में रावण। रावण सहित लंका का सारा समाज रोगग्रस्त है और हनुमानजी हैं उत्कृष्टतम वैद्य। वे तो भगवान शंकर के अवतार हैं न। किसी ने गोस्वामीजी से पूछ दिया कि हनुमानजी तो वैद्य बनकर गये थे, फिर उन्होंने लंका को क्यों जला दिया ? तो गोस्वामीजी बड़े भावनात्मक पद्धति से कहते हैं कि यह हनुमानजी की बड़ी विलक्षण चिकित्सा पद्धति है। वे लंका को जलाकर औषध तैयार कर रहे थे। कैसे ? वे बोले आयुर्वेदशास्त्र की मान्यता है कि जब साधारण जडी-बूटियों से काम न चले, तब सोना-रत्न आदि का भस्म बनाकर रोगी को देना चाहिए। उससे रोगी स्वथ्य हो जाता है। भगवान राम ने हनुमानजी से यही कहा कि भई ! तुमसे अच्छा वैद्य और कौन होगा ? विष में भी अमृतत्व खोज निकालने वाले उत्कृष्टतम वैद्य तो भगवान शंकर ही हैं।
Saturday, 7 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
लोभ का सीधा संबंध बुद्धि से है और यह निश्चित है कि जिस विकार का संबंध बुद्धि से होगा, वह बड़ी गंभीर समस्या उत्पन्न करेगा। इसे यों समझ लीजिए कि अगर किसी के शरीर में रोग हो जाय और वह उस रोग को जानकर, अपने को रोगी मानकर चिकित्सक के पास जाय, औषध ले और स्वस्थ होने की चेष्टा करे, तब तो कोई समस्या नहीं है, पर यदि कोई रोगी होने पर भी रोग का अनुभव न करे, अपने को रोगी न माने तो ? और मन के संदर्भ में यही सत्य है। मन में विकार आने पर, मन के रोगी होने पर यदि हमारी बुद्धि स्वथ्य बनी रहे, बुद्धि में ठीक-ठीक यह अनुभव होता रहे कि हमारे मन में विकार है, यह रोग हो गया है, तब तो हम उस रोग से निवृत्ति की चेष्टा करेंगे, पर कहीं ऐसा हो कि मन के रोगों को बुद्धि का समर्थन प्राप्त हो जाय और बुद्धि यह कहने लगे कि यह रोग नहीं, यह तो स्वथ्यता का लक्षण है, तो ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से वह रोग दूर होने के स्थान पर अचल होकर बैठ जायेगा। चाहे वह काम हो, क्रोध हो या लोभ ; जब भी हम उस विकार का बुद्धि के द्वारा समर्थन करेंगे, तर्क-युक्ति से उसका पक्ष लेंगे, तो निश्चित रूप से उस रोग को दूर करना असंभव हो जायेगा।
Friday, 6 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
चार प्रमुख रोग हैं, जो हमारे अन्तःकरण को आक्रांत कर विविध रूपों में प्रकट होते हैं, इन सब रोगों के निदान में यह विभाजन सहायक सिद्ध होता है। कुछ रोग काम प्रधान होते हैं, तो कुछ क्रोध प्रधान और कुछ लोभ प्रधान। जैसे आसक्ति काम प्रधान रोग होता है और इसका केन्द्र है मन। हिंसा क्रोध प्रधान रोग है और इसका केन्द्र है अहंकार। स्वार्थपरक वृत्तियाँ लोभ से जुड़ी हुई हैं, जहाँ कि बुद्धि की प्रधानता है। इस तरह अनगिनत व्याधियों से हमारा अन्तःकरण आक्रांत है और हमारा अन्तःकरण ही नहीं, बल्कि सारा समाज इन व्याधियों से आक्रांत है।
Thursday, 5 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
जितने भी मन के रोग हैं, उनके मूल में मोह है। इस मोह से ही रोगों की श्रृंखला शुरू होती है। जैसे शरीर के संदर्भ में वात, पित्त और कफ है, उसी तरह मन के संदर्भ में काम, क्रोध और लोभ है। मोह दोनों संदर्भों में समान रूप से जुड़ा हुआ है। गोस्वामीजी इन चारों को ही अधिक महत्व देते हैं और अगर हम देखें तो पायेंगे कि हमारे अन्तःकरण के चारों भाग इन चारों के एक-एक अधिष्ठान हैं। जैसे काम का अधिष्ठान है मन। इसलिए काम का एक नाम मनोज भी है। काम मन को आक्रांत करता है। काम का संबंध मुख्य रूप से व्यक्ति के मन से है। लोभ का केन्द्र है बुद्धि, क्रोध का अहंकार और मोह का अधिष्ठान है चित्त। इस तरह इन एक-एक व्याधियों का हमारे अन्तःकरण के एक-एक भाग से संबंध है। क्रोध का अहंकार से घनिष्ठ संबंध है। क्रोध जब भी आयेगा, कहीं न कहीं अहंकार से अवश्य जुड़ा होगा।
Wednesday, 4 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
रामचरितमानस में मन के रोगों के जो लक्षण बताये गये हैं, निदान और चिकित्सा की जो पद्धति प्रस्तुत की गयी है, उनके द्वारा यदि हम अपने अन्तर्जीवन में विद्यमान रोगों को ठीक-ठीक समझ सकें और उससे मुक्त होने के लिए उस चिकित्सा-पद्धति को ह्रदयंगम कर सके, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे जीवन के अधिकांश मानस-रोगों का उपशमन हो जायेगा।
मानस-रोग कहने पर साधारणतया केवल मन के रोगों का अर्थ ही ध्वनित होता है, लेकिन यहाँ पर मन बड़े व्यापक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। मनुष्य के अन्तःकरण को चार भागों में विभक्त किया गया है, जिन्हें मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार कहते हैं। इन चारों के समुच्चय को अन्तःकरण-चतुष्टय कहते हैं। मानस-रोगों के संदर्भ में मन इस समग्र अन्तःकरण-चतुष्टय का बोधक है। इसलिए वे मानस-रोग जो मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को केन्द्र बनाकर प्रकट होते हैं, मानस-रोग कहलाते हैं। मानस-रोगों के स्वरूप को समझने के लिए अन्तःकरण पर भी एक दृष्टि डालना उपयोगी होगा। जो संकल्प-विकल्प का केन्द्र है अर्थात जहाँ से संकल्प-विकल्प उठते हैं उसे मन कहते हैं। जिसके द्वारा हम निर्णय करते हैं, किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं वह बुद्धि है। जो स्वीकृति देने वाला है वह अहंकार है और इन सबके पीछे जहाँ जन्मान्तर के संस्कार संग्रहीत हैं वह चित्त है। इनमें एक, दो या सभी विकारग्रस्त हो जाते हैं, जिस पर रामचरितमानस में मानस-रोग के रूप में चर्चा की गयी है।
मानस-रोग कहने पर साधारणतया केवल मन के रोगों का अर्थ ही ध्वनित होता है, लेकिन यहाँ पर मन बड़े व्यापक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। मनुष्य के अन्तःकरण को चार भागों में विभक्त किया गया है, जिन्हें मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार कहते हैं। इन चारों के समुच्चय को अन्तःकरण-चतुष्टय कहते हैं। मानस-रोगों के संदर्भ में मन इस समग्र अन्तःकरण-चतुष्टय का बोधक है। इसलिए वे मानस-रोग जो मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को केन्द्र बनाकर प्रकट होते हैं, मानस-रोग कहलाते हैं। मानस-रोगों के स्वरूप को समझने के लिए अन्तःकरण पर भी एक दृष्टि डालना उपयोगी होगा। जो संकल्प-विकल्प का केन्द्र है अर्थात जहाँ से संकल्प-विकल्प उठते हैं उसे मन कहते हैं। जिसके द्वारा हम निर्णय करते हैं, किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं वह बुद्धि है। जो स्वीकृति देने वाला है वह अहंकार है और इन सबके पीछे जहाँ जन्मान्तर के संस्कार संग्रहीत हैं वह चित्त है। इनमें एक, दो या सभी विकारग्रस्त हो जाते हैं, जिस पर रामचरितमानस में मानस-रोग के रूप में चर्चा की गयी है।
Tuesday, 3 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्....................
........कल से आगे.........
मंथरा कैकेयी से कहती है कि राजा से केवल यही वरदान न माँगना कि भरत को राज्य मिले। क्यों ? क्योंकि भरत को राज्य मिलने पर केवल आपको आनन्द ही तो मिलेगा, पर इससे कौसल्या को दुःख तो नहीं मिलेगा। आनन्द तो तभी आयेगा, जब हमें आनन्द और कौसल्या को दुःख मिले। मंथरा कहना चाहती है कि कौसल्या बड़ी प्रसन्न हो रही है, बड़ा उत्सव मना रही है, बड़ा दान बाँट रही है, उन्हें जरा सबक सिखाना है, इसलिए ऐसा वरदान माँगिए जैसा मैं कह रही हूँ। यही है राजयक्ष्मा के साथ कोढ़। ईर्ष्यावृत्ति के साथ दुष्टता का योग और वह इस सीमा तक पहुँच जाती है कि वह केवल अपने लोभ की पूर्ति ही नहीं चाहती, बल्कि दूसरे को लाभ से वंचित करके उसे उत्पीड़ित भी करना चाहती है। ये रोग कैकेयी में नहीं है, पर रोगी मंथरा के पास वे थोड़ी देर बैठ गयीं और सारा रोग ज्यों का त्यों कैकेयी में आ गया, तो ये रोग संक्रामक भी है। इस प्रकार लोभ, ईर्ष्या और कुटिलता रूपी मन के ये जो रोग हैं, ये ही रामराज्य में व्यवधान उत्पन्न कर देते हैं और आज के समाज में भी यह रोग अत्यंत व्यापक रूप में फैला हुआ है।
मंथरा कैकेयी से कहती है कि राजा से केवल यही वरदान न माँगना कि भरत को राज्य मिले। क्यों ? क्योंकि भरत को राज्य मिलने पर केवल आपको आनन्द ही तो मिलेगा, पर इससे कौसल्या को दुःख तो नहीं मिलेगा। आनन्द तो तभी आयेगा, जब हमें आनन्द और कौसल्या को दुःख मिले। मंथरा कहना चाहती है कि कौसल्या बड़ी प्रसन्न हो रही है, बड़ा उत्सव मना रही है, बड़ा दान बाँट रही है, उन्हें जरा सबक सिखाना है, इसलिए ऐसा वरदान माँगिए जैसा मैं कह रही हूँ। यही है राजयक्ष्मा के साथ कोढ़। ईर्ष्यावृत्ति के साथ दुष्टता का योग और वह इस सीमा तक पहुँच जाती है कि वह केवल अपने लोभ की पूर्ति ही नहीं चाहती, बल्कि दूसरे को लाभ से वंचित करके उसे उत्पीड़ित भी करना चाहती है। ये रोग कैकेयी में नहीं है, पर रोगी मंथरा के पास वे थोड़ी देर बैठ गयीं और सारा रोग ज्यों का त्यों कैकेयी में आ गया, तो ये रोग संक्रामक भी है। इस प्रकार लोभ, ईर्ष्या और कुटिलता रूपी मन के ये जो रोग हैं, ये ही रामराज्य में व्यवधान उत्पन्न कर देते हैं और आज के समाज में भी यह रोग अत्यंत व्यापक रूप में फैला हुआ है।
Monday, 2 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................
पहले तो मंथरा में लोभ और ईर्ष्या की वृत्ति है। श्रीराम के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर उसका ह्रदय राजयक्ष्मा से जलने लगा, फिर उसके बाद उसके मन को कोढ़ भी हो गया। अगर मंथरा यह सोचकर शांत हो जाती कि राम को राज्य मिले या चाहे जिसको मिले, मुझे क्या लेना-देना है ! यह भी एक विवेक की बात होती और उसे ईर्ष्या हो ही गयी, तो मन में यह भी सोच लेती कि राम को राज्य मिल रहा है, बुरा तो लग रहा है, पर मैं कर ही क्या सकती हूँ ? इसे रोकना मेरे बस की बात नहीं है, तो भी बुराई आगे नहीं बढ़ पाती, परन्तु उस राजयक्ष्मा के साथ कोढ़ (कुटिलता और दुष्टता) ने मिलकर अयोध्या में एक असाध्य रोगी उत्पन्न किया, जिससे रामराज्य में बाधा उत्पन्न हो जाती है। अब एक रात बची हुई है, क्या उपाय करूँ कि राम सिंहासन पर न बैठ सकें ! वह योजना बनाती है। कितनी भयंकर षड्यंत्रकारिणी थी वह और इतना ही नहीं, उसकी कुटिलता और दुष्टता पराकाष्ठा तक पहुँच जाती है, जब वह कैकेयी से कहती है कि राजा से केवल यही वरदान न माँगना कि भरत को राज्य मिले। क्यों ?
.........आगे कल.........
.........आगे कल.........
Sunday, 1 November 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
लोभ और ईर्ष्या दोनों का बड़ा घनिष्ठ संबंध है। दूसरों का सुख देखकर जलने की वृत्ति मुख्यतः लोभ से जुड़ी हुई है। इस वृत्ति के दृष्टांत के रूप में मानस में इस रोग से ग्रस्त मंथरा को प्रस्तुत किया गया। यह वृत्ति मंथरा के चरित्र में दिखाई देती है। मंथरा महारानी कैकेयी की प्रियसेविका है, कैकयनरेश की कृपापात्र है, पर इतना होते हुए भी लोभ की वृत्ति उसके अन्तःकरण में दबी पड़ी है और उसका अतिरेक ईर्ष्या भी उसके चरित्र में दिखाई देता है। मंथरा नगर में घूमने निकली। नगर सजाया जा रहा था। उसने पूछा कि नगर क्यों सजाया जा रहा है ? तो समाचार मिला कि कल अयोध्या के राजसिंहासन पर श्रीराम का तिलक होने वाला है। श्रीराम का राजतिलक की बात सुनकर उसका ह्रदय जलने लगा। गोस्वामीजी ने कहा कि इस जलन की भी मात्रा होती है। अगर लोभ कफ हो और उस कफ से साधारण खाँसी आवे तो वह जल्दी ठीक हो सकती है, पर यदि खाँसी यक्ष्माजन्य हो, तब तो उसका ठीक होना बड़ा कठिन है और इस राजयक्ष्मा रोग से जुड़ा हुआ एक अन्य रोग है कोढ़। वैसे उनका आपसी संबंध समझ में नहीं आता, क्योंकि शरीर के संदर्भ में इस संबंध को कोई महत्व नहीं दिया जाता पर मन के संदर्भ में ये दोनों गहराई से जुड़े हुए हैं। मन की कुटिलता और दुष्टता ही मन का कोढ़ है और दूसरों के सुख को देखकर जलना ही उसका राजयक्ष्मा है।
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