रुद्रगणों की भूल यह थी कि वे नारद को हँसी का पात्र बना रहे थे । नारदजी का उपहास देखकर उन्हें आनन्द की अनुभूति हो रही थी । परिणाम यह होता है कि नारदजी का क्रोध अनियंत्रित हो गया । फलस्वरूप उन्हें ध्यान नहीं रह गया कि मैं क्या कर रहा हूँ । उन्होंने शिवगणों को राक्षस बना दिया । उनके क्रोध ने रावण और कुम्भकर्ण की सृष्टि कर दी । वह तो अच्छा हुआ कि उतने पर ही उनका क्रोध शान्त नहीं हुआ, नहीं तो भगवान उनकी चिकित्सा कैसे करते ? नारदजी का क्रोध सीमा का अतिक्रमण कर गया । भगवान तो थे नहीं, पर क्रोध में उनके होंठ फड़कने लगे, मानो तैयारी करने लगे कि चलकर क्या करना है - क्रोध की तीव्रता इतनी थी कि सोचने लगे - या तो मैं आत्महत्या कर लूँगा, या फिर भगवान को शाप दूँगा । मुझे उन्होंने संसार में हँसी का पात्र बना दिया ।
Tuesday, 31 May 2016
Monday, 30 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
....कल से आगे .....
मन की दो स्थितियाँ हैं - एक, जल की तरह और दूसरी, दर्पण की तरह । जल में भी आकृति दिखाई देती है । एक क्षण के लिए जल शान्त-सा प्रतीत होता है, झाँकने लगिए तो आकृति दिखाई पड़ती है, पर एक कंकड़ी भी अगर गिर जाए, हवा का तनिक झोंका चल जाय तो जल हिलने लगता है । और तब उसमें आकृति सही दिखाई नहीं देती । इसी प्रकार जब वासना के कंकड़ से मन अशान्त और चंचल हो गया हो, तब उस अशांत मन के द्वारा यदि व्यक्ति आत्म-निरिक्षण करे, तो वह अपनी वास्तविकता को नहीं देख पाता है । नारदजी की स्थिति ऐसी ही थी, उन्हें एकान्त में शीशे में अपना मुँह देखने को नहीं मिला, उन्होंने जल में अपने मुख को देखा । अभिप्राय यह है कि चंचल मन से उन्होंने अपनी ओर देखने की चेष्टा की । फलस्वरूप 'कामात्क्रोधोSभिजायते' वाली बात उनके जीवन में आ गई । नारदजी को यह संकोच तो हुआ नहीं कि मैं बन्दर क्यों बन गया ? उन्हें तो इस बात पर क्रोध आ गया कि दूसरों ने मुझे बन्दर क्यों कह दिया ? और क्रोध में आकर उनके मुँह से पहली बात निकली - तुम दोनों कपटी और पापी जाकर राक्षस हो जाओ । तुमने हमारी हँसी की, उसका फल भोगो ।
मन की दो स्थितियाँ हैं - एक, जल की तरह और दूसरी, दर्पण की तरह । जल में भी आकृति दिखाई देती है । एक क्षण के लिए जल शान्त-सा प्रतीत होता है, झाँकने लगिए तो आकृति दिखाई पड़ती है, पर एक कंकड़ी भी अगर गिर जाए, हवा का तनिक झोंका चल जाय तो जल हिलने लगता है । और तब उसमें आकृति सही दिखाई नहीं देती । इसी प्रकार जब वासना के कंकड़ से मन अशान्त और चंचल हो गया हो, तब उस अशांत मन के द्वारा यदि व्यक्ति आत्म-निरिक्षण करे, तो वह अपनी वास्तविकता को नहीं देख पाता है । नारदजी की स्थिति ऐसी ही थी, उन्हें एकान्त में शीशे में अपना मुँह देखने को नहीं मिला, उन्होंने जल में अपने मुख को देखा । अभिप्राय यह है कि चंचल मन से उन्होंने अपनी ओर देखने की चेष्टा की । फलस्वरूप 'कामात्क्रोधोSभिजायते' वाली बात उनके जीवन में आ गई । नारदजी को यह संकोच तो हुआ नहीं कि मैं बन्दर क्यों बन गया ? उन्हें तो इस बात पर क्रोध आ गया कि दूसरों ने मुझे बन्दर क्यों कह दिया ? और क्रोध में आकर उनके मुँह से पहली बात निकली - तुम दोनों कपटी और पापी जाकर राक्षस हो जाओ । तुमने हमारी हँसी की, उसका फल भोगो ।
Sunday, 29 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
विश्वमोहिनी ने भगवान के गले में जयमाल पहना दी तथा दोनों चले गए, तब दोनों रुद्रगणों ने नई भूमिका की । उन्होंने देवर्षि नारद से कहा - जाकर दर्पण में अपना मूँह तो देखिए । अब वे लोग यही सलाह पहले भी दे सकते थे । पर वह नहीं किया । जब नारद की पूरी दुर्दशा हो गयी और वे बेचारे व्याकुल हो गए, तब उन दोनों ने उन्हें अपना मुँह शीशे में जाकर देखने की बात कही । नारदजी तुरन्त वहाँ से उठे और जल में झाँककर अपना मुँह देखा । तुलसीदासजी कहते हैं - बुध्दि आँख है और मन शीशा - हम विवेक की दृष्टि से अपने मन के दर्पण में झाँककर वास्तविकता को देखने की चेष्टा करें । लेकिन मन को दर्पण तब कहा जाएगा, जब वह दर्पण की तरह रहे । मन की दो स्थितियाँ हैं - एक, जल की तरह और दूसरी, दर्पण की तरह ।
......आगे कल .....
......आगे कल .....
Saturday, 28 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
भगवान ने नारद को जब विदा कर दिया, तो नारद ने पहले दर्पण नहीं देखा । यह आत्मनिरीक्षण का अभाव सूचित करता है । उसके पश्चात वे स्वयंवर-सभा में पहुँचे । वहाँ जो अन्य लोग थे, वे तो नारद को नारद ही समझ रहे थे और उसी भाव से प्रणाम कर रहे थे, लेकिन शंकरजी के जो दो गण उनके दोनों ओर बैठे हुए थे, वे उन्हें बंदर की आकृति वाला देख रहे थे । शिवजी के ये दोनों गण नारदजी पर कटाक्ष करते हुए कहने लगे - वाह, भगवान ने इन्हें कैसा सौंदर्य दिया है । तो भई, अगल-बगल वालों से सदा सावधान रहना चाहिए । वे क्या कह रहे हैं, किस उद्देश्य से कह रहे हैं, पता नहीं चलता । जब दाएँ-बाएँ वाले लोग प्रशंसा करते हैं, तो समझ में नहीं आता कि उसमें कितना व्यंग्य है और कितना कटाक्ष । बेचारे प्रशंसा के आतुर व्यक्ति तो यह समझ ही नहीं पाते । तो, यहाँ शिवजी के दोनों गण नारदजी को सुनाते हुए आपस में कह रहे हैं - लगता है कि विश्वमोहिनी इन्हीं के गले में जयमाल डाल देंगी, ये तो दूसरे साक्षात हरि (बन्दर) लग रहे हैं । और नारद यह सुनकर बड़े फूल रहे हैं, अपने आप को भगवान के समान सुन्दर समझ रहे हैं । उन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि दूसरे क्या समझ रहे हैं । वास्तव में होना तो यह चाहिए था कि नारद अपने को देखते ।
Friday, 27 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
भगवान से जब नारद ने कहा कि आप मुझे अपनी सुन्दरता दे दीजिए, आप मेरे बड़े हितैषी हैं, तो भगवान ने कह दिया - तुम्हारा जिसमें परम हित होगा, मैं वही करूंगा । इतना सुनकर नारदजी ने आगे भगवान क्या कह रहे हैं, यह सुनना आवश्यक नहीं समझा । वे शरीर से तो भगवान के सामने खड़े थे, पर मन में कल्पना कर रहे थे कि मैं स्वयंवर-सभा में बैठा हुआ हूँ, विश्वमोहिनी जयमाला लेकर आई हैं और मेरे गले में पहना रही हैं । जब व्यक्ति के मन में तीव्र मानसिक रोग उत्पन्न हो जाता है और वह प्रलाप करने लगता है, तब बीच-बीच में कोई सुसंगत बात भी कह देता है । पर इसके कारण उसे स्वस्थ्य नहीं समझना चाहिए । वात के प्रकोप की यह विशेषता है कि रोगी में बोलने की क्षमता तो बढ़ जाती है, पर वह विवेकयुक्त वाणी का प्रयोग नहीं करता । जब सन्निपात इत्यादि में रोगी बहुत बकबक करने लगे और कभी-कभी उसके मुँह से कोई सुसंगत बात निकल भी जाए, तो लोग कहते हैं कि इसको वात हो गया है । नारद भी काम-वात से पीड़ित हो गये थे, उन्होंने भी एकाध सुसंगत बात कही - मेरा हितैषी भगवान से बड़ा कोई नहीं है । भगवान ने मन-ही-मन हँसकर कहा - नारद, बस इतनी ही बात तुमने ठीक कही, पर आगे जितनी बातें तुम मुझसे माँग रहे हो, वह तो कुपथ्य की याचना है ।
Thursday, 26 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
एक सज्जन ने मुझे बतलाया कि एक महात्मा ने क्रोध को जीतने के उपाय लिखे हैं । उसमें सुझाया गया है कि क्रोध आने पर व्यक्ति अपने सामने शीशा रख ले और देखें कि क्रोध में शक्ल कैसी हो जाती है, तो क्रोध शान्त हो जाएगा । या फिर पानी पी ले तो क्रोध शान्त हो जाएगा । मैंने उससे विनोद में कहा कि यदि वह स्वयं शीशा देखे तब तो ठीक है पर कोई दूसरा व्यक्ति उसके सामने यदि शीशा रख दे, तो बड़ी समस्या उठ खड़ी होगी । नारदजी के जीवन में जो क्रोध था, वह शीशे को ही लेकर था । नारद की पहली समस्या तो यह थी कि वे भगवान विष्णु से सुन्दरता माँगते हैं । तत्पश्चात यदि वे स्वयं शीशे में देख लेते कि भगवान ने कैसी सुन्दरता दी है, तो झगड़े से बच जाते । पर उन्होंने मान लिया कि भगवान ने तो अब मुझे सुन्दर बना ही दिया । नारद ने कहा था - 'आन भाँति नहिं पावौं ओही' । इस पर भगवान ने तुरन्त नारद को उत्तर दिया था - मुनिजी, पहले यह बताइए कि यदि रोगी कुपथ्य माँगे तो क्या वैद्य देता है ? आप तो रोगी हैं और मुझसे कुपथ्य माँग रहे हैं, तो फिर मैं कैसे दूँ ? अब भगवान का वाक्य तो बड़ा स्पष्ट था, पर नारदजी को वह सुनाई ही नहीं पड़ा ।
Wednesday, 25 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
रामायण में विभिन्न पात्रों के संदर्भ में क्रोध का विश्लेषण किया गया है कि मनुष्य के जीवन में क्रोध कैसे आता है । काम की प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न होनेवाले क्रोध का साक्षात्कार आपको नारद के चरित्र में मिलेगा । एक सज्जन ने मुझसे कहा - गीता में कहा गया है कि जब व्यक्ति विषय का चिन्तन करता है तो उससे संग उत्पन्न होता है, संग से कामना उत्पन्न होती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है । यहाँ नारद के जीवन में काम और क्रोध तो दिखाई दे रहे हैं, पर उन्होंने जीवन में संग या तो शंकरजी का किया या ब्रह्मा का या फिर विष्णु का । फिर इनके जीवन में काम कैसे आ गया ? बात यह है कि शरीर से संग तो उन्होंने ब्रह्मा-विष्णु-शंकर का किया, पर जहाँ भी जाते थे, वहाँ अप्सराओं की ही कथा सुनाते थे । वे भले ही शरीर से अप्सराओं को छोड़कर चले आए थे, पर उनके मन में तो उनके सौंदर्य का चिन्तन प्रतिक्षण हो रहा था । और विचित्र बात यह है कि जिस काम को उन्होंने हराकर भेज दिया था, उसी का वे अनवरत चिन्तन करने लगे थे । तो, संग का तात्पर्य केवल शरीर से संग नहीं होता, अपितु मनुष्य के अन्तर्मन में जिस वस्तु का चिन्तन चलता है, वही सच्चा संग होता है ।
Tuesday, 24 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
रामायण में दोनों प्रकार के क्रोध आपको दिखाई देंगे । कुछ पात्र ऐसे हैं, जिनके जीवन में क्रोध सन्तुलित है । वह उस आग के समान है, जिसे घर में भोजन पकाने के बाद बुझा दिया जाता है । पर कुछ दूसरे पात्र भी हैं, जो क्रोध में इतना उन्मत्त हो जाते हैं कि उनका क्रोध ज्वाला बनकर उन्हें जलाने लगता है । पहले प्रकार का क्रोध भगवान राम और लक्ष्मणजी के चरित्र में दिखाई देता है और दूसरे प्रकार का क्रोध नारद, परशुराम और कैकेयी के जीवन में दृष्टिगोचर होता है । जहाँ पर 'क्रोध पित्त नित छाती जारा' वाली बात चरितार्थ होती है । यहाँ पर इस सन्दर्भ में मैं एक संकेत यह कर दूँ कि क्रोध स्वयं क्रिया न होकर एक प्रतिक्रिया है । काम और लोभ तो क्रिया हैं, पर क्रोध प्रतिक्रिया है । इसका अभिप्राय यह है कि क्रोध अपने आप जन्म नहीं लेता - वह काम, लोभ और अहंकार की वृत्ति में बाधा पड़ने से प्रतिक्रिया के रूप में प्रकट होता है । यदि व्यक्ति के जीवन में काम की पूर्ति में बाधा पड़े तो क्रोध आ जाएगा, या लोभी व्यक्ति के जीवन में लोभ की पूर्ति में बाधा पड़े तो वह क्रोध का शिकार होगा, या फिर अहंकारी व्यक्ति के अहंकार पर चोट लगे तो क्रोध जन्म लेगा । तात्पर्य यह है कि क्रोध जीवन में प्रतिक्रिया के रूप में आता है तथा वह अन्य अवगुणों के साथ जुड़ा हुआ आता है ।
Monday, 23 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
....कल से आगे .......
लक्ष्मणजी ने देखा कि भगवान को क्रोध आ गया है । उन्होंने उनके चरणों को पकड़ लिया और बोले, महाराज! मेरा काम मुझे ही करने दीजिए, आप न करें तो ही ठीक है । तो, क्रोध की भूमिका यह है कि अगर कोई अपराधी है, तो उसे दण्ड देने की आवश्यकता है । जब अग्नि घर के एक कमरे में जलती होती है, तब भोजन को पकाती है । जो व्यक्ति वह पका हुआ भोजन ग्रहण करता है, उसके भीतर भी वह अग्नि पित्त के रूप में भोजन को पचाती है, शरीर को शक्ति देती है । पर वही अग्नि यदि अनियंत्रित हो जाय तो घर में आग लगा सकती है, व्यक्ति को जलाकर खत्म कर सकती है । अभिप्राय यह है कि क्रोध अगर सन्तुलित होगा, समन्वित होगा, सीमा में होगा, तो वह बुराई की विनष्ट करने वाला होगा । यहाँ पर भगवान राम के क्रोध की भूमिका यही है । लक्ष्मणजी ने भगवान राम से जब यह कहा कि आपका विचार तो बड़ा अच्छा है, मैं अभी जाकर सुग्रीव को मार देता हूँ, तो भगवान श्रीराघवेन्द्र ने कहा कि लक्ष्मण! अग्नि अगर जलावे तो कौन पसन्द करेगा ? अग्नि यदि शरीर में शक्ति बढ़ावे, तेजस्विता बढ़ावे, तब तो वह सबको प्रिय होगी । वे लक्ष्मणजी से कहते हैं - धनुष-बाण लेकर सुग्रीव के पास जाओ, लेकिन भय दिखाकर उसे दूर भगाना नहीं, बल्कि मेरे पास ले आओ ।
लक्ष्मणजी ने देखा कि भगवान को क्रोध आ गया है । उन्होंने उनके चरणों को पकड़ लिया और बोले, महाराज! मेरा काम मुझे ही करने दीजिए, आप न करें तो ही ठीक है । तो, क्रोध की भूमिका यह है कि अगर कोई अपराधी है, तो उसे दण्ड देने की आवश्यकता है । जब अग्नि घर के एक कमरे में जलती होती है, तब भोजन को पकाती है । जो व्यक्ति वह पका हुआ भोजन ग्रहण करता है, उसके भीतर भी वह अग्नि पित्त के रूप में भोजन को पचाती है, शरीर को शक्ति देती है । पर वही अग्नि यदि अनियंत्रित हो जाय तो घर में आग लगा सकती है, व्यक्ति को जलाकर खत्म कर सकती है । अभिप्राय यह है कि क्रोध अगर सन्तुलित होगा, समन्वित होगा, सीमा में होगा, तो वह बुराई की विनष्ट करने वाला होगा । यहाँ पर भगवान राम के क्रोध की भूमिका यही है । लक्ष्मणजी ने भगवान राम से जब यह कहा कि आपका विचार तो बड़ा अच्छा है, मैं अभी जाकर सुग्रीव को मार देता हूँ, तो भगवान श्रीराघवेन्द्र ने कहा कि लक्ष्मण! अग्नि अगर जलावे तो कौन पसन्द करेगा ? अग्नि यदि शरीर में शक्ति बढ़ावे, तेजस्विता बढ़ावे, तब तो वह सबको प्रिय होगी । वे लक्ष्मणजी से कहते हैं - धनुष-बाण लेकर सुग्रीव के पास जाओ, लेकिन भय दिखाकर उसे दूर भगाना नहीं, बल्कि मेरे पास ले आओ ।
Sunday, 22 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
भगवान श्रीराम क्रोध को भी स्वीकार करते हैं । वे जीवन में यत्र-तत्र क्रोध करते हुए दिखाई देते हैं । खर-दूषण के साथ युद्ध करते हुए क्रोध से भरे दिखाई देते हैं । नारद के प्रसंग में भी उनमें क्रोध की स्वीकृति दिखाई देती है । अन्य प्रसंगों में भी क्रोध का वर्णन है । प्रश्न उठता है कि क्रोध को स्वीकार करने में ईश्वर का उद्देश्य क्या है ? इस संदर्भ में सुग्रीव का प्रसंग ही ले लें । सुग्रीव राज-पाट पाकर भोगों में भूल जाते हैं । भगवान के पास जाने की उन्हें याद ही नहीं रहती । गोस्वामीजी कहते हैं कि भगवान राम ने रोष को स्वीकार किया । उन्हें सुग्रीव पर रोष आता है और वे लक्ष्मण को श्रोता बनाते हैं । जहाँ क्रोध का प्रसंग हो, वहाँ लक्ष्मण से बढ़िया श्रोता और कोई नहीं हो सकता, क्योंकि लक्ष्मणजी क्रोध के बड़े समर्थक हैं । उनके चरित्र में अग्नि की तेजस्विता है । उनका क्रोध रामायण में सर्वत्र दिखाई देता है । तो, आज जब भगवान श्रीराघवेन्द्र ने क्रोध की यह नई भूमिका स्वीकार की, तो लक्ष्मणजी यह सोचकर आश्चर्यचकित हो गए कि मेरी भूमिका प्रभु ने कैसे ले ली । प्रभु ने कहा - लक्ष्मण ! देखा सुग्रीव को ? राज्य, खजाना, नगर और स्त्री पाकर उसने भी मेरी सुधि भुला दी ! लक्ष्मणजी ने पूछा - तो महाराज, इस अपराध के बदले में क्या करने का विचार है ? प्रभु बोले - जिस बाण से मैंने बालि का वध किया था, उसी से मैं उस मुर्ख सुग्रीव का कल वध करूँगा ।
........आगे कल .......
........आगे कल .......
Saturday, 21 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
रामायण में एक बढ़िया उपमा दी गयी है । भगवान राम काम की तुलना तो सर्प से करते हैं और क्रोध की अग्नि से । यह प्रसंग अरण्यकाण्ड में आता है । यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि व्यक्ति सर्प से जितना डरता है, आग से उतना नहीं डरता, क्योंकि उसे लगता है कि सर्प न जाने कब अँधेरे में से निकलकर उसे डस ले । आग तो छिपी नहीं है, वह प्रत्यक्ष है । घर में नित्य उसका प्रयोग होता है, इसलिए अग्नि को हम निकट से देखने के इतने अभ्यस्त हैं कि उससे सर्प के समान भय नहीं लगता । पर सच्चाई तो यह है कि अग्नि भी सर्प के समान घातक है । जैसे सर्प के डँसने से कितने लोगों की मृत्यु होती है, वैसे ही अग्नि से जल जाने से भी, किन्तु दोनों में अन्तर यह है कि एक अँधेरे में छिपा हुआ है तो दूसरा प्रत्यक्ष है । इसी प्रकार काम की वृत्ति छिपी रहती है, जबकि क्रोध प्रकट । इस काम की वृत्ति को व्यक्ति प्रकट नहीं करना चाहता, लेकिन क्रोध करने में वह संकोच नहीं करता । भगवान श्रीराघवेन्द्र कहते हैं कि दोनों से सावधान रहने की आवश्यकता है, बल्कि सर्प से तो हमें कभी-कभी ही भय होगा, किन्तु अग्नि से हमें नित्य भय है । सर्प के निकलने की संभावना तो ऋतु-विशेष में, स्धान-विशेष में होती है, पर अग्नि का जलना तो सब जगह, सब समय नितांत आवश्यक है । ऐसी परिस्थिति में अग्नि के प्रति व्यक्ति को सतत् सजग रहना चाहिए ।
Friday, 20 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
मनुष्य का मन काम, क्रोध और लोभ से परिचालित होता है । यदि व्यक्ति के मन में काम न हो, तो यह आशंका बन सकती है कि व्यक्ति कहीं निष्क्रिय न हो जाए । यदि लोभ के माध्यम से समाज में धन संग्रहित न हो, तो परिणाम यह होगा कि समाज निर्धन हो जाएगा । दरिद्रता के विनाश के लिए या अन्य मानवीय समस्याओं के समाधान के लिए जिस धन की आवश्यकता है, उसकी पूर्ति लोभ के द्वारा होती है । इस प्रकार काम और लोभ के द्वारा समाज में सृष्टि का और उसे गतिशील बनाने का कार्य सम्पन्न होता है । इनके साथ क्रोध के रूप में यह जो पित्त है, उसका भी अपना मौलिक महत्व है । उसके अभाव में भोजन ज्यों का त्यों बना रहेगा, जिससे शरीर शक्तिशाली नहीं बन पाएगा । पित्त अग्नि के रूप में भोजन को जलाकर ऐसी ईंधनशक्ति के रूप में परिणत कर देता है, जिससे शरीर को अपने संचालन के लिए आवश्यक रसों की प्राप्ति होती है । पर जब यही पित्त शरीर में अधिक बनने लगता है, तो वह अन्न को भस्मीभूत करने के स्थान पर व्यक्ति के ह्रदय को ही जलाने लगता है । क्रोध की प्रक्रिया भी ठीक ऐसी ही है । वैसे काम और लोभ की तुलना में क्रोध की विचित्रता पर लोगों का ध्यान कम जाता है । क्रोध के प्रति हमारी सजगता की वृत्ति उतनी नहीं होती, तथापि जीवन में व्यक्ति जिसका प्रतिक्षण अनुभव करता है, वह क्रोध है ।
Thursday, 19 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
गोस्वामीजी आयुर्वेद की पध्दति से मन के रोगों को समझाते हैं । आयुर्वेदशास्त्र कहता है कि इस शरीर की रचना में कफ, वात और पित्त इन तीन धातुओं का महत्व है, जो व्यक्ति को चैतन्य बनाए रखते हैं । जब तक ये सन्तुलित रूप से विद्यमान रहते हैं, तब तक तो व्यक्ति स्वस्थता का अनुभव करता है, पर ज्योंही इनमें असंतुलन उत्पन्न होता है, वह अस्वस्थ हो जाता है । इसी प्रकार मन में भी काम, क्रोध और लोभ रूप वात, पित्त और कफ हैं । विगत दिनों काम और लोभ की चर्चा की गयी थी । अब हम थोड़ा क्रोध के संदर्भ में विचार करेंगे । यदि हम शरीर को देखें तो वात और कफ की भूमिका के साथ पित्त की भूमिका भी बड़े महत्व की है । यदि व्यक्ति के शरीर में पित्त सर्वथा समाप्त हो जाए, तो पाचन प्रक्रिया नष्ट हो जाएगी । यह पित्त पाचन की प्रक्रिया को सक्रिय करता है ।
Wednesday, 18 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
कल मानस-रोगों से मुक्ति के संदर्भ की बात रखी गई, पर पहले मानस-रोगों का जो विचित्र रूप है, उस पर थोड़ा विचार करें । एक रोगी केवल अपने लिए ही समस्या नहीं होता, वह दूसरों के लिए भी समस्या खड़ी करता है । रोगी स्वयं तो अस्वस्थ होता ही है, दुख पाता ही है, साथ ही परिवार के लोगों को भी चिन्ता में डाल देता है । और कहीं रोग यदि छूतवाला हुआ, तब तो वह केवल चिंता ही नहीं, रोग भी बाँटता है । शरीर के संदर्भ में तो कुछ ही रोग ऐसे होते हैं, जो छूत से होते हैं और शेष रोग छूतजन्य नहीं होते, लेकिन मानस-रोगों के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि सारे-के-सारे रोग छूत से फैलते हैं । जो व्यक्ति मन से रोगी होता है, वह परिवार को और समाज को भी रोगी बना देता है । इसलिए मन के रोग के स्वरूप को समझकर उसे मूल से नष्ट करने की चेष्टा करनी चाहिए ।
Tuesday, 17 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
मोह की सबसे बड़ी विलक्षणता यह है कि अन्य रोग तो मन में होते हैं, पर मोह का निवास चित्त में होता है । इसलिए मन की औषधि करने पर भी चित्तगत दोषों का नाश नहीं होता है । अतएव चित्तगत दोषों को मिटाने के लिए वैराग्य का अभ्यास औषधि के रूप में दिग्दर्शित हुआ है । काकभुशुण्डिजी कहते हैं - मन को तब निरोग हुआ जानना चाहिए, जब ह्रदय में वैराग्य का बल बढ़ जाए । तात्पर्य यह है कि चित्तगत, संस्कारगत मोह को काटने के लिए तीव्र वैराग्य के अभ्यास की आवश्यकता होती है । इसलिए महापुरूष लोग साधनाक्रम में अभ्यास पर बल देते हैं । पुराने प्रतिकूल संस्कारों को काटने के लिए अभ्यास के द्वारा चित्त में नए अनुकूल संस्कार पैदा करने होते हैं । पुराने संस्कारों को काटने के लिए रामचरितमानस में सूत्र दिया गया है - सत्संग से, बार-बार सन्त का संग करने से वैराग्य और भक्ति के संस्कार तीव्र होते हैं और पुराने संस्कार समाप्त होते हैं । मानस-रोगों से मुक्ति पाने का यही उपाय है ।
Monday, 16 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
सृष्टि के सृजन की प्रक्रिया में नाभि को बड़ा महत्व दिया गया है । कहा जाता है कि सृष्टि का सृजन ब्रह्मा द्वारा होता है और ब्रह्मा का जन्म कमल पर, जो भगवान विष्णु की नाभि से निकलता है । तो, कमल से ब्रह्मा और ब्रह्मा से सृष्टि । इसका क्या तात्पर्य हुआ ? यही कि सृष्टि करते समय ब्रह्मा मनमानी नहीं करते, किसी को सुन्दर या किसी को कुरूप नहीं बनाते, अपनी ओर से सृष्टि में भेद उत्पन्न नहीं करते, अपितु भेद के बीज कमल में ही रहते हैं, जिसमें से उनकी भी उत्पत्ति हुई है । सृष्टितत्व में बताया गया है कि प्रयलकाल में यह विराट् ब्रह्माण्ड भगवान के उदर में सो जाता है । वस्तुओं के स्थूल रूप तो मिट जाते हैं, पर वे संस्कार के रूप में ईश्वर के उदर में समाहित रहते हैं । जब तक ईश्वर सुषुप्त हैं, निष्क्रिय हैं, तब तक वे संस्कार भी सुप्त रहते हैं, दिखाई नहीं देते । जैसे हमारे जीवन में होता है । जब हम गहरी नींद में होते हैं, उस समय हमारे अभ्यासजन्य संस्कार सक्रिय नहीं दिखाई देते । लेकिन जैसे ही नींद खुलती है, वे सक्रिय हो जाते हैं । इसी प्रकार से जब प्रलय होता है तो व्यक्ति केवल संस्कार के रूप में जीवित रहता है, वह ईश्वर के उदर में समाया रहता है । सृष्टिकाल में उस नाभि से, संस्कारों के उस मूल-केन्द्र से सृष्टि की प्रक्रिया प्रारंभ होती है । इस प्रसंग में कहा गया है कि रावण की नाभि में अमृतकुण्ड है । तात्पर्य यह है कि रावण की नाभि में पूर्व-पूर्व जन्मों के चित्तगत संस्कार पड़े हुए हैं ।
Sunday, 15 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
गोस्वामीजी कहते हैं कि वैसे तो ईश्वर की ईच्छा मात्र से काल भी मर सकता है, फिर भी वे देखना चाहते हैं कि जीव इसमें कितना सहयोग देता है । इसलिए श्रीराघवेन्द्र विभीषण की ओर देखते हैं और विभीषणजी उस रहस्य को जानते हैं कि रावण की मृत्यु क्यों नहीं हो रही है ? उसके नए सिर और नई भुजाएँ क्यों निकल रही हैं ? गोस्वामीजी द्वारा प्रदत्त सूत्र बड़े महत्व का है । काकभुशुण्डिजी कहते हैं -
नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।
अब इनको चाहे मानस-रोगों के संदर्भ में औषध कह लीजिए, चाहे लंका के राक्षसों के संदर्भ में बाण । यदि मोह राक्षस है, तो बाण चलाया जाता है और यदि मोह रोगों का मूल है, तो औषध दी जाती है । लेकिन मोह ऐसा है कि बहुत-सी औषधियों का प्रयोग करने पर भी मनुष्य के दुर्गुणों का विनाश नहीं होता है । वैसे तो साधारणतः यदि किसी के शरीर पर प्रहार किया जाय या उसका सिर काट दिया जाय, तो उसकी तत्काल मृत्यु हो जाएगी । पर रावण के साथ समस्या है कि सिर और भुजा के साथ-साथ जब तक उसकी नाभि पर भी प्रहार नहीं किया जाएगा, वह नहीं मरेगा । यह नाभि वस्तुतः चित्त का मूल-केन्द्र है । यहीं पर पूर्व-पूर्व जन्मों के संस्कार संग्रहित रहते हैं ।
नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।
अब इनको चाहे मानस-रोगों के संदर्भ में औषध कह लीजिए, चाहे लंका के राक्षसों के संदर्भ में बाण । यदि मोह राक्षस है, तो बाण चलाया जाता है और यदि मोह रोगों का मूल है, तो औषध दी जाती है । लेकिन मोह ऐसा है कि बहुत-सी औषधियों का प्रयोग करने पर भी मनुष्य के दुर्गुणों का विनाश नहीं होता है । वैसे तो साधारणतः यदि किसी के शरीर पर प्रहार किया जाय या उसका सिर काट दिया जाय, तो उसकी तत्काल मृत्यु हो जाएगी । पर रावण के साथ समस्या है कि सिर और भुजा के साथ-साथ जब तक उसकी नाभि पर भी प्रहार नहीं किया जाएगा, वह नहीं मरेगा । यह नाभि वस्तुतः चित्त का मूल-केन्द्र है । यहीं पर पूर्व-पूर्व जन्मों के संस्कार संग्रहित रहते हैं ।
Saturday, 14 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...........
गोस्वामीजी विनयपत्रिका में लिखते हैं - विभीषण जीव हैं और रावण मूर्तिमान मोह है । जब चेष्टा करने पर भी मोह नष्ट नहीं होता, तब भगवान श्रीराघवेन्द्र जीव से सहायता की याचना करते हैं । वे विभीषण से पूछते हैं - क्यों ? बहुत से ऐसे विषय होते हैं, जिनमें वैद्य को रोगी से बड़ी प्रेरणा मिलती है । रोगी को अपनी प्रकृति के, अपने स्वयं के विषय में जितनी अनुभूति होती है, उतनी वैद्य को नहीं है । अतः जब रोगी अपनी पूरी प्रकृति, अपनी समस्त समस्याओं को वैद्य के सामने रखता है, तभी वैद्य ठीक-ठीक दवाओं की व्यवस्था कर उनकी समस्याओं का समाधान करने में समर्थ होता है । तो, भगवान श्रीराघवेन्द्र विभीषण की ओर देखते हैं, तो इसका तात्पर्य यह है कि रोगों का विनाश तब तक नहीं होगा, जब तक जीव स्वयं सहायक नहीं बनेगा, जब तक वह स्वयं मोह को नहीं मिटाना चाहेगा ।
Friday, 13 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
कल के प्रसंग को सूत्र के रूप में यों कहें कि योग्य से योग्य वैद्य भी रोगी को तब तक स्वस्थ नहीं कर सकता, जब तक कि रोगी स्वयं वैद्य को सहयोग न दे । यदि रोगी वैद्य के आदेश का पालन करे, वैद्य की दी हुई औषध और पथ्य का सेवन करे, तभी वह स्वस्थ हो सकता है । पर यदि वैद्यराज ऊँची से ऊँची दवा देकर, पथ्य बताकर चले जाएँ और रोगी उस पुड़िया को फेंक दे तथा जिन वस्तुओं को वैद्य ने खाने के लिए मना किया हो उन्हें खाने की चेष्टा करे, तब वैद्य की उच्च से उच्च योग्यता भी उस रोगी को भला कैसे स्वस्थ कर सकती है ? इसी प्रकार ईश्वर चाहे जितने बड़े वैद्य हों, पर जब तक रोगी के रूप में यह जीव उनको सहयोग नहीं देगा, तब तक उनकी सर्वशक्तिमता सफल नहीं हो सकती । यहाँ पर भी यही संकेत है । विभीषण स्वयं जीव के प्रतीक हैं ।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
कल के प्रसंग को सूत्र के रूप में यों कहें कि योग्य से योग्य वैद्य भी रोगी को तब तक स्वस्थ नहीं कर सकता, जब तक कि रोगी स्वयं वैद्य को सहयोग न दे । यदि रोगी वैद्य के आदेश का पालन करे, वैद्य की दी हुई औषध और पथ्य का सेवन करे, तभी वह स्वस्थ हो सकता है । पर यदि वैद्यराज ऊँची से ऊँची दवा देकर, पथ्य बताकर चले जाएँ और रोगी उस पुड़िया को फेंक दे तथा जिन वस्तुओं को वैद्य ने खाने के लिए मना किया हो उन्हें खाने की चेष्टा करे, तब वैद्य की उच्च से उच्च योग्यता भी उस रोगी को भला कैसे स्वस्थ कर सकती है ? इसी प्रकार ईश्वर चाहे जितने बड़े वैद्य हों, पर जब तक रोगी के रूप में यह जीव उनको सहयोग नहीं देगा, तब तक उनकी सर्वशक्तिमता सफल नहीं हो सकती । यहाँ पर भी यही संकेत है । विभीषण स्वयं जीव के प्रतीक हैं ।
Thursday, 12 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
गोस्वामीजी विनयपत्रिका में रावण को मूर्तिमान मोह बताते हैं । गोस्वामीजी के इस कथन का एक आध्यात्मिक तात्पर्य है । भगवान श्रीराघवेन्द्र रावण के दस सिर और बीस भुजाओं को अपने तीस बाणों के द्वारा काट देते हैं, पर अगले ही क्षण अद्भुत दृश्य दिखाई देता है, वह यह कि रावण के नए सिर और नई भुजाएँ निकल आती हैं । श्रीराम बारम्बार उसके सिर और भुजाओं को काटते हैं और उतनी ही बार रावण के नए सिर और भुजाएँ पैदा हो जाती हैं । इस प्रकार रावण को मारने की चेष्टा करने पर भी जब भगवान श्रीराघवेन्द्र उसका वध नहीं कर पाते - कम-से-कम लोगों के सामने तो यही दिखाई देता है - तब वे विभीषण की ओर देखते हैं । इस प्रसंग को जब शंकरजी ने पार्वतीजी को सुनाया, तो उन्हें यह सोच बड़ा आश्चर्य हुआ कि क्या सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान ईश्वर रावण का वध नहीं कर सकते थे ? पर यह प्रसंग मात्र उसी प्रसंग के संदर्भ में नहीं है, अपितु वह तो हम सबके जीवन से जुड़ा हुआ है । जब यह कहा जाता है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं और व्यक्ति के ह्रदय में बैठे हुए हैं, तो ऐसी स्थिति में प्रश्न यह उठता है कि वे जीवन की बुराइयों को मिटा क्यों नहीं पा रहे हैं ? ईश्वर के होते हुए भी हमारे अन्दर दुर्गुण ज्यों के त्यों क्यों बने हुए हैं ? रावण के उक्त प्रसंग में इस प्रसंग का सार्थक उत्तर दिया गया है ।
Wednesday, 11 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
काकभुशुण्डिजी ने रोगों का मूल कारण मोह को बताया । जाने हुए सत्य की उपेक्षा करने की जो वृत्ति है, वह मोह है और यह मोह अभ्यास से उत्पन्न हुआ है, जो केवल इसी जन्म से सम्बध्द नहीं है, अपितु अगणित पूर्व-पूर्व जन्मों से बनता चला आया है । जैसे कई बार कुछ लोगों का अभ्यास बन जाता है मुँह में उँगली डालकर चबाने का । वे यह जानते तो हैं कि ऐसा करना ठीक नहीं, लेकिन जब भी वे कुछ सोचते रहते हैं, तो अनजाने में, बिना प्रयास के, उनका अभ्यास उन पर हावी हो जाता है और अभ्यास से प्रेरित हो वही कार्य करने लगते हैं, जिन्हें वे बुरा समझते हैं । जब व्यक्ति के इसी जीवन में पड़ने वाले दुर्गुण के अभ्यास का छूटना इतना कठिन होता है, तब अगणित जन्मों से जो अभ्यास बना चला आ रहा है, उनका छूटना कितना कठिन होगा इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है । ये अभ्यास संस्कार के रूप में चित्त में संग्रहित रहते हैं, इसलिए अनुकूल परिस्थिति पाने से अंकुरित होते रहते हैं । रावण के प्रसंग में इसी का संकेत किया गया है ।
Tuesday, 10 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...........
विगत कुछ दिनों से चल रहे इस प्रसंग का नाम गोस्वामीजी 'नारद-मोह' देते हैं । यह सार्थक नाम है । इसका तात्पर्य यह है कि दुर्गुणों के बीज व्यक्ति के अन्तःकरण में विद्यमान रहते हैं और समय पाकर वे अंकुरित हो उठते हैं । रामायण में यह दावा किया गया है कि बड़े से बड़ा व्यक्ति भी इसका अपवाद नहीं है, ऐसा कोई नहीं है जो कह सके कि उसके अन्तःकरण में दुर्गुणों के संस्कार नहीं है । यदि कोई ऐसा कहता है, तो वह अपने जाने हुए सत्य का तिरस्कार करता है और फलस्वरूप मन और शरीर की दृष्टि से अस्वस्थ हो उठता है । इसलिए रामचरितमानस में सारे रोगों के मूल में मोह का होना बताया गया है । मोह कोई रोग नहीं है, पर रोगों का जन्मदाता है ।
Monday, 9 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ............
भगवान ने नारद को बता दिया कि तुम वृथा गर्व कर रहे हो कि तुमने काम को जीत लिया, देखो तुम तो काम में इतने पागल हो रहे हो, जितना एक गृहस्थ भी नहीं होता ! गृहस्थ कामी भी बनता है तो सुबह उठकर पूजा-पाठ तो कर ही लेता है, पर नारद की दशा ऐसी हो गयी है कि कहते हैं -
जप तप कछु न होइ तेही काला ।
हे विधि मिलइ कबन विधि बाला ।।
नारद को बड़ा गर्व था कि मुझे अभिमान नहीं हुआ । पर भगवान ने उन्हें दिखा दिया कि तुम कितने अभिमानी हो ! अरे, तुम तो मुझ पर क्रोध कर रहे हो, मुझे गाली दे रहे हो, मुझे शाप दे रहे हो ! तुम्हारा सारा अभिमान व्यर्थ है । नारद जब इस सत्य को समझ लेते हैं, तब भगवान उनके अलग-अलग विकारों को दूर करने के बदले विकारों के मूल में जो मोह की वृत्ति विद्यमान है; उसी को दूर कर देते हैं । और जब विश्वमोहिनी नहीं रही - जब तक माया थी, तब तक भगवान से झगड़ रहे थे और जब माया का लोप हो गया, मोह दूर हो गया, तो भगवान के श्री चरणों में गिर पड़े और कहने लगे - महाराज, मेरा पाप कैसे मिटे यह बताइए । मुझसे जो दोष हुआ है, उसका प्रायश्चित क्या है ? भगवान विष्णु ने मुस्कराकर कहा - जाकर शंकरजी के शतनाम का जप करो । उन्होंने मुनि को शंकरजी की याद दिला दी । प्रभु का संकेत यह है कि मुनि, यदि तुमने शंकरजी की बात सुनी होती, तो समस्या ही नहीं आती ।
जप तप कछु न होइ तेही काला ।
हे विधि मिलइ कबन विधि बाला ।।
नारद को बड़ा गर्व था कि मुझे अभिमान नहीं हुआ । पर भगवान ने उन्हें दिखा दिया कि तुम कितने अभिमानी हो ! अरे, तुम तो मुझ पर क्रोध कर रहे हो, मुझे गाली दे रहे हो, मुझे शाप दे रहे हो ! तुम्हारा सारा अभिमान व्यर्थ है । नारद जब इस सत्य को समझ लेते हैं, तब भगवान उनके अलग-अलग विकारों को दूर करने के बदले विकारों के मूल में जो मोह की वृत्ति विद्यमान है; उसी को दूर कर देते हैं । और जब विश्वमोहिनी नहीं रही - जब तक माया थी, तब तक भगवान से झगड़ रहे थे और जब माया का लोप हो गया, मोह दूर हो गया, तो भगवान के श्री चरणों में गिर पड़े और कहने लगे - महाराज, मेरा पाप कैसे मिटे यह बताइए । मुझसे जो दोष हुआ है, उसका प्रायश्चित क्या है ? भगवान विष्णु ने मुस्कराकर कहा - जाकर शंकरजी के शतनाम का जप करो । उन्होंने मुनि को शंकरजी की याद दिला दी । प्रभु का संकेत यह है कि मुनि, यदि तुमने शंकरजी की बात सुनी होती, तो समस्या ही नहीं आती ।
Sunday, 8 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
वैसे स्वभावतः नारद बड़े सत्यवादी हैं ; यदि उनसे कोई पूछे कि सबसे बड़ा पाप क्या है, तो वे यही कहेंगे कि असत्य से बढ़कर कोई पाप नहीं है । पर आज नारद मोह में पड़ गए हैं, इसलिए जानते हुए भी सत्य को दबा जाते हैं । गोस्वामीजी लिखते हैं - मुनि ने विश्वमोहिनी के सब लक्षणों को विचारकर मन में रख लिया और राजा से कुछ अपनी ओर से बनाकर कह दिए । उन्हें लगा कि यदि मैं यह सच-सच बता दूँ, तो ये कहीं अपनी कन्या का विवाह किसी दूसरे से न कर दें; इसलिए मैं ही योजना बनाकर उसे प्राप्त कर लूँ । उसके पश्चात नारद के जीवन में सारे दुर्गुण - काम, क्रोध, लोभ, मद और मात्सर्य - दिखाई देने लगे, जिन सबके मूल में रामायण के अनुसार - उनका यही अपार मोह है ।
Saturday, 7 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
नारदजी ने जब विश्वमोहिनी का हाथ देखा, तो शीलनिधी ने उनसे पूछा - महाराज, लड़की के हाथ में क्या लिखा है ? नारद ने मोह के कारण पाठ उल्टा पढ़ा । नारदजी को कहना यह चाहिए था कि ऐसे-ऐसे लक्षण जिस वर में होंगे, उससे इस कन्या का विवाह होगा, जैसा कि उन्होंने पार्वतीजी के प्रसंग में कहा था कि ये जितने लक्षण मैंने बताए वे शंकरजी में हैं, इसलिए इसका विवाह शंकरजी से होगा । पर यहाँ पर उनकी बुध्दि में विपरीतता आ गई । उन्होंने लक्षणों का उल्टा अर्थ ले लिया । 'जो एहि बरइ अमर सोई होई' का अर्थ उन्होंने यह लगाया कि जो इस कन्या से विवाह करेगा, उसमें अमरता आदि के गुण आ जाएँगे । अर्थात पहले तो वह मरणधर्मा ही होगा, पर जब इस कन्या से उसका विवाह हो जाएगा तो अमर हो जाएगा । तात्पर्य यह है कि पहले तो लोग उसको कुछ नहीं मानते रहेंगे, पर विवाह के बाद उसकी पूजा करने लगेंगे ! अभिप्राय यह है कि जो कुछ मिलेगा, वह माया की कृपा से, माया के द्वारा मिलेगा !! देवर्षि नारद के जीवन में माया की यही विकटता दीख पड़ती है ।
Friday, 6 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
शीलनिधी राजा एक पिता के रूप में नहीं, बल्कि माया के प्रति आकर्षण की वृद्धि करने के लिए नारद से कहते हैं कि महाराज, जरा बताइए इस कन्या में क्या गुण हैं और क्या दोष ! नारदजी ने जब कन्या को देखा तो उनको लगा कि उसमें सब गुण ही गुण हैं । यदि उन्होंने थोड़ा विचार किया होता तो समझ गये होते कि सृष्टि में जहाँ गुण हैं, वहाँ दोष भी अवश्य हैं । जब पार्वतीजी के बारे में उन्होंने बताया था, तब उनके गुणों का वर्णन करके कहा था - तुम्हारी कन्या में जो दो-चार कमियाँ हैं, उन्हें भी सुन लो । लेकिन विश्वमोहिनी के प्रसंग में उन्होंने शीलनिधी राजा से उनकी कन्या के दोष की चर्चा तक नहीं की । इसका अभिप्राय यह है कि उनको माया में गुण ही गुण दिखाई दे रहा है, दोष का दिखना बन्द हो गया है । यह दोष का दिखना बड़े महत्व की बात है । यदि व्यक्ति को दोष दिखाई देता रहे तो स्वाभाविक रूप से वह दोष की ओर से सावधान रहेगा । दोष को देखकर उसके अन्तःकरण में वैराग्य की सृष्टि होगी । पर जब उस व्यक्ति को दोष न दिखाई दे तो उसका परिणाम मोह ही तो होगा ? और वही नारदजी के जीवन में हुआ ।
Thursday, 5 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
भगवान द्वारा माया से निर्मित नगर नारद को बड़ा आकर्षक प्रतीत होता है । और वे उसे देखने के लिए आगे बढ़ जाते हैं । उनके चित्त में विपर्यय उपस्थित होता है । नगर के शीलनिधी नाम के राजा ने आकर उन्हें प्रणाम किया और अपनी कन्या को बुलवाया । कन्या का नाम है विश्वमोहिनी । गोस्वामीजी विनयपत्रिका में सूत्र देते हैं कि माया तो विश्व को सम्मोहित ही करती है और यह मोहजनित मल करोड़ों उपाय से भी नहीं छूटता । ऐसी विश्वमोहिनी को बुलाकर राजा शीलनिधी नारदजी से कहते हैं - हे नाथ, आप अपने ह्रदय में विचारकर इसके सब गुण दोष कहिए । गोस्वामीजी यहाँ पर शब्दों को उलट देते हैं । जिस समय हिमाचल ने अपनी पुत्री का हाथ नारदजी को दिखलाया था तो उनसे कहा था - कन्या में क्या दोष-गुण हैं आप बताइए । पहले उन्होंने दोष का नाम लिया, फिर गुण का । और जब विश्वमोहिनी के पिता ने अपनी कन्या का हाथ दिखाया तो उनसे कहा - इसके गुण और दोष बताइए । इसका अभिप्राय यह है कि जहाँ वात्सल्य है, वहाँ यह चिंता रहती है कि यदि कोई कमी है, दोष है, तो उसका निराकरण होना चाहिए । पर जहाँ पर उद्देश्य ही मोहित करना है, वहाँ पर दोष का उल्लेख केवल कहने भर के लिए हो रहा है, मूलरूप से तो वहाँ गुण की तरफ ही आकृष्ट किया जा रहा है ।
Wednesday, 4 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
दुर्गुणों के बीज समय पाकर कैसे उभड़ आते हैं, इसे प्रत्यक्ष कराने के लिए भगवान ने एक कौतुक किया । जब देवर्षि नारद चलने लगे, तो भगवान अपनी माया को प्रेरित कर एक नगर की रचना करते हैं । भगवान की यह माया बैकुंठ से भी अधिक सुन्दर एक चित्र-विचित्र नगर की सृष्टि करती है । एक ओर लक्ष्मी हैं, जो भक्तिरूपा हैं और दूसरी ओर माया है, जिसके द्वारा दुर्गुणों की सृष्टि होकर व्यक्ति भ्रमित होता है और उसका सारा ज्ञान विस्मृत हो जाता है । नारद के साथ यही हुआ । वे यह भी तो सोच सकते थे कि जब मैं जा रहा था तब रास्ते में यह नगर तो था नहीं, अब आते समय कहाँ से आ गया ? लेकिन इस बात पर उनकी दृष्टि ही नहीं गई । जो नहीं था, यदि वह दिखाई दे तो समझ लेना चाहिए कि यह जादू का ही खेल है । और जादू के खेल को बस देखना ही चाहिए । जादूगर के हाथ में मिठाई देखकर यदि कोई लपककर खा लेने की इच्छा करे तो उसमें खतरा है । तो, नारद यदि देखते कि यह भी कोई जादूगरी का, माया का खेल है, तो बच जाते । लेकिन वे ऐसा नहीं देख पाते ।
Tuesday, 3 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
नारद के मन में यही तो अहंकार आ गया था कि मैंने काम को, क्रोध को, लोभ को, बुराई को जीत लिया है । भगवान नारद के इस अहंकार के आधार को ही नष्ट कर देना चाहते हैं । वे यह बताना चाहते हैं कि जैसे गर्मी के दिनों में घास सूख जाती है, दिखाई नहीं देती, पर इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि घास के बीज नष्ट हो गए, बल्कि यह जानना चाहिए कि घास के बीज तो धरती के नीचे छिपे हुए हैं और वर्षा का जल पाकर वे फिर से उग आते हैं, उसी प्रकार नारद, तुमने जिन दुर्गुणों को जीतने का दावा किया है, उन सबके बीज तुम्हारे अन्तःकरण में विद्यमान हैं, इसलिए समय पाकर वे फिर से उभड़ सकते हैं ।
Monday, 2 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
नारदजी जब बह्मलोक का लम्बा चक्कर लगाते हुए भगवान विष्णु के लोक में गए, तो भगवान ने देखा - नारद के मन में अभिमान के भारी वृक्ष का अंकुर पैदा हो गया है । नारदजी को जिसे काट देना चाहिए था, उसे नहीं काटा है । सत्कर्म के पास अहंकार की घास तो उगेगी ही, पर बुद्धिमान साधक उस अहंकार की घास को काटकर धान्य को आगे बढ़ने की शक्ति देता है । अतः भगवान ने निर्णय किया - मैं उसे तुरन्त उखाड़ फेकूँगा । अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान भाषण के द्वारा नारद को समझाने की चेष्टा नहीं करते । उन्हें लगता है कि शिवजी ने नारद को समझाने की चेष्टा की, तो नारद ने उन्हें ईर्ष्यालु समझ लिया, इसलिए यदि मैं भी उन्हें समझाने की चेष्टा करुँ, तो कहीं मुझमें भी दोष न देखने लगें, यह न सोचने लगें कि मुझे भी उनसे ईर्ष्या हो गयी है । यदि रोगी वैद्य को ही रोगी मानकर उसकी चिकित्सा करने की चेष्टा करे और कहे कि आपको दवा लेने की आवश्यकता है, तब तो रोगी स्वस्थ होने से रहा । अतः नारद के रोग को भगवान सीधे नष्ट करने का निश्चय करते हैं । इसके लिए वे एक नई पद्धति का आश्रय लेते हैं
Sunday, 1 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
नारदजी जब काम पर विजय पाने की पूरी गाथा शंकरजी को सुना देते हैं, तब भगवान शंकर विनम्र शब्दों में कहते हैं - मैं आपको बार-बार प्रणाम करता हूँ । पहला वाक्य सुनकर नारद बड़े प्रसन्न हुए कि शंकरजी मेरी स्तुति कर रहे हैं, बार-बार मुझसे विनय कर रहे हैं । पर अगले ही वाक्य में शंकरजी ने अपना क्षोभ प्रकट कर दिया और वह क्षोभ बड़ा कठोर था -
जिमि यह कथा सुनायहु मोही ।
तिमि जनि हरिहि सुनायहु कबहूँ ।।
अब इससे बढ़कर कथा की बुरी आलोचना हो ही नहीं सकती कि कोई कह दे - यह कथा अब कभी मत सुनाइए, वह सुनने योग्य नहीं है । भगवान शंकर की बात से नारदजी को ऐसा लगा कि उन्हें मुझसे ईर्ष्या हो गयी है, वे नहीं चाहते कि मेरा नाम फैले, इसलिए ये मुझे रोक रहे हैं और कपट की शिक्षा दे रहे हैं ; भगवान के सामने सरल बनना चाहिए या कि कपट करना चाहिए ? भक्ति का लक्षण ही है छलरहित बनना - लेकिन इधर शंकरजी कहते हैं - अगर भगवान विष्णु पूछें तो भी प्रसंग छिपा लीजिए । नारद भक्तिभाव भूल गए । बस, यही मानस-रोगों के सन्दर्भ में एक विडंबना है । संक्षिप्त में इसे यों कह लीजिए कि शरीर के रोगों के संबंध में तो व्यक्ति अपने रोग को स्वीकार कर अपने को रोगी मानता है, लेकिन मन के रोगों के संबंध में सिद्धांत बिल्कुल उल्टा है । मन का रोगी अपने को रोगी न मान सामने वाले को ही रोगी मानता है । नारदजी के साथ यही होता है । वे स्वयं रुग्ण हैं, पर रोगी समझ रहे हैं शंकरजी को ।
जिमि यह कथा सुनायहु मोही ।
तिमि जनि हरिहि सुनायहु कबहूँ ।।
अब इससे बढ़कर कथा की बुरी आलोचना हो ही नहीं सकती कि कोई कह दे - यह कथा अब कभी मत सुनाइए, वह सुनने योग्य नहीं है । भगवान शंकर की बात से नारदजी को ऐसा लगा कि उन्हें मुझसे ईर्ष्या हो गयी है, वे नहीं चाहते कि मेरा नाम फैले, इसलिए ये मुझे रोक रहे हैं और कपट की शिक्षा दे रहे हैं ; भगवान के सामने सरल बनना चाहिए या कि कपट करना चाहिए ? भक्ति का लक्षण ही है छलरहित बनना - लेकिन इधर शंकरजी कहते हैं - अगर भगवान विष्णु पूछें तो भी प्रसंग छिपा लीजिए । नारद भक्तिभाव भूल गए । बस, यही मानस-रोगों के सन्दर्भ में एक विडंबना है । संक्षिप्त में इसे यों कह लीजिए कि शरीर के रोगों के संबंध में तो व्यक्ति अपने रोग को स्वीकार कर अपने को रोगी मानता है, लेकिन मन के रोगों के संबंध में सिद्धांत बिल्कुल उल्टा है । मन का रोगी अपने को रोगी न मान सामने वाले को ही रोगी मानता है । नारदजी के साथ यही होता है । वे स्वयं रुग्ण हैं, पर रोगी समझ रहे हैं शंकरजी को ।
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