Wednesday, 31 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान की कथा तो अनन्त है, इसको पूरा कर पाना सम्भव नहीं है, पर समय की सीमाओं में रहकर मैं बस इतना ही कहूँगा कि जनकनन्दिनी श्रीसीताजी, लक्ष्मण जी और भगवान श्रीराघवेन्द्र ने जीवन पथ के लिए जो सूत्र दिये उनका हमें जीवन पथ में चलते हुए सर्वदा स्मरण करते रहना चाहिए । और इनमें से चाहे जो पथ आप अपने लिये चुन लीजिए । गोस्वामीजी कहते हैं कि हम अपनी शक्ति का सही सदुपयोग अपने लिये तथा समाज के लिये करें, बस प्रभु की यात्रा का यही उद्देश्य है, और इस यात्रा पथ की कथा हमें और आपको अपने जीवनपथ को समझने में सहायता देगी ।

Tuesday, 30 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

तुलसीदास जी ने वन पथ में भगवान श्रीराम, श्रीसीताजी और लक्ष्मण जी के चलने की पद्धति का वर्णन करते हुए कहा कि -
प्रभु पद रेख बीच बिच सीता ।।
धरति चरन मग चलति सभीता ।।
- इसका सांकेतिक अभिप्राय है कि प्रभु के चरणों में जो चार रेखायें हैं वे मानो चार मर्यादाएँ हैं जो भगवान श्रीराघवेन्द्र ने चार रेखाओं के माध्यम से बनायी । श्रीसीताजी ने निरन्तर उन चारों रेखाओं की रक्षा करने की चेष्टा की, मर्यादाओं को बचाने की चेष्टा की । इसके द्वारा श्रीजानकी जी ने हमें सावधान कर दिया कि प्रभु की रेखाओं को मैंने कभी नहीं लाँघा, पर लक्ष्मण की रेखा को मैं लाँघ गयी इसी कारण से मुझे लंका में कैद होना पड़ा । इसका अभिप्राय है कि चाहे कोई बड़ा हो और चाहे छोटा हो पर उसकी रेखा (मर्यादा) को कभी मत लाँघिये । बड़ों का सम्मान तो कीजिए ही, किन्तु छोटे के प्यार की भी रक्षा कीजिए ।

Monday, 29 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

श्रीसीताजी ने सुमन्त जी से कहा कि आप पिताजी से जाकर कह दीजियेगा कि मेरे सामने न तो भ्रम की समस्या है, न श्रम की समस्या और न दुख की समस्या है । और उसका सूत्र देते हुए श्रीसीताजी ने कहा कि भ्रम की समस्या तो उसके सामने होगी जिसे स्वयं यह निर्णय करना हो कि मुझे किधर जाना है ? पर यहाँ तो जब आगे-आगे प्रियतम चलेंगे तब फिर निर्णय तो इन्हीं को करना होगा । इसलिए मुझे भला भ्रम क्यों होगा । इसका अभिप्राय है कि जीवन पथ में कभी भ्रमित न हो इसका सर्वश्रेष्ठ उपाय यही है कि हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि महाराज ! आप ऐसी कृपा करें कि मैं आपके पीछे-पीछे चलूँ । हम अपनी कामनाओं के पीछे प्रभु को चलाने की चेष्टा करने के स्थान पर प्रभु से यही प्रार्थना करें कि आप जिसे सही समझें, कृपा करके हमें उसी दिशा में ले चलें ।

Sunday, 28 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

सुमन्त जी ने जब महाराज श्रीदशरथ का प्रस्ताव दुहराया तो उस समय जो सूत्र श्रीसीताजी ने दिया, वह बड़े काम का है । उन्होंने जो बात कही, वह सबके लिए है । श्रीसीताजी ने सुमन्त जी को प्रणाम करके कहा कि आप तो मेरे लिए बड़े पूज्य हैं, मैं आपके सामने उत्तर देना नहीं चाहती हूँ, लेकिन आप जाकर के पिताजी से कह दीजियेगा कि वे मेरे लिए चिन्ता न करें । उस समय श्रीसीताजी ने चिन्ता न करने के लिए तीन सूत्र दिये हैं । वे तीनों सूत्र व्यक्ति के जीवन पथ में आने वाली समस्याओं से संबंधित हैं । उन्होंने कहा कि जीवन पथ पर चलते हुए व्यक्ति के समक्ष बहुधा श्रम, भ्रम और दुख की समस्याएँ आती हुई दिखायी देती हैं । भ्रम की समस्या का तात्पर्य है कि कभी-कभी व्यक्ति के लिए यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि जीवन के लिए सही मार्ग कौन सा है ? इसको कहते हैं बुद्धि का भ्रम । और दूसरी समस्या व्यक्ति के सामने थकान की आती है, क्योंकि जब व्यक्ति चलेगा तो श्रम की अनुभूति तो होगी ही । बुद्धि में भ्रम, शरीर में श्रम और जब बहुत प्रयत्न करने के बाद भी व्यक्ति को जीवन का लक्ष्य नहीं मिलता है तो व्यक्ति के मन में दुख होता है । इस प्रकार ये तीन समस्याएँ प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में विद्यमान रहती हैं ।

Saturday, 27 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

जनकनन्दिनी श्रीसीता ने भगवान राम को वन मार्ग में याद दिलाते हुए कहा कि आप अत्यंत सुकुमार हैं, इसलिए जल्दी से वन में कुटिया बनाने का प्रबंध कीजिए । प्रभु ने लौट करके देखा तो दिखायी पड़ा कि श्री सीताजी के होंठ सूख गये हैं, चेहरे पर श्रम की अभिव्यक्ति है । लेकिन सीताजी को अपने श्रम की चिन्ता नहीं है । और भई ! सचमुच जीवन पथ में चलने के लिये यह बहुत बढ़िया सूत्र है । क्योंकि जब प्रत्येक व्यक्ति अपने श्रम की चिन्ता करने लगता है तभी समस्या उत्पन्न हो जाती है । हम लोग अपने दुख और श्रम की चिन्ता करते हैं पर चिन्ता करनी चाहिए अपने साथ वाले के श्रम की । अगर हम सामने वाले के दुख से दुखी हों, सामने वाले के श्रम से चिन्तित हों, तो अपना मार्ग जन्य श्रम कम हो जायेगा, विस्मृत हो जायेगा । श्रीसीताजी को चिन्ता है श्रीराम के श्रम की और भगवान श्रीराम तो श्रीसीताजी को श्रमित देखकर रोने लगे ।

Friday, 26 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान श्रीराम के द्वारा धनुष तोड़ने पर जनकपुर-वासिनी स्त्रियाँ दूसरा ही अर्थ लेती हैं । उन्होंने तो भगवान राम से ही कह दिया कि राघवेन्द्र ! तुम यह गर्व मत करना कि धनुष को तुमने तोड़ा है । लक्ष्मण जी ने पूछ दिया - प्रभु ने नहीं तोड़ा तो फिर किसने तोड़ दिया ? सखियों ने व्यंग्य भरी भाषा में यही कहा कि जिसे फूल तोड़ने में पसीना आ जाय, वह भला धनुष को तोड़ सकता है ? अरे ! यह तो हमारी तथा श्रीसीताजी की कृपा थी कि हम लोगों ने देवताओं से प्रार्थना करके धनुष को तुड़वा दिया । इसलिए धन्यवाद तो हम लोगों को दीजिए । प्रभु ने मुस्कराकर कहा - बिल्कुल ठीक है । भगवान कहते हैं कि वस्तुतः जो कुछ भी मेरे द्वारा होता हुआ दिखायी देता है वह भक्ति की इच्छा और संकल्प से ही होता है । वस्तुतः भक्ति के बल से ही मैं सारे कार्य सम्पन्न करता हूँ ।

Thursday, 25 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

तुलसीदास जी जब धनुष-यज्ञ का वर्णन करने लगे तो किसी ने पूछ दिया - महाराज ! श्रीराम को जब पुष्पवाटिका में फूल तोड़ने में पसीना आ गया तो फिर धनुष तोड़ने में उनकी क्या दशा हुई होगी ? तो गोस्वामीजी ने कहा - उस दिन न तो किसी ने श्रीराम को धनुष उठाते देखा, न चढ़ाते देखा और न तोड़ते देखा । लोगों ने देखा कि धनुष टूटा पड़ा है, और उसके पास श्रीराम खड़े हैं । राजागण आश्चर्य से देखने लगे कि कुछ पसीना-वसीना तो आया नहीं, इसलिए वे लोग कहने लगे कि यह तो कोई षड्यंत्र लग रहा है । अरे ! इतना बड़ा धनुष यदि सचमुच तोड़ा होता तो कम से कम पसीना तो आया ही होता । किन्तु भगवान श्रीराघवेन्द्र के कार्य करने की यह सर्वथा अनोखी पद्धति है । उनका अभिप्राय क्या है ? आइए, इस पर भी थोड़ा विचार करें - सुमन सुन्दर मन का प्रतीक है, और धनुष है अहंकार का प्रतीक । जब भगवान को सुमन को डाली से अलग करना पड़ा तो व्याकुल हो गये लेकिन जब अहंकार तोड़ना पड़ा तो रंचमात्र श्रम की अनुभूति नहीं हुई । क्योंकि ईश्वर के आगे अहंकार टिक नहीं सकता, इसका तात्पर्य यह है ।

Wednesday, 24 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

वन यात्रा में गंगा पार करने के बाद श्रीसीताजी ने भगवान राम की ओर जिज्ञासा भरी दृष्टि से देखकर प्रश्न किया - प्रभु आपने तो कहा था कि वन में चलकर एक कुटी बनायेंगे, किन्तु वह वन कितनी दूर है जहाँ आप कुटी बनाने वाले हैं । प्रभु ने कहा - सीते ! लगता है आप थक गयी हैं । इसलिए मैं तो पहले ही कह रहा था कि आप मत चलिए । श्रीसीताजी ने कहा - महाराज ! मुझे अपनी थकान की चिन्ता नहीं है, पर मुझे लगता है कि आप जरुर थक गये होंगे । भगवान राम ने कहा - ऐसा अनुभव तुम्हें क्यों हो रहा है ? तो जनकनन्दिनी श्रीसीता ने कहा - प्रभु ! मुझे आपकी कोमलता का परिचय मिल चुका है । भगवान ने जानना चाहा कि आपको मेरी कोमलता का परिचय कहाँ मिला ? जनकनन्दिनी श्रीसीता ने स्मरण दिलाते हुए कहा - महाराज ! पुष्पवाटिका में आप फूल चुनने आये, उस समय सखी के कहने पर जब मैंने आँखें खोलकर दर्शन किया तो मुझे दिखायी पड़ा कि आपके माथे पर पसीने की बूँद है । - बस महाराज ! मैं उसी समय समझ गयी कि आप अत्यंत सुकुमार हैं क्योंकि जिसे फूल तोड़ने में पसीना आ गया वह कितना कोमल होगा ? पर श्रीराम की यही परिपूर्णता है । वे फूल तोड़ने के कार्य को बड़ी कोमलता से करते हैं । इसका अभिप्राय यह है कि मानो पुष्प की कलियों को वृक्ष से अलग करने में उनका ह्रदय यह सोचकर अत्यंत व्याकुल हो जाता है कि इन पुष्पों को डाली से अलग कैसे करें ? यह जो प्रभु की कोमलता है वह शरीरजन्य नहीं, अपितु भावनाजन्य है ।

Tuesday, 23 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान श्रीराम वन में यद्यपि उदासी वेष में गये किन्तु धनुष-बाण अवश्य लेते गये । वैसे दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं । पर भगवान राम का तात्पर्य यह था कि हम अपने स्वार्थ के लिए तो उदासीन हो सकते हैं, अपने लिए राज्यप्राप्ति के उद्देश्य से हम नहीं लड़ेंगे, इसलिए उदासी बनकर जा रहे हैं । लेकिन मैं यह प्रतिज्ञा नहीं करता हूँ कि जब समाज पर संकट आवेगा, तब भी नहीं लड़ूँगा, अपितु जब कभी ऐसा अवसर दिखायी दिया तब तो मैं धनुष-बाण उठाकर अवश्य संघर्ष करुँगा । भगवान श्रीराघवेन्द्र की दृष्टि में व्यक्ति के जीवन में सन्तत्व एवं स्थित प्रज्ञता दोनों का सामंजस्य होना चाहिए । किन्तु उस सामंजस्य का रूप यही होना चाहिए कि आप अपने संदर्भ में स्थितप्रज्ञ बन जाइये और दूसरों के लिए सन्त । अपनी पीड़ा से विचलित मत होइए, पर जब दूसरों की पीड़ा देखिये तब आपका ह्रदय द्रवित हुए बिना न रहे । भगवान राम के चरित्र में पग-पग पर यही तो दिखायी देता है ।

Monday, 22 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गीता में स्थितप्रज्ञ और सन्त दोनों के लक्षणों का वर्णन किया गया है । आपको सन्तत्व और स्थितप्रज्ञता में एक सूक्ष्म अन्तर मिलेगा । स्थितप्रज्ञ वह है कि जिसकी प्रज्ञा  (बुद्धि) प्रत्येक स्थिति में स्थिर है । जो किसी भी घटना से विचलित नहीं होता, वह स्थितप्रज्ञ है । पर रामचरितमानस में सन्त का लक्षण बताया गया कि सन्त वह है कि जो दूसरे के दुख में दुखी हो जाता है । यद्यपि पढ़कर तो यही लगता है कि इन दोनों में परस्पर विरोध है । क्योंकि जो सन्त होगा वह स्थितप्रज्ञ नहीं होगा और जो स्थितप्रज्ञ होगा वह सन्त नहीं होगा । पर भगवान राम के व्यक्तित्व में बड़े अद्भुत रूप में दोनों का सामंजस्य विद्यमान है, तथा दोनों की ही सार्थकता है । और इस सूत्र को हमें समझ लेना चाहिए । हम अपनी पीड़ा, अपने दुख में स्थितप्रज्ञ बनें इसमें तो शोभा है । लेकिन अगर हम दूसरों की पीड़ा के समय भी स्थितप्रज्ञ बन जायँ, तो क्या यह स्थितप्रज्ञता कही जायेगी ?

Sunday, 21 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

कोमलता की परिभाषा करते हुए रामायण में कहा गया है कि वन जाने का समाचार जब भगवान राम को मिला तो श्रीराम मुस्कराने लगे । उन्हें रंचमात्र भी दुख नहीं हुआ । लेकिन दूसरी ओर जब प्रभु माँ की ओर देखते हैं, पिता जी की ओर देखते हैं, तो भगवान राम की आँखों में आसूँ आ गये । पढ़कर आश्चर्य होता है कि स्वयं की इतनी वस्तु खो गयी पर रंचमात्र दुखित नहीं हैं । इसका कारण क्या है ? तब गोस्वामीजी ने कहा - श्रीराम की कोमलता का एक नया ही रूप है । स्वयं अपने लिये तो वे इतने कठोर दिखायी देते हैं कि इतने बड़े आघात की झेलने में उन्हें रंचमात्र भी पीड़ा नहीं होती है । तुलसीदास जी ने कहा कि करुणामय भगवान श्रीराघवेन्द्र इतने कोमल हैं कि स्वयं अपने ऊपर बड़े से बड़े कष्ट को झेलकर भी किसी दूसरे का रंचमात्र भी दुख देख लें तो व्याकुल हो जाते हैं, और फिर तो प्रभु की आँखों से आँसू रुकते नहीं हैं ।

Saturday, 20 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

जीवनपथ में सर्वदा फूल ही बिछे हुए नहीं मिलते हैं । जनकनन्दिनी श्रीसीता जहाँ प्रकट हुई थी, वहाँ पर तो पुष्प की वर्षा करके श्रीराघवेन्द्र के मार्ग को कोमल बनाया गया था और उस सुकोमल मार्ग पर श्रीराघवेन्द्र चले । पर यह जो चित्रकूट का मार्ग है, पुष्पाच्छादित नहीं है, बल्कि इस मार्ग में तो काँटे ही काँटे बिछे हुए हैं । और भई ! जो सत्य यहाँ प्रभु के जीवन में प्रकट हुआ वही हमारे और आपके जीवन का भी सत्य है । कभी हमारे और आपके जीवन में ऐसा लगता है कि मार्ग पर चलना अत्यंत सुगम है, फूल बिछे हुए हैं तथा स्वागत-सत्कार हो रहा है । और कभी ऐसा प्रतीत होता है कि पग-पग पर काँटे हैं, विध्न हैं । इस प्रकार से रास्ते पर परस्पर दो विरोधी अनुभूतियाँ हों तो क्या काँटों के भय से हम मार्ग पर चलना बन्द कर दें ? क्या कठिनाइयों के भय से हम लक्ष्य की ओर बढ़ने से विरत हो जायँ ? या फिर लक्ष्य की ओर बढ़ने पर आने वाले इन विध्न और काँटों को कैसे पार करें इसका उपाय खोजें ?

Friday, 19 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

श्री रामचरितमानस में भगवान श्रीराघवेन्द्र की विविध यात्राओं का ऐसा उल्लेख किया गया है कि वे यात्राएँ केवल भूगोल की साधारण यात्रायें नहीं, वरन वे सबकी सब हमारे जीवन की यात्राएँ हैं । प्रभु ने विविध मार्गों पर चलकर हमारे समक्ष एक आदर्श उपस्थित किया और चुनाव के लिये हमें स्वतंत्रता दे दी कि हम इन मार्गों में से जिस मार्ग का स्वयं को अधिकारी समझें उस मार्ग पर चलकर अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने की चेष्टा करें । भगवान श्रीराघवेन्द्र की यात्रा का अभिप्राय यह है कि सर्वप्रथम हमारे जीवन में सही-सही लक्ष्य का निर्णय हो, उसके पश्चात लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किस मार्ग का वरण करना है यह निर्णय करना होगा । उस मार्ग पर चलने की सही पद्धति तथा उस मार्ग में आने वाली समस्याओं आदि को पार करते हुए यदि हम जीवन पथ में आगे बढ़ें, तो इसमें कोई सन्देह नहीं है कि हम जीवन के लक्ष्य को पा लेंगे ।

Thursday, 18 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

तुलसीदास जी वनपथ की झाँकी का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि आगे-आगे श्रीराम चल रहे हैं, उनके पीछे श्री सीताजी डरे हुए भाव से श्रीराम की चरण-रेखा को बचाती हुई चलती हैं । तथा सबसे अन्त में श्री लक्ष्मण जी सावधान होकर सीता जी और भगवान राम को थोड़ा दाहिने करके चलते हैं, ठीक पीछे नहीं चलते हैं । इसका तात्पर्य है कि व्यक्ति को मार्ग में चलते हुए सावधान तो रहना चाहिए, किन्तु ठीक पीछे चलने की आदत कभी-कभी समस्या उत्पन्न कर देती है । महापुरुषों का बिल्कुल सीधा अनुगमन नहीं करना चाहिए । उनको जरा दाहिने करके चलिये । जीवन यात्रा में हम कभी न अटकें इसके लिए श्रीराम को आगे करके ही चलना चाहिए । यद्यपि हम लोग भी श्रीराम को मानते हैं, पर एक अन्तर है । हम लोग वैसे पुकारते तो हैं राम को, पर प्रश्न यह है कि हम ईश्वर के पीछे चलना चाहते हैं या ईश्वर को अपने पीछे चलाना चाहते हैं ? और हम लोगों की समस्या यह है कि हम ईश्वर को भी पीछे चलाना चाहते हैं, ईश्वर के पीछे चलना नहीं चाहते । दूसरी महत्वपूर्ण बात है - रेखाओं को बचाना । इसका अभिप्राय है कि श्रीराम ने अवतार लेकर जो रेखायें  (मर्यादायें) बना दीं, हम उन मर्यादाओं को मानते हैं कि नहीं ? श्री लक्ष्मण जी और श्री सीता जी एक-एक पग डर कर उठा रहे हैं कि कहीं कोई रेखा मिट न जाय । इसका अर्थ है कि संसार पथ में यदि ईश्वर आगे रहे, हम उनकी मर्यादा का ध्यान रखें और ईश्वर का भय बना रहे, तो फिर भटकने की कोई संभावना नहीं है ।

Wednesday, 17 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

समुद्र को पार करने के लिए पत्थर के साथ-साथ भगवान ने जो दूसरा पुल बनाया वह भक्ति मार्ग का पुल है, पर डर यह है कि चलते समय अगर कहीं समुद्र में गिर गये तो जलचर उठाकर खा जायेंगे । और वस्तुतः ये जलचर ही हमारे जीवन के दुर्गुण हैं तथा सद्गुण ही पत्थर हैं । और पत्थर तथा जलचर दोनों के द्वारा पुल बनाकर मानो भगवान ने बता दिया कि कर्म मार्ग माने सद्गुणों का सदुपयोग, और भक्ति मार्ग का तात्पर्य है दुर्गुणों का सदुपयोग । सचमुच जलचर तो ऐसे थे कि जो बन्दरों को गिरने पर उठाकर खा लेते, पर जब उन्होंने भगवान की सुन्दरता देखी तो देखते ही रह गये । इसका अभिप्राय है कि जितनी भी दोष-वृत्तियाँ हैं, उनको भगवान से जोड़ दीजिए । जब ये भगवान में लग जायेंगी तो इनका भी सदुपयोग हो जायेगा । यह भक्ति मार्ग है, भगवत् कृपा का मार्ग है ।

Tuesday, 16 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

पत्थर का पुल कर्म-मार्ग है । पत्थर यद्यपि मजबुत होता है, पर उसमें एक बुराई है कि वह बहुत वजनदार होता है, इसलिए डूब जाता है । अतः कोई ऐसा उपाय करना चाहिए कि जिससे पत्थर की मजबूती बनी रहे पर वह हल्का हो जाय । और जब इसका उपाय खोजा गया तो पता चला कि नल, नील जिस पत्थर को छू देंगे वह हल्का तो हो जायेगा पर मजबूत ज्यों का त्यों रहेगा । इसी प्रकार हम लोंगो के जीवन में भी सत्कर्म का जो पत्थर है, वह है तो बड़ा मजबूत, पर उसमें अहंकार का बोझ इतना अधिक है कि वह डुबो ही देता है । इसलिए किसी तरह से सत्संग कीजिये, महापुरुषों का आशीर्वाद प्राप्त कीजिये कि सत्कर्म हो, पर उसमें अहंकार का बोझ न हो । और निरभिमानी होकर 'रा' और 'म' शब्द लिखकर पत्थरों को परस्पर जोड़ दीजिये । और इस प्रकार जब ईश्वर का आश्रय लेकर व्यक्ति पुल बना लेगा तो सरलता से देहाभिमान के समुद्र को पार कर लेगा, डूबता नहीं ।

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामचरितमानस में वर्णन आता है कि समुद्र पर पहले पत्थरों का पुल बनाया गया । यह पत्थरों का पुल कर्म मार्ग है । और जब पुल बन गया तो जाम्बवान जी से प्रभु ने पूछा कि अब तो समुद्र पार करने की समस्या समाप्त हो गयी । किन्तु जाम्बवान जी ने कहा - महाराज ! पुल छोटा है, और सेना बड़ी है, इसलिए सारी सेना को पार होने में बड़ा समय लगेगा । भगवान श्रीराघवेन्द्र ने कहा - अच्छा अब एक और पुल मैं बनाता हूँ । और तब प्रभु पुल के ऊपर खड़े हो गये । उस समय प्रभु की रुप-माधुरी का पान करने के लिए जब समुद्र के सारे जलचर ऊपर आ गये तब भगवान राम ने कहा कि अब तो चारों ओर मार्ग ही मार्ग है जो जिधर से जाना चाहे चला जाय । किन्तु बन्दर पहले डरे, उन्हें लगा कि कहीं ऐसा न हो कि हम इन पर चढ़े और ये हमें लेकर ही समुद्र में डूब जायें, इसलिए बन्दरों ने पत्थर आदि फेंककर देखा और जब उन्हें यह लगा कि जलचर डूबने वाले नहीं हैं, तो सेना पार होने लगी । गोस्वामीजी ने लिखा कि कुछ लोग हनुमान जी की तरह आकाश मार्ग से गये । कुछ पत्थर के पुल से गये और कुछ जलचरों के पुल से गये । इस प्रकार तीन मार्गों से सेना पार हुई । मानो भगवान ने बता दिया कि ज्ञान, कर्म और भक्ति इन तीनों ही मार्गों के द्वारा व्यक्ति पार हो सकता है ।

Saturday, 13 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

बहुधा यह देखा जाता है कि जीवन पथ में कुछ लोग अटक जाते हैं, और कुछ लोग भटक जाते हैं । श्रीसीता जी को आप चाहे मूर्तिमान भक्ति कह लीजिए, चाहे शान्ति कह लीजिए, चाहे माया कहिये और चाहे शक्ति कह लीजिए, पर बन्दरों के समान ही सीताजी की खोज में सारे संसार के लोग लगे हुए हैं । यद्यपि कुछ लोग तो रावण की तरह श्रीसीता जी को गलत पद्धति से प्राप्ति किये हुए दिखायी देते हैं । उन्हें लगता है कि सीता जी को हमने पा लिया है । पर यह सर्वनाश की पद्धति है । किन्तु दूसरी ओर रामचरितमानस में यह पढ़कर बड़ा आश्चर्य होता है कि सही पद्धति अपनाने के बाद, इतनी लम्बी यात्रा करने के पश्चात भी बन्दर बेचारे समुद्र के किनारे ही अटक गये । जो श्रेष्ठ लोग हैं, उनमें से भी अधिकांश समुद्र के किनारे जाकर ही अटक जाते हैं । पर अटकने वालों के लिए भी अन्त में यह उपाय निकला कि हनुमान जी लंका से लौटकर अपना अनुभव उन्हें सुनाते हैं । इसका सीधा सा तात्पर्य है कि अगर आप स्वयं चल सकें तो चलिए, पर अगर बीच में थककर अटक गये हों, तो हनुमान जी से कथा जरूर सुनिये । क्योंकि हनुमान जी से कथा सुनकर ही बन्दरों में उत्साह जाग्रत हुआ कि कोई बात नहीं, एक बार यदि अटक गये हैं, तो फिर पार होंगे । इसलिए सारे बन्दर पहले तो लौट आते हैं और नये सिरे से पुनः भगवान के साथ यात्रा करते हुए फिर समुद्र के किनारे आते हैं । किन्तु भई ! समुद्र को पार किये बिना लंका में जाने को नहीं मिलेगा । और लंका में जाये बिना श्रीसीता जी की प्राप्ति नहीं होगी ।

Friday, 12 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

वर्णन आता है कि चित्रकूट के पास तक निषादराज आगे-आगे चल रहे थे और भरतजी उनके साथ चल रहे थे । पर जिस समय वे चित्रकूट के निकट पहुँचे और श्रीभरत की आँखों से अश्रुधारा उमड़ी तथा गदगद कण्ठ से जब उन्होंने भगवान राम का नाम लेना प्रारंभ किया, तब ऐसा दिव्य प्रेम उमड़ा कि ज्योंही भरत जी के मुख से 'राम' शब्द निकला, गोस्वामीजी ने कहा कि बस, उस शब्द को सुनकर निषादराज की यह दशा हो गयी कि निषादराज जी बेचारे मार्ग भूल गये । इसके द्वारा भगवान ने मानो कहा कि भरत जैसे प्रेमी को मार्ग दिखाने में यही डर है कि मार्ग दिखाने वाला ही कहीं मार्ग न भूल जाय । किसी भक्त ने भगवान से पूछा - महाराज ! अगर मार्ग भूल जायेगा तब तो भटक जायेगा ? किन्तु भगवान ने कहा - नहीं भाई ! यही तो अन्तर है, कि संसार में अगर कोई मार्ग भूल जाय, तो वह प्रेमी भटक कर जिधर जाता है, मैं भी उधर ही चला जाता हूँ । प्रेमी के लिए कोई मार्ग निर्धारित नहीं होता, बल्कि प्रेमी जिधर चला जाता है वही मार्ग बन जाता है । और श्रीभरत जी तो मूर्तिमान प्रेम हैं ।

Thursday, 11 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

अयोध्याकाण्ड में एक बड़ा अनोखा प्रसंग आता है । चित्रकूट से लौटकर श्री भरत अयोध्या आये और गुरु वसिष्ठ के चरणों में प्रणाम करके बोले - गुरुदेव मेरे मन में एक संकल्प है अगर वह शास्त्र के विरूद्ध न हो, तो मैं उसका पालन करुँ और महाराज ! शास्त्र की व्याख्या और निर्णय तो आप ही करेंगे । गुरु वसिष्ठ ने पूछा - क्या चाहते हो ? श्रीभरत ने कहा कि मैं सोचता हूँ कि अयोध्या के राज्य सिंहासन पर प्रभु की पादुकाओं को बैठा दूँ, और मैं नन्दिग्राम में रहकर वहीं से प्रभु के राज्य की सेवा करुँ । उस समय गुरु वसिष्ठ ने कोई ग्रन्थ खोलकर उसमें नहीं देखा कि श्रीभरत का यह संकल्प शास्त्र अथवा वेद के अनुकूल है या नहीं । अपितु उन्होंने तुरन्त कहा - भरत ! मैं अब धर्म का निर्णय किसी शास्त्र या किसी ग्रन्थ से नहीं करुँगा, बल्कि मैंने तो धर्म का निर्णय करने के लिए एक सूत्र पा लिया है । इसलिए अब जो भी निर्णय करना होगा, उसी सूत्र के अनुसार करुँगा । श्रीभरत ने कहा - महाराज ! कौन सा सूत्र आपको मिल गया ? गुरु जी ने कहा - भरत ! तुम जो समझोगे, तुम जो कहोगे और तुम जो करोगे, मैं समझ जाऊँगा कि बस वही धर्म का सार है । इसका अभिप्राय है कि जिसके जीवन में धर्म के प्रति द्वन्द्व है, वहाँ तो विधि-निषेध संबंधी विचार की आवश्यकता है । लेकिन जहाँ पर शुद्धप्रेम का उदय हो गया है वहाँ बाह्य नियंत्रण अथवा विधि-निषेद की कोई आवश्यकता नहीं है ।

Wednesday, 10 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान राम यमुना पार होकर जब चले तो वहाँ पर एक बड़ा सुन्दर प्रसंग आता है । गोस्वामीजी कहते हैं कि जैसे ही प्रभु ने यमुना पार की, लोगों को दिखायी पड़ा कि एक बड़ा ही तेजस्वी, तपस्वी, भगवान राम के सामने आया । और उसने भगवान राम के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और तब भगवान श्रीराघवेन्द्र ने गदगद होकर, तापस को कसकर ह्रदय से लगा लिया । कई लोग आज भी प्रश्न करते हैं कि ये तापस जी कौन थे ? और यही प्रश्न गोस्वामीजी से भी लोगों ने पूछा कि महाराज ! बताइए ये कौन हैं ? इसका उत्तर देते हुए गोस्वामीजी कहते हैं कि तापस जी मूर्तिमान प्रेम हैं और भगवान मूर्तिमान परमार्थ । वस्तुतः यह तापस जी और श्रीराम का मिलन नहीं है बल्कि यह तो प्रेम और परमार्थ का मिलन है । भगवान ने जब तापस जी को ह्रदय से लगाया, तो तापस जी से कहा कि मैं तो दरिद्र हूँ और तुम पारस हो । तापस जी ने कहा - महाराज ! आप कैसी बातें करते हैं ? भगवान श्रीराम ने मुस्कराकर कहा - *ब्रह्म दरिद्र है और प्रेम पारस है ।* और यह बिल्कुल ठीक बात है । क्योंकि दरिद्र वह है जो दूसरे की कोई सहायता न कर सके । और भगवान कहते हैं कि मैं तो सारे संसार के ह्रदय में बैठा हुआ हूँ, पर आज तक किसी को बदल नहीं पाया । इसलिए मैं तो दरिद्र हूँ । परन्तु प्रेम का पारस जब जीवन में आ जाता है, तो वह व्यक्ति को बदल देता है, इसलिए पारस तो आप हैं । इसका अभिप्राय है कि ईश्वर के होते हुए भी प्रेम जब तक नहीं आयेगा, तब तक हमारे जीवन में परिवर्तन नहीं होगा ।

Tuesday, 9 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान राम ने महर्षि भरद्वाज से प्रार्थना की कि मुझे मार्ग दिखाने वाला दीजिए । तो इसका सीधा-सा तात्पर्य है कि जब हम जीवन पथ का चुनाव करें तो अपनी ही बुद्धि से न करें । क्योंकि अपनी बुद्धि और अपने अहंकार से यदि करेंगे तो पता नहीं जो मार्ग चुनेंगे वह उच्छृंखलता और पतन की ओर हमें ले जायेगा कि उत्थान की ओर, इसकी चिन्ता बनी रहेगी । इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम वेदानुगामी जीवन व्यतीत करें । अपने जीवन को वेद और शास्त्रों के अनुरूप चलाने की चेष्टा करें । पर भगवान कहते हैं कि इनकी भी एक सीमा है । और सीमा भगवती यमुना हैं । इसलिए इस पार से तो विद्यार्थियों को विदा किया और पार होकर प्रभु चले ।

Monday, 8 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

जैसे कोई सीढ़ी लगी हुई है, तो यद्यपि सीढ़ी की बड़ी महिमा है, क्योंकि अगर सीढ़ी न हो तो व्यक्ति ऊपर नहीं उठेगा, लेकिन प्रश्न यह है कि व्यक्ति छत पर पहुँचने के पश्चात सीढ़ी का परित्याग कर देगा कि सीढ़ी पर ही खड़ा रहेगा ? इसका सीधा सा अर्थ है कि सीढ़ी चाहे कितनी भी बढ़िया क्यों न हो, किन्तु छत पर पहुँच जाने पर आपको सीढ़ी को छोड़ना ही पड़ेगा । भगवान कहते हैं कि इसी प्रकार वेदों के द्वारा तुम सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण का सदुपयोग करो और इसके पश्चात इन तीनों से ऊपर उठने की चेष्टा करो । जैसे किसी व्यक्ति को जल की आवश्यकता है तो उसे जल का सेवन करना अनिवार्य है । क्योंकि जल के बिना प्यास नहीं बुझाई, तृप्ति नहीं होगी । लेकिन जैसे तृप्ति का अनुभव कर लेने के बाद तत्काल उसे जल की अपेक्षा नहीं रह जाती है, ठीक उसी प्रकार से वेद के द्वारा व्यक्ति कैसे तमोगुण से उठकर रजोगुण में जाय, और रजोगुण से सतोगुण में जाय, इसका विस्तृत वर्णन किया गया है । लेकिन उसके बाद इन तीनों से ऊपर उठकर इनके भी परे हो जाने की आवश्यकता है । इसी का संकेत सूत्र रामचरितमानस में प्राप्त होता है ।

Sunday, 7 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान कृष्ण भी शास्त्र को प्रमाण मानते हुए कहते हैं - तस्मन्च्छात्रं प्रमाणन्ते - और भगवान कृष्ण ने जो बात कही, भगवान राम के रूप में इन्होंने चरितार्थ करके दिखाया । क्योंकि भगवान श्रीराघवेन्द्र जब चारों विद्यार्थियों को आगे करके चले तो हम कह सकते हैं कि विद्यार्थियों के रूप में चारों वेद ही भगवान के आगे चल रहे हैं । वेदों के लिए एक वाक्य कहा गया है कि ये वेद जो हैं वे भगवान के निश्वास हैं । और भई ! जब हम और आप चलते हैं तो साँस हमारे आगे-आगे चलती है । और अगर यह प्रश्न किया जा कि भगवान के आगे कौन चलेगा ? तो इसका उत्तर यही दिया जायेगा कि वेद चलेंगे । इसलिए ये चारों विद्यार्थी आगे चलते हैं और भगवान उनके पीछे चलते हैं । पर इन चारों विद्यार्थियों को भगवान राम ने यमुना के किनारे से ही लौटा दिया । लेकिन क्यों लौटा दिये ? आइये, जरा इस पर भी विचार करें । भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं कि अर्जुन ! वेदों की अतुलित गरिमा होते हुए भी तुम्हें वेदों के ऊपर उठना है । भगवान ने कहा कि अन्त में वेद ज्ञान की भी एक सीमा है इसलिए व्यक्ति को उस वेद ज्ञान से ऊपर उठना चाहिए । इससे वेद की सीमा का कोई हनन नहीं होता ।

Saturday, 6 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान अपने विषय में जो सुनते हैं उसे चाहे शंकर जी बोलें, चाहे ब्रह्मा जी बोलें, चाहे वाल्मीकि जी बोलें, और चाहे कोई अन्य, पर भगवान के लिए न तो उनमें कोई बड़ा है और न ही छोटा । यद्यपि लोग भले ही बहस करें कि इनमें बड़ा कौन है ? इसलिए तुलसीदास जी कहते हैं कि जब संसार में माता-पिता या श्रेष्ठ व्यक्तियों में इतनी कृपा की भावना होती है कि -
     सुनि सनमानहिं सबहिं सुबानी ।
     भनिति भगति नति गति पहिचानी ।।
      यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ ।
- वे शब्दों पर ध्यान न देकर भाव पर ध्यान देते हैं । तब फिर हमारे प्रभु तो उदारों में भी परम उदार हैं । *जान सिरोमणि कोसलराऊ* हैं । वे तो केवल भाव पर ही ध्यान देते हैं ।

Friday, 5 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

काकभुशुण्डि जी गरुड़ जी से कहते हैं - ये जितने बड़े महापुरुष हैं, वे जो कुछ वर्णन करते हैं, वह उनकी बुद्धि का विलास है । और भई ! जब सम्पूर्ण का प्रतिपादन किया ही नहीं जा सकता, तो क्या हम उसे बुद्धि का विलास मानकर छोड़ दें ? किन्तु गोस्वामी जी ने कहा - नहीं-नहीं, आप अवश्य ही बुद्धि का विलास कीजिए । व्यक्ति कहता है बुद्धि से, लेकिन भगवान बुद्धि से सुनते नहीं हैं । और यह बढ़िया सूत्र है - अगर बुद्धि से कहा जाय और बुद्धि से सुना जाय तो झगड़ा हुए बिना नहीं रहेगा । क्योंकि बुद्धि का स्वभाव है दूसरे के दोष को निकालना । कई लोग कथा में भी आते हैं, तो गिनते रहते हैं कि प्रवचन में कितनी बार व्याकरण की अशुद्धि हुई ? कौन-सा शब्द बार-बार दोहराया गया ? इसका अभिप्राय है कि बुद्धि से सुनने पर दोष की ओर ध्यान जायेगा ही, क्योंकि बुद्धि का स्वभाव बात को काटना है । बुद्धि का बल तर्क है, तर्क माने कैंची । अतः बुद्धि से सुनने पर व्यक्ति बात तुरन्त काट देता है । इसलिए कितनी भी बढ़िया बात बुद्धि से कही जाय पर बुद्धि से सुना न जाय । भगवान भी हमारी बात बुद्धि से नहीं सुनते हैं । कैसे सुनते हैं - व्यक्ति कहता तो है बुद्धि से पर भगवान सुनते हैं भाव से । भगवान राम भाव ग्राहक हैं । इसलिए वे यह नहीं देखते कि सामने वाला क्या कह रहा है, वरन वे यह देखकर प्रसन्न होते हैं कि मेरे विषय में बेचारा कुछ कहना चाह रहा है । भले ही न कह पा रहा हो पर इसका भाव बढ़िया है ।

Thursday, 4 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

ईश्वर के संबंध में जो कुछ कहा जाता है, उसके लिए कोई दावा नहीं कर सकता कि बिल्कुल यही बात सही है । गोस्वामीजी ने कहा भी यही है कि सब जानते हैं कि प्रभु की महिमा असीम है, अनन्त है, पर वह जानते हुए भी सभी लोग कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं । विनय-पत्रिका में भगवान ने पूछा - तुलसीदास ! तुम मेरे संबंध में बहुत ही नये-नये ग्रन्थ लिख रहे हो, तो क्या तुम समझते हो कि मेरी महिमा को अपने ग्रन्थों में ठीक-ठीक लिख दोगे ? गोस्वामीजी ने कहा - महाराज ! बिल्कुल नहीं ! मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि कहने से आपकी महिमा मैं घटाता ही हूँ बढ़ाता नहीं हूँ । क्योंकि सच तो यह है कि महाराज ! कहने पर आपकी महिमा की पूर्णता नहीं हो पाती । भगवान ने कहा - तो फिर कहना क्यों नहीं बन्द कर देते हो ? तो बड़ा सीधा सा उत्तर दे दिया गोस्वामीजी ने कि महाराज ! क्या बतायें, अगर आपके विषय में नहीं कहेंगे, तो संसार के विषय में ही वाणी का प्रयोग करना पड़ेगा । इसलिए भले ही आपकी महिमा असीम हो पर हम अपनी वाणी को धन्य करने के लिए ही उसे कहते हैं, आपकी महिमा को प्रतिपादित करने के लिए नहीं । साधारण व्यक्ति की तो बात ही क्या, बड़े-बड़े मनीषियों के लिए भी जो शब्द लिखा गया, वह भी इसी बात की ओर संकेत करता है ।

Wednesday, 3 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

ईश्वर के सन्दर्भ में यमुनाचार्य जी ने बड़ी मीठी बात कही है । उन्होंने भगवान से कहा कि महाराज ! मैं और ब्रह्मा यदि आपकी स्तुति करने लगें, तो आप पहले मुझ पर प्रसन्न हो जायेंगे, ब्रह्मा पर पर बाद में । भगवान ने पूछा 'ऐसा क्यों' ? तो उन्होंने कहा - प्रभु ! आपके विषय में ब्रह्मा भी कुछ कहेंगे और मैं भी कुछ कहूँगा । पर मेरी बुद्धि तो ससीम है । मेरे मुँह भी एक है । बोलने में थकान जल्दी ही आती है इसलिए आपकी महिमा का वर्णन करते-करते मैं तो जल्दी ही थककर गिर जाऊँगा । और जब आप मुझे गिरा हुआ देखेंगे, तो गोद में उठाये बिना नहीं रहेंगे । किन्तु ब्रह्मा के चार-चार मुँह हैं । बुद्धि भी अधिक और आयु भी अधिक है । इसलिए न तो वे रखेंगे और न ही आप उन्हें उठायेंगे ।

Tuesday, 2 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

रामायण के भावार्थ के संबंध में कई बार लोग मुझसे पूछ देते हैं कि तुम जो बात कहते हो, उसको तुलसीदास जी ने भी सोचा था या तुम अपने मन से ही कह देते हो ? तो भई ! मैं इसका सही उत्तर दे सकता हूँ कि अगर रामकिंकर सोच सकता है, तो तुलसीदास जी ने नहीं सोचा होगा, यह कहना तो गोस्वामीजी का बहुत बड़ा अनादर करना होगा । पर गोस्वामीजी के शब्दों में इसका उत्तर सर्वथा भिन्न होगा । तुलसीदास जी कहते हैं कि ईश्वर के सन्दर्भ में चाहे शंकर जी बोलें, चाहे काकभुशुण्डि जी बोलें, चाहे याज्ञवल्क्य जी कहें और चाहे मुझ जैसा तुच्छ व्यक्ति बोले, लेकिन कोई अन्तर नहीं है । और अन्तर इसलिए नहीं है क्योंकि ईश्वर जब असीम है तो उसकी असीमता का प्रतिपादन न तो शंकर जी कर सकते हैं और न ही मैं कर सकता हूँ । क्योंकि असीम तो सीमा में आवेगा नहीं ।

Monday, 1 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

समस्त धर्मग्रंथ ईश्वर की महिमा का वर्णन करते हैं । ईश्वर की भक्ति का उपदेश देते हैं । और सभी ईश्वर की ओर बढ़ने का मार्ग व्यक्ति को बताते हैं । और वे ग्रन्थ जो दावा करते हैं, वे किसी न किसी के लिए समान रूप से उपयोगी हैं । अब यहाँ विचारणीय प्रश्न यह है कि इन ग्रन्थों में प्रमुखता किस ग्रन्थ को दी गयी ? और तब गोस्वामीजी अपने अद्भुत शैली के माध्यम से दोनों पक्षों का निर्वाह कर रहे हैं । यदि केवल भौतिक पक्ष का निर्वाह करना होता तो चार विद्यार्थियों को भेजने का तुक समझ में नहीं आता । क्योंकि अगर किसी व्यक्ति को मार्ग दिखाना है, तो आप एक व्यक्ति को भेजेंगे । परन्तु यह चार शब्द बड़ा प्रतीकात्मक है । हमारी मान्यता है कि समस्त ग्रन्थों में परम प्रमाण चारों वेद ही हैं । वेद ही परम प्रामाणिक तथा अपौरुषेय हैं ।