गोस्वामीजी विनयपत्रिका में प्रभु की कृपा का वर्णन करते हैं कि भगवान कितने उदार हैं, क्षमाशील हैं, इसका पूरा वर्णन करते हैं और अन्त में वे सम्बोधित किसे करते हैं, सुना किसे रहे हैं ? रामायण के पहले कथावाचक के यहाँ सबसे कम भीड़ थी या उसके अन्तिम कथावाचक के यहाँ ? रामकथा के प्रथम वक्ता तो शंकरजी हैं, उनके यहाँ तो कथा सुननेवाले के लिए पात्रता की इतनी कठिन कसौटी थी कि स्वयं शंकरजी के गणों को भी वहाँ आकर कथा सुनने का अधिकार नहीं दिया गया । इतनी अधिक मर्यादा जिस कथा की है, वह समझ लें कि कितनी दुर्लभ है । कथा की दुर्लभता का जो स्वरूप है, वह शंकरजी के चरित्र में दिखाई देता है, जहाँ शंकरजी स्वयं एक ही वक्ता और पार्वतीजी एक ही श्रोता हैं । भगवान शंकर प्रथम वक्ता हैं और अन्तिम वक्ता गोस्वामीजी हैं । शंकरजी के यहाँ तो कम-से-कम एक श्रोता दिखाई भी पड़ा, पर गोस्वामीजी के यहाँ कोई श्रोता नहीं है, अकेले बैठे हुए गुनगुना रहे हैं । किसी ने पूछा कि महाराज ! किसे सुना रहे हैं ? गोस्वामीजी ने कहा कि भाई, एक श्रोता तो है । कहाँ है ? वे बोले कि बाहर नहीं भीतर है । बोले कि भाई ! मैं अपने मन को सुना रहा हूँ ।
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