Thursday, 30 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

ज्ञान और भक्ति के संदर्भ में यह प्रश्न उठाया गया है कि ज्ञानी को भक्ति की आवश्यकता है या नहीं ? गोस्वामीजी कहते हैं कि ज्ञानी को भी भक्ति की आवश्यकता है । क्यों ? ज्ञानी तो मुक्त हो गया, अब उसे भक्ति की क्या आवश्यकता है ? तो इसके उत्तर में एक दृष्टांत देते हुए कहते हैं - जैसे स्थल के बिना जल नहीं रह सकता, चाहे कोई करोड़ों प्रकार से उपाय क्यों न करें, वैसे ही मोक्षसुख भी भक्ति को छोड़कर नहीं रह सकता । गोस्वामीजी कहते हैं कि ज्ञान से मोक्ष तो मिलेगा पर मोक्ष-सुख की अनुभूति का आनन्द तो भक्ति से ही प्राप्त होगा ।

Wednesday, 29 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

किसी ने गोस्वामीजी से पूछ दिया - श्रीराम को पा लेने के बाद श्रीभरत का क्या अवदान हो सकता है ? श्रीराम साक्षात ईश्वर हैं और ईश्वर प्राप्ति सबसे महान उपलब्धि है । भगवान श्रीराम की अयोध्या से लंका तक की उस लम्बी यात्रा में जिन लोगों ने श्रीराम का दर्शन किया उन्हें और क्या पाना शेष रह गया था जिसकी पूर्ति श्रीभरत करते हैं ? तो गोस्वामीजी कहते हैं - श्रीराम के दर्शन से चाहे जो भी मिला हो लेकिन एक वस्तु ऐसी थी जो श्रीभरत के दर्शन से प्राप्त हुई । और वह क्या थी ? गोस्वामीजी कहते हैं - रास्ते में जो असंख्य जड़-चेतन जीव थे उनमें से जिनको भगवान श्रीराम ने देखा, वे सब परम पद के अधिकारी हो गये । ईश्वर का दर्शन मुक्ति प्रदान करता है । लेकिन गोस्वामीजी यहाँ पर एक सूक्ष्म संकेत सूत्र देते हैं । वे कहते हैं कि मुक्ति और मुक्ति का सुख इसमें एक सुक्ष्म अंतर है । क्या ? मुक्ति तो पा लेना एक बार सरल है पर मुक्ति के सुख की जो अनुभूति है, उसे पाना सरल नहीं है । वे कहते हैंं कि भगवान तो मुक्ति देकर चले गए पर मुक्ति का सुख श्रीभरत के दर्शन के बिना नहीं मिलेगा ।

Tuesday, 28 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

लक्ष्मणजी अपराध को अपराध मानकर कठोर दण्ड के पक्षधर हैं । और उनके चरित्र में ऐसा दिखाई भी देता है । वे बड़े तेजस्वी हैं, और जहाँ कहीं अन्याय या भूल होती है वहाँ सामान्य व्यक्ति की तो बात ही क्या, बड़े-से-बड़े व्यक्ति को भी वे क्षमा नहीं करते । वे उसकी भर्त्सना और किसी-न-किसी प्रकार से उसे दण्डित करते हैं । लक्ष्मणजी का यह दण्ड विधान एक तात्कालिक उपाय है और भरतजी का उपाय सर्वकालिक है । वे क्या उपाय करते हैं ? मन्थरा को छूड़ा देते हैं । क्यों ? श्रीभरत अपराध को अपराध की दृष्टि से नहीं रोग की दृष्टि से देख रहे हैं । रोगी के प्रति एक वैद्य की जो दृष्टि होती है वही दृष्टि श्रीभरत की मन्थरा के प्रति है । वैद्य जब किसी रुग्ण व्यक्ति को देखता है, तब वह उसे औषधि और उपचार के द्वारा स्वस्थ बनाने का ही विचार करता है, उसे दण्ड देने की बात उसके मन में नहीं आती । श्रीभरत की दृष्टि वैद्य की दृष्टि है और मन्थरा उनकी दृष्टि में एक रोगी की भाँति दया की पात्र है ।

Monday, 27 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

मनुष्य को दण्ड का भय प्रारंभ में तो अपराध करने से रोकता है पर बाद में व्यक्ति धीरे-धीरे उस भय का भी अभ्यस्त बन जाता है । जैसे इसे यों कहें कि व्यक्ति प्रारंभ में जेल जाने से डरता है, लेकिन अगर दो-चार बार जेल हो आता है तो फिर वह उसका अभ्यस्त हो जाता है । आपको ऐसे हजारों अपराधी मिलेंगे, जो जेल से भयभीत नहीं होते । जेल जाना भी उन्हें स्वाभाविक लगता है । तो दण्ड की व्यवस्था को लक्षणों की चिकित्सा कहा गया है । लक्षणों की चिकित्सा का अभिप्राय यह है कि जैसे अगर सिर में तीव्र पीड़ा हो रही हो और हम सिर पर कोई दवा लगा लें, तो थोड़ी देर के लिए तो सिर में ठण्डक आ जाती है या ऐसी कोई दवा खा लेते हैं, जिसके द्वारा कुछ समय के लिए हमें दर्द से छुटकारा मिल जाता है । तो यह भी एक उपाय है और इसकी भी आवश्यकता है । पर कभी-कभी ऐसी भी एक स्थिति आती है कि लोग गोली खाने के अभ्यस्त हो जाते हैं । और आजकल के चिकित्सक भी यह बताते हैं कि कुछ गोलियों की प्रतिक्रिया बड़ी बुरी होती है । तो जो शरीर के संदर्भ में सत्य है वही मन के संदर्भ में भी सत्य है । जब हम कोई तात्कालिक सरल उपाय सोचते हैं तो उससे हमें तत्काल तो बड़ा संतोष मिलता है पर वह दीर्घकालिक दृष्टि से कल्याणकारी सिद्ध नहीं होता । इसी तरह समाज में अपराध को रोकने के लिए दण्ड की व्यवस्था तो रहेगी पर इस तात्कालिक समाधान के बाद उस समस्या की गहराई में पैठकर उसका मूल समाधान ढूँढ़ना पड़ेगा । उसके कारण को मिटाना पड़ेगा । तब कहीं जाकर सच्चे अर्थों में रोग या बुराइयों से छुटकारा मिलेगा ।

Sunday, 26 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

.....कल से आगे .....
यद्यपि श्रीभरतजी यहाँ पर बड़े दुखी हैं और बड़े कठोर शब्दों में कैकेयी की भर्त्सना करते हैं, पर इतना होते हुए भी जब शत्रुघ्न ने मंथरा को कठोर दंड दिया तो भरतजी ने शत्रुघ्न को शाबाशी नहीं दी, यह नहीं कहा कि तुमने बहुत अच्छा किया, यह दंड देने योग्य ही है । यदि वे ऐसा कहते तो कोई अस्वाभाविक बात न होती, बल्कि यह प्रसंग के अनुकूल ही प्रतीत होता । लेकिन गोस्वामीजी कहते हैं कि श्रीभरत ने तुरन्त शत्रुघ्नजी का हाथ पकड़ लिया और कहा - नहीं, नहीं, मंथरा को दंड देने की आवश्यकता नहीं है, तब दयानिधि श्रीभरत ने उनको छुड़ा दिया । इस संदर्भ में यह जो एक दृष्टिकोण श्रीभरत का है और एक श्री शत्रुघ्न का, अगर इन दोनों दृष्टिकोणों पर विचार करें तो उसका तात्पर्य यह है कि दुर्गुणों के द्वारा समाज में जो समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, उसका समाधान करने के लिए बहुधा दो प्रकार के विचार सामने आते हैं । इनमें से एक मान्यता जो समाज में बहुत प्रचलित है वह यह है कि अगर समाज में अपराध को रोकना है तो अपराधी को इतना कठोर दंड दिया जाना चाहिए कि व्यक्ति अपराध करने का साहस ही न करे । इससे अपराध रुकता है । पर कभी-कभी ऐसा अनुभव होता है और प्रत्यक्ष भी दिखाई देता है कि कठोर दंड व्यवस्था के द्वारा बुराइयाँ तात्कालिक रूप से दूर होती हुई तो प्रतीत होती हैंं पर समाधान टिकाऊ नहीं रहता । और यह दूसरी मान्यता है ।

Saturday, 25 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

.....कल से आगे ....
महाराज श्रीदशरथ की मृत्यु हो चुकी है । सभी रानियाँ विधवा वेश में हैं, प्रजा शोक वेष में है, लेकिन मंथरा उस समय भी अपने आपको सुन्दर वेशभूषा से सजा लेती है तथा आभूषण धारण कर लेती है । और इसी वेष में वह वहाँ पर पहुँचती है । उस समय श्रीभरत तो इतने व्याकुल हैं कि कुछ कहने और सुनने की मनःस्थिति में ही नहीं हैं । लेकिन शत्रुघ्नजी की दृष्टि मंथरा पर पड़ जाती है । उनको ऐसा लगता है कि यह जो कुछ अनर्थ हुआ है, उसके मूल में मंथरा है । अगर मंथरा न होती तो संभवतः ये घटनाएँ भी न होतीं । इसलिए इस घटना की सबसे बड़ी अपराधिनी यही है । और शत्रुघ्नजी का दर्शन यही है कि अपराधी को कठोर-से-कठोर दण्ड देना चाहिए । इसलिए उन्होंने आगे बढ़कर उसके कूबड़ पर प्रहार किया । उन्हें लगा कि मन्थरा में दोष है कूबड़ अर्थात कुटिलता और टेड़ापन ही उसका दोष है । इसलिए उन्होंने पहले उसके कूबड़ पर ही प्रहार किया । पर उन्होंने देखा कि अरे, यह तो सिर से पैर तक बुरी है । पैर के नख से चोटी तक इसमें कहीं कोई अच्छाई का लेशमात्र नहीं है । और तब उसकी चोटी पकड़कर उसे घसीटने लगे ।
       .....क्रमशः .....

Friday, 24 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामचरितमानस में एक प्रसंग में जहाँ गुरु वसिष्ठ के आदेश से श्रीभरत ननिहाल से आते हैं, तो कैकेयी बड़े उत्साह से उनका स्वागत करती है । लेकिन श्रीभरत दुख और पीड़ा से परिपूर्ण अयोध्या के सारे वातावरण को देखकर अत्यंत व्यथित हैं इसलिए उनको इस स्वागत में सुखानुभूति नहीं होती । और वे माँ से अयोध्या में व्याप्त म्लानता का कारण पूछते हैं । कैकेयी बड़े आनन्द से अपनी सारी करतूतों का वर्णन करने लगती है । उसी समय वहाँ मन्थरा आ जाती है जो इन सारी घटनाओं का सूत्रधार है । कैकेयी यही समझ रही थी कि भरत को सिंहासन पर बिठाने के लिए मैंने इतना प्रयास किया है तो भरत के मन में मेरे प्रति बड़ी कृतज्ञता होगी कि मैंने कितना कष्ट सहकर उसे अयोध्या के साम्राज्य का उत्तराधिकारी बनाया है । और मन्थरा के ह्रदय में तो और भी गहरा विश्वास था कि यह सारा कार्य तो मेरे द्वारा ही सम्पन्न हुआ है, इसलिए उस अवसर पर, जब श्रीभरत और कैकेयी एकान्त में मिल रहे हैं, अपनी उपस्थिति के द्वारा इस महान कार्य में जो मैंने भूमिका निभाई है, उसे प्रदर्शित कर दूँ । इस समय सामने जाने से हो सकता है कि श्रीभरत सिंहासन पर बैठने से पहले ही मुझे पुरस्कार दे दें । नहीं तो कौन जाने सिंहासन पर बैठने के बाद कहीं वे मुझे भूल न जाएँ । पर यहाँ तो श्रीभरत अत्यंत दुखित हो मूर्च्छा की स्थिति से उठ रहे हैं । उस समय मन्थरा का वहाँ पहुँचना और उसका आचरण परिवेश के सर्वथा प्रतिकूल है ।
    ....आगे कल .....

Thursday, 23 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी अलग-अलग रोगों का विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनका जीवन किसी एक दिशा में असंतुलित दिखाई देता है, पर बहुधा वे दूसरी दिशा में वे असंतुलित प्रतीत नहीं होते । देखा जाता है कि कभी-कभी किसी व्यक्ति में तीव्र काम की वृत्ति होती है पर वह उतना लोभी अथवा क्रोधी नहीं होता । कभी-कभी ऐसा भी दिखाई देता है कि एक व्यक्ति बड़ा लोभी है पर उसके स्वभाव में क्रोध और काम की उग्रता नहीं दिख पड़ती । इसी तरह कोई व्यक्ति अत्यंत क्रोधी हो सकता है पर उसमें काम और लोभ की वृत्ति उतनी प्रबल नहीं होती । तो समाज में बहुत से ऐसे व्यक्ति होते हैं, जो इनमें से केवल एक असंतुलन से ही पीड़ित होते हैं । काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि यदि तीनों में से किसी एक का असंतुलन हो तो उसकी चिकित्सा करना सरल है । ऐसे व्यक्ति को स्वस्थ बनाना आसान है लेकिन यदि किसी के जीवन में तीनों प्रकार के असंतुलन आ जाएँ, काम, क्रोध और लोभ तीनों प्रबल हो जाएँ तो ऐसे व्यक्ति की चिकित्सा करना बहुत कठिन है ।

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

गोस्वामीजी अलग-अलग रोगों का विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनका जीवन किसी एक दिशा में असंतुलित दिखाई देता है, पर बहुधा वे दूसरी दिशा में वे असंतुलित प्रतीत नहीं होते । देखा जाता है कि कभी-कभी किसी व्यक्ति में तीव्र काम की वृत्ति होती है पर वह उतना लोभी अथवा क्रोधी नहीं होता । कभी-कभी ऐसा भी दिखाई देता है कि एक व्यक्ति बड़ा लोभी है पर उसके स्वभाव में क्रोध और काम की उग्रता नहीं दिख पड़ती । इसी तरह कोई व्यक्ति अत्यंत क्रोधी हो सकता है पर उसमें काम और लोभ की वृत्ति उतनी प्रबल नहीं होती । तो समाज में बहुत से ऐसे व्यक्ति होते हैं, जो इनमें से केवल एक असंतुलन से ही पीड़ित होते हैं । काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि यदि तीनों में से किसी एक का असंतुलन हो तो उसकी चिकित्सा करना सरल है । ऐसे व्यक्ति को स्वस्थ बनाना आसान है लेकिन यदि किसी के जीवन में तीनों प्रकार के असंतुलन आ जाएँ, काम, क्रोध और लोभ तीनों प्रबल हो जाएँ तो ऐसे व्यक्ति की चिकित्सा करना बहुत कठिन है ।

Wednesday, 22 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

जनकजी के रोष भरे वाक्यों का परिणाम क्या हुआ?  ब्रह्म (भगवान राम ) में तो कोई गर्मी नहीं आई, पर लक्ष्मणजी में आ गई । वे तमतमा उठे, उनकी भौंहे टेढ़ी हो गयीं, ओठ फड़कने लगे तथा नेत्र क्रोध से लाल हो गए । उनमें क्रोध तो दिखाई दे रहा है, पर उनका क्रोध हर क्षण नियन्त्रित दिखाई दे रहा है । जब वे बोलने चले तो भगवान के चरणों में प्रणाम किया और तब जनक को बहुत कस करके फटकारा । उसका लाभ यह हुआ कि लक्ष्मणजी की गर्मी के बाद भगवान राम में भी कुछ उष्मा आ गई । लक्ष्मणजी भगवान राम के सामने कह रहे थे - हे भानुकुल कमल सूर्य ! मैं बिना किसी अभिमान के कहता हूँ, सुनिए ! यदि मैं आपकी आज्ञा पाऊँ, तो ब्रह्मांड को गेंद की तरह उठा लूँ और उसे कच्चे घड़े की भाँति फोड़ डालूँ । नाथ ! आज्ञा हो तो धनुष को कमल की डंडी की तरह चढ़ाकर, उसे लेकर सौ योजन तक दौड़ता चला जाऊँ । ज्योंही लक्ष्मणजी ने क्रोध भरे बचन बोले कि पृथ्वी डगमगा उठी और सभी लोग और राजा डर गए । लगता है, लक्ष्मणजी में असीम क्रोध है, पर वे इस क्रोध में भी कितने सन्तुलित हैं । यदि कोई व्यक्ति क्रोध में भरा हुआ काँप रहा हो तो उसको समझाने पर भी उसके समझने में बहुत विलंब लगता है । उस समय बुद्धि काम नहीं करती । लेकिन धन्य हैं लक्ष्मणजी, उनका अपने क्रोध पर अद्भुत नियंत्रण है । भगवान राम को लक्ष्मणजी से एक वाक्य भी नहीं कहना पड़ा कि तुम बैठ जाओ, शान्त हो जाओ । उन्होंने लक्ष्मणजी की ओर इशारा मात्र किया । बस दोनों की आँखें मिली और भगवान राम के नेत्रों को देखते ही लक्ष्मणजी शान्त होकर बैठ गए जो उद्देश्य था वह पूरा हो गया ।

Tuesday, 21 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

ब्रह्म में न तो राग है न रोष । जब वेदांत के ब्रह्म में राग और रोष नहीं है, तो वह सक्रिय भी नहीं है । वह तो दृष्टा और कूटस्थ है । पुष्पवाटिका प्रसंग में श्रीसीताजी भगवान राम के मन में राग उत्पन्न करती हैं । अब रोष की सृष्टि आवश्यक थी । पुष्पवाटिका में तो उन्होंने राग को स्वीकार कर लिया पर धनुष यज्ञ के प्रसंग में आए तो अपनी भूमिका उन्होंने बदल दी । जनकजी को ऐसा लगा कि जब निर्गुण ब्रह्म को सगुण बनाया गया तो यह सगुण ब्रह्म यदि दृष्टा, कूटस्थ और अचल बना रहेगा और उसमें सक्रियता नहीं आएगी, तब तो यहाँ विवाह का प्रसंग ही पूरा नहीं हो सकेगा । विवाह का प्रश्न तो तभी आयेगा, जब इनके मन में राग हो । और धनुष तो तब टूटेगा, जब इनको क्रोध आवे । अतः राग की सृष्टि के बाद जनक को यह अनुभव हुआ कि इस ब्रह्म में अब रोष की सृष्टि आवश्यकता है । इसलिए उन्होंने रोष भरे वाक्य कहे ।

Monday, 20 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

रामायण में क्रोध के अनेक सूक्ष्म रूप दिखाए गए हैं । रामचरितमानस में सबसे सूक्ष्म क्रम भगवान राम में परिलक्षित होता है । धनुषयज्ञ के प्रसंग में गोस्वामीजी चार व्यक्तियों की तुलना करते हैं । वहाँ हम जनकजी, लक्ष्मणजी, परशुरामजी तथा भगवान राम के क्रोध को देख पाते हैं । अपने-अपने स्थान पर ये चारों व्यक्ति महान हैं, लेकिन चारों की शैली में अन्तर है । पहले तो जनकजी को क्रोध आया ? क्यों ? जब धनुष नहीं टूटा सारे राजा निराश होकर बैठ गए तब सबसे पहले जनकजी को क्रोध आया । गोस्वामीजी यहाँ पर थोड़ी चतुराई करते हैं । वे यह नहीं कहते कि जनक क्रोध में भरकर बोले । वे कहते हैं - "बोले बचन रोस जनु साने" जनकजी के शब्द ऐसे थे कि लगता था कि वे क्रोध से सने हुए हैं । इसका अर्थ क्या है ? यह क्रोध का सोद्देश्य प्रयोग था । जैसे कहीं बड़ी ठण्डक हो जाए, तो गर्मी पैदा करने के लिए हम शरीर को रगड़ते हैं । गर्मी पैदा करने का उद्देश्य है शरीर को ठण्डा होने से बचाना, मृत्यु से बचाना । इस समय तो सारे राजा धनुष तोड़ने में असमर्थ हो रहे हैं और भगवान राम और लक्ष्मण ऐसे प्रशान्त भाव से बैठे हुए हैं कि जैसे धनुष के टूटने न टूटने से उनका कोई संबंध ही नहीं है । जो धनुष तोड़ नहीं सकते, वे चेष्टा करके थक गए, और जो उसे तोड़ने में समर्थ हैं, वे तोड़ने के लिए उद्यत नहीं हो रहे हैं । इसलिए चतुर जनक ने थोड़ी गर्मी पैदा कर दी, और उनका गर्मी पैदा करना सार्थक था ।

Sunday, 19 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

हनुमानजी द्वारा भेद नीति का प्रयोग क्या था - उन्होंने सबका घर तो जला दिया, पर विभीषण का घर छोड़ दिया । और सचमुच उससे रावण के मन में जबरदस्त भेद पड़ गया । रावण ने सोचा कि जब मैंने इस बन्दर को मृत्युदंड दिया, तो इसी विभीषण ने आकर रोका था । और इसी बन्दर ने सारा नगर जलाया पर इसी का घर छोड़ दिया । लगता है, दोनों मिले हुए हैं । अब मैं इसको सह नहीं सकता । हनुमानजी को अभीष्ट भी यही था कि रावण के मन में विभीषण के प्रति अविश्वास उत्पन्न हो जाए । और तब रावण ने क्या किया ? वह यह भी निर्णय कर सकता था कि विभीषण को कैद में डाल दे । पर उसने ऐसा नहीं किया । रावण ने सोचा, कि विभीषण अगर तुम समझते हो कि तुम्हारा घर नहीं जला, तो भले ही उस बन्दर ने तुझे न जलाया हो पर - "रावण क्रोध अनल निज" मैं अपने क्रोध की अग्नि के द्वारा तुम्हें जलाकर नष्ट कर दूँगा । और इस तरह लात मारकर उसे घर से निकाल देता है ।

Saturday, 18 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भेद नीति का तात्पर्य यह है कि जहाँ दो व्यक्ति मिलकर अधिक शक्तिशाली हो रहे हों, वहाँ उन दोनों में फूट पैदा कर दी जाए । पर लंका में हनुमानजी की चेष्टा दूसरे प्रकार की है । वह स्वार्थी राजनीतिज्ञों जैसी चेष्टा नहीं है । हनुमानजी ने देखा कि विभीषण और रावण का एक साथ रहना मानो अच्छाई और बुराई का एक साथ रहना है और इस तरह साथ रहने में अच्छाई का लाभ बुराई को मिल रहा है । क्योंकि विभीषणजी जितनी पूजा-पाठ करते हैं, वह सब रावण के द्वारा दी गई सभी सुविधाओं के बीच ही तो करते हैं । इसलिए उसका पुण्य भी रावण को मिलता जाता है । इस प्रकार वह पुण्य पाप को शक्ति प्रदान कर रहा है । इसलिए हनुमानजी ने निर्णय लिया कि पुण्य को पाप से अलग कर देना चाहिए । इसलिए हनुमानजी भेद नीति का प्रयोग करते हैं ।

Friday, 17 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

हनुमानजी वस्तुतः रावण पर साम, दाम, दण्ड और भेद - इन चारों का प्रयोग करते हैं । जब उन्होंने साम का प्रयोग किया तो रावण को भाषण देकर समझाया । फिर उसे दाम नीति का लोभ भी दिखाया - तुम भगवान के चरणकमल को ह्रदय में धारण कर लंका का अचल राज्य करो । हनुमान चालीसा में आप लोग पढ़ते हैं - तुम्हरो मंत्र विभीषण माना । लंकेश्वर भये सब जग जाना ।। वह मंत्र कौन-सा है, यह हनुमान चालीसा में नहीं लिखा है । पर रामायण में इसका उत्तर मिल सकता है । यह मंत्र तो हनुमानजी ने पहले विभीषण को नहीं, रावण को दिया था, पर रावण ने उस मंत्र का तिरस्कार कर दिया और विभीषण ने उसे ग्रहण कर लिया । हनुमानजी का मंत्र क्या था ? यह कि भगवान के चरणों को तुम ह्रदय में धारण करो और लंका का अचल राज्य करो । विभीषण ने इस मंत्र को पूरी तरह से समझ लिया था कि यह बिल्कुल ठीक है । वे जब भगवान की ओर चले तो हनुमानजी के मंत्र का स्मरण करते हुए चले । और भगवान राम उन्हें लंकेश कहकर लंका का अचल राज्य दे देते हैं । हनुमानजी ने रावण को दाम नीति के द्वारा भी आकृष्ट करना चाहा । पर वह भी सफल नहीं हुआ । फिर उन्होंने दण्ड नीति का प्रयोग करते हुए रावण को धमकाया भी । उन्होंने रावण से कहा - तुम जैसे राम के द्रोही को हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी नहीं बचा सकेंगे । दण्ड नीति में असफल हो जाने के बाद अन्त में हनुमानजी ने भेद नीति का बड़ा कड़ा प्रयोग किया ।

Thursday, 16 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

जो सामान्य रोगी होता है, वह तो वैद्य की बातों पर विश्वास करता है और उसके कहे अनुसार पथ्य आदि करता है । पर जब रोग असाध्य हो जाता है और रोगी की मृत्यु होनेवाली होती है, तो बहुधा उसकी प्रकृति कुपथ्य की दिशा में होने लगती है । वैद्य जो कहता है वह उसका ठीक उल्टा ही करता है । इसलिए लिखा हुआ है -
    काल दंड गहि काहू न मारा ।
     हरइ धर्म बल बुद्धि विचारा ।।
- काल लाठी लेकर किसी को नहीं मारता । वह धर्म, बल, बुद्धि और विचार को हर लेता है । हनुमानजी समझ लेते हैं कि रावण जैसा व्यक्ति स्वस्थ होने की स्थिति में नहीं है । और बाद में अंगद आकर घोषणा कर देते हैं कि तुम सन्निपात के रोगी हो । काम, क्रोध और लोभ, इनमें से यदि एक भी जीवन में असंतुलित हो जाए, तो व्यक्ति अस्वस्थ होकर मर सकता है, पर रावण में तीनों ही पराकाष्ठा में हैं । और विशेषकर क्रोध में रावण ने सारे संसार का अहित तो किया ही, पर अपना तो सर्वनाश ही कर लिया ।

Wednesday, 15 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

हनुमानजी जैसे वैद्य भी चेष्टा करके रावण की चिकित्सा नहीं कर पाते । क्यों ? मानस-रोग के संदर्भ में पहला सूत्र यह है कि जो सद्गुरु हैं, वे ही वैद्य हैं और रोगी का पहला कर्तव्य है कि वह उसके वचनों पर विश्वास करे । हनुमानजी ने यहाँ पर रावण के रोगों को पकड़ लिया और उन्होंने यह निर्णय किया कि रावण के रोगों का यह जड़ यदि एक बार नष्ट हो जाए, तो उसके अन्य रोग स्वयं नष्ट हो जाएँगे । इसलिए हनुमानजी ने तुरन्त रावण से अनुरोध किया कि मैं तुम्हें कुछ और छोड़ने के लिए नहीं कहता, तुम केवल एक ही वस्तु छोड़ दो । क्या ? - तुम तमरूप अभिमान का त्याग कर दो । हनुमानजी इतने उदार हैं कि उसे केवल एक ही वस्तु छोड़ने के लिए कहते हैं । यदि बहुत कुपथ्य करने वाला रोगी हो और उसको वैद्य अगर सब कुछ छोड़ने के लिए कहे तो शायद वह एक भी बात न माने । तो चतुर वैद्य कहता है कि अच्छा भइ, भले सब न छोड़ सको, पर इतना तो छोड़ ही दो । हनुमानजी ने कहा कि सारे विकारों को भले न छोड़ सको, पर अभिमान छोड़ दो । और अभिमान में भी एक शब्द जोड़ दिया - तम अभिमान । चलो सतोगुणी, रजोगुणी अभिमान को न छोड़ पाओ तो कोई बात नही है, पर कम-से-कम तमोगुणी अभिमान को छोड़ दो । पर रावण का रोग इतना बढ़ गया है कि हनुमानजी की हितकर बातें भी उसे नहीं सुहाती ।

Tuesday, 14 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान राम ने सीधे लंका पर आक्रमण न करके पहले हनुमानजी को वहाँ भेजा था । इसका सांकेतिक तात्पर्य क्या है ? रामचरितमानस में जहाँ पर मानस रोगों का वर्णन आया है, वहाँ मानस रोगों के वर्णन के साथ ही यह भी कहा गया है कि मन के रोगों को नष्ट करने वाला वैद्य चाहिए । और वह वैद्य कौन है ? - सद्गुरु ही वह वैद्य है । हनुमानजी को रावण के पास भेजने का तात्पर्य यह था कि हनुमानजी ही वस्तुतः सद्गुरु हैं । वे शंकर के अवतार हैं । इसलिए वे वैद्यों के वैद्य हैं । भगवान शंकर के लिए रामायण में कहा गया है -
   तुम्ह त्रिभुवन गुर बेद बखाना ।
वे त्रिभुवन के गुरु और सबसे बड़े वैद्य हैं । और रावण तो एक कल्प में उनके गण के रूप में उनका शिष्य भी रह चुका है । तो भगवान का तात्पर्य यह है कि रावण जैसा रोगी, जो अपने रोग के द्वारा स्वयं तो दुःख पा ही रहा है, पर अपने से भी अधिक वह सारे समाज को दुःख में डाल रहा है, उसके रोग का निदान हो जाए । भगवान चेष्टा करते हैं कि रावण के वध की आवश्यकता न पड़े ।

Monday, 13 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामचरितमानस में कहा गया है कि किसी के जीवन में अगर केवल काम है, तो वह बात ज्वर से पीड़ित है । अगर किसी के जीवन में केवल लोभ है, तो वह कफ ज्वर से पीड़ित है और किसी के जीवन में क्रोध है तो वह पित्त ज्वर से पीड़ित है । पर यदि किसी के जीवन में ये तीनों हों, तब क्या होगा ? गोस्वामीजी कहते हैं कि अगर तीनों हों तो समझ लेना चाहिए कि बस सन्निपात रोग हो गया है । तो यहाँ रावण के सन्दर्भ में सन्निपात शब्द का ही प्रयोग किया गया है । अंगद जब रावण की सभा में गए, तो रावण बहुत बकबक करने लगा । अंगद उसे बड़े ध्यान से सुन रहे थे । रावण ने पूछा - तुमने मेरी बात को बड़े ध्यान से सुना, कुछ समझ में आया ? अंगद ने कहा - मैं यही देखने तो आया था कि तुम्हें कौन-सा रोग हुआ है ? और अब समझ में आ गया - तुम्हें तो सन्निपात हो गया है । जब हनुमानजी जैसा वैद्य भी आकर तुम्हारी चिकित्सा नहीं कर पाया, तब तो तुम्हारी चिकित्सा होना मुश्किल है ।

Sunday, 12 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

यह रावण क्या है ? यह है ब्राह्मणों के शाप से आहत प्रतापभानु के अन्तःकरण की प्रतिक्रिया । प्रतापभानु के चरित्र के बारे में लिखा हुआ है -
   दिन प्रति देह बिबिध बिधी दाना ।
   सुनइ शास्त्र विधी वेद पुराना ।।
   विप्र भवन सुर भवन सुनाए ।
   सब तीरथन्ह विचित्र बनाए ।।
इस तरह के पवित्रतम कार्य प्रतापभानु के द्वारा हुआ करते थे । और वही जब रावण बनता है, तो उसके जीवन में एक ही व्रत है -
   जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं ।
   नगर गाउँ पुर आग लगावहिं ।।
- प्रतापभानु के अन्तःकरण की प्रतिक्रिया ही आज रावण के रूप में प्रकट होती है कि हमने भला बनने की चेष्टा की और बदले में हमें शाप देकर हमारे पूरे परिवार को नष्ट कर दिया गया । तो अब मैं बुराई के द्वारा इसका बदला लूँगा । और इसका परिणाम यह होता है कि इस प्रतिक्रिया के फलस्वरूप रावण सारे समाज पर अत्याचार करता है । तो जहाँ शिवजी का क्रोध समाज के लिए कल्याणकारी है, वहीं रावण के रूप में इस क्रोध का विकृत स्वरूप समाज के लिए अभिशाप बनकर आता है ।

Saturday, 11 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

प्रतापभानु अगले जन्म में रावण बन जाता है । रावण के रूप में उसके जीवन का एक ही व्रत था कि ब्राह्मणों और मुनियों को खाना । यह किस बात की प्रतिक्रिया थी ? यही कि मैं इन ब्राह्मणों को भोजन करा रहा था और इन लोगों ने मुझे शाप दे दिया, बिना अपराध के । तो मैं इन सबको खाऊँगा । अब ये मेरा क्या कर सकते हैं । यही क्रोध की हिंसक प्रतिक्रिया रावण के चरित्र में विद्यमान है । भगवान राम को दण्डकारण्य में रावण के क्रोध की प्रतिक्रिया दिखाई देती है । दण्डकारण्य में वे देखते हैं कि वहाँ मुनियों की हड्डियों का ढेर लगा हुआ है । भगवान पूछते हैं कि यह हड्डियों का ढेर कैसा है ? इस पर मुनि लोग आँखों में आँसू भरकर कहते हैं - निशाचरों ने मुनियों को खा लिया है । पर विचित्र विडंबना तो यह है कि इन निशाचरों का निर्माण भी तो मुनियों ने ही किया था । अपना ही निर्माण अपने को खा जाए - यह एक बड़ी विचित्र स्थिति है । और ऐसा ही होता है कि अपने से उत्पन्न हुआ दुर्गुण अपने ही लिये तथा समाज के लिए घातक हो सकता है ।

Friday, 10 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

ब्राह्मणों ने प्रतापभानु को शाप देकर सोचा कि हमने अपराधी को दण्ड दे दिया, पर अचानक उनको फिर से आकाशवाणी सुनाई पड़ी । आकाशवाणी में ब्राह्मणों की आलोचना करते हुए कहा गया कि आप लोगों ने इसे जो शाप दिया, वह विचार करके नहीं दिया । यदि प्रतापभानु विचारशून्य हो गया था तो कम-से-कम आप लोगों को तो विचार की भूमिका में रहना चाहिए था । एक व्यक्ति विचारशून्य हो जाय और इसके बदले में दूसरा व्यक्ति भी विचारशून्य होकर आक्रमण करने लगे और शाप देकर किसी को राक्षस बना दें तो यह समाज के लिए कितना घातक होगा । ब्राह्मणों को जो क्रोध हुआ, उससे ब्राह्मणों की महिमा नहीं बढ़ी, अपितु उसके दुष्परिणाम को सारे समाज को न जाने कितने वर्षों तक भोगना पड़ा । भगवान ने ब्राह्मणों की प्रशंसा नहीं की क्योंकि जब कोई व्यक्ति किसी को राक्षस बना देगा, बुरा बना देगा, तो बुरा व्यक्ति तो बुरा बनकर और भी बुराई करने की चेष्टा करने लगेगा । और यही होता है प्रतापभानु के जीवन में ।

Thursday, 9 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

.....कल से आगे .....
आकाशवाणी के माध्यम से भगवान से जो सन्देश मिला उसे यदि विद्वानों और पण्डितों ने सर्वांग रूप से मान लिया होता और अन्न को छोड़कर अपने-अपने घर चले जाते तो शायद क्रोध की प्रतिक्रिया का जन्म न होता । लेकिन उन्होंने आकाशवाणी की आधी बात मानी और एक तीव्रतम प्रतिक्रिया उनके मन में उत्पन्न हो गई । क्या ? आकाशवाणी में तो यही कहा गया था - 'उठि उठि गृह जाहू' । अर्थात अपने-अपने घर को चले जाइए । भोजन मत करिए । यह सुनकर उन्होंने भोजन तो छोड़ ही दिया, पर घर जाने के पूर्व वे स्वयं न्यायाधीश के सिंहासन पर बैठ गए । न्यायाधीश की सबसे बड़ी विशेषता यह होनी चाहिए कि वह स्वयं संतुलित हो, समत्व में स्थित हो, तभी वह ठीक-ठीक न्याय कर पावेगा । यदि वह स्वयं क्रोधग्रस्त हो जाय तो ऐसी स्थिति में वह न्याय नहीं कर पावेगा । क्रोधग्रस्त हो जाने पर तो वह जो करेगा, वह बदले की वृत्ति से करेगा । ब्राह्मणों ने विचारक की भूमिका के स्थान पर बदले की वृत्ति को स्वीकार कर लिया और वे कहने लगे - कि अरे ! मूर्ख राजा ! तूने हम लोगों का धर्म नष्ट करने की चेष्टा की । और साथ-ही-साथ ईश्वर को धन्यवाद देते हुए बोले - यह तो ईश्वर ने हमारे धर्म की रक्षा की । आकाशवाणी में यह नहीं कहा था प्रतापभानु का इसमें कोई दोष है । केवल यही कहा था कि अन्न में माँस मिला हुआ है । लेकिन इन लोगों ने जब शाप दिया तो यह कहकर - जाओ, सारे परिवार सहित राक्षस हो जाओ । तो उनका ऐसा कहना क्या उचित था ? उन्हें इतना क्रोध आ गया कि उसके सारे परिवार को राक्षस होने का शाप दे दिया ।

Wednesday, 8 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

क्रोध एक प्रतिक्रिया है । इस प्रतिक्रिया में यदि एक व्यक्ति क्रोध करता है, तो दूसरा व्यक्ति उसे देखकर क्रोधित हो उठता है, और इस प्रकार से क्रोध की प्रतिक्रिया समाज में व्याप्त हो जाती है । रामायण में इसका दृष्टांतस्वरूप है, प्रतापभानु का चरित्र । प्रतापभानु के मन में अमर होने की इच्छा उत्पन्न होती है । कपट मुनि उसकी इस दुर्बलता का लाभ उठाता है । कपट मुनि ने कहा कि यह तभी सम्भव है, जब हम अपने हाथों से भोजन बनाकर ब्राह्मणों को खिलायेंगे । और ब्राह्मण जब प्रसन्न होकर आशीर्वाद देंगे, तो उसके परिणामस्वरूप तुम अमर हो जाओगे, तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी । प्रतापभानु उस प्रलोभन में फँस जाता है । वह इसे स्वीकार कर लेता है । इसके पश्चात कपट मुनि का मित्र कालकेतु योजनाबद्ध रूप से भोजन का निर्माण करता है और इस पध्दति से करता है, जैसे अन्न और फल का मिश्रण हो । पर उसमें ब्राह्मण का माँस भी डाल दिया गया था । जिस समय आमन्त्रित ब्राह्मणों को भोजन के लिए बिठा दिया, उसी समय आकाशवाणी हुई - ब्राह्मणों ! इस रसोई में ब्राह्मण का माँस मिला है, आप लोग यहाँ से उठकर अपने-अपने घर को चले जाइए । इस अन्न को खाने में बड़ी हानि है ।
      ......आगे कल ....

Tuesday, 7 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान शंकर में नियन्त्रण की पराकाष्ठा है । उनका क्रोध पूर्णरूपेण नियन्त्रित है । उनके जीवन में कोई भी ऐसी वृत्ति नहीं है, जिस पर नियंत्रण न हो । यही भगवान शंकर की स्वस्थता का प्रतीक है । और दूसरे पक्ष में वही काम की अस्वस्थता का प्रतीक है । रामायण के प्रारंभ में मानो यह स्वीकार किया गया है कि जब हम शिव के समान केवल बुराई को मिटाने के लिए क्रोध को स्वीकार करते हैं, जितनी मात्रा से बुराई मिट जाय पर भलाई पर आँच न आने पावे तो ऐसी परिस्थिति में क्रोध समाज और व्यक्ति को स्वस्थ बनानेवाला होता है । यह पित्त की उस भूमिका को पूरा करनेवाला है, जिसके द्वारा भोजन पचकर शरीर को शक्ति प्रदान करता है तथा व्यक्ति को सुखी बनाता है । अनियंत्रित क्रोध समाज और व्यक्ति को नाश की ओर ले जाता है । इसके अनेक दृष्टांत हैं । सबसे बुरे क्रोध का चित्रण मिलता है रावण के चरित्र में । रावण के जीवन में अनियंत्रित क्रोध की पराकाष्ठा है ।

Monday, 6 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान शंकर ने जब काम को जला दिया, रति अपने पति काम को जीवित कर देने के लिए अनुरोध करती है । वह भगवान शंकर से कहती है कि महाराज, आपने काम को जला दिया, अब मेरा क्या होगा ? और इसका अभिप्राय यह है कि भले ही भरतजी जैसे भक्तों के जीवन में कामशून्य रति हो सकती है, पर सर्वथा कामशून्य हो जाना तो संसार के सभी व्यक्तियों के लिए सम्भव नहीं है । मेरा तो अपना पति मिलन तभी होगा, जब काम विद्यमान रहेगा । तो भगवान शंकर तुरन्त यह कह देते हैं - अब से तुम्हारे पति का नाम अनंग होगा, और वह अशरीरी होकर रहेगा । जब इतने पर भी रति सन्तुष्ट नहीं होती तब भगवान शंकर कहते हैं - जब भगवान द्वापर युग में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेंगे, तब तुम्हारा पति उनके पुत्र के रूप में जन्म लेगा । इसका अभिप्राय यह है कि कामना सहित रति को स्वीकार कर पाना तो केवल ईश्वर के लिए ही सम्भव है । इसकी परिपूर्णता भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में मिलती है । श्रीकृष्ण के द्वारा गोपियों को स्वीकार कर लेना तथा साथ ही कुब्जा को भी स्वीकार कर लेना मानो समग्र काम सहित रति को स्वीकार कर लेने का प्रतीक है ।

Sunday, 5 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान शंकर इतनी सीमित मात्रा में क्रोध का प्रयोग करते हैं कि वासनात्मक अनियंत्रित काम तो नष्ट हो जाय पर समाज में रस की वृत्ति का विनाश न होने पाये । वे इतने नियंत्रित हैं कि काम की पत्नी के आने पर उस पर क्रोध नहीं करते । काम के साथ उसकी पत्नी रति भी आई थी पर शंकरजी ने काम को जलाया रति को नहीं । क्यों ? जितने भक्त हैं वे भगवान से यही तो माँगते हैं कि उन्हें काम नहीं चाहिए पर रति तो चाहिए ही । रामायण में भरतजी से बढ़कर भक्त नहीं है । उनको काम की आकांक्षा है ही नहीं - उन्हें न तो अर्थ चाहिए, न धर्म चाहिए, न काम चाहिए और न मोक्ष चाहिए । वे कहते हैं - एक चीज चाहिए । क्या ? - 'जनम जनम रति राम पद' - रति चाहिए । रति में जो तद् रूपता है, वह किस भक्त को नहीं चाहिए?  भक्त तो यही चाहता है कि हम भगवान का ध्यान करते-करते भगवान के तद् रूप हो जाएँ, एकाकार हो जाएँ । तो भगवान शंकर रति को भी जीवित रखते हैं और रस की आकांक्षा को भी ।

Saturday, 4 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

काकभुशुण्डि सुमेरू पर्वत के चार शिखरों पर विभिन्न प्रकार की साधना करते हैं । उनमें से एक शिखर पर आम का वृक्ष लगा हुआ है । और वे उस आम के वृक्ष का उपयोग क्या करते हैं ? यहाँ पर बड़ा मार्मिक संकेत है । आम के वृक्ष का उपयोग काम भी करता है और काकभुशुण्डिजी भी । इसका अभिप्राय यह है कि रस की जो प्यास है, उसी से प्रेरित होकर व्यक्ति कामी बनता है और उसी से भक्त । काकभुशुण्डिजी आम के वृक्ष के नीचे बैठकर क्या करते हैं - आम की छाया में वे मानस पूजा करते हैं । यह मानस पूजा बड़ा सार्थक शब्द है । आम से रस की इच्छा मन में उत्पन्न होती है । और मन से मनोज जुड़ा हुआ है । मनुष्य के अन्तःकरण में रस की आकांक्षा है । और यही आकांक्षा मन को ब्रह्मरस की खोज में ले जाती है तथा अनन्त तृप्ति का अनुभव प्राप्त करती है ।

Friday, 3 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

कामजन्य क्रोध का स्वरूप नारद के चरित्र में दिखाई देता है । लोभजन्य क्रोध का स्वरूप कैकेयी के चरित्र में है । कैकेयी में जब लोभ आता है, तब वे कोपभवन में बैठ जाती हैं । परशुरामजी के जीवन में आनेवाला क्रोध अहंकार की प्रतिक्रिया के रूप में उपजता है । उन्हें लगता है कि सामनेवाले व्यक्ति ने उचित आदर नहीं दिया । उन्हें अपने अहं पर इतनी आस्था हैं कि स्वयं अपना परिचय देते हुए कहते हैं कि मैं बालब्रह्मचारी और अत्यंत क्रोधी हूँ । तो, जो क्रोध काम, लोभ और अहं की प्रतिक्रिया-स्वरूप उपजता हैंं, वह पहले देखने में उस अग्नि के समान है, जिसे हम घर में रोज देखते हैं और इस नित्य देखने के फलस्वरूप उसे इतनी भयानक नहीं मानते हैं । पर यदि हम जरा-सी भी असावधानी करें तो वह जैसे कपड़े को पकड़कर व्यक्ति को, घर को जला देती है, उसी प्रकार यह क्रोध भी व्यक्ति के असावधान रहने पर उसे और समाज को सन्त्रस्त कर देता है ।

Thursday, 2 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

जब नारद अपना तीव्र पित्तज्वर भगवान के प्रति कठोर शब्दों का प्रयोग करके उतार चुके, तब भगवान ने प्रत्युत्तर में कुछ न कह, शान्त रह नारद को ठण्डा कर दिया । यदि एक व्यक्ति क्रोध करे और सामनेवाला भी क्रोध करे, तब तो दोनों का क्रोध अग्नि को भड़काएगा ही । भगवान ने नारद का दिया श्राप अपने सिर पर चढ़ा लिया तथा ह्रदय में हर्षित हो उन्होंने नारदजी से बहुत विनती की और अपने माया की प्रबलता खींच ली । बस, त्योंही नारद का आवेश दूर हो गया और उन्होंने भगवान के चरणों को पकड़ लिया तथा ग्लानि में भरकर बोले - प्रभु, मैंने न जाने क्या-क्या आपको कह डाला । भगवान ने कहा - नारद, तुम थोड़े ही कह रहे थे, वह तो तुम्हारा क्रोध कह रहा था । वह अब चला गया है । अब तो जो तुम हो वही हो, इसलिए इस प्रकार विनम्र भाषा का प्रयोग कर रहे हो ।