Monday, 31 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

देश के एक बहुत बड़े उद्योगपति मेरे पास आए और उन्होंने मुझसे एकान्त में प्रश्न किया कि 'जीवन का लक्ष्य क्या है ?' सन्त-महात्मा साधारणतया यही कहते सुने जाते हैं कि जीवन का लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है । अब उनसे इस उत्तर को सुनने के बाद किसी के पूछने पर हम भी यही बात दुहरा दें, तो यह एक वाक्य की पुनरावृति मात्र ही होगी, वास्तविकता नहीं । मैंने उन्हें उत्तर देने के स्थान पर उनसे ही पूछ दिया कि आपको क्या लगता है ? मैं यदि कोई लक्ष्य बता दूँ और आप उसी बात को दुहराते रहें, तो इससे कुछ अन्तर पड़ने वाला नहीं है । इसके पश्चात उनसे एक लम्बा विचार-विनिमय हुआ । इसीलिए हमारे शास्त्र बड़े मनोवैज्ञानिक रूप में इस तथ्य की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं । शास्त्रों में एक ओर जहाँ यह लिखा हुआ है कि हमारा लक्ष्य ईश्वर को पाना है अथवा आत्मज्ञान प्राप्त करना है, वहीं दूसरी ओर यह भी लिखा हुआ है कि मनुष्य के पुरुषार्थ के चार उद्देश्य हैं - अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष - इन चार फलों की प्राप्ति करना । इस प्रकार जीवन में चार लक्ष्यों की बात सामने आती है । अतः शास्त्र जब जीवन के एक लक्ष्य की बात न कहकर चार लक्ष्यों की बात कहते हैं तो इसका संकेत यही है कि व्यक्ति वहीं से प्रारंभ करे जहाँ पर वह अवस्थित है ।

Sunday, 30 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी का प्रारम्भिक जीवन जैसा कि हमें ज्ञात है, अत्यंत दीनता, दरिद्रता और अभावों में बीता । 'मानस' और 'विनयपत्रिका' दोनों में ही दीनता पूर्ण अनेक पक्तियाँ पढ़ने को मिलती हैं । एक दिन हिन्दी की प्रसिद्ध कवियत्री श्रीमती महादेवी वर्मा ने मुझसे कहा कि गोस्वामीजी की यह दीनताभरी वाणी समाज के लिए अकल्याणकारी नहीं है ? क्या इसे पढ़कर व्यक्ति के जीवन में अपने आपको दीन-हीन मानने की वृत्ति नहीं आ जाएगी ? वैसे यह प्रश्न बड़ा युक्तिसंगत लगता है, पर आइए इस पर एक भिन्न दृष्टि से विचार करके देखें ! प्रश्न यह है कि हम विचार कहाँ से प्रारंभ करें ? हम जिस स्थिति में हैं वहाँ से अथवा 'क्या होना चाहिए' वहाँ से ! तो विचार का श्रीगणेश वहाँ से होना चाहिए कि हमारी वर्तमान स्थिति क्या है । पहले हम यह जान लें कि हम कहाँ पर स्थित हैं । यह तो कोई भी कह सकता है कि व्यक्ति का शरीर स्वस्थ और रोगमुक्त होना चाहिए । पर जिससे आप यह बात कहें उसकी क्या स्थिति है । वह रोगग्रस्त है अथवा अपने आपको स्वस्थ अनुभव कर रहा है । यदि उसके शरीर में रोग है, दुर्बलता है तो इस बात को दुहरा देने मात्र से कि व्यक्ति को स्वस्थ होना चाहिए, उसे कोई लाभ होनेवाला नहीं है । इसलिए कोई आदर्श वाक्य दुहराने के स्थान पर सर्वप्रथम जो वर्तमान स्थिति है, उस पर विचार करना आवश्यक है । व्यक्ति की जो समस्या है उस पर ध्यान देने की आवश्यकता है ।

Saturday, 29 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी की आत्मकथा (विनय-पत्रिका) में शरीर से जुड़े सम्बन्धों का वर्णन नहीं है, यह तो मन की आत्मकथा है । इसमें मन के विविध और विलक्षण चित्रों के दर्शन आपको होंगे । साधारण दृष्टि से देखने पर हमें ऐसा लग सकता है कि इसमें रामचरितमानस में जैसा रस है, वैसा रस नहीं है, पर गहराई से दृष्टि डालने पर हमें ज्ञात होता है कि ये दोनों तो एक-दूसरे के पूरक ग्रन्थ हैं । 'विनयपत्रिका', प्रभु के नाम लिखी गई एक पाती है जिसे लेकर गोस्वामीजी प्रभु की सभा में गए । इस रचना की पृष्ठभूमि और इसमें जो संकेत सूत्र हैं, वे दोनों ही अत्यंत महत्वपूर्ण हैं ।

Friday, 28 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी के जन्म के समय आनन्द-उल्लास के कोई चिन्ह दिखाई नहीं देते पर उस महापुरुष ने अनेकानेक जीवों के जीवन में आनन्द, उत्साह और उल्लास का संचार किया । गोस्वामीजी ने अपनी आत्मकथा जिस रूप में लिखी है उसमें उन्होंने अपने कुल, माता-पिता, जन्म स्थान आदि का वर्णन उस पद्धति से नहीं किया है जैसा कि अन्यत्र देखा जाता है । इसलिए उनके इस ग्रन्थ की तुलना चित्र से न करके 'दर्पण' से करना अधिक उपयुक्त होगा । हम जब किसी व्यक्ति के चित्र के सामने खड़े होते हैं तो उस व्यक्ति की आकृति और उसके मुख के भाव को देखते हैं, पर दर्पण की विशेषता यह है कि उसके सामने खड़े होने पर हम अपने आपको देखते हैं । गोस्वामीजी की आत्मकथा की विशेषता भी यही है कि हम सब उसमें अपने आपको देख सकते हैं । गोस्वामीजी के बारह ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं, पर उनमें से भी जिन दो ग्रन्थों का अधिक प्रचार है, वे हैं - 'रामचरितमानस' और 'विनय पत्रिका' । 'रामचरितमानस' तो रामकथा है और 'विनय पत्रिका' गोस्वामीजी की आत्मकथा है ।

Thursday, 27 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

गुरू वसिष्ठ भगवान राम के नामकरण के समय कहते हैं कि भगवान राम का नाम और उनकी कथा दोनों ही परम कल्याणकारी हैं, विश्राम प्रदान करने वाले हैं । ये चेतना प्रदान करने वाले हैं, जगाने वाले हैं और सुलाकर विश्राम प्रदान करने वाले भी हैं । भगवत्कथा 'मोह की निद्रा' से जगाती है और 'भगवद् विश्वास' के रूप में विश्राम प्रदान करती है ।

Wednesday, 26 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

गोस्वामीजी ने अपनी भूख के विषय में कहा है कि यदि कोई मुझे चने के चार दाने दे देता था तो ऐसा लगता था कि मानो चार फल मिल गये हों । पर गोस्वामीजी ने समाज से मिलनेवाले अपमान और कष्टों के विष को भगवान शंकर की तरह पी लिया और हम सबको रामकथा का अमृत पिलाकर धन्य बना दिया । मनुष्य के जीवन में अन्तर्बाह्य से जुड़ी अनेकानेक समस्याएँ हैं । बाहर की समस्याएँ भी कष्ट देती हैं, पर मन की समस्याएँ कहीं अधिक दुख देती हैं । गोस्वामीजी ने भी मन से जुड़ी समस्याओं का अनुभव किया और उनका समाधान उन्होंने प्रभु के चरित्र में पाया । वे कहते हैं - मैंने प्रभु की कृपा से ही विश्राम प्राप्त किया । वस्तुतः भगवान राम के नाम की विशेषता यही है ।

Tuesday, 25 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

देवता तो अमृत पीकर अमर हुए, पर भगवान शंकर विषपान करके भी अमर हो गए । संसार में भी समुद्र-मंथन चलता ही रहता है । उसमें सुख और दुख दोनों ही आते हैं । पर हमारी वृत्ति यही होती है कि सुख का अमृत मिलने पर हम उसे अकेले ही पीना चाहते हैं और जब दुखरूपी जहर प्राप्त होता है तो उसे बाँटना चाहते हैं । भगवान शंकर का जीवन-दर्शन यह नहीं है । मानो वे कहते हैं कि दुख स्वयं पी लो, सुख सबको बाँट दो ।

Monday, 24 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

रामायण में वर्णन आता है कि जब रावण की आज्ञा से मारीच कपट-स्वर्णमृग बनकर चला तो बड़ा प्रसन्न दिखाई देता है । मारीच प्रभु के बाण लगने से अपने मरने की कल्पना करके यह जो प्रसन्न हो रहा है, उसके पीछे एक मधुर संकेत है । मारीच को आज स्मरण आता है कि प्रभु जब विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए पधारे थे, उस समय प्रभु ने जो बाण मेरे ऊपर चलाया वह बिना फल वाला, अधूरा बाण था, फिर भी उसके लगने से मेरी यह दशा हो गई कि मैं जिधर देखता उधर राम और लक्ष्मण दोनों भाई ही दिखाई पड़ते थे । मारीच यह सोचकर प्रसन्न हो रहा है कि आज तो फल सहित पूरे बाण का भरपूर स्वाद मिलेगा । मारीच के मनोभाव को इस रूप में समझा जा सकता है कि जैसे आपको किसी फल या मिठाई का एक छोटा-सा टुकड़ा दिया जाय, और उसे चखने के बाद आपको वह इतना स्वादिष्ट प्रतीत हो और यह लगे कि ऐसा अद्भुत स्वाद तो कभी मिला ही नहीं । और एक दिन यह पता चले कि वही फल आपको पूरा-का-पूरा ही मिलने वाला है तो आप प्रसन्न होंगे या नहीं ? मारीच की भी ठीक यही मनःस्थिति है । वह सोचता है कि प्रभु के बिना फल वाले (अधूरे) बाण लगने से जब इतना आनन्द मिला था तो आज, जब फलसहित पूरा बाण लगेगा तो न जाने और कितना आनन्द मिलेगा ! इसका अर्थ है कि जो दुख हमें ईश्वर से जोड़ दे, ईश्वर की स्मृति दिला दे, वह दुख फिर दुख नहीं रह जाता ।

Sunday, 23 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

जीवन में दुख तो आता ही है, पर 'क्यों आता है' यदि इस प्रश्न पर विचार किया जाय तो भिन्न-भिन्न दृष्टियाँ सामने आती हैं । कुछ लोगों को लगता है कि हमारे कर्मों के द्वारा ही जीवन में दुख आता है, अतः उसे भोगने से ही उससे छुट्टी मिल सकती है । पर यही प्रश्न यदि आप ज्योतिषी से कर दें तो वह यही कहेगा कि 'ग्रहों के कारण दुख-सुख आते हैं' । भूत-प्रेत को मानने वाले ओझा आदि किसी भूत, प्रेत व चुड़ैल का नाम लेकर कहेंगे कि वह विध्न-बाधा डाल रहा है । कई बार व्यक्ति दुख आने पर किसी अन्य व्यक्ति को दोष देता हुआ दिखाई देता है कि अमुक व्यक्ति ने हमारा काम बिगाड़ दिया । पर एक भक्त की दृष्टि सर्वथा भिन्न होती है । उसको इसमें भी भगवान की कृपा दिखाई देती है । ऐसी स्थिति में भी वह भगवान का स्मरण करता है । भगवान शंकर की भी यही दृष्टि है । मारीच के जीवन में भी हमें यही दृष्टि दिखाई देती है ।

Saturday, 22 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

समुद्र-मंथन से जब विष निकला और भगवान विष्णु ने देवताओं को समझाते हुए कहा कि घबराओ मत ! अमृत निकलने के पहले विष भी निकलता है । तुम धैर्य रखो, अमृत भी अवश्य निकलेगा । तब देवताओं ने कहा - महाराज ! इस विष की ज्वाला से हम सब लोगों की मृत्यु के पश्चात यदि अमृत निकलेगा भी, तो वह किस काम का ? भगवान विष्णु ने कहा कि तुम लोगों में से यदि कोई इसे पी ले तो इस विष की ज्वाला से सबको मुक्ति मिल जायेगी । पर देवता पीछे हट गए । जीवन में दुख कौन स्वीकार करना चाहेगा ? तब भगवान विष्णु ने देवताओं से कहा कि तुम लोग जाकर भगवान शंकर से प्रार्थना करो कि वे इस विष को पी लें । भगवान शंकर उस समुद्र-मंथन में सम्मिलित नहीं थे । भगवान शंकर की दृष्टि सर्वथा भिन्न है । भगवान शंकर ने जब देवताओं से यह सुना कि इसे भगवान विष्णु ने भेजा है तो वे गदगद हो गए - मुझसे वे कितना प्रेम करते हैं ! वे स्वयं विषपान करने में समर्थ हैं । वे चाहते तो इसे नष्ट भी कर सकते थे । पर उन्होंने इसे मेरी महिमा बढ़ाने के लिए ही मेरे पास भेजा है । और भगवान विष्णु जिस वस्तु को भेजेंगे वह तो विष  (मारक) हो ही नहीं सकती, वह वस्तु तो परम कल्याणकारी ही होगी । भगवान शंकर की यह वृत्ति यदि जीवन में आ जाय तो वह जीवन सार्थक और धन्य हो जायेगा । इस कथा का यही सूत्र है ।

Friday, 21 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

पुराणों में कथा आती है कि भगवान विष्णु के बताने पर अमृत पाने के लिए देवताओं और दैत्यों ने मिलकर समुद्र-मंथन की प्रक्रिया प्रारंभ की । पर मन्थन के परिणामस्वरूप जो प्रथम वस्तु बाहर निकली उसके कारण एक भयावह दृश्य उपस्थित हो गया । क्योंकि समुद्र से एक नीलवर्ण का भयानक विष बाहर निकल आया जिसकी ज्वाला में देवताओं और दैत्यों के साथ संसार में सब-के-सब जलने लगे । व्याकुल होकर देवताओं ने भगवान विष्णु को उलाहना दिया - महाराज ! आपने कहा था कि अमृत निकलेगा, पर यहाँ तो अमृत के स्थान पर विष निकल आया ! यह हमारे जीवन का भी सत्य है । हम सब चाहते हैं कि हमें सुख मिले और हमारे दुख दूर हों । हर व्यक्ति, चाहे वह भला हो या बुरा हो, देवता हो अथवा दैत्य हो यही चाहता है । बहुधा यह देखा जाता है कि वान्छित सुख के स्थान पर जब जीवन में दुख, प्रतिकूलता अथवा संकट आ जाय तो अधिकांश व्यक्तियों की आस्था डगमगाने लगती है । लोगों को लगता है कि शास्त्रों में जो लिखा हुआ है कि जिस कार्य से जैसा परिणाम मिलना चाहिए, वैसा न होकर विपरित क्यों हो रहा है ? देवताओं के मन में भी यही संशय उत्पन्न हो गया । भगवान विष्णु ने देवताओं को समझाते हुए कहा कि घबराओ मत ! अमृत निकलने से पहले विष भी निकलता है । तुम धैर्य रखो, अमृत भी अवश्य निकलेगा ।

Thursday, 20 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

बुरे विचारों के प्रति हमारा आकर्षण क्यों है ? इसका उत्तर इस रूप में दिया जा सकता है कि कई बार व्यक्ति को ऐसा लगता है कि अच्छे विचारों के लिए त्याग करना पड़ेगा, कष्ट सहना पड़ेगा और बुरे विचारों के माध्यम से हम अपने भोग और वासना को तृप्त कर सकेंगे । इसलिए आप पायेंगे कि बुरे विचार मर-मर कर फिर से जी उठते हैं । व्यक्ति का भोगों के प्रति ऐसा प्रबल आकर्षण है ! दूसरी ओर जीवन में अच्छे विचार तो आते हैं पर वे क्रियान्वित नहीं हो पाते । यदि उन्हें किसी तरह प्रारंभ भी कर दिया जाय तो पूरे नहीं हो पाते यही मानो देवताओं की मृत्यु की शाश्वत समस्या है ।

Wednesday, 19 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

 .....कल से आगे....
बलि ने गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की । पर उसने साथ ही यह भी कहा - गुरुदेव ! आप कह रहे हैं कि वे ईश्वर हैं, तब तो वे सर्वशक्तिमान हैं, चाहे जो कर सकते हैं । वे यदि चाहते तो बलपूर्वक भी मेरा यह राज्य छीन सकते थे । पर उनकी यह कितनी बड़ी कृपा है कि वे एक याचक के रूप में आकर उसे लेना चाहते हैं । यह तो मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य है । अतः मैंने निश्चय किया है कि मैं अपने दिए गए वचन पर दृढ़ रहकर, वे जो कुछ भी मांगेंगे, उन्हें सब समर्पित कर दूँगा । शुक्राचार्यजी बलि को ऐसा करने से रोकते हैं । वे क्यों रोकते हैं ? वे तो इतने ज्ञानवान गुरु हैं कि ईश्वर को पहिचान गए । पर ईश्वर को पहिचानने के बाद भी वे बलि को समर्पण से रोकना चाहते हैं, जबकि शास्त्रों में यह लिखा हुआ है कि भगवान को पहचान लेने के बाद यज्ञ, कर्म आदि सब कुछ उन्हें समर्पित कर देना चाहिए, यही जीवन की धन्यता है । यहाँ बलि का सौभाग्य देखिए कि भगवान स्वयं समर्पण कराने के लिए आए हुए हैं । पर शुक्राचार्य सोचते हैं कि इस दान से शिष्य की सारी सम्पत्ति चली जाएगी तो मुझे जो सुख-सुविधा मिली हुई है, वह भी छिन जाएगी । भोग की यही लालसा जो उनमें विद्यमान है, वही बलि को समर्पण से रोकना चाहती है ।

Tuesday, 18 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

इन्द्र की प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु वामन के रूप में अवतार लेते हैं । बलि ने सारे संसार को जीत लेने के बाद एक महान यज्ञ का आयोजन किया । उस यज्ञ में भगवान वामन एक याचक के रूप में पधारते हैं । उनकी तेजस्विता से बलि प्रभावित हो जाता है । वह उनसे कहता है कि आपके आगमन से हमारा यज्ञ धन्य हो गया । आप आज्ञा दीजिए कि हम आपकी क्या सेवा करें ! बलि के समीप ही शुक्राचार्यजी बैठे हुए थे । उन्होंने भगवान वामन को पहिचान लिया कि ब्रह्मचारी के रूप में साक्षात भगवान विष्णु ही आए हुए हैं । शुक्राचार्य ने बलि को संकेत से कहा कि तुम बाहर चलो, तुमसे एकांत में कुछ बातें करनी है । वे बलि को यज्ञशाला से बाहर ले गए और पूछा - तुम जानते हो यह ब्रह्मचारी कौन हैं ? बलि ने कहा - कोई बहुत बड़े तेजस्वी महापुरुष लगते हैं । शुक्राचार्य बोले - ये कोई ब्रह्मचारी नहीं हैं, स्वयं भगवान विष्णु ही वामन का रूप बनाकर तुम्हारी सारी सम्पत्ति और राज्य को लेने के लिए आए हुए हैं । तुमने बिना जाने-समझे उनको माँगने का वचन देकर ठीक नहीं किया । अतः अब लौटकर उनसे कह दो कि मैं आपको दान नहीं दूँगा । बलि का जन्म यद्यपि दैत्य जाति में हुआ था और उसमें दैत्यों के संस्कार भी थे, पर उस समय उसमें भक्त प्रह्लाद जैसी भावना का उदय हुआ । आप जानते ही होंगे कि बलि के पिता विरोचन और विरोचन के पिता भक्त प्रह्लाद थे । प्रह्लाद-पौत्र बलि ने शुक्राचार्य की बात सुनी तो वह गदगद हो गया । उसने कहा - गुरुदेव ! आप धन्य हैं । आपने ईश्वर को पहिचान लिया और अपने शिष्य को उनका साक्षात्कार करा दिया । आप जैसा गुरु पाकर आज मैं धन्य हो गया ।
     .....शेष कल....

Monday, 17 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

दैत्य जाति में जन्म लेने वाले बलि ने अपने पौरुष और पराक्रम से युद्ध में सारे देवताओं को हरा दिया और इस प्रकार पृथ्वी और स्वर्ग दोनों पर अधिकार कर लिया । इन्द्र को यह चिन्ता हो गई कि दैत्यों से लड़कर उन्हें हरा पाना तो हमारे लिए सम्भव है नहीं, अतः हम अपना स्वर्ग कैसे वापस ले सकते हैं । उन्हें लगा कि यह कार्य बिना भगवान का आश्रय लिए सम्भव नहीं है । ऐसा विचार कर सब देवताओं सहित इन्द्र ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि प्रभु ! आप हमारी सहायता करें । देवताओं और दैत्यों का एक बड़ा अन्तर सामने आया । देवताओं की विशेषता यह नहीं है कि उनमें भोग और वासनाओं का अभाव है । भोगों की लालसा तो देवताओं और दैत्यों में एक जैसी ही है, पर भोगों की प्राप्ति और अपनी पराजय के प्रति दोनों के दृष्टिकोण में अन्तर भी है । दैत्यों को अपनी योग्यता और पुरुषार्थ पर भरोसा है, पर देवता असफलता के क्षणों में अपनी असमर्थता स्वीकार कर ईश्वर की शरणागति ग्रहण करते हैं ।

Sunday, 16 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

एक व्यक्ति यह मानता है कि हमें जो योग्यताएं प्राप्त हैं उनका उपयोग हमें अधिक से अधिक भोगों के अर्जन में करना चाहिए । वह अपनी क्षमता का उपयोग सांसारिक सुख और भौतिक उन्नति की प्राप्ति के लिए करता है । पर एक दूसरा दृष्टिकोण भी सामने आता है कि जिसमें व्यक्ति यह सोचता है कि 'शरीर के सांसारिक वस्तुओं की आवश्यकता तो है, पर ये वस्तुएँ ही जीवन का लक्ष्य नही हैं ।' उसे ऐसा लगता है कि इस नाशवान शरीर के लिए भोगों को जुटाने में ही हम सारा जीवन व्यतीत कर दें और इस नश्वर शरीर के अन्तराल में जो अविनाशी चैतन्य आत्मतत्व विद्यमान है उसे भूल जायँ, इससे बढ़कर मनुष्य के विवेक का कोई अनादर नहीं होगा । समाज के इन दो रूपों में मानो हम शुक्राचार्य और बृहस्पति के प्रभाव का ही दर्शन करते हैं ।

Saturday, 15 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

दैत्यों के गुरु हैं शुक्राचार्य और देवताओं के गुरु हैं बृहस्पति । ज्योतिष शास्त्र में इन दोनों के स्वभाव का जो वर्णन प्राप्त होता है उसमें कहा गया है कि बृहस्पति में ज्ञान और विचार की प्रधानता रहती है । बृहस्पति के प्रभाव से ही व्यक्ति शास्त्र, वेदान्त आदि का अध्ययन करता है तथा उपासना-साधना आदि की दिशा में प्रवृत्त होता है । शुक्राचार्य भी विद्वता में बृहस्पति से किसी प्रकार न्यून नहीं हैं, पर दोनों की चिन्तन की दिशा में अन्तर है । आप जानते ही होंगे कि जब शुक्र अस्त हो गया हो तो उस स्थिति में ज्योतिषविद् विवाह-कार्य का निषेध करते हैं । 'शुक्रास्त होने पर कन्या को पति के घर नहीं जाना चाहिए', ऐसा कहा जाता है । इसका संकेत यही है कि जीवन में भोगजनित सुखों का प्रेरक और रक्षक शुक्र ही है । दूसरी ओर जीवन में आत्मतत्व को जानने की आकांक्षा और उसे पाने की प्रेरणा के मूल में बृहस्पति ही है । इस प्रकार बृहस्पति और शुक्र दोनों ही विद्वता में समान हैं पर उन दोनों से प्रेरित समाज और व्यक्ति के जीवन में एक बहुत बड़ा अन्तर हमें दिखाई देता है ।

Friday, 14 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

पुराणों में यह गाथा आती है कि देवता और दैत्य दोनों के ह्रदय में अमृत पाने की इच्छा उत्पन्न हुई । देवता और असुरों का संग्राम चलता रहता था जिसमें दैत्य और देवता दोनों ही मारे जाते थे । पर दैत्यों के गुरु शुक्राचार्यजी को मृतसंजीवनी विद्या का ज्ञान था, इससे दैत्यों को तो जीवनदान मिल जाता था पर देवताओं की संख्या घटती जाती थी । अपनी संख्या अधिक होने के कारण दैत्य आसानी से देवताओं पर विजय प्राप्त कर लेते थे । इसलिए देवताओं को अमृत की आवश्यकता थी क्योंकि वे अमरत्व को प्राप्त कर सकें । देव-दैत्य संघर्ष और उसमें देवताओं की मृत्यु एवं पराजय की यह गाथा वस्तुतः हमारे-आपके जीवन का भी सत्य है । गोस्वामीजी कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में यह दिखाई देता है । हमारे जीवन में जो सद्गुण हैं वे तो मानो देवता हैं और हमारे अन्तःकरण में उत्पन्न होने वाले दुर्गुण-दुर्विचार ही मानो दैत्य हैं । हम सब यह अनुभव करते हैं कि हम अच्छे संकल्प लेते हैं, पर वे श्रेष्ठ विचार पूरे नहीं हो पाते । मानो यही, प्रतीकात्मक रूप से, देवता की मृत्यु है । दूसरी ओर दुर्गुण-दुर्विचार बार-बार हमारे भीतर उत्पन्न होते रहते हैं । इन दोनों के संबंध में पुराणों में जो सूत्र प्राप्त होते हैं वे बड़े महत्व के हैं ।

Thursday, 13 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

गोस्वामीजी ने रामचरितमानस का प्रयाणन किया पर अपने आपको इसका रचियता नहीं मानते । वे कहते हैं कि इस ग्रन्थ की रचना सबसे पहले भगवान शंकर ने की । भगवान शंकर ने सबसे पहले इसकी रचना अपने मानस में की । फिर समय आने पर इसे पार्वतीजी को सुनाया । शंकर के 'मानस' से रचित इस रामचरित्र गाथा का नाम इसीलिए 'रामचरितमानस' पड़ा । गोस्वामीजी जब यह कहते हैं कि 'इस ग्रन्थ की रचना भगवान शंकर ने की' तो वह उनकी शाब्दिक विनम्रता मात्र न होकर एक अनुभूतिजन्य सत्य है । गोस्वामीजी अपने विषय में यह भली-भाँति जानते थे कि जिन गुणों से काव्य-रचना की जाती है, उसमें उसका सर्वथा अभाव है । गोस्वामीजी से पूछा गया कि फिर आपके द्वारा इतने महान ग्रन्थ की रचना कैसे हुई ? इसका उत्तर में वे कहते हैं कि भगवान शंकर के कृपा-प्रसाद से मुझे ऐसी निर्मल मति प्राप्त हो गई जिससे मेरे अन्तःकरण में कवित्त का उदय हो गया । इसलिए इस रचना के मूल में भगवान शंकर की कृपा ही है, अब भले ही ऊपर से कवि के रूप में तुलसीदास दिखाई देता हो ।

Wednesday, 12 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी का पूर्वजीवन दुख, पीड़ा और अपमान से भरा हुआ था । पर इस पीड़ा और तिरस्कार का सामान्यतया जो परिणाम इसे झेलनेवाले में देखा जाता है, वैसा कुछ हमें गोस्वामीजी के जीवन में दिखाई नहीं देता । किसी बुरे व्यक्ति के जीवन के पूर्व इतिहास की जब खोज की जाती है तो बहुधा यही ज्ञात होता है कि समाज से मिलनेवाले अपमान और पीड़ा के कारण ही वह बुरा और अत्याचारी बन गया था । और बदले की भावना ने ही उसे समाज को पीड़ा पहुँचानेवाला बना दिया था । पर गोस्वामीजी ने अपमान और पीड़ा के विष को पीकर भी रामचरितमानस रूपी वह दिव्य अमृत प्रदान किया जिसे पीकर आज भी अगणित व्यक्ति धन्य हो रहे हैं ।

Tuesday, 11 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी ने संसार के थके हुए और जो दीन-हीन अवस्था में हैं, मन की समस्याओं से पीड़ित हैं उन सबको मन की शान्ति और विश्राम की प्राप्ति का सूत्र देते हुए निमंत्रण दिया कि जैसे वन में चारों ओर आग लग जाने पर जो सरोवर का आश्रय प्राप्त कर उसमें कूद पड़े तो वह जलने से बच जाता है, उसी प्रकार जो संसार के विषयों की दुख और चिन्ता की अग्नि में जल रहे हैं, वे यदि आकर इस 'मानस' के दिव्य, असीम और अथाह सरोवर में प्रवेश कर स्नान करेंगे तो इस ज्वाला से बच जाएँगे और उसके मन को विश्राम और सुख की प्राप्ति होगी । हमारा मन ही सभी समस्याओं का केन्द्र है और इस ग्रन्थ की विशेषता यही है कि मन से जुड़ी हुई समस्याओं का समाधान इसके माध्यम से हमें प्राप्त होता है ।

Sunday, 9 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

लंकिनी ने मन की एक और विचित्रता की बात हमारे सामने रखी । वह हनुमानजी से कहती है कि जब मुझे ज्ञात हुआ कि मेरे ऊपर राक्षसों का शासन हो जाएगा तो मैं दुखी हो गई, पर विडम्बना है कि राक्षसों के राज्य में रहते-रहते आज मेरी यह दशा हो गई है कि मैं ब्रह्माजी के वचनों को भी भूल गई और आपको मैंने चोर कहा, खाने की चेष्टा की ! वह कहती है कि मैंने ब्रह्माजी से पूछा था कि महाराज ! फिर परिवर्तन कब होगा ? तो उन्होंने यही कहा कि जब तुम्हारे ऊपर एक बंदर का मुक्का लगेगा जिससे तुम गिर पड़ोगी और तुम्हारे अंदर परिवर्तन आ जाएगा, उस समय तुम समझ लेना कि निशाचरों का विनाश होने ही वाला है । अंत में लंकिनी, हनुमानजी से एक बहुत मधुर बात कहती है कि आप लंका में प्रवेश कीजिए । पूछा जा सकता है - अरे ! तुम लंका में रहनेवाली हो, रावण की सेविका हो, वह तुम्हारा राजा है, तुम हनुमानजी को कैसे लंका में जाने दे रही हो ? लंकिनी ने जो शब्द कहा - 'कोसलपुर राजा' इससे मानो वह बताना चाहती है कि मैं भ्रमवश मान बैठी थी कि लंका का राजा रावण है । रावण तो लंका पर बलात् अधिकार किए बैठा है, इसके वास्तविक राजा तो भगवान राम ही हैं । यह एक शाश्वत सत्य है ।

Saturday, 8 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

लंकिनी हनुमानजी को अपनी आत्मकथा सुनाती है । मानो यही मन की कथा है, प्रवृत्ति की कथा है । लंकिनी ने कहा कि मैं तो यहाँ बहुत काल से लंका की रक्षिका के रूप में कार्यरत हूँ । जब ब्रह्माजी ने मेरा निर्माण किया उस समय मैंने उनसे अपना भविष्य जानने की इच्छा व्यक्त की, तब उन्होंने बताया था कि प्रारंभ में तुम देवताओं, यक्षों के अधिन रहोगी पर अन्त में तुम्हारे ऊपर राक्षसों का अधिकार हो जायेगा । सुनकर मुझे पीड़ा हुई कि एक दिन मुझे राक्षसों के द्वारा शासित होना पड़ेगा । यही जीवन का भी सत्य है । हमारे मन की जो प्रवृत्ति है वही लंकिनी है । उसमें जब अच्छे विचार उठते हैं यही मानो उस पर देवताओं का शासन है तथा लोभ और तृष्णा अधिक बढ़ जाएँ तो मानो यही यक्षों का शासन है । और जब दुर्गुण-दुर्विचारों के द्वारा मन संचालित होने लगे तो यही समझना चाहिए कि उस पर राक्षसों का आधिपत्य हो गया है । लंकिनी ने इसे अपने जीवन में अनुभव किया ।

Friday, 7 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

हनुमानजी के लंका प्रवेश के समय मुक्के के प्रहार से लंकिनी को एक नई दृष्टि मिली । उठकर खड़ी होने के पश्चात उसने हनुमानजी से कहा - मैं बहुत पुण्यवती हूँ कि मुझे आपके दर्शन करने का सुयोग प्राप्त हुआ । आश्चर्य होता है कि मुक्का पड़ा, गिर पड़ी, रक्त निकलने लगा और कह रही है कि मेरा बहुत बड़ा पुण्य है ! साधारणतया तो यही देखा जाता है कि किसी को चोट लग जाय तो वह यही पूछता है कि यह संकट कैसे आया ? कौन-सी दशा और अन्तर्दशा चल रही है ? पर लंकिनी हनुमानजी के इस प्रहार को अपने किसी पाप का परिणाम न मानकर, पुण्य का परिणाम मानती है और बड़ी प्रसन्न होती है । अच्छी घटना के बाद प्रसन्न होना और इसे अपने पुण्य-फल के रूप में स्वीकार करना, यह तो व्यक्ति के लिए स्वाभाविक है, पर प्रतिकूलता और आघात के बाद भी उसे अपने पुण्यफल के रूप में ग्रहण कर प्रसन्नता की अनुभूति होना यह एक नई दृष्टि है । पूछा जा सकता है कि हमारे-आपके जीवन में दुख आता है, विपत्ति आती है, वह हमारे पाप का परिणाम है या पुण्य का परिणाम है ? इसका एक ही उत्तर है कि संकट के समय यदि हमारी शुद्ध हुई, हमारा विवेक जागृत हो गया तब वह संकट पाप का नहीं हमारे पुण्य का परिणाम है । और यदि संकट आने पर हमारी बुद्धि और भी मलिन होती गई, तो मानो वह संकट हमारे पाप का परिणाम है ।

Thursday, 6 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

प्रसंग आता है कि हनुमानजी जब लंका में पैठने लगे तो अचानक लंकिनी नाम की राक्षसी ने उनका मार्ग रोक लिया । बड़ी अनोखी बात है कि लंकिनी की आँख इतनी पैनी थी कि हनुमानजी के 'अति लघु रूप' में होने पर भी उसने उन्हें देख लिया । लंका वालों की दृष्टि बड़ी पैनी होती है, पर विडम्बना यह है कि वे उस पैनी दृष्टि का उपयोग दूसरों के दोष-दर्शन में ही करते हैं । लंकिनी ने हनुमानजी को पकड़ लिया और कहा - " कहाँ जा रहे हो ? मैं यहाँ इसलिए खड़ी हूँ कि तुम्हारे जैसों को खा सकूँ ! मैं तुम्हें खाऊँगी ।" लंकिनी अपने 'खाने' को एक दार्शनिक रूप देती कहती है कि मैंने निश्चय किया है कि मैं चोरों को मिटाकर रहूँगी, तुम चोर हो अतः मैं तुम्हें खाऊँगी । हनुमानजी ने उनकी बात सुनी और एक मुक्का उसके सिर पर मारा । इस मुष्टि-प्रहार से वह गिर पड़ी पर दूसरे ही क्षण अपने आपको संभालकर खड़ी हो गई । इसमें सूत्र तो यह है कि मनुष्य के जीवन में ऐसे अवसर आते हैं जब उसे आघात लगता है और वह गिर पड़ता है । पर गिर जाने पर भी जो अपने आपको सँभाल ले और उठकर खड़ा हो जाय, वही बुद्धिमान और विचारयुक्त व्यक्ति की पहचान है ।

Wednesday, 5 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

हनुमान जी के समुद्र पार करने के बीच में सुरसा परीक्षा लेने आई थी अतः उसने कहा कि मैं तो तुम्हें अभी खाऊँगी । और जब उसने खाने के लिए अपना मुँह फैलाया तो हनुमानजी ने अपना शरीर दूना कर लिया । फिर दोनों में एक होड़-सी लग गई । सुरसा जितना मुँह फैलाती है, हनुमानजी उससे दूने हो जाते हैं । अन्त में जब सुरसा ने सौ योजन का मुँह बना लिया तो, यद्यपि हनुमानजी चाहते तो वे भी दो सौ योजन के बन सकते थे, पर वर्णन आता है कि सुरसा जब यह सोचकर कि देखूँ, अब बन्दर कितना ऊँचा जाता है, आँख खोलकर चारों ओर देखती है तो उसे बड़ा आश्चर्य होता है क्योंकि हनुमानजी कहीं दिखाई नहीं देते ? गोस्वामीजी कहते हैं - वे इतने छोटे बन गए कि सुरसा उन्हें ढूँढ़ ही नहीं पा रही है । हनुमानजी केवल छोटे ही नहीं बन गए, अपितु सुरसा के मुख में प्रविष्ट होकर बाहर भी आ गए । मानो इसमें सूत्र यही है कि अपने आपको बड़े-से-बड़ा बनाने की शक्ति रखते हुए भी जो अपने आपको अति लघु अर्थात शून्य बना सकता है ऐसा अभिमानरहित व्यक्ति ही लंका में प्रवेश कर वहाँ से सुरक्षित लौट सकता है ।

Tuesday, 4 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

हनुमानजी समुद्र पार करने के लिए जब निकले तो मैनाक पर्वत के बाद सुरसा सामने आ जाती है । सुरसा अपनी भूखी होने की बात कहती है और हनुमानजी की प्रशंसा करते हुए कहती है कि तुम तो शरीर के मोह और बन्धन से ऊपर उठे हुए हो, तुम बहुत बड़े त्यागी और विरागी हो, अतः अपने शरीर को मुझे भोजन के रूप में दे सकते हो जिससे मेरी भूख मिट जाएगी । संसार में देखा जाता है कि बड़े-से-बड़ा त्याग करने वाला व्यक्ति भी अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है । प्रशंसा एक ऐसी वस्तु है जो सबको अच्छी लगती है । प्रशंसा से कौन प्रसन्न नहीं होता ? प्रशंसा बड़े-बड़े व्यक्तियों को लुभाती है । सुरसा हनुमानजी की प्रशंसा करती है पर वे इसके आकर्षण में नहीं फंसते । उन्होंने सुरसा से स्पष्ट रूप से कह दिया कि मेरे सामने एक लक्ष्य है और इस शरीर के द्वारा उसे पूरा करने के बाद ही इसे तुम्हारे भोजन के निमित्त प्रदान कर पाना संभव हो पाएगा, उससे पूर्व नहीं । हनुमानजी का तात्पर्य यह था कि 'हमें शरीर एक उद्देश्य पूर्ति के लिए मिला हुआ है, अतः उस लक्ष्य को पूरा करने तक हमें शरीर को बचाना चाहिए । और जब वह लक्ष्य प्राप्त हो जाय, उस शरीर का सदुपयोग हो जाय तो उसके बाद मृत्यु का स्वागत करने में हमें भयभीत नहीं होना चाहिए ।' यही सच्चे वैराग्यवान का लक्षण भी कहा जा सकता है । वैराग्य का यह अर्थ नहीं है कि प्रशंसा सुनकर अथवा क्षणिक आवेश में आकर शरीर को नष्ट कर दिया जाय । जो विषपान कर अथवा आत्महत्या के द्वारा शरीर को नष्ट कर लेते हैं वे वैराग्यवान नहीं कहे जाते । यह कार्य तो व्यक्ति के आवेश और अज्ञानता का परिचायक है, वैराग्य का नहीं ।

Monday, 3 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

हनुमानजी समुद्र पार करने के लिए जब निकले तो सबसे पहले मैनाक पर्वत समुद्र से निकलकर उनके सामने आ गया और उसने हनुमानजी को निमंत्रण दिया कि पहले आप विश्राम कर लीजिए फिर आगे जाइए । पर हनुमानजी उस स्वर्णपर्वत मैनाक को स्पर्श भर करने के बाद उसे प्रणाम कर उससे विदा लेते हैं । हनुमानजी के इस कार्य के माध्यम से उनके चरित्र की पूर्णता और विशेषता के कई सूत्र हमारे सामने आते हैं । संसार में अपने आपको त्यागी मानने वाले व्यक्ति बहुधा यह कहते सुने जाते हैं कि 'अरे ! मैंने लाखों को ठोकर मार दी ।' वे बताना चाहते हैं कि उन्होंने कितना बड़ा त्याग किया है ! पर आप विचार करें कि यह त्याग वास्तविक है क्या ? यह तो किसी त्यागी की नहीं, बहुत बड़े अभिमानी की भाषा है । हनुमानजी ने मैनाक पर्वत से यह नहीं कहा कि 'जाओ, हम सोने के पर्वत को लात मारते हैं' अपितु उन्होंने मैनाक पर्वत को प्रणाम किया और नम्रतापूर्वक यह कहा कि मैं 'रामकार्य' का एक उद्देश्य लेकर चला हूँ और जब तक वह पूरा नहीं हो जाता तब तक मुझे विश्राम नहीं मिलेगा । इसके द्वारा हनुमानजी ने जो सूत्र दिया वह उनकी सजगता का परिचायक था । उसमें स्वर्ण पर्वत का त्याग है पर उनमें इस त्याग के अभिमान का लेश भी नहीं है । इसका अभिप्राय है कि त्याग के साथ त्याग का विवेक सार्थक है, पर यदि वस्तु के त्याग होने पर त्याग का अभिमान बढ़ जाय तो फिर उस त्याग का कोई महत्व नहीं रह जाता ।

Sunday, 2 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

बाल्मीकि-रामायण में मेघनाद-विभीषण संवाद के रूप में एक प्रसंग हमारे सामने आता है । युद्धस्थल में मेघनाद ने जब विभीषण को देखा तो उसके क्रोध की सीमा नहीं रही । उसने विभीषण जी को फटकारते हुए कहा - तुम कृतघ्न हो, भ्रातदोही हो ! जिस बड़े भाई ने पुत्र की तरह तुम्हारा लालन-पालन किया, तुम्हें हर प्रकार की सुख-सुविधा और छूट दी, उस पर जब संकट का समय आया तो तुम उसे छोड़कर निकल गए ? इस तरह का तर्क बहुत-से लोगों को बड़ा अच्छा लगता है पर विभीषण जी ने जो उत्तर दिया वह बड़े महत्व का है ।
        विभीषण जी ने कहा कि जैसे किसी एक मकान में हमारा जन्म हुआ, लालन-पालन हुआ, उपनयन आदि संस्कार हुए और यदि एक दिन उस मकान में आग लग जाय और हम यह निर्णय करें कि जिस घर में मैं जन्म से लेकर अब तक जुड़ा रहा उसे छोड़कर नहीं भागूँगा भले ही वहाँ जलकर मर जाऊँ, तो क्या यह विवेकपूर्ण निर्णय कहा जा सकता है ? बुद्धिमान वह नहीं है कि जो घर में आग लगने पर घर के भीतर बैठकर मर जाय और यह कहे कि मैंने घर से बड़ा प्रेम किया है, अपितु बुद्धिमान तो वह है जो घर से बाहर निकले और आग बुझाने की चेष्टा करे । विभीषण जी ने कहा कि मैंने तो यही चाहा कि लंका बच जाय और सब निशाचरगण लंका में जो आग लगी है उसमें जलने न पावें । विभीषण रावण को समझाने की चेष्टा करते हैं पर वह दुराग्रही है, हठी है । वह विभीषण जी की बात नहीं सुनता । तो क्या ऐसी स्थिति में विभीषण को रावण का साथ देते हुए उसके साथ ही जलकर मर जाना चाहिए ? समाज में भी परिवर्तन इस निष्ठा से नहीं होगा कि हम जिसके साथ हैं, उसमें अच्छाई हो या बुराई हो, हम सदैव उसका साथ देते रहेंगे । संसार में अधिकांश लोग यही चाहते हैं कि बुरे कर्मों में भी लोग हमारा साथ दें इसलिए वे ऐसे निष्ठावालों की पीठ ठोंकते हैं । पर यह पीठ ठोंकने वाली बात नहीं है । बुराई को समझने के बाद निष्ठा के नाम पर उसे न छोड़ने की धारणा भले ही स्वार्थी व्यक्तियों की दृष्टि में ऊँची बात हो, पर सिद्धांत की दृष्टि से यह धारणा अविवेकपूर्ण ही मानी जायेगी ।

Saturday, 1 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

महाभारत काल में कर्ण ने दुर्योधन को मित्र मान लिया । उसने यह धारणा बना ली कि मुझे तो प्रत्येक स्थिति में मित्र का साथ देना है । मित्र सही करे, गलत करे अथवा न्याय करे या अन्याय करे, बस मुझे तो अपने मित्र के ही पक्ष में रहना है । इसीलिए उसने युद्ध में दुर्योधन की ओर से लड़ते हुए अपने प्राण भी दे दिए । लोग कर्ण की प्रशंसा करते हैं । सचमुच वह बड़ा वीर योद्धा और दानी था । उसने किसी प्रकार के लोभ को जीवन में स्वीकार नहीं किया । पर इन सद्गुणों से सम्पन्न होने पर भी उसने अन्याय और दुर्गुणों के प्रतीक दुर्योधन का साथ दिया, बुराई का पक्ष लिया, समर्थन किया । ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो मानते हैं कि जिससे एक बार जुड़ गए तो अन्त तक निर्वाह करना चाहिए । यह धारणा सुनने में चाहे बड़ी ऊँची लगती हो पर इसके मूल में विवेक का लेश भी नहीं है ।