Tuesday, 31 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान राम अयोध्या से सभी बन्दरों को वस्त्राभूषण पहना कर जब विदा करते हैं, उस समय अन्य बन्दर तो चले गये परन्तु अंगद बैठे रह गये । और जब अंगद जी बैठे रहे तो प्रभु नहीं बोले । क्योंकि अपनी ओर से किसी से जाओ कहना तो ठीक नहीं है । इसलिए प्रभु ने कुछ नहीं कहा । लेकिन अंगद ही से त्रुटि हो गई । क्योंकि यदि वे बैठे रहे थे तो फिर बैठे ही रह जाते । पर वे बैठे नहीं रह पाये । अंगद ने जब देखा कि सब चले गये तो वे अचानक भगवान के पास आ गये । उस समय भगवान अगर पूछते कि अंगद तुम क्यों नहीं गये तब तो वे बातें समझ में आती जो अंगद ने कही । यद्यपि प्रभु ने अपनी ओर से नहीं पूछा कि - अंगद तुम क्यों नहीं गये ? पर अंगद अपनी ओर से ही बोल पड़े । इसमें उनकी मानसिक दुर्बलता दिखायी दे गयी । उनके मन में कहीं न कहीं यह भय था कि कहीं ऐसा न हो जाय कि भगवान बाद में मुझे भेज ही दें । इसीलिए अभी से निर्णय हो जाय कि रहना है या जाना है । अगर जाना ही है तो जब सब साथी जा रहे हैं उन्हीं के साथ हम भी चले जायँ । इनका साथ क्यों छूटे ? भगवान समझ गये कि अभी बैठने की अडिगता वाली वृत्ति इनमें नहीं है ।

Monday, 30 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामायण के महानतम पात्र बाल ब्रह्मचारी श्री हनुमान जी और सबसे दुर्बल चरित्र वाले सुग्रीव । दोनों यदि दूर होते तो कोई बात नहीं । परन्तु इससे बढ़कर विचित्र बात कोई और नहीं हो सकती कि ये दोनों पात्र अत्यंत निकट हैं । जीवन भर हनुमान जी तथा सुग्रीव में वही भावना रही । हम लोगों के जीवन में एक दुर्बलता होती है कि जब हमारा किसी मान्यता-विशेष के प्रति बहुत आग्रह होता है तो हम दूसरों को भी केवल उसी आधार पर परखना चाहते हैं । हाँ ! अपनी मान्यता पर हम खरे उतरें, अपनी मान्यता के अनुकूल हम अपना जीवन बनायें यह तो उचित है । हनुमान जी अगर कहीं अपनी कसौटी पर सुग्रीव को कसकर देखते, तब तो सुग्रीव से जीवन में न जाने कब का साथ छूट गया होता । किन्तु हनुमान जी ऐसा नहीं करते हैं । और भगवान श्रीराघवेन्द्र भी सुग्रीव, अंगद और हनुमान जी से एक ही प्रकार का व्यवहार नहीं करते । और न ही ये तीनों प्रभु से एक ही प्रकार के व्यवहार की आशा करते हैं । रामचरितमानस में यह भिन्नता आपको दिखायी देगी ।

Sunday, 29 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

जब भगवान श्रीराम चित्रकूट में कैकेयी जी की प्रशंसा करने लगे तब श्री भरत जी की आँखों में आँसू आ गये । प्रभु यह सोचकर बड़े प्रसन्न हुए कि भले ही भरत जी कैकेयी की आलोचना करते रहे हों, परन्तु आज जब मैं प्रशंसा कर रहा हूँ तो गदगद हो रहे हैं । लगता है कि मेरे भाषण का प्रभाव पड़ा, जिससे कि भरत बदल गये । उन्होंने श्रीभरत की ओर देखा और पूछा कि भरत ! अभी जो मैंने माँ की कथा सुनायी वह तुम्हें कैसी लगी ? सुनकर तुम्हारी आँखों में आँसू आ गये, लगता है तुम्हें बड़ा सुख मिला । परन्तु भरत जी ने कहा - महाराज ! आँसू कथा सुनकर नहीं आये, अपितु कथावाचक को देखकर आये । क्योंकि - मैं सोचने लगा कि जिन कैकेयी ने आपको इतना कष्ट दिया, जब उनका गुण स्वयं आप गा रहे हैं तो लगा कि आप कितने उदार हैं जो अपने को कष्ट देने वाले का भी गुण गा सकते हैं । प्रभु ! इससे मुझे उनके गुण की याद नहीं आ रही है, मुझे तो आपके गुण की याद आ रही है । यही अपनी-अपनी भिन्न दृष्टि है । और यह भिन्नता प्रत्येक क्षेत्र में है । जैसे मनुष्य की आकृति में भिन्नता है, मनुष्य के स्वभाव में भिन्नता है । अगर एक ही प्रकार के आचरणयुक्त व्यक्तियों को ईश्वर प्राप्ति का निर्देश कर दिया जाय तो आपकी मान्यता के आधार पर भले ही वह ठीक हो, लेकिन ईश्वर तो आपकी मान्यता से बँधा हुआ है नहीं । आपके जीवन की जो मान्यताएँ हैं उन्हें आपको मानना चाहिए । श्री भरत की दृष्टि भी भरत के साथ है और भगवान की दृष्टि भगवान के साथ है ।

Saturday, 28 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामायण में एक ओर तो हनुमान जी जैसे ब्रह्मचारी से लेकर सुग्रीव तक भगवान के राम के सेवक हैं तथा दूसरी ओर अगर चित्रकूट के संदर्भ में विचार करके देखेंगे तो आपको दिखायी देगा कि भगवान श्रीराघवेन्द्र जब चित्रकूट की ओर यात्रा कर रहे हैं तब उनके साथ लक्ष्मण जी और जनकनन्दिनी श्री सीता जी हैं । उसके पश्चात जब श्री भरत जी चित्रकूट की ओर यात्रा करते हैं तब अयोध्या के नागरिक श्री भरत जी के साथ चित्रकूट जाते हैं । और उन पात्रों में भरत जी के साथ-साथ कैकेयी जी भी हैं । यद्यपि कैकेयी जी संदर्भ में बड़ा मतभेद है । कई लोग यदि उन्हें प्रशंसा की दृष्टि से देखते हैं तो कई लोग उनकी बड़ी कठिन शब्दों में निन्दा करते हैं । रामायण में भगवान श्रीराम कैकेयी जी प्रशंसा करते हैं किन्तु श्री भरत जी उनकी निन्दा करते हैं । और यह जो प्रशंसा अथवा निन्दा है वह व्यक्ति की अलग-अलग दृष्टि पर निर्भर है ।

Friday, 27 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

रामायण में ये जो विविध मार्गों का वर्णन किया गया है वे विविध मार्ग हैं क्या ? 'विविध मार्ग' तो यद्यपि कविता की भाषा है किन्तु विविध मार्ग का अभिप्राय है साधना के विविध रूप । और इन साधना के विविध रूपों के चुनाव में कैसे भूल होती है इसके एक दो दृष्टांत मैं आपके सामने रखूँगा । रामायण में जितने पात्र हैं, उनके चरित्र में, उनके जीवन में आपको भिन्नता दिखायी देगी । श्री लक्ष्मण जी, श्री भरत जी, श्री हनुमान जी, ये सब भगवान के महानतम भक्त हैं, पर इनके जीवन में भिन्नता दिखायी देती है कि नहीं ? जैसे - हनुमान जी महाराज ने अपने जीवन में ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया, कभी विवाह नहीं किया, पर श्री भरत जी और लक्ष्मण जी के जीवन में विवाह का वर्णन है । तो बालब्रह्मचारी हनुमान जी श्रेष्ठ हैं या विवाहित भरत जी श्रेष्ठ हैं ? इसका उत्तर क्या हो सकता है ? किन्तु गोस्वामीजी का अभिप्राय है कि यदि आप श्रेष्ठता तथा कनिष्ठता का निर्णय अपनी मान्यताओं के आधार पर करेंगे, तो आप उनमें से एक को श्रेष्ठ बता देंगे । जैसे यदि आपके मन में यह आग्रह है कि ब्रह्मचर्य एक बहुत ऊँची स्थिति है तो आपको लगेगा कि श्री हनुमान जी में ब्रह्मचर्य है इसलिए वे ही सर्वश्रेष्ठ हैं । पर केवल इसी मान्यता के आधार पर निर्णय करना ठीक नहीं है ।

Thursday, 26 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

जब हमारे जीवन में साधन करते हुए भी लाभ न मिल रहा हो, तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि हमने सही मार्ग का, सही साधन का चुनाव किया है कि नहीं । तथा साधन के लिए जो बातें होनी चाहिए उनका हम ठीक-ठीक पालन कर रहे हैं कि नहीं । अगर दोनों बातों का ध्यान हम रख रहे हैं तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि व्यक्ति को साधना के बाद सफलता न मिले । इस सन्दर्भ में वह व्यंग्यात्मक गाथा आपने अवश्य सुनी होगी जिसमें यह बताया गया है कि किसी व्यक्ति ने सोचा कि रात्रि में नौका चलाकर यात्रा करेंगे तो बड़ा आराम रहेगा क्योंकि उस समय धूप नहीं रहेगी इसलिए शीतलता तथा शांति में यात्रा होगी । बेचारा रात्रि में नाव पर बैठा और रातभर नाव खेता रहा । सुबह हुई तो उजाले में देखा कि रात्रि को जहाँ से चले थे वहीं पर हैं । बड़ा आश्चर्य हुआ उसे, उसने सोचा कि मैंने इतने घण्टे नाव खेई, मुझे तो काफी दूरी पर होना चाहिए था, परन्तु क्या हुआ ? तो किसी बुद्धिमान व्यक्ति ने बताया कि भलेमानुष ! तुम नाव तो खेते रहे पर लंगर हटाया ही नहीं । इस तरह तो जिन्दगी भर भी नाव खेते रहो फिर भी जहाँ के तहाँ ही रहोगे । ठीक यही बात साधन के सम्बन्ध में भी है ।

Wednesday, 25 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

रावण के मन जब यह प्रश्न आया कि राम मनुष्य हैं अथवा ईश्वर । उस समय उसे गुरु के पास जाकर यह संशय उनके समक्ष रखना चाहिए था, क्योंकि गुरु का वरण ही संशय को दूर करने के लिए किया जाता है । पर रावण सन्देह उत्पन्न होने के बाद शंकर जी के पास नहीं गया । रावण से किसी ने पूछा कि तुम शंकर जी के पास क्यों नहीं जाते ? तो रावण ने कहा कि अब क्या दस सिर वाला, पाँच सिर वाले से ही पूछेगा ? - तो फिर गुरु क्यों बनाया ? - तो उसने कहा - भाई ! गुरु बनाना चाहिए इसलिए मैंने भी गुरु बना लिया । कुछ लोग गुरु बनाने के लिए ही गुरु बनाते हैं कि बहुत सी वस्तुओं के साथ गुरु भी होना चाहिए । और गुरु जितना प्रसिद्ध हो उतना ही बढ़िया है ऐसा मानकर गुरु बनाते हैं । रावण ने गुरु का वरण किया पर शंकर जी के वचनों पर विश्वास नहीं किया, गुरु की दवा का सेवन नहीं किया, और उसके जीवन में निरन्तर कुपथ्य ही दिखायी दे रहे हैं । इसलिए रावण के जीवन में निरन्तर दोषों की वृद्धि होती गयी ।

Tuesday, 24 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

यदि हमारे जीवन में लाभ नहीं हो रहा तो आत्मनिरीक्षण करके देखें कि हमसे कोई त्रुटि तो नहीं हो रही है । सती जी का रोग बढ़ गया तो उसके कारण हमें प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं । यद्यपि सती जी कथा की नाव में बैठीं तो, परन्तु अहंकार लेकर बैठीं कि 'मैं तो दक्ष की पुत्री हूँ ।' अगस्त्य जी ने जब पूजन किया तो वह भाव आ गया कि मैं इनकी अपेक्षा श्रेष्ठ हूँ, तो मैं क्या कथा सुनूँ इसीलिए कथा का लाभ नहीं हुआ । वैद्य पर विश्वास होना चाहिए, किन्तु भगवान राम के रूप को देखकर जब सती के अन्तःकरण में सन्देह उत्पन्न हुआ, तब भगवान शंकर ने बहुत समझाया किन्तु उनके वचनों पर विश्वास नहीं हुआ इसलिए सतीजी को दुःख उठाना पड़ा । इसे दृष्टांत के रूप में हम यों कह सकते हैं कि आप यदि विश्व के सबसे बड़े चिकित्सक को अपना चिकित्सक तो बना लें, किन्तु जब दवा करना हो तब आप अपने मन से ही दवा करें, तो क्या इससे रोग ठीक हो जायेगा ?

Monday, 23 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

 .....कल से आगे.....
भगवान की भक्ति को सर्वोत्तम औषध के रूप स्वीकार करते हुए लिखा गया है कि - 'रघुपति भगति सजीवनि मूरी ।' - और भक्ति की यही दिव्य दवा सती जी को दी जा रही थी । क्योंकि शंकर जी सती जी को कथा सुनाने के लिए अगस्त्य जी के पास लेकर गये, और कथा का श्रवण - 'दूसर रति मम कथा प्रसंगा' - के अनुसार भक्ति ही तो है । इसका अभिप्राय है कि यहाँ पर शंकर जी के रूप में वैद्य भी बहुत बढ़िया है, भक्ति के रूप में दवा भी सर्वोत्तम है, लेकिन फिर भी बात उल्टी हो गयी । क्योंकि सती का रोग बढ़ गया । सती जी भगवान शंकर के साथ कथा में गयीं । गोस्वामीजी कथा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि मैं सन्देह, मोह और भ्रम को दूर करने वाली तथा संसाररुपी नदी को पार करने वाली कथा सुना रहा हूँ । और आप याद रखियेगा कि कथा नाव तो है, पर नाव डूबती हुई दिखायी देती है कि नहीं ? इसका सीधा सा तात्पर्य है कि यद्यपि नाव तो अत्यंत सुदृढ़ होना ही चाहिए, पर नाव बहुत बढ़िया होने के बाद भी अगर बैठने वाले व्यक्ति असंतुलित हो जायँ, यात्री यदि सम्भल कर न बैठें तो नाव अवश्य डूब जायेगी । बढ़िया नाव में भी जितना बोझ उठाने की सामर्थ्य होगी अगर उससे ज्यादा बोझ लाद दिया जायेगा तो भी नाव डूब जायेगी । कथा की नाव में यद्यपि बोझ उठाने की बड़ी सामर्थ्य है लेकिन इतना होते हुए भी कथा की नाव में अहंकार का बोझ उठाने की सामर्थ्य नहीं है । अगर कोई अहंकार का भार लेकर कथा की नाव में बैठेगा तो नाव के डूबने की संभावना अधिक रहेगी ।

Sunday, 22 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

काकभुशुण्डि जी मन के रोगों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पहले वैद्य खोजिये । और वह वैद्य है सद्गुरु । रामायण में तो सबसे बड़े सद्गुरु भगवान शंकर हैं । और वे शंकर जी सद्गुरु के रूप में रावण को प्राप्त हैं । वे ही शंकर जी सती के पति भी हैं, और ' पतिदेवः गुरुः स्त्रीणाम्' के रूप में सती जी के भी गुरु हैं । यद्यपि शंकर जी तो त्रिभुवन गुरु हैं । पर कितनी बड़ी विडम्बना है ? भगवान राम से शंकर जी ने यही कहा कि प्रभु ! आपने जनकनन्दिनी के वियोग में जो रुदन लीला की, उसमें तो मुझे बड़ा विचित्र सा अनुभव हुआ । क्योंकि मैं तो समझे बैठा कि मैं त्रिभुवन गुरु हूँ, लेकिन महाराज ! आपके स्वरुप के विषय में भ्रम ही हुआ तो मेरे परिवार में हुआ । या तो सती जी भ्रम हुआ या रावण को ।
     .....आगे कल ....

Saturday, 21 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में जहाँ पर गोस्वामीजी मानस रोगों का वर्णन करते हैं वहाँ पर वे अत्यंत सांकेतिक रूप में उचित साधन के विषय में वर्णन करते हैं । इसे हम यों कह सकते हैं कि जैसे रोग दूर करने के दवा, वैद्य तथा पथ्य ये तीन साधन हैं । और हमें यह स्पष्ट दिखायी देता है कि रोग को ठीक-ठीक पहचान करने वाला वैद्य अथवा डाक्टर यदि न मिले, तो भी आप ठीक नहीं होंगे । बहुत अच्छी दवा बताने वाला वैद्य भी मिल जाय, पर अगर दवा ही बाजार में नकली मिले, तो नुस्खा किस काम आवेगा ? और असली दवा भी मिल गयी, उसे लेकर खाने लगे, पर जितनी दवा नहीं खा रहे हों उससे अधिक यदि कुपथ्य कर रहे हों तो फिर दवा भी फायदा नहीं करेगी । जीवन में लाभ नहीं हो रहा तो ढूँढ़िये कि कौन सी कमी रह गयी है ? कहीं सद्गुरु की कमी तो नहीं रह गयी, कहीं कपट मुनि जैसा नकली गुरु जैसे प्रतापभानु को मिला, वैसे ही हमें भी तो नहीं मिल गया है । कहीं कालनेमि की तरह वैद्य तो नहीं मिल गया ? क्योंकि कालनेमि के समान वैद्य मिलने पर भी समस्या रहेगी । पर अगर भगवान शंकर के समान योग्य वैद्य मिल गया तब तो कोई समस्या नहीं है । लेकिन केवल सद्गुरुरुपी वैद्य होने से ही काम नहीं चलेगा अपितु उसके वचनों पर विश्वास भी होना चाहिए । भक्ति की दवा हो किन्तु उसके साथ श्रद्धा का अनुपान अवश्य हो। और उसके पश्चात विषय में कुपथ्य का परित्याग भी हो । जब इतनी वस्तुएँ एकत्रित होती हैं तब कहीं जाकर मन के रोगों का नाश होता है ।

Friday, 20 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी कहते हैं कि पहले आप साधन का निर्णय कर लीजिए । लेकिन साधन का निर्णय कैसे होगा बस यह बात सबसे महत्वपूर्ण है । मान लीजिए एक व्यक्ति ऐसे गाँव का रहने वाला हो जिस गाँव में पहुँचने के लिए सड़क नहीं है और वहाँ पर बैलगाड़ी ही यात्रा का एकमात्र साधन है । पर कहीं भाषण में वह व्यक्ति हवाई जहाज की महिमा सुन ले और महिमा को सुनकर यदि वह निर्णय करे कि हम हवाई जहाज में ही यात्रा करेंगे, तो फिर वह व्यक्ति जीवन में यात्रा कभी नहीं कर पायेगा । उसे तो हवाई जहाज की महिमा को दूर ही रखना चाहिए तथा बैलगाड़ी का महत्व समझना चाहिए । उसकी यात्रा का प्रारंभ तो बैलगाड़ी से ही होगा, क्योंकि वह जहाँ रहता है वहाँ बैलगाड़ी ही सुलभ है । अधिकांश लोगों के जीवन में समस्या यह होती है कि वे ऊँची बात सुनते अथवा ग्रन्थों में पढ़ते हैं तो उनमें से जो बात बहुत ऊँची लगती है वे उसी को अपने जीवन में उतारना चाहते हैं । कई लोग तो पूछते हैं सबसे ऊँची बात क्या है ? मैं कहूँगा कि आप यह पता बिल्कुल मत लगाइए कि सबसे ऊँची बात क्या है, अपितु आप यह पता लगाने की चेष्टा कीजिए कि हमारे लिए सबसे ऊँची बात क्या है ? आप कहाँ हैं, सबसे पहले इस पर आप विचार कीजिए । क्योंकि आप जहाँ बैठे हुए हैं वहीं से साधना प्रारंभ कीजिए ।

Thursday, 19 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामायण में आप देखेंगे कि जितने ईश्वर से जुड़े हुए पात्र हैं, साधक हैं, भक्त हैं, उनके जीवन में परस्पर भिन्नता दिखायी देती है । और इस भिन्नता के रहस्य को जो समझ लेगा, वह साधन को ठीक-ठीक अपने जीवन में अपना लेगा । अधिकांश लोगों के जीवन में यही समस्या आती है और वे साधना करते हुए भी यह उलाहना देते हुए दिखाई देते हैं कि हम इतने दिनों से साधन कर रहे हैं पर साधन का जो फल शास्त्रों में लिखा हुआ है या प्रवचन में या सन्तों के द्वारा जो कहा जाता है, उसका अनुभव हम नहीं कर रहे हैं । इस प्रश्न का निराकरण करने के लिए दो बातें कहीं जा सकती हैं । एक तो यह कि शास्त्रों एवं व्याख्याकारों के द्वारा जो कहा गया है वही सत्य न हो । अथवा जो कहा गया है वह सत्य तो हो, पर कहीं न कहीं हमसे भूल हो रही हो ।

Wednesday, 18 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

मार्ग का निर्णय केवल लक्ष्य से ही नहीं होगा, अपितु मार्ग का निर्णय इस बात से होगा कि आप किस नगर के रहने वाले हैं । इसका अभिप्राय है कि एक ही स्थान पर जाने वाले व्यक्ति, अगर अलग-अलग नगरों में रहते हैं, तो उनके मार्ग भिन्न-भिन्न हो जायेंगे । इसी तरह जिनके जीवन में एक ही लक्ष्य 'ईश्वर की प्राप्ति' होता है उनके जीवन में भी मार्ग की भिन्नता होती है । इसलिए रामचरितमानस और गीता में समन्वय का यही जो तत्व है, वह आपको पूरी तरह मिलेगा । गीता में कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग तथा समर्पण योग की समग्रता आपको मिलेगी । और श्री रामचरितमानस में भी इसी समन्वय सूत्र का प्रतिपादन करते हुए एक ओर कहा गया कि सत्य के विषय में दावा नहीं किया जा सकता । यह भी एक पक्ष है, और काकभुशुण्डि जी कहते हैं कि मैं दावे से कह रहा हूँ, यह दूसरा पक्ष है । गोस्वामीजी ने कहा - भई ! जो वक्ता जहाँ पर बैठा है, वो वहीं से बोलता है । परन्तु गोस्वामीजी स्वयं ऐसा दावा नहीं करते । तुलसीदास जी बोले कि काकभुशुण्डि जी भक्ति के आचार्य हैं, वे तो दावा कर सकते हैं, लेकिन मैं वैसा दावा कैसे करूँ ? इसका तात्पर्य है कि आचार्य, आचार्य की भाषा में बोलेगा । सन्त सन्त की भाषा में बोलेगा । भक्त, भक्त की भाषा बोलेगा और कर्मयोगी, कर्मयोगी की भाषा में बोलेगा । आप जिस नगर में रहते हैं, वहीं से यात्रा प्रारंभ करेंगे । इसलिए आपका मार्ग निश्चित रूप से एक कभी नहीं हो सकता । जितने सही मार्ग पर चलने वाले साधक हैं उनके मार्ग में भी भिन्नता है ।

Tuesday, 17 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान श्रीकृष्ण से गीता में समस्त योगों का वर्णन सुनने के पश्चात अर्जुन ने भगवान से कहा - महाराज ! आप जो बातें सुना रहे हैं उनसे तो मैं बड़े चक्कर में पड़ गया हूँ - क्योंकि आप कभी संन्यास योग की बात कहते हैं तो कभी कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं । और मैं जब आपके मुख से इस प्रकार मिली-जुली बात सुनता हूँ तो उससे मेरे मन में भ्रम उत्पन्न होता है । इसलिए अर्जुन ने कहा - आप कृपा करके बता दीजिए कि मुझे क्या करना है और तब भगवान अर्जुन से एक बड़ी विचित्र बात कहते हैं कि अर्जुन ! तुम सभी धर्मों का परित्याग कर मेरी शरण में आ जाओ । किन्तु भई ! प्रश्न यह उठता है केवल यही एक श्लोक भगवान प्रारंभ में कह देते और अर्जुन उसको स्वीकार कर लेता, किन्तु ऐसा क्यों नहीं किया ? यदि हम विचार करके देखें तो हमें यह लगेगा कि इसके द्वारा भगवान ने एक ओर तो जितने भी पक्ष समाज में हो सकते हैं उन सबका सांगोपांग वर्णन किया, परन्तु दूसरी ओर जब अर्जुन ने कहा महाराज ! यह तो आपने सबके लिए बताया पर अब मेरे लिए कौन-सा मार्ग श्रेयस्कर है आप यह भी तो बताइए और भगवान कहते हैं कि तुम्हें तो बस शरणागति मार्ग का ही अनुगमन करना चाहिए । इसका तात्पर्य है कि मार्ग अनगिनत हैं । मार्ग अनगिनत होने के दो तात्पर्य हैं । एक तो लक्ष्य की भिन्नता से मार्ग में भिन्नता होती है । क्योंकि अगर किसी को अलग-अलग नगर में जाना हो, तो उसके लिए अलग-अलग मार्ग होंगे । लेकिन याद रखिए कि केवल लक्ष्य की भिन्नता से ही मार्ग में भिन्नता नहीं होती । बल्कि लक्ष्य के एक होने पर भी मार्ग में भिन्नता होती है ।

Monday, 16 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गीता में बड़ी सांकेतिक बात आती है । आज तक यह विवाद चल रहा है कि गीता का प्रतिपाद्य क्या है ? कुछ लोग कहते हैं कि 'ज्ञानयोग', कुछ लोग कहते हैं 'कर्मयोग' तथा कुछ लोगों की मान्यता है कि 'भक्तियोग' । और यदि ढूँढ़ने चलें तो तीनों के समर्थन में वाक्य मिलेंगे । इससे तो यही लगता है कि गीता में भगवान ने तीनों योगों का वर्णन किया है । वैसे यह तो ठीक ही है कि भगवान ने तीनों योगों का प्रतिपादन किया, क्योंकि भगवान जो उपदेश देते हैं वह किसी व्यक्ति के लिए नहीं है । भले ही वह किसी व्यक्ति को निमित्त बनाकर दिया जा रहा है । किन्तु भगवान जो उपदेश देते हैं वह सर्वकालिक है, सार्वदेशिक है और सार्वजनीन है और जब सबके लिये है तो यह स्वाभाविक है कि उसमें समस्त योगों का वर्णन होगा ।

Sunday, 15 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

पार्वती ने भगवान शंकर से पूछा - आप कृपा करके बताइए कि भगवान का अवतार क्यों होता है ? तो भगवान शंकर ने तुरन्त कहा - पार्वती ! भगवान का अवतार क्यों होता है, इस विषय में दावे से कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि बिल्कुल यही सत्य है । और ठीक इससे उल्टा एक वाक्य मिलेगा आपको रामायण के उत्तरकाण्ड में । काकभुशुण्डि जी से गरुड़ जी पूछ रहे हैं, और वहाँ काकभुणुण्डि जी दावा करते हुए कहते हैं - मैं दावा करता हूँ कि जो बात मैं कह रहा हूँ, वह बिल्कुल ठीक है । तो भई ! यह तो बड़ी विचित्र सी बात लगती है । क्योंकि गुरु कहे कि मैं दावा नहीं करता, और चेला कहता है कि मैं दावा कर रहा हूँ । शंकरजी गुरुजी हैं, वे दावा नहीं कर रहे हैं, और काकभुशुण्डि जी शिष्य हैं किन्तु वे कहते हैं कि मैं दावे से कह रहा हूँ । और जब बड़े आग्रहपूर्वक गरुड़ जी पूछते हैं तब वे सबको एक साथ जोड़ते हुए कह देते हैं कि मैं जो कह रहा हूँ यही मत ठीक मत है, तथा सबका यही मत है कि भगवान के चरणों प्रेम करना चाहिए । तो भई ! गुरुजी की बात ठीक है कि चेले की ? इसका अभिप्राय यह है कि साध्य तत्व की असीमता पर जब विचार करें, तब तो निश्चित रूप से यह कहना पड़ता है कि यह कोई दावा नहीं कर सकता कि ऐसा ही है । लेकिन कठिनाई यह है कि साध्य तत्व के वर्णन में भले ही कोई दावा न करे लेकिन जब व्यक्ति किसी साधना को स्वीकार करेगा, उस समय यदि साधना के विषय में उसके मन में आग्रह और आस्था न हो, तब तो वह कोई साधन कर ही नहीं सकता । जब भी आप साधना करते हैं तो किसी न किसी प्रकार के आग्रह को, किसी न किसी प्रकार के पक्षपात को तो स्वीकार करते ही हैं । इस प्रकार इन दोनों का सामंजस्य यही है कि अगर उपनिषद में यह दावा किया गया कि दूसरा कोई मार्ग नहीं है, और पुराणों में भिन्न-भिन्न देवताओं की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया गया, तो इसका उद्देश्य एकमात्र निष्ठा जाग्रत करने का है ।

Saturday, 14 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

जीवनपथ के संदर्भ में उपनिषद् के एक मंत्र में दावा करते हुए कहा गया कि इस मार्ग को छोड़कर कल्याण का कोई अन्य मार्ग नहीं है - नान्यत् पन्था विद्यते अनयाय - इस प्रकार आचार्यों तथा उपनिषद् के ऋषियों ने कभी-कभी यह आग्रह तो किया, यह दावा तो किया कि मनुष्य के कल्याण का एकमात्र मार्ग यही है । लेकिन व्यापक संदर्भ में देखने पर ऐसा लगता है कि इस आग्रह का सही-सही उद्देश्य किसी पथ विशेष के प्रति निष्ठा उत्पन्न करना है । आपने यदि पुराणों की परम्परा का अध्ययन किया होगा तो आपको उन विभिन्न पुराणों में भी यह बात मिलेगी । हमारे पुराणों में अलग-अलग देवताओं की प्रधानता की परम्परा है । किसी में शिव की प्रधानता मिलेगी, किसी में विष्णु की प्रधानता दिखायी देगी और किसी में सूर्य की । इस प्रकार से ईश्वर के विविध रूपों की शैली यह है कि उसमें कभी-कभी, जब एक की प्रशंसा की गयी तो उसके साथ-साथ दूसरे की निन्दा भी कर दी गयी । यद्यपि साधारण व्यक्ति पढ़कर चकरा जाता है, क्योंकि अठारहों पुराणों के रचियता अगर अलग-अलग महापुरुष होते और वे अलग-अलग बातें कहते, तब तो लगता कि भई ! सबका मत अलग-अलग है, पर जब यह दावा किया जाता है कि अठारहों पुराणों के रचयिता भगवान व्यास ही हैं तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है कि एक ही महापुरुष एक पुराण में तो भगवान शंकर की सर्वोच्चता का प्रतिपादन करे, और दूसरे पुराण में भगवान विष्णु की महिमा को सर्वोच्च बताये, तो फिर ? इसका सीधा-सा अभिप्राय यही है कि हमें पुराणों की शैली को, व्यास जी की शैली को समझने की आवश्यकता है ।

Friday, 13 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

त्रिवेणी के पावन तट पर महर्षि भरद्वाज से भगवान श्रीराघवेन्द्र का मार्ग के सन्दर्भ में जो प्रश्न है, जो जिज्ञासा है कि मैं किस मार्ग से जाऊँ, वस्तुतः यह प्रश्न भौतिक मार्ग से अधिक संबंधित नहीं है । इसमें व्यक्ति के आध्यात्मिक जीवनपथ के संबंध में संकेत छिपा हुआ है । भगवान श्री राघवेन्द्र जब यह कहते हैं कि मैं किस मार्ग से जाऊँ ? तो प्रश्न में ही यह तात्पर्य छिपा हुआ है कि यद्यपि मार्ग तो कई हैं, पर कुछ मार्ग ऐसे हैं जिन्हें हम बुरा मार्ग कहते हैं और संसार के अधिकांश व्यक्ति इसी मार्ग पर चल रहे हैं । क्योंकि अधिकांश प्राणी काम, क्रोध अथवा लोभ के मार्ग पर ही चलते हुए दिखायी देते हैं । और यह सर्वथा स्वाभाविक है कि उस पथ का अनुगमन करता हुआ व्यक्ति गोस्वामीजी तथा गीता के शब्दों में नरक की दिशा में बढ़ता हुआ अन्त में नरक के द्वार में प्रविष्ट हो जाता है । लेकिन जिन मार्गों को हम कल्याणकारी मार्ग कहते हैं, उन मार्गों में भिन्नता है या नहीं ? क्या किसी मार्ग के विषय में दावे से यह कहा जा सकता है कि संसार में समस्त प्राणियों के लिये एक मात्र यही मार्ग है ? आने वाले दिनों में इस पर विचार करेंगे ।

Thursday, 12 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

राजा प्रतापभानु के महत्वकांक्षा के विन्ध्याचल में भटकने का अन्तिम परिणाम यह हुआ कि वह रावण बन गया, राक्षस बन गया । विन्ध्याचल की दूसरी कथा में जब विन्ध्याचल सूर्य का प्रकाश रोकने के लिए ऊपर उठने लगा तो अगस्त्य जी कहा गया कि महाराज ! किसी तरह से आप ही इस समस्या का समाधान कीजिए । अगस्त्य जी जब विन्ध्याचल के समीप पहुँचे तब विन्ध्याचल ने सोचा कि संत आये हैं तो प्रणाम करना चाहिए । इसलिए विन्ध्याचल ने तुरंत संत के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया तथा अगस्त्य जी से पूछ दिया - महाराज ! क्या आज्ञा है ? अगस्त्य जी ने कहा - मैं दक्षिण भारत की यात्रा पर जा रहा हूँ, जब तक लौटकर नहीं आता तब तक इसी तरह पड़े रहो । और संत की आज्ञा मानकर विन्ध्याचल वैसा ही पड़ा रह गया । बहुत दिनों तक जब अगस्त्य जी नहीं लौटे, तो किसी ने कहा - वे महात्मा तो गये, अब वे नहीं लौटेंगे, उठो ! उठो ! किन्तु विन्ध्याचल ने कहा कि जब महात्मा ने आदेश दिया है तो मैं महात्मा के आदेश को नहीं टाल सकता । पर जब भगवान श्रीराघवेन्द्र को विन्ध्याचल ने आते देखा तो गदगद हो गया । विन्ध्याचल सोचने लगा, मैं तो केवल यही चाहता था कि सूर्य मेरी परिक्रमा करे, पर जिस ईश्वर के शरीर में कोटि-कोटि ब्रह्मांड हैं, कोटि-कोटि सूर्य हैं, वह स्वयं जब मेरी परिक्रमा करने आ गया तब इससे बढ़कर बड़प्पन भला क्या होगा ? मुझे तो वस्तुतः भगवान प्राप्ति के मार्ग का बड़प्पन मिल गया । इस प्रकार महत्वकांक्षा के मार्ग के ये दो प्रसंग हैं । इनमें एक मार्ग रावण का है, और दूसरा पथ वह है जिसके द्वारा विन्ध्याचल को भगवान प्राप्ति के बड़प्पन की उपलब्धि होती है । उसका पथ यही है कि सत्संग के माध्यम से हम सही मार्ग पर चलें तथा महत्वाकांक्षा को भगवान से जोड़ दें ।

Wednesday, 11 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

राजा प्रतापभानु वन में भटककर कपट मुनि के पास पहुँच गये । कपट मुनि ने राजा से पूछ दिया - तुम्हारा नाम ? बोला - महाराज ! मैं प्रतापभानु का मंत्री हूँ । फिर प्रतापभानु ने पूछ दिया - महाराज ! आपका परिचय ? तो उसने कहा - मेरा नाम तो एकतनु है । राजा ने आश्चर्य भरे स्वर से पूछा, महाराज ! यह नाम तो संसार में कभी सुनने को नहीं मिला । इस नाम का अर्थ क्या है ? जरा यह भी बताने का कष्ट करें । उसने तुरन्त कहा कि जब आदिसृष्टि बनी तभी मेरी उत्पत्ति हुई । और तब से मेरा एक ही शरीर है इसीलिए मैं एकतनु हूँ । प्रतापभानु ने कहा - महाराज कोई सेवा ? लेकिन कपट मुनि बोला - मुझे कुछ नहीं चाहिए ? गोस्वामीजी ने कहा - कपट मुनि जितनी उदासीनता दिखाता है, राजा के अन्तःकरण में उतनी ही श्रद्धा यह सोचकर बढ़ती जा रही है कि महाराज जंगल में रहते हैं, अभी तक मृत्यु नहीं हुई, यह सचमुच बड़े त्यागी हैं । अन्त में प्रतापभानु कहने लगा कि महाराज ! मैं आपसे जरा झूठ बोल गया था, वस्तुतः मैं प्रतापभानु का मंत्री नहीं हूँ । कपट मुनि ने हँसकर कहा कि मैं तो पहले ही जान गया कि तुम प्रतापभानु हो । तो महाराज ! आप नाराज तो नहीं हैं ? उसने व्यंग्य भरी भाषा में कहा - यह जो तुमने मुझसे झूठ बोला, मुझे बड़ा अच्छा लगा । किसी महात्मा से कोई झूठ बोल दे और उसे अच्छा लगे ऐसा तो होता नहीं है । किन्तु इसे अच्छा क्यों लगा ! वस्तुतः उसके मन में विचार आया कि मैं कपट शुरु करने वाला था ही, पर अब तुमने स्वयं ही अपनी ओर से पहल कर दी तो अब मुझे पाप नहीं लगेगा । इसका अभिप्राय है कि यद्यपि दोनों ही कपटी हैं किन्तु जो बड़ा कपटी होगा वह बाजी ले जाएगा ।

Tuesday, 10 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

राजा प्रतापभानु वन में मार्ग भूल गया । लेकिन मार्ग भूलने के बाद भी यदि महर्षि भरद्वाज मिल गये होते तो काम बन जाता । परन्तु प्रतापभानु को मार्गदर्शक कौन मिला ? गोस्वामीजी ने संकेत किया कि राजा को जो महापुरुष मिला, वह एक ऐसा व्यक्ति था जिसका राज्य प्रतापभानु ने छीन लिया था । लेकिन उसने निर्णय कर लिया था कि वह प्रतापभानु से बदला अवश्य लेंगे । ऐसा सोचकर उसने तुरन्त साधु का वेष बनाया तथा जंगल में कुटिया बनाकर रहने लगा और यह शूकर जो था, जिसके पीछे राजा भागा था, वह वस्तुतः असली शूकर नहीं था । ऊपर से दिखायी दे रहा था आकर्षक शूकर पर भीतर से राक्षस था । और यह प्रतापभानु को भटकाकर ले गया उसी कपट मुनि के आश्रम में । कपट-मुनि के आश्रम में जाकर उसने देखा कि आश्रम सुन्दर है, मुनि ने सुन्दर वस्त्र पहनकर रखा है, उसे लगा कि आज तो बहुत बड़े महात्मा का दर्शन मुझे हो गया । उसने महानता का लक्षण भी क्या मान लिया ? सुन्दर वेष देखकर राजा ने निर्णय किया कि ये तो बहुत बड़े महात्मा हैं । अगर महात्मा का लक्षण यही माना जाय कि जो बात बढ़िया बनाने तथा वेष बनाने में जितना अधिक निपुण है, वह उतना ही ऊँचा, महात्मा है तो वही स्थिति होगी जो प्रतापभानु की हुई । इसीलिए संत के लक्षणों में यह कहीं नहीं कहा गया है कि जो इस प्रकार के वेष में हो, वह संत है ।

Monday, 9 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

गोस्वामीजी कहते हैं कि जब शूकर का पीछा करते हुए मंत्री एवं सेनापति राजा प्रतापभानु से पीछे छूटकर अलग हो गये तब राजा 'अति अकेल' - अत्यंत अकेला हो गया । तुलसीदास जी का अभिप्राय मानो यही है कि जब आप सफल होंगे तब तो आपके साथ सब लोग होंगे और जब आप विफल होंगे तो ये सब आपसे बिछुड़े बिना नहीं रहेंगे, साथ छोड़े बिना नहीं रहेंगे । गोस्वामीजी ने कहा कि इसी प्रकार आज असफल होने पर वह राजा बेचारा अत्यंत अकेला हो गया । वैसे व्याकरण की परम्परा है कि जहाँ एक शब्द से काम चले वहाँ पर दो शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए । इस दृष्टि से यहाँ पर तुलसीदास जी का यह वाक्य कुछ अटपटा सा दिखायी देता है । क्योंकि अकेल माने एक और 'अति अकेल' माने भी एक ही है । तो लगता है कि यहाँ पर अति शब्द का प्रयोग व्यर्थ किया गया है । तुलसीदास जी का अभिप्राय है कि भले ही व्यक्ति आपको अकेले जाता हुआ दिखायी दे रहा हो पर अगर वह मन में ध्यान करता हुआ चल रहा हो कि हमारे आगे भगवान चल रहे हैं, इस प्रकार चलता हुआ व्यक्ति अकेला भले ही दिखायी दे, पर वस्तुतः वह अकेला कहाँ है, क्योंकि वह तो भगवान के साथ है । गोस्वामीजी का तात्पर्य है कि अकेले होने के बाद भी अगर प्रतापभानु को भगवान की याद आ जाती तब तब तो कहना ही क्या था ? 'अति अकेल' माने जब बाहर के सब लोग साथ छोड़ ही दें और भीतर भगवान की भी याद न रह जाय तब हम अकेले नहीं, अति अकेले हैं ।

Sunday, 8 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

प्रतापभानु के जीवन में सफलता के पश्चात जब विफलता आयी तो उसने उसे भी यदि गीता के 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' - के रूप में लिया होता तो कष्ट नहीं आता । प्रतापभानु यद्यपि दिखावा तो यही करता था कि मेरे मन में फल की कोई इच्छा नहीं है क्योंकि मुझे तो तत्वज्ञान हो चुका है, लेकिन दिखावे के लिए ऐसा भाषण देने वाला राजा फलाकांक्षा से इतना ग्रस्त था कि जिस समय शूकर पर उसका बाण नहीं लगा उस समय उसे क्रोध आ गया । असफलता में शान्ति अथवा ईश्वर की स्मृति नहीं आयी, अपितु क्रोध आ गया । और तब महत्वकांक्षा के वन में क्रोध से भरा हुआ प्रतापभानु लोभ के शूकर का पीछा करने लगा । रामायण में कहा है कि - काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ - और क्रोध से भरकर लोभ के शूकर का पीछा करता हुआ प्रतापभानु अन्त में जंगल में मार्ग भूल जाता है । इसका अभिप्राय है कि जब कोई जीवन में इस तरह चलेगा तो संसार में उसका मार्ग भूलना अवश्यंभावी है ।

Saturday, 7 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

जो प्रारब्धवादी हैं वे यह मानकर चलते हैं कि जब प्रारब्ध से लाभ हुआ था तो प्रारब्ध से ही हानि हो गयी । पर जो भक्त हैं वे मानते हैं कि भगवान ने कृपा करके विजय दिला दी पर कहीं सफलता का अभिमान न हो जाय, कहीं नजर न लगे, इसलिए थोड़ी सी असफलता दे दी । भक्तों के जीवन में यही दिव्य भावना होती है । भक्त जीवन में जो हारते हुए दिखायी देते हैं उस दुख और पराजय में भी वे भगवान के द्वारा अपनी रक्षा ही देखते हैं । लेकिन सही अर्थों में जय और पराजय को लेकर पाना, सफलता तथा विफलता को ले पाना, इससे बहुत कम लोग परिचित हैं ।

Friday, 6 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

एक किसी ने भगवान से पूछ दिया - महाराज ! आपने नारद के चरित्र में कलंक क्यों लगवा दिया ? नारद जैसे महात्मा, जिन्होंने काम, क्रोध तथा लोभ तीनों को जीत लिया, पर बीच में आपने यह किस (विश्वमोहिनी प्रसंग) चक्कर में डाल दिया ? भगवान बोले - बात यह है कि अगर बच्चा बहुत सुन्दर हो, तो माँ को बड़ी चिन्ता होती है कि इसको कहीं नजर न लग जाय और नजर से बचाने के लिए माँ एक काला टीका अवश्य ही लगा देती है । इसी प्रकार मैंने भी देखा कि नारद ने काम, क्रोध और लोभ को जीत लिया है, अब बस इसको नजर लगने ही वाली है । भगवान ने कहा कि नारद को एक तो काम की दृष्टि लग गयी, पर उससे भी बड़ा संकट तब पैदा हो गया जब उन्हें अपनी नजर लगने लगी । जब नारद ने काम, क्रोध तथा लोभ को हरा दिया तो काम ने आकर चरणों में प्रणाम किया पर जाते-जाते वह नजर लगाता गया । काम ने कहा - महाराज ! आज तक बड़े-बड़े महात्मा उत्पन्न हुए पर आप जैसा कोई नहीं हुआ । किन्तु उसके बाद सबसे बड़ी बात यह हुई कि काम का वाक्य सुनकर नारद जी अपने आप को देखकर सोचने लगे कि सचमुच मुझमें इतने अधिक गुण हैं । और तब भगवान ने काला टीका लगा दिया । उन्हें लगा कि नारद के मन में अभिमान उत्पन्न हो गया कि मैं इतना चरित्रवान हूँ । मैं काम, क्रोध और लोभ आदि का विजेता हूँ । भगवान ने कहा - नारद तो मेरा नन्हा बालक है । और जैसे बालक को नजर लग जाय तो वह रुग्ण हो जाता है तथा माँ उसकी रुग्णता को दूर करने की चेष्टा करती है, इसी प्रकार नारद को बचाने के लिए मैंने यह खेल किया । वस्तुतः विश्वमोहिनी के प्रति नारद के मन में जो आकर्षण उत्पन्न हुआ, उसके द्वारा मैंने नारद का अभिमान शिथिल कर दिया । बस, यही काला टीका है ।

Thursday, 5 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं - लाभालाभौ जयाजयौ - व्यक्ति को लाभ-हानि तथा जय-पराजय में सम रहना चाहिए । पढ़कर आश्चर्य होता है कि भगवान को यह शब्द कहने की क्या आवश्यकता थी ? परन्तु भगवान का अभिप्राय है कि लाभ के साथ हानि तथा जय के साथ पराजय भी जुड़ी हुई है । किन्तु ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति का कर्तव्य यह है कि उसे जय और पराजय दोनों से सावधान रहने की आवश्यकता है । जब जय हो उसका स्वागत तो करे पर अभिमानी बनने से बचे । जय का सदुपयोग तो यह है कि व्यक्ति उसे भगवान के चरणों में अर्पित कर दे, और कहे कि प्रभु यह मेरी जय नहीं है, यह तो आपकी कृपा से मिली है । जीव जो सफलता प्राप्त करता है वह आपकी कृपा से ही पाता है । इस प्रकार व्यक्ति यदि सफलता को ईश्वर से प्राप्त मान लेगा, तो वह अभिमान से बच जायेगा । और अगर पराजय या दुख मिले तो मनुष्य के मन में यह बात आनी चाहिए कि जिसने इतने दिनों तक जय प्रदान की, अगर आज एक पराजय भी उसने दे दी तो उसकी अनुकम्पा ही मानकर हमें स्वीकार करना चाहिए ।

Wednesday, 4 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

राजा प्रतापभानु महत्वकांक्षी था, और इतना अधिक महत्वाकांक्षी था कि सारे संसार को जीत लेने के बाद भी उसकी तृप्ति नहीं हुई, संतोष नहीं हुआ और अन्त में वह विन्ध्याचल के गम्भीर वन में गया । आगे चलकर वर्णन आता है कि उसने मृगों पर अपने बाण का प्रहार करते हुए लक्ष्य पर सफलता प्राप्त की । सफलता प्राप्ति के पश्चात सायंकाल को जब वह लौट रहा था तो अचानक उसके सामने एक शूकर आ गया । और वह शूकर बड़ा विशाल था, उसके दाँत बड़े चमकीले थे । उस दृश्य को जब प्रतापभानु ने देखा तो उसके मन में यही आया कि दिन भर तो मैंने शिकार खेला पर इतना बढ़िया शूकर तो कहीं भी नहीं दिखा, चलो इसको भी मारना चाहिए । इतना सोचकर उसने धनुष पर बाण चढ़ाकर शूकर पर चला दिया । महत्वकांक्षी व्यक्ति की यही मनोवृत्ति होती है, क्योंकि उसे संतोष नहीं होता । उसे लगता है कि एक बार और लक्ष्य को जीत लें । किन्तु प्रतापभानु के जीवन में आज पहली बार एक नया अनुभव हुआ । और भी ! प्रतापभानु के जीवन में जो अनुभव हुआ, वह हमारे-आपके सबके जीवन का अनुभव है । कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके लिए कहा जाता है कि वे बड़े सफल हैं, पर क्या कोई बड़े से बड़ा सफल व्यक्ति यह दावा कर सकता है कि जीवन में हमें कभी भी विफलता का सामना नहीं करना पड़ेगा । ऐसा दावा तो कोई व्यक्ति नहीं कर सकता । हाँ ! अगर कोई व्यक्ति यह समझने की भूल करे कि हमें केवल सफलता ही मिलेगी, विफलता नहीं मिलेगी तो यह उसकी मिथ्या धारणा ही होगी ।

Tuesday, 3 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

हनुमान जी महाराज को ईर्ष्या के रूप में सिंहिका मिली, तो उन्होंने उसे क्यों मार डाला ? हनुमान जी आकाश मार्ग से जा रहे हैं, ऊपर उठ रहे हैं, तो इसमें सिंहिका की कोई हानि नहीं है । लेकिन सिंहिका ने हनुमान जी को ज्योंही ऊपर आते हुए देखा त्योंही उसने अपने स्वभाव के अनुसार हनुमान जी को ऊपर से नीचे गिराने का निर्णय लिया । तो दूसरे के पतन से जो प्रसन्न हो तथा दूसरे को खाकर जिसके महत्वकांक्षा की पूर्ति हो ऐसी जो ईर्ष्या है वह समाज का कल्याण नहीं कर सकती । क्योंकि वह व्यक्ति को आगे बढ़ने की प्रेरणा नहीं देती वरन बढ़ते हुए व्यक्ति को गिराने की प्रेरणा देती है ।

Monday, 2 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

.....कल से आगे....
पिछड़ने वाला व्यक्ति यह सोचे कि अगर यह तेज दौड़ रहा है तो हम इससे भी तेज दौड़ कर आगे निकल जायँ । तो स्वाभाविक रूप से वह व्यक्ति ज्यादा तेज दौड़ कर आगे वाले व्यक्ति से भी आगे बढ़ जावेगा । यह वृत्ति बहुत अच्छी तो नहीं कही जायेगी लेकिन इस मात्सर्य वृत्ति के द्वारा दूसरे से होड़ लगाकर आगे बढ़ने की प्रेरणा उत्पन्न हो तो समाज में बहुत ऊँची स्थिति नहीं होने पर भी यह चलेगी । विद्यार्थी पढ़ते हैं तो आपस में बढ़ने की होड़ रहती है । और इस प्रतिस्पर्धा में बहुतों की उन्नति भी हो जाया करती है । लेकिन इसका दूसरा पक्ष थोड़ा सा भिन्न है । अगर हमने तेज दौड़ करके दूसरे को हरा दिया तब तो यह मात्सर्य की वृत्ति है, पर कुछ व्यक्ति ऐसे स्वभाव के भी होते हैं कि जब उन्हें लगता है कि दौड़ में तो हम इसकी बराबरी नहीं कर सकते तो क्यों न इसकी टाँग पकड़ कर खींच ले, कि अगर हम न दौड़े तो यह भी न दौड़ने पाये । बस यही ईर्ष्या है । तो दोनों दृष्टियों में से एक को बचाइये और एक को मारिये । मात्सर्य रूपी राहु को रहने दीजिए, पर ईर्ष्या रूपी सिंहिका को मार दीजिए ।

Sunday, 1 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

मात्सर्य से संबंधित एक बड़ा अनोखा वर्णन हनुमान जी की लंका यात्रा के प्रसंग में आता है । गोस्वामीजी ने हनुमान जी की यात्रा का जो वर्णन किया उस यात्रा में उन्होंने एक राक्षसी का वर्णन किया है जिसका नाम था सिंहिका । उसका परिचय गोस्वामीजी ने 'रामाज्ञा-प्रश्न' में यह कहकर दिया कि सिंहिका जो थी वह राहु की माता थी और यह विचित्र बात है कि राहु की अभी तक नवग्रहों में पूजा होती है । लेकिन हनुमान जी को जब राहु की माता मिली तो उसे उन्होंने छोड़ा नहीं, मार दिया । बेटा, यद्यपि पाप-ग्रह ही माना जाता है, पर इतना होते हुए भी अमर ग्रह है, उनकी पूजा होती है । और उसी की माता मार दी गयी, इसका सांकेतिक सूत्र क्या है ? इस पर आप जरा विचार कीजिए । ये तो ईर्ष्या और मात्सर्य की दो वृत्तियाँ हैं । उनमें एक मात्सर्य तो राहु का स्वभाव है तथा ईर्ष्या जो है वह सिंहिका का स्वभाव है । ईर्ष्या और मात्सर्य की वृत्तियाँ एक-दूसरे के बहुत पास हैं, बिल्कुल मिलती-जुलती हैं । कभी-कभी तो किसी से पूछ दीजिए कि मात्सर्य माने, तो वह उत्तर में वह कह देगा - ईर्ष्या । पर ईर्ष्या और मात्सर्य में थोड़ा अंतर है । मात्सर्य शब्द का अर्थ है कि जैसे दो व्यक्ति चल रहे हैं तो स्वाभाविक है कि एक व्यक्ति की गति तेज हो सकती है और दूसरे की धीमी । इस प्रकार एक व्यक्ति तो तेज चलता हुआ आगे है और दूसरा जो पिछड़ गया है उसे बुरा लग रहा है । उस समय उसके मन में जो क्षोभ उत्पन्न होता है उसी का नाम मात्सर्य है । अब इसकी दो प्रतिक्रियाएं होंगी । एक ईर्ष्या की और दूसरी मात्सर्य की । ईर्ष्या वाली प्रतिक्रिया में मात्सर्य वाली प्रतिक्रिया भिन्न होगी । एक प्रतिक्रिया तो यह होगी कि पिछड़ने वाला व्यक्ति यह सोचे कि अगर यह तेज दौड़ रहा है तो हम इससे भी तेज दौड़ कर आगे निकल जायँ ।
     ......आगे कल ....