Friday, 30 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी कहते हैं कि बालि की मृत्यु के बाद तारा का सुग्रीव से तथा मन्दोदरी का विभीषण से परिणय हो जाता है । अब इसे केवल भौतिक धरातल पर देखें तो अटपटा-सा लगता है पर इसके दूसरे पक्ष पर दृष्टि डालें तो एक नया अर्थ सामने आता है । प्रत्येक समाज में अपनी-अपनी कुछ परम्पराएँ होती हैं उसे तो हम देखते हैं पर उसके पीछे जो आध्यात्मिक चिन्तन होता है, बहुधा उसकी ओर हमारी दृष्टि नहीं जाती । मन्दोदरी मन की बेटी है । मन की वृत्ति की विशेषता यह है कि उसमें हमेशा बुरे संकल्प ही नहीं आते, अच्छे विचार एवं संकल्प भी आते हैं । मन्दोदरी भले ही रावण के साथ व्याह दी गई हो एवं तारा का परिणय बालि के साथ कर दिया गया हो पर यह पक्ष तो मानो मन का बुराई के साथ जुड़ जाने का ही संकेत करता है । अब क्या यह उचित है कि मन सदैव बुराइयों से ही जुड़ा रहे ? तब तो यह एक अधूरापन ही कहलाएगा । मन में जब तक परिवर्तन होकर सद्वृत्तियाँ नहीं आ जातीं, वह अच्छाइयों से नहीं जुड़ पाता, उसकी कोई सार्थकता नहीं । इसलिए मन्दोदरी जब तक विभीषण से नहीं जुड़ जाती, तारा सुग्रीव का वरण नहीं कर लेती, तब तक उनके जीवन में पूर्णता नहीं आ सकती । निष्ठा का तात्पर्य यह नहीं है कि यदि बुराई के साथ हमारा सम्बन्ध हो जाय तो फिर सदैव हम उससे ही जुड़े रहें ।

Thursday, 29 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

मय दानव लंका का निर्माण करता है और रावण से इतना प्रभावित है कि वह अपनी पुत्री मन्दोदरी, रावण को अर्पित कर देता है । पर 'रामायण' में मन्दोदरी का जो चरित्र हमारे सामने आता है उसमें उनके अनेक सद्गुणों का, विवेक का वर्णन किया गया है । 'रामायण' में बार-बार यह पढ़ने को मिलता है कि वे रावण को समझाने की चेष्टा करती हैं । पर रावण का दुर्भाग्य कि वह इस पर ध्यान नहीं देता और अन्त में मारा जाता है । रावण की मृत्यु समय भी मन्दोदरी का विवेक जागृत-अवस्था में ही दिखाई देता है । वह कहती हैं कि आपने जीवन भर दूसरों को पीड़ा पहुँचाई लेकिन श्रीराम कितने उदार हैं कि उन्होंने आपको अपने धाम में स्थान दिया । मन्दोदरी की दृष्टि मानो सत्य को देखने और पहचानने में सक्षम थी । रावण की मृत्यु के पश्चात लंका के राजा के रूप में विभीषण जी का अभिषेक होता है । उस समय मन्दोदरी विभीषण की सहधर्मिणी के रूप में लंका के सिंहासन पर बैठती है । इसे लेकर कई लोगों के मन में प्रश्न उठते हैं । उन्हें लगता है कि यह तो चारित्रिक श्रेष्ठता का परिचायक नहीं है । गोस्वामीजी ने भी इस ओर संकेत किया है । पर उनकी दृष्टि में यह दोषपूर्ण कार्य न होकर मानो जीवन में एक सही दिशा में होने वाले परिवर्तन या परिमार्जन का द्योतक है ।

Wednesday, 28 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

युधिष्ठिर को 'धर्मराज' के रूप में देखा जाता है और रावण को हम पाप-वृत्ति का साकार रूप मानते हैं । पर कैसी अनोखी बात है कि चाहे कोई धर्मात्मा हो या पापी; मन दोनों के ही साथ है । और यदि 'रामायण' एवं 'महाभारत' के युद्धों के कारणों पर हम दृष्टि डालें तो इसके जो सूत्र हमारे सामने आते हैं उसके मूल में कहीं-न-कहीं यह मन का मय दानव ही कारण के रूप में विद्यमान है ।

Tuesday, 27 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

'मानस' में एक अनोखा वर्णन आता है कि लंका के सारे भवन व महल सोने के बने हुए हैं । और इस स्वर्णमयी लंका का निर्माण करने वाला व्यक्ति 'मय' नाम का एक दानव था । और जब हम महाभारत-काल में दृष्टि डालते हैं तो एक आश्चर्यजनक बात हमारे सामने आती है कि यह 'मय' दानव वहाँ भी हमें दिखाई देता है । महाभारत-युद्ध के पूर्व की गाथा में वर्णन आता है कि प्रारंभ में जब युधिष्ठिर को राज्य दिया गया तो नये नगर के निर्माण हेतु उन्होंने उस समय 'मय' दानव को ही आमंत्रित किया । मय दानव ने एक नगर का निर्माण किया जिसमें उसने अपने अद्भुत कला-कौशल का परिचय देते हुए विभिन्न प्रासादों एवं सभा-भवनों आदि की रचना की । यह सुनकर बड़ा विचित्र-सा लगता है और एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि लंका का त्रेतायुग में निर्माण करने वाला मय दानव क्या द्वापर काल में भी विद्यमान था ? क्या उसकी इतनी लम्बी आयु थी कि वह रावण के काल से लेकर युधिष्ठिर के समय तक जीवित रहा ? यदि आध्यात्मिक दृष्टि से विचार करें तो हम कह सकते हैं कि रामायण और महाभारत काल में दिखाई देने वाला मय दानव आज भी विद्यमान है । यह मय दानव कौन है ? गोस्वामीजी विनय-पत्रिका में मय दानव का परिचय देते हुए कहते हैं कि व्यक्ति का 'मन' ही मय दानव है । इसका संकेत यही है कि 'मन' सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग इन चारों युगों में होता है, वह तो कभी मरता ही नहीं । यह मन रूपी मय दानव हर युग में बड़ी अनोखी-अनोखी रचनाएँ करता रहता है । जिसके पास धन आदि साधन है वे बाहर बढ़िया से बढ़िया जो निर्माण कराते हैं, ये मन की कल्पनाओं को आकार प्रदान करने की ही चेष्टाएँ हैं । पर जिनके पास साधन नहीं है क्या वे निर्माण नहीं करते ? वे भी मन-ही-मन, बैठे-बैठे न जाने कितनी रचनाएँ करते रहते हैं ? व्यक्ति बाहर निर्माण न कर पाने पर भी मनोराज्य में कल्पनाओं के द्वारा उन सबका सुख प्राप्त करने में संलग्न रहता है । यह सारा मन का ही खेल है ।

Monday, 26 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

बहुत से साहित्यकार, कवि और लेखक हुए हैं, पर उनकी प्रासंगिकता बहुत अल्पकालीन होती है और फिर समाप्त हो जाती है । 'इतने वर्षों के बाद भी तुलसीदासजी प्रासंगिक क्यों हैं ?' इसे यदि समझ लें तो साहित्यकार और बुद्धिजीवी भी उनसे प्रेरणा प्राप्त कर लाभान्वित हो सकते हैं । श्रीरामचरितमानस के साथ जुड़ा हुआ यह 'मानस' शब्द कई अर्थों में अभिव्यक्त होता है । इसमें तुलसी की प्रासंगिकता का भी उत्तर प्राप्त होता है । मनुष्य यद्यपि बहिरंग दृष्टि से बदलता हुआ दिखाई देता है पर मनुष्य के मन के साथ जो समस्याएँ जुड़ी हुई हैं वे प्रत्येक युग में विद्यमान दिखाई देती हैं और ये समस्याएँ भविष्य में भी रहेंगी । गोस्वामीजी ने 'मानस' की रचना 'मन' को केन्द्र में रखकर की है, अतः इस ग्रन्थ की प्रासंगिकता तो रहेगी ही ।

Sunday, 25 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

जब कोई यह प्रश्न करता है कि ' तुलसी की प्रासंगिकता क्या है ?' अथवा यह सिद्ध करने की चेष्टा करता है कि 'तुलसी आज भी प्रासंगिक हैं' तो पढ़कर हँसी आ जाती है । क्योंकि जो तुलसी की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाते हैं वे यह नहीं देख पाते कि उनकी स्वयं कोई प्रासंगिकता है भी या नहीं ? और तुलसीदास जी को प्रासंगिक सिद्ध करने वालों से कोई यह पूछे कि देश में कोटि-कोटि व्यक्ति जिनसे प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं उनकी प्रासंगिकता की घोषणा आप कर देंगे तो क्या लोग आपको धन्यवाद देंगे कि आपने तुलसी को प्रासंगिक मान लिया, बड़ी कृपा की ? गोस्वामीजी को ऐसे किसी प्रमाण-पत्र की आवश्यकता नहीं है । वस्तुतः विचार यह करना चाहिए कि पाँच सौ से अधिक वर्ष व्यतीत करने के बाद भी वे इतने प्रासंगिक क्यों हैं ?

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

ध्यान क्या है ? जब कोई व्यक्ति ध्यान करेगा तो जिसका ध्यान करता है उसके लिए शब्द है 'ध्येय' और जो करने वाला है वह है 'ध्याता' यही ध्याता, ध्यान और ध्येय जो है उसे शिखर कह दीजिए, चाहे जटा कह दीजिए या मानो त्रिवेणी कह दीजिए । प्रारंभ में आप निर्णय करेंगे मैं भगवान राम का ध्यान करूँगा । उसके पश्चात आप ध्यान करने बैठेंगे तो ध्यान की पद्धति आपको ज्ञात होगी । आपको कहाँ ध्यान करना है, ह्रदय में करना है, भ्रूमध्य में करना है और यह ध्यान की पद्धति है । यह प्रारंभ है और जब धीरे-धीरे क्रमशः इसका विकास होता है तो परिणाम की अंतिम स्थिति, वह है कि जब इन तीनों को अलग-अलग भान न रह जाए । मैं ध्यान करने वाला हूँ, मैं यह ध्यान कर रहा हूँ, यह ध्यान की पद्धति है । तीनों मिल करके यहाँ बिल्कुल एकाकार हो गये हैं वह साधक न रह करके सिद्ध हो चुका है ।

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

महर्षि पतंजलि ने योग की पद्धति का बड़ी विस्तृत और जटिल व्याख्या पातंजल योग दर्शन में किया है । आजकल योग शब्द बड़ा प्रिय है । बहुत से लोग में जब बात हो तो कहते हैं कि आजकल मैं योगा करता हूँ वे योग को योगा बना देते हैं । उसमें अंग्रेजी का रस थोड़ा मिल जाता है । योगा का अर्थ ठीक वही है वह जो करते हैं, वह भी योग का ही एक अंग है, पर योग की पद्धति इतनी ही नहीं है कि आसन कर लिया, प्राणायाम कर लिया । उनके द्वारा भी तो लाभ ही है पर उसका उद्देश्य क्या है ? महर्षि पतंजलि कहते हैं कि व्यक्ति को क्रमशः ध्यान के माध्यम से अपनी चित्त वृत्तियों के निरोध तक पहुंचना है । यह उनका एक लक्ष्य है, सूत्र है । अब इसको आप इस संदर्भ में विचार करके देखें । जैसे रावण के चरित्र में मिलेगा । रावण एक विशेष प्रकार का ध्यान योगी है । उसके लिए ध्यानयोगी शब्द कहना शायद उचित नहीं होगा । बहुत बड़ा ध्यान कुयोगी है । कुयोगी इसलिए है कि ध्यान की शक्ति का अगर कोई दुरुपयोग करे तो वह कुयोगी ।

Thursday, 22 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

सतयुग जिसे सर्वश्रेष्ठ युग पुराणों में माना गया । उस युग के लिए कहा गया कि ज्ञान प्रधान युग था और सतयुग की साधना पद्धति में योग और ध्यान की प्रधानता थी और उसके माध्यम से ही व्यक्ति सत्य का साक्षात्कार करता था । ध्यान की साधना में चित्त की मुख्यता है । भक्ति की साधना में मन की मुख्यता है, कर्म की साधना में व्यक्ति के अहं की मुख्यता और असमर्थता में शरणागति की साधना विद्यमान है । इसे और स्पष्ट कर लें कि जैसे किसी रोग को नष्ट करना हो, तो नष्ट करने के लिए ऐसी दवा मिले जिससे व्यक्ति के शरीर में या मस्तिष्क में पीड़ा हो रही है उससे छुट्टी मिले पर दर्द दूर हो गया लेकिन दर्द के कारणों का पता नहीं चला तो बार-बार होगा, बार-बार वही गोलियाँ लेनी पड़ेंगी और लेने के बाद फिर अभ्यास बनेगा । अभ्यास बनने के बाद वे दवाइयाँ भी प्रभावशाली नहीं रह पातीं । इसलिए वेदान्त की यह मान्यता है, योगशास्त्र की यह मान्यता है, ज्ञान की यह मान्यता है कि जब तक अंतरंग कारण की चिकित्सा नहीं की जायेगी तब तक सही अर्थों में व्यक्ति पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो सकता है ।

Wednesday, 21 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

मन, बुद्धि और चित्त तथा अहंकार हमारे आपके अन्तःकरण में चार विभाजित रूप में विद्यमान हैं । प्रत्येक मनुष्य के व्यक्तित्व की बनावट अलग अलग है और उसके अनुकूल ही वे व्यक्ति को उपाय बताते हैं । किसके लिए कौन सा उपाय ठीक है । किससे आप लाभ अनुभव करते हैं । इससे मुझे लाभ हुआ आप ऐसा अनुभव करेंगे तो आपके लिए वह पद्धति ठीक है । जो विभाजन किया है वह चार अंक है । चाहे चार घाट हैं, चाहे चार युग हैं, चाहे अन्तःकरण के चार रूप हैं, चाहे भगवान राम के चार भाई हैं । इस तरह से चार के अंक बहुत बड़ी संख्या में आपको धार्मिक और आध्यात्मिक प्रतीकों में मिलेंगे ।

Tuesday, 20 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी से पूछा गया - लोग इतनी कथा सुनते हैं, सत्संग में जाते हैं, सुन करके उनको लगता भी है कि हाँ ये बात तो अच्छी है ठीक है, पर ऐसा क्यों है कि उनके जीवन में उनका व्यवहार वैसा नहीं हो पाता है ? गोस्वामीजी ने इसका उत्तर यही दिया कि जैसे आपको कोई आदत लड़कपन से पड़ गयी हो और आप समझ लेते हैं कि यह आदत आपकी सही नहीं है - अब अगर कोई व्यक्ति नाखून को ही दाँत से कुतरने लगता है, तो एक बड़ा ही अभद्र दृश्य उपस्थित होता है । वह नहीं समझता है कि कोई मैं बड़ा वैज्ञानिक कार्य कर रहा हूँ, पर उसे पूछिए तो वह यही कहेगा कि क्या बतावें अनजाने में ही आदत पड़ गयी है और वह आदत मुझसे छूटती नहीं । गोस्वामीजी कहते हैं कि जब एक जन्म में जो आदत पड़ गयी वह नहीं छूटती तो इतने जन्मों की जो आदत है ? उन्होंने यही लिखा है कि यह वह चित्त है जो इतने पूर्व संस्कारों से अभ्यस्त हो चुका है कि सुन करके समझने के बाद भी उसे क्रियान्वित कर सकने में सक्षम नहीं दिखाई देता है ?

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

आपने एक शब्द बार-बार प्रवचनकर्ताओं, विद्वानों, संतों के मुख से सुना होगा - अन्तःकरण चतुष्टय । उनके कार्यों का बंटवारा इस रूप में किया गया कि जहाँ मनुष्य के मन में एक संकल्प विकल्प, यह ठीक कि वह ठीक, यह करें कि वह करें, ये जो नाना प्रकार के संकल्प विकल्प उठते हैं उसी का नाम मन है और जिसके द्वारा आप निर्णय करते हैं, उस निर्णय के अनुसार कार्य जिसके द्वारा संपन्न होता है, उसी का नाम बुद्धि है । अब वह जो व्यक्ति निर्णय करता है, वह निर्णय उसके संस्कार से ही जुड़ा हुआ है । ये जो संस्कार हैं, जहाँ संग्रहित हैं, जहाँ एकत्र है उसी का नाम है चित्त । बुद्धि वह है जो समझकर निर्णय देती है और चित्त वह है जो संस्कार के ही अनुकूल निर्णय देता है । उसके बाद जब आप कोई क्रिया करते हैं तो क्रिया करने के साथ, मैं ये करूँगा, मैंने ऐसा किया तो इन सबके मूल में एक शब्द आप जोड़ देते हैं 'मैं', ये अहंकार है । इस तरह से ये मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार हमारे आपके अन्तःकरण में चार विभाजित रूप में विद्यमान हैं ।

Sunday, 18 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

जब व्यक्ति रोगी होता है तो वह चिकित्सक की खोज करता है, डाक्टर या वैद्य की खोज करता है और जिस व्यक्ति को जिस पद्धति से लाभ होता है, उसका विश्वास उसी पद्धति पर होता है वह दूसरों को भी आग्रहपूर्वक यह बताता है कि इन वैद्य के द्वारा या डाक्टर के द्वारा मुझे लाभ हुआ है और आपको भी इसके द्वारा लाभ हो सकता है । तो ज्ञान मार्ग, भक्ति, कर्म या शरणागति का भी वही तात्पर्य और उद्देश्य है । ज्ञानी भी यह चाहता है कि मन के रोग दूर हों, मनुष्य की समस्याओं का समाधान हो, भक्त, कर्मयोगी और शरणागत सभी तो यही चाहते हैं । इसलिए पद्धतियों में भिन्नता होते हुए भी जिस पद्धति से जिनको लाभ होता है वह उसकी प्रशंसा करेंगे ।

Saturday, 17 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी ने चार घाटों की जो परिकल्पना की उसका अर्थ है कि ये किसी वर्ग, सम्प्रदाय या किसी मान्यता के लिए ही नहीं, वे समान रूप से सबके लिए उपादेय हैं, कल्याणकारी हैं और यही संकेत ये जो चार वृक्ष हैं और चार वृक्षों के नीचे जो साधना है, चार वृक्ष, चार घाट, चार फल, चार भाई - ये चार अंकों का जो बाहुल्य है वे सबके बड़े निहित अर्थ वाले अंक हैं । और यहाँ पर भी आप यही पायेंगे । उसको उस रूप में आप लेंगे - पीपल के नीचे ध्यान, पाकरी के नीचे जप, आम के नीचे मानस पूजा, वट के नीचे कथा, इसका मूल उद्देश्य यही है कि हमें जीवन में जो चाहिए ध्यान के द्वारा, जप के द्वारा, मानस पूजा के द्वारा, कथा के द्वारा ये समस्त तत्व भुशुण्डि जी की साधना में विद्यमान हैं और आनन्द यही है । सम्प्रदाय और दीक्षा भी उन्होंने ली तो किसी भक्त से नहीं ली, ज्ञानी से ली । मानो संकेत यह है कि ज्ञान और भक्ति परस्पर विरोधी नहीं है और पराकाष्ठा यह है कि शंकर जी ज्ञान घाट के आचार्य होते हुए भी भुशुण्डि जी से कथा स्वयं सुनने आये ।

Friday, 16 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

महाभारत में महाराज शल्य ने यह निर्णय किया कि युधिष्ठिर मेरे भांजे हैं और जब महान युद्ध हो रहा है तो मेरा कर्तव्य है कि मैं उनकी सहायता करूँ और वे सेना लेकर चले । चतुर छली दुर्योधन ने सेवकों को आज्ञा दिया कि महाराज शल्य जिस मार्ग से जा रहे हैं, उस मार्ग में ऐसी सुंदर ठहरने की भोजन की, विश्राम की व्यवस्था करो जिससे वे प्रसन्न हो जायें । महाराज शल्य जहाँ जाते दुर्योधन के सेवक स्वागत करते, भोजन कराते, रात्रि विश्राम कराते, शल्य बड़े गदगद होते । पर समस्या तब आ गई कि जब उन्होंने गदगद कण्ठ से कहा कि हमारे भांजे युधिष्ठिर ने कितना सुंदर प्रबंध करा दिया, इस पर सेवकों ने कहा - क्षमा करेंगे आपके भांजे युधिष्ठिर जी ने नहीं, आपके भांजे दुर्योधन जी ने आपके लिए प्रबंध किया है और तब धर्म के अविवेक का पक्ष सामने आया । शल्य ने निर्णय किया कि शास्त्र यह कहता है कि जिसका भोजन करें जिसका अन्न ग्रहण करें उसकी ही सेवा करनी चाहिए और जब मैंने दुर्योधन का अन्न खा लिया तो दुर्योधन की ओर से ही लड़ना मेरा कर्तव्य है । भला सोचिए इससे बढ़कर मूर्खता कोई हो सकती है ? उन्होंने प्राण भी दे दिया इस धर्म का पालन करने के लिए । अब यह जो धर्म के प्रति उनकी समझ है, पालन ही नहीं किया, प्राण दे दिया क्या वह सही धर्म था ? और तब मुझे वह बात कई बार दोहरानी पड़ती है कि अगर ऐसे ही धर्मात्मा हनुमान जी होते तो रावण की वाटिका का फल खाने के बाद रावण की ओर से लड़ने का निर्णय कर लेते ? इसका अर्थ है कि धर्म के विषय में व्यक्ति का विवेक अगर सही नहीं है, तो अनर्थ हो सकता है ।

Thursday, 15 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

ज्ञान का पक्ष विवेक का पक्ष है । विवेक के पक्ष का अभिप्राय है कि कभी-कभी हमसे अनेक ऐसी ऐसी भूलें होती हैं जो हमारे अज्ञान के कारण, नासमझी के कारण, विवेक शून्यता के कारण होती हैं, तो उसका अभिप्राय है कि मनुष्य के विवेक में भी, मस्तिष्क में भी परिवर्तन होना परम आवश्यक है । मनुष्य की अगर बुद्धि ही पवित्र नहीं होगी, शुद्ध नहीं होगी, अगर वह सत्य को बुद्धि से ठीक-ठीक समझ नहीं लेगा तो फिर व्यक्ति जीवन में धन्यता प्राप्त नहीं कर सकता । ज्ञानी जब मस्तिष्क या बुद्धि पर बल देता है तो उसका अभिप्राय है कि हम सही सही जाने । जानना परम आवश्यक है । क्या सही है क्या नहीं सही है, क्या पवित्र है, क्या अपवित्र है, क्या धर्म है ?

Wednesday, 14 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान श्रीराम ने जब पत्थर बन गई अहिल्या को चरणों से स्पर्श कर उसमें चेतना का संचार किया, तब अहिल्या ने यही कहा कि प्रभु ! इतने वर्ष सेवा करने के बाद भी त्याग और तपस्या का जीवन व्यतीत करने के बाद भी, अगर हमारे मन में वह वृत्ति आई तो मैं यही कहूँगी कि जिस दवा के द्वारा मैं चैतन्य हो गयी हूँ, वह दवा मैं आपसे माँगती हूँ और वह मैं अपने साथ ले जाऊँगी - *पद कमल परागा रस अनुरागा* - मेरा मन भ्रमर आपके चरण कमल के दिव्य अनुराग रस का पान करता रहे मानो वह अनुराग रस देने की क्षमता महर्षि गौतम में नहीं है, जो भगवान राम में है । तब यह जो भक्ति रस का सामंजस्य है मानो यह बताने के लिए है कि हाँ, चरित्र निर्माण भी महान आवश्यक वस्तु है, पर मनुष्य के मन में रस की आवश्यकता है, मनुष्य के जीवन में भाव की आवश्यकता है और यह भक्ति का पक्ष है ।

Tuesday, 13 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

एक सज्जन ने मुझसे कहा कि कथा तो आप प्रारंभ करते हैं समय से, पर लगता है कि अंत में आप थोड़ा समय का ध्यान नहीं रख पाते और कुछ अधिक बोल जाते हैं । तो मैंने यही कहा कि अपनी पत्नी से बात करते समय आप घड़ी सामने रख लेते हैं क्या ? कि जहाँ वह घड़ी की सुई आई कि बस अब प्रेम की चर्चा बंद । इसका अर्थ है जब आप रस और आनंद में डूबे हुए हैं तो आप फिर भी घड़ी को देख रहे हैं तो किस काम के । आप होंगे घड़ीदास । लेकिन वस्तुतः इसका अर्थ है रस का अपना आनन्द है, उसका अपना पक्ष है और उसका अर्थ है । श्रीराम के चरित्र में यही समन्वय है । एक ओर मर्यादा की पराकाष्ठा है, दूसरी ओर रस की पराकाष्ठा है और इसलिए भोगों के संदर्भ में भी श्रीराम के लिए कहा गया - अयोध्या में भगवान राम जब सिंहासन पर बैठते हैं तो वह बहुत सुन्दर वस्त्र पहनते हैं, आभूषण धारण करते हैं, रत्न धारण करते हैं और जब राजा के रूप में निवास करते हैं तो भोगों को भोगते हैं और गोस्वामीजी ने वह पंक्ति लिखी श्रीराम के विषय में जो श्रीराम के चरित्र की परिपूर्णता है और शब्द यही है *'श्रुति पथपालक'*।

Monday, 12 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

मानस का अभिप्राय है कि श्रीराम का चरित्र जो है राग-विराग, त्याग, श्रृंगार, शांति सभी का साकार दृश्य है । सभी श्रीराम के चरित्र में दिखाई देते हैं । भगवान राम जब वन में रहते हैं तब क्या करते हैं - ध्यान रखते हैं कि सीताजी को क्या बात सुनके प्रसन्नता होगी । लक्ष्मण को क्या सुन करके अच्छा लगेगा । भगवान राम के प्रत्येक क्रिया कलाप में उन दोनों को निरंतर प्रसन्न करने की भावना है । यही श्रीराम के चरित्र की परिपूर्णता है कि वे राज्य का परित्याग कर देते हैं, समस्त संसार के ऐश्वर्य का परित्याग कर देते हैं, पर भावना रस का परित्याग नहीं करते हैं । क्योंकि उनको लगता है कि अगर सीता मेरे लिए सब कुछ छोड़ करके वन में आती हैं तो उनको अनुभव नहीं होने देना चाहिए कि किसी वस्तु का उनके लिए अभाव है और श्रीराम ने सचमुच ऐसा ही कर दिया कि लक्ष्मण को, सीताजी को एक क्षण के लिए भी घर की याद नहीं आयी ।

Sunday, 11 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

समाज में एक वर्ग वह है जो चरित्र की स्वच्छता, समाज में चरित्र निर्माण कैसे हो, उसी को महत्व देता है । अगर किसी समाज का चरित्र श्रेष्ठ नहीं होगा तो स्वाभाविक रूप से वह समाज पतन के गर्त में गिरेगा । तो कुछ लोगों का आग्रह चरित्र निर्माण पर है और गोस्वामीजी उनको निमंत्रण देते हुए कहते हैं कि क्या चरित्र निर्माण के लिए श्रीराम से बढ़कर अन्य कोई चरित्र सारे इतिहास में, सारे पुराणों में सारे विश्व में हुआ है कि जो इतना उज्ज्वल चरित्र का हो, जिसमें इतने गुण गण विद्यमान हों और इसके साथ-साथ उन्होंने यह कहा कि कुछ लोग ऐसे होते हैं कि वे कहते हैं चरित्र तो क्रिया की वस्तु है । पर अगर मनुष्य के अन्तर्ह्रदय में भावना नहीं है, रस नहीं है तो फिर जीवन किस कार्य का । उनकी मान्यता यह है कि जब तक लोगों के ह्रदय में रस का संचार नहीं होगा, भावना का उदरेक नहीं होगा तब तक वह निर्जीव ही रहेगा । इसका निर्माण तो भक्ति के द्वारा ही संभव है और तब भगवान राम से बढ़कर रसमय चरित्र किसका हो सकता है । श्रीराम के स्पर्श से पत्थर की नारी भी अभिचेतन हो जाती है और उसमें भी रस का संचार हो जाता है ।

Saturday, 10 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

बहुधा यही दिखाई देता है कि जब किसी ग्रंथ का आप अध्ययन करें तो ग्रंथकर्ता किसी धर्म विशेष, सम्प्रदाय विशेष, मान्यता विशेष से जुड़ा हुआ होता है और वह अपने धर्म, सम्प्रदाय और मान्यता के अनुकूल ही उस ग्रंथ में प्रतिपादन करता है । और वर्णन करता है और वह ठीक है, वह भी पद्धति है । पर स्वाभाविक है कि अब ऐसी रचना एक धर्म सम्प्रदाय या विशेष वर्ग के लिए ही तो प्रेरक हो सकती है । अनेक आचार्यों ने अपनी-अपनी पद्धति से व्याख्यायें की और सभी व्याख्यायें बड़े महत्व की हैं और विभिन्न व्यक्तियों के लिए प्रेरक हैं, कल्याणकारी हैं । पर उनमें भिन्नता है । एक सम्प्रदाय से जुड़ा हुआ व्यक्ति दूसरे सम्प्रदाय की मान्यता को नहीं स्वीकार कर पाता, उसे लगता है कि यह सही नहीं है । ऐसी स्थिति में गोस्वामीजी की जो मुख्य भूमिका थी वह थी समन्वय की । और तब उन्होंने भगवान राम के चरित्र के रूप में घाटों की परिकल्पना की । उनका अभिप्राय यह है कि भगवान श्रीराम का जो चरित्र है उसमें वे सभी गुण विद्यमान हैं, जो समाज में या विश्व में व्यक्तियों को अपेक्षित लगते हैं, आवश्यक लगते हैं और उनका जो अभिष्ट है वह उन्हें प्राप्त हो सकता है ।

Friday, 9 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

गोस्वामीजी ने श्री रामचरितमानस ग्रंथ की रचना के प्रारंभ में जब मानसरोवर से रामकथा की तुलना की और उन्होंने कहा कि भगवान शंकर ने इसकी रचना की और मैं तो एकमात्र उसका अनुवाद ही प्रस्तुत कर रहा हूँ तो उनसे पूछा गया कि शंकरजी ने जो रचना की वो तो ठीक है, पर आपने भी इसमें कुछ किया या नहीं ? आपकी भूमिका क्या है ? तब गोस्वामीजी ने एक सूत्र दिया कि मैंने इसमें घाटों की रचना की । मानसरोवर की यात्रा जो लोग कर चुके हैं वे जानते हैं कि मानसरोवर में तो घाट नहीं है । गोस्वामीजी इस ग्रंथ की तुलना भी उसी मानसरोवर से ही करते हैं । पर मानसरोवर की यात्रा बड़ी कठिन है और मानसरोवर का दर्शन करके बस धन्यता का अनुभव करते हैं । तो इसका अभिप्राय यह है कि मानसरोवर सबके लिए सुगम नहीं है । गोस्वामीजी ने भगवान शंकर के द्वारा की गयी रचना, जो दिव्य देव वाणी में थी, उसे ग्रामीण भाषा में आज जिसे हम हिन्दी कहते हैं लिखा । तो उसका उद्देश्य यही तो था कि जैसे मानसरोवर की यात्रा अत्यंत कठिन है उसी प्रकार से भगवान शंकर ने जिस रामचरितमानस सर की रचना की वह अत्यंत दुर्गम, अत्यंत कठिन है । उस तक पहुँचना प्रत्येक व्यक्ति के लिए संभव प्रतीत नहीं हो रहा था । तो मानो उन्होंने यह चेष्टा की कि यह श्रीराम का जो दिव्य चरित्र है वह अधिक से अधिक लोगों को मिल सके और अधिकांश व्यक्ति उससे लाभान्वित हो सकें । तब उन्होंने भाषा के माध्यम से उसे सुगम बना दिया ।

Thursday, 8 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

रामायण में चार के अंक के द्वारा बहुत कुछ कहा गया है  । चार घाटों की बात भी कही गयी है, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार उसको पवित्र करने वाली साधनाओं का भी संकेत किया गया है । इस संदर्भ में भुशुण्डि जी चार वृक्षों के नीचे चार प्रकार की साधना करते हैं । आजकल बड़ी चर्चा रहती है कि वातावरण बड़ा प्रदूषित हो गया है । वैज्ञानिक भी चिन्तित हैं कि भविष्य में क्या होगा ? वैज्ञानिकों को यह दिखाई पड़ रहा है कि सूर्य की किरणों में जो विषैले तत्व हैं उसको रोकने के लिए पृथ्वी और सूर्य के बीच एक ओजोन पर्त है जिसके द्वारा वे किरणें मनुष्य पर घातक प्रभाव नहीं डाल पाती । पर इन वर्षों में अनुभव किया गया कि उस ओजोन पर्त में छिद्र हो रहा है और चिन्तित वैज्ञानिक यह सोचने लगे हैं कि अगर इसी प्रकार से वातावरण में प्रदूषण बढ़ता गया और ओजोन पर्त कहीं नष्ट हो गयी, तब तो सारी मानव जाति का, सारी पृथ्वी का विनाश निश्चित है और तब बहुत बार आग्रह किया जाता है कि इस प्रदुषण को रोकने का उपाय क्या  है ? अनेक उपाय हैं जैसे वनों का लगाना । वृक्ष काटे जा रहे हैं, उन्हें फिर से लगाया जाना चाहिए । इसका अभिप्राय है कि यह जो आज प्रदुषण है, वह भी व्यक्ति की उन्नति की देन है, विज्ञान ने इतनी उन्नति के साथ अगर बहुत सी वस्तुएँ दी हैं तो उसके भयानक परिणाम भी दिये हैं और केवल यह सत्य प्रकृति का ही नहीं है । हमारे आपके जीवन में भी जब उन्नति होती है, तो उन्नति के साथ प्रदुषण बहुत आने की संभावना रहती है । बाहर का प्रदुषण मिटे उसके लिए तो वृक्ष लगाना चाहिए, पर बाहर जो प्रदुषण है मिटे, और भीतर प्रदुषण बढ़ता जाय तो ? इसलिए भीतर भी वृक्ष लगाइए । आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि बाहर ही नहीं, बाहर भी शुद्ध वायु हो, बाहर भी प्रदुषण मुक्त हो, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है कि हमारे ह्रदय में, हमारे अन्तःकरण में प्रदुषण मिटे, दोष मिटे और प्रदुषण को मिटाने के लिए चाहे आप चार घाट की कथा सुनिए और चाहे चार वृक्ष अपने ह्रदय में लगा दीजिए और उनके नीचे जो चार प्रकार की साधनाएँ बतायी गयी उन साधनाओं के माध्यम से हमारा ह्रदय शुद्ध हो सकता है, पवित्र हो सकता है ।

Wednesday, 7 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान श्रीराम का जो चरण हैं उन्हें पाने के लिए भक्त व्यग्र रहते हैं, महामुनि व्यग्र रहते हैं । मानस में एक पात्र हैं महाराज जनक और दूसरे पात्र हैं केवट । वर्ण की, बुद्धिमता और ज्ञान की दृष्टि से जनक श्रेष्ठ हैं । भगवान के चरण प्रक्षालन का सौभाग्य दोनों व्यक्तियों को मिला । इन दोनों में सर्वथा भिन्नता है । मानो जनक का प्रसंग यह बताता है कि हम पात्र बनेंगे तो भगवान को, भगवान का पद पा सकेंगे और केवट का प्रसंग यह बताता है कि उसने कोई बर्तन नहीं ढूंढा । उसने नाव में पड़ा हुआ काठ का कठौता, वह कोई चरण धुलाने के लिए नया नहीं बनवाया गया था । वह तो नित्य ही नाव में ही जल उलीचने के लिए केवट रखा करते हैं । उसने बड़ा मधुर संकेत किया । बोला, महाराज जिसके द्वारा आज तक मैं जल उलीचता था आज उसके द्वारा उसमें जल लूंगा, मैं नहीं आग्रह करता कि पात्र को आपका चरण मिलता है । मुझे तो लगता है कि आप जिसको चरण दे रहे हैं वही पात्र बन जाता है । व्यक्ति के पास क्या वस्तु है, जल भी आपका, कठौता भी आपका, नाव भी आपकी । मानो यह जो विनम्रता है केवट की इसका अभिप्राय यह है कि वस्तुतः व्यक्ति अगर यह अनुभव कर सके जैसे केवट ने अनुभव किया - जिन लोगों में विशेषता होती है, उन्हें अनुभव करना बड़ा कठिन है, पर यदि होने लगे कि प्रभु हम तो आपको रंचमात्र किसी प्रकार से प्रसन्न करने योग्य नहीं हैं, कोई गुण मुझमें नहीं है, उसे ही सौभाग्य मिलेगा ।

Tuesday, 6 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

एक व्यक्ति ने कहीं से सुन लिया कि एक व्यक्ति हैं जो बहुत मधुर गाय का दूध बाँटते हैं, बिना मूल्य के बाँटते हैं । उसके पास मूल्य देने की शक्ति नहीं थी । वह पहुँच गया और उन सज्जन से कहा कि मैंने सुना है कि आप बिना मूल्य के दूध देते हैं तो मुझे भी दीजिए । उदार सज्जन ने उनसे कहा, ठीक है, मैं दूँगा, बर्तन लाइए । आपके हाथ में तो कोई बर्तन नहीं दिखाई देता ? उस व्यक्ति ने कहा कि दूध के साथ क्या आप बर्तन नहीं दे सकते हैं ? ऐसा करिये कि बर्तन भी आप ही दे दीजिए । मानो यही है असमर्थ की साधना । समर्थ व्यक्ति पहले साधना के द्वारा अपना निर्माण करता है और भगवान से कृपा की मांग करता है । पर गोस्वामीजी जैसा व्यक्ति कहता है कि महाराज यहाँ तो दूध ही नहीं, बर्तन भी आपको ही देना है । यहाँ पात्र बन करके मैं आपको पाऊँ इसके स्थान पर अगर पात्र की आवश्यकता है तो पात्र का निर्माण भी आपके द्वारा ही होना है ।

Monday, 5 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

दो शब्द बड़े महत्व के हैं, बर्तन और भरना । जो बर्तन होता है वह गढ़ा जाता है और जब कोई वस्तु उसमें डाली जाती है तो 'भरना' उसको कहते हैं । एक घड़ा है, कुम्हार के द्वारा उसको गढ़ा गया अथवा किसी स्वर्णकार या किसी कारीगर के द्वारा किसी धातु का बर्तन गढ़ा गया । तो गढ़ने के पश्चात जब बर्तन बन गया, तो उसमें आप जो भी भरना चाहें - दूध, जल, अन्य कोई वस्तु या उसमें कोई वस्तु दान के रूप में भर दें । इसी प्रकार मनुष्य की साधना का उद्देश्य है - अपने आप को गढ़ना । साधना का उद्देश्य है - व्यक्ति को पात्र बनाना, व्यक्ति को योग्य बनाना । व्यक्ति का निर्माण साधना के द्वारा किया जाता है और फिर साधना के द्वारा जब कोई व्यक्ति पात्र बन जाता है तो पात्र बनने के पश्चात वह भगवान के सम्मुख निवेदन करता है कि आप अपनी कृपा के द्वारा इसको भर दीजिए, इसको सम्पूर्णता प्रदान कीजिए ।

Sunday, 4 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

जब भगवान शंकर पार्वतीजी को कथा सुनाते हैं तो उन्होंने कहा, पार्वती मैं तुम्हें वह कथा सुना रहा हूँ जो भुशुण्डि ने गरुड़ को सुनायी थी । माना यह जाता है कि भगवान शंकर मानस के रचियता हैं, पर वे कहते यही हैं कि यह कथा वह है जो भुशुण्डिजी ने गरुड़ को सुनायी और भुशुण्डिजी यह सुनाते हैं कि हमने भगवान शंकर से या उनके माध्यम से महर्षि लोमश के द्वारा जो कथा सुनी थी वह मैं सुना रहा हूँ और याज्ञवल्क्य जी भारद्वाज जी से कहते हैं कि यह कथा वह है जिसे शंकरजी ने पार्वतीजी को सुनाया । कैसी अनोखी बात है मौलिकता को लोग बहुत बड़ा गुणगान मानते हैं । जब कोई वस्तु नई हो तो लोग उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि यह सर्वथा मौलिक कृति है और कृतिकार भी इस पर गर्व अनुभव करता है कि उसने कोई नई वस्तु दी है । लेकिन यहाँ तो ठीक उल्टी बात है । यहाँ तो भगवान शंकर जिन्हें हम आदि रचयिता मानते हैं, वह भी यह दावा नहीं करते कि मेरी बनायी हुई जो रामकथा है वह मैं सुना रहा हूँ । इसका तत्व रामकथा का अनादित्व, अनंतत्व है । उसका तात्पर्य यह है कि वस्तुतः व्यक्ति जब तक अपने अभिमान से, अपने कर्तव्य से मुक्त नहीं होता और यह मानता है कि उसने रामकथा की रचना की है, रामकथा को एक नया रूप, नया दर्शन दिया है तो यह उसकी धृष्टता की पराकाष्ठा है । रामकथा तो अनादि और अनन्त है और स्वाभाविक रूप से मानो वक्ता ऐसा अनुभव करता है कि स्वयं उसका इसमें कोई कर्तृत्व नहीं है, कोई पुरुषार्थ नहीं है, कोई योग्यता नहीं है ।

Saturday, 3 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

आप पढ़ते हैं कि यह रामकथा वह है जिसे भगवान शंकर ने पार्वती को सुनाया, श्रीराम का चरित्र वह है, जिसे काकभुशुण्डिजी ने गरुड़ जी को सुनाया, श्रीराम का चरित्र, जिसे महर्षि याज्ञवल्क्य ने भारद्वाज जी को सुनाया और वही रामकथा जिसे गोस्वामी तुलसीदास जी भाषा के माध्यम से हमें दिया । यद्यपि उन्होंने यही कहा कि मैंने अपने अन्तःकरण के सुख के लिए ही इसका निर्माण किया है, लेकिन उसे सबके लिए समान रूप से उन्होंने सुलभ किया । तो ये चार वक्ता, चार श्रोता, चार घाट या श्रीराम के ये चार भाई - श्रीराम, श्रीभरत, श्री लक्ष्मण, श्री शत्रुघ्न या सुमेरु पर्वत के चार शिखर पर चार वृक्ष, इनका सांकेतिक तात्पर्य क्या है, इसका अभिप्राय क्या है, आने वाले दिनों में इस पर दृष्टि डालेंगे ।

Friday, 2 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

प्रत्येक व्यक्ति का जो निर्माण हुआ है, उसमें एक जैसी बातें दिखाई देती हैं, पर भिन्नताएँ भी अनेक हैं और भिन्नताओं के स्वाभाविक रूप का दर्शन, आप अपने जीवन में, समाज में करते होंगे । कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं कि जो प्रत्येक बात को बुद्धि की कसौटी पर, तर्क की कसौटी पर कस करके देखना चाहते हैं । कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो बुद्धिमता और तर्क को बहुत महत्व नहीं देते, वे सहज विश्वास से भक्ति भावना से कथा श्रवण करते हैं और कुछ श्रोता ऐसे होते हैं जिनकी दृष्टि उपयोगिता पर होती है । कथा सुनने से क्या लाभ है या उसमें हमें क्या संदेश दिया गया क्या प्रेरणा दी गई यह एक सामाजिक दृष्टि है और एक चौथी दृष्टि ऐसी भी हो सकती है, जिसको गोस्वामीजी ने रखने की चेष्टा की । अगर कोई व्यक्ति बुद्धिवादी है, बुद्धि प्रधान है तो हम कहेंगे यह ज्ञानी है, अगर कोई भावना और ह्रदय प्रधान है तो हम कहेंगे यह भक्त है, कोई व्यक्ति अगर कर्म या सामाजिक संदर्भ से जुड़ा हुआ है, तो हम उसे कहेंगे यह कर्म धारणा से जुड़ा हुआ व्यक्ति है । गोस्वामीजी कहते हैं कि समाज में कुछ लोग ऐसे होते हैं कि जिनमें एक प्रकार की हीनता होती है, जिनमें अभाव की अनुभूति होती है और तब स्वाभाविक रूप से मानो वह संदेश देना चाहते हैं कि रामकथा ज्ञानियों के लिए भी उपादेय है, भक्तों के लिए भी परम रसमयी है, समाज सेवियों के लिए और कर्म प्रधान व्यक्तियों के लिए पुरुषार्थ की प्रेरणा देने वाली है पर, जो असमर्थ से असमर्थ व्यक्ति है उनको भी इस कथा के माध्यम से वह संदेश प्राप्त हो सकता है कि वह ऐसा अनुभव करें कि नहीं-नहीं हम भी इस जल को पी करके, इस जल को पा करके अपने जीवन में तृप्ति का अनुभव कर सकते हैं । इस तरह से मानस में चार घाटों की परिकल्पना की गई ।

Thursday, 1 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

आपने प्राचीन काल के, पुराने समय के सरोवर देखे होंगे । आजकल सरोवरों की परम्परा नहीं है । जल के नये साधन हैं और नये रूप में उनका उपयोग किया जा रहा है पर आपने पुराने सरोवर जहाँ देखे होंगे, वहाँ आपने देखा होगा कि उसमें जो चारों किनारे हैं वो किस रूप में प्रस्तुत किये जाते रहे हैं । उसमें तीन ओर तो घाट होते थे, सीढ़ियाँ होती थीं और चौथी ओर सीढ़ियाँ नहीं होती थी । केवल वह सपाट बना हुआ रहता था और उसका उद्देश्य यह होता था कि तीन घाट मनुष्यों के लिए थे, चौथा घाट पशुओं के लिए, उनके उपयोग के लिए बनाया जाता था, उसको गऊ घाट कहते थे । किसी भी पशु के लिए सीढ़ी के माध्यम से जल तक पहुँचना संभव नहीं है, इसलिए उसके लिए उसे सपाट रखा जाता था । उसका मानो अभिप्राय यह है कि जैसे आप यहाँ पर कथा श्रवण करने के लिए भिन्न-भिन्न दिशाओं से आये हुए हैं । आप नगर के जिस भाग में निवास करते हैं उस भाग से यहाँ उपस्थित हैं और आप सब एक साथ कथा श्रवण कर रहे हैं । लगता तो यही है कि एक वक्ता कथा कह रहा है, पर अगर भिन्न-भिन्न श्रोताओं से यह प्रश्न किया जाय कि आपने आज कथा में क्या सुना, तो आप देख करके चकित हो जायेंगे कि उन श्रोताओं ने जो सुना होगा, उसे जिस रूप में ग्रहण किया होगा, उसमें निश्चित रूप से भिन्नता होगी । कोई व्यक्ति ऐसा होगा कि उसको एक भाग, किसी को दूसरा भाग, किसी को तीसरा या चौथा भाग प्रिय होगा ।