Wednesday, 30 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

अहंकार को केन्द्र बनाकर समाज को स्वस्थ बनाने की पद्धति धर्म की पद्धति है। बुद्धि को केन्द्र बनाकर समाज की स्वथ्यता ज्ञान की पद्धति है। चित्त को केन्द्र बनाकर योग की पद्धति है। ह्रदय और मन को स्वस्थ बनाकर समाज बनाने की जो प्रक्रिया है, यही भक्ति की प्रक्रिया है। इसका सांकेतिक रूप से गोस्वामीजी ने रामचरितमानस में बहुत ही मधुर पद्धति में वर्णन प्रस्तुत किया है। उन्होंने मानस में भगवान राम के विविध चित्र प्रस्तुत किये, जो बड़े मधुर और आकर्षक हैं, लेकिन जब भगवान राम ने उनसे पूछा कि इन सारी पद्धतियों में, सारे रूपों में हमारा कौन सा रूप तुम्हें सबसे अधिक प्रिय है ?
          .......आगे कल.......

Tuesday, 29 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

कई लोगों के मन में पध्दति के प्रति इतना अधिक आग्रह हो जाता है कि वह भी एक समस्या बन जाती है। आग्रह ही नहीं होगा तो साधना आगे नहीं बढ़ेगी, पर आग्रह का अतिरेक भी कभी-कभी व्यक्ति को सत्य से वंचित कर देता है। जैसे किसी रोगी को किसी एक चिकित्सा-पद्धति के प्रति ही इतना अधिक आग्रह हो जाय कि उस पद्धति से लाभ न होने पर भी वह उसे न छोड़े, तो यह तो रोग से भी बड़ी समस्या है। मुख्य लक्ष्य क्या है ? स्वथ्यता। तो पद्धति के चुनाव के लिए सबसे बड़ी कसौटी क्या है ? यही कि जिस पद्धति से हमें स्वथ्यता का लाभ हो वही पद्धति हमारे लिए ठीक है। शास्त्र या किसी व्यक्ति के कहने से कि यह पद्धति श्रेष्ठ है, कोई आवश्यक थोड़े है कि वह सबके लिए समान रूप से लाभदायक हो। गोस्वामीजी से पूछा गया कि ये जितने उपाय कहे गये हैं, इनमें सही कौन सा है ? उन्होंने कहा कि सब सत्य है। झूठ तो कुछ है ही नहीं। मैं मानता हूँ कि समस्त ऋषि-मुनियों का, समस्त आचार्यो का अनुभव सत्य है। विभिन्न चिकित्सा-पद्धतियों के द्वारा अगणित लोग स्वस्थ हो रहे हैं, उसी तरह भिन्न-भिन्न साधना-पद्धतियों से लोग स्वस्थ हो रहे हैं तो हम कैसे कहें कि यह पद्धति वैज्ञानिक है और यह अवैज्ञानिक।

Monday, 28 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................

......कल से आगे.......
सीताजी मूर्तिमती भक्ति हैं। त्रिजटा और सीताजी का संवाद भक्ति के संदर्भ में है। भक्तिशास्त्र की मान्यता यह है कि ह्रदय-परिवर्तन के द्वारा ही मोह का विनाश होगा। इसलिए वहाँ पर ह्रदय को केन्द्र बनाकर बात कही गयी और यहाँ संवाद अखण्ड-ज्ञानघन भगवान और जीवरुपी विभिषण के बीच है। नाभिकुण्ड का अभिप्राय क्या है? यही संस्कारों का अमृतकुण्ड है। साधक जिन बुराइयों को मिटाना चाहता है, वे फिर से नये सिरे से रावण की सृष्टि करने में समर्थ होती है, इसलिए विभिषण भगवान से कहते हैं कि आप उसकी नाभि पर बाण का प्रहार कर उसके अमृतकुण्ड को सुखा दीजिए। यह योग का मार्ग है। योगाग्नि के द्वारा चित्त की वृत्तियाँ निरुद्ध हो जाती है, वह निर्विकल्प हो जाता है। चित्त का निर्विकल्प हो जाना ही रावण की मृत्यु है। इस तरह से इन अलग-अलग प्रसंगों में अलग-अलग रूपों में एक ही समस्या के भिन्न-भिन्न समाधान प्रस्तुत किये गये हैं और ये सभी समाधान बड़े उपयोगी हैं, पर मुख्य बात यही है कि इनमें से कौन सी चिकित्सा - पध्दति हमारे लिए ठीक है, हम कहाँ से प्रारंभ करें, इसका चुनाव हमें करना है।

Sunday, 27 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

भगवान  राम विभिषण से पूछते हैं कि विभिषण बताओ ! रावण कैसे मरेगा ? बड़ी विचित्र शैली है गोस्वामीजी की। लोग तो इस बात का बड़ा ध्यान रखते हैं कि आगे-पीछे की बात एक दूसरे से कटनी नहीं चाहिए। इस दृष्टि से तो गोस्वामीजी को विभिषण के द्वारा वही उत्तर दिलवाना चाहिए था, जो त्रिजटा ने सीताजी को दिया, पर बड़ी अद्भुत बात है, जो उत्तर त्रिजटा ने सीताजी को दिया, वही विभिषण ने भगवान राम को नहीं दिया। उन्होंने यह नहीं कहा कि आप रावण के ह्रदय पर प्रहार करेंगे, तब रावण की मृत्यु होगी। बल्कि उन्होंने एक नयी बात कह दी। इसका अभिप्राय क्या है ? मानो गोस्वामीजी बताना चाहते हैं कि त्रिजटा का सत्य भी सत्य है और विभिषण का सत्य भी सत्य है। इन सबमें कोई न कोई सामंजस्य है। इनमें से किस केन्द्र के माध्यम से हम रावण की मृत्यु को मुख्यता देते हैं, इसका निर्णय हम स्वयं अपनी साधना-पध्दति से करें। अन्त में सबका सामंजस्य तो होना ही है।
           भगवान राम विभिषण से पूछते हैं कि बताओ ! रावण कैसे मरेगा ? इसके उत्तर में विभिषण ने न तो सिर को केन्द्र बताया और न ह्रदय को। उन्होंने तो नाभि को केन्द्र बताया। वे बोले कि महाराज ! रावण की नाभि में अमृतकुण्ड है और जब तक यह अमृतकुण्ड नहीं सूखेगा, तब तक रावण न तो सिर काटने से मरेगा, न भुजा काटने से, बल्कि हर बार उसके सिर और भुजाएँ उत्पन्न होती जायेंगी।
            .........आगे कल ......

Saturday, 26 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.................

अपनी समस्या को जीव समझता है और जब ईश्वर और जीव का मिलन होता है तभी समस्या का समाधान होता है। यह सामंजस्य रामायण में बताया गया है -
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा ।
जौं एहि भाँति बनै संयोगा ।।
      इसका अभिप्राय यह है कि व्यक्ति का प्रयत्न -  उसकी तीव्र आकांक्षा और भगवान की कृपा, दोनों का जब सामंजस्य होता है, तभी समस्या का समाधान होता है। इन दोनों में अगर एक की भी कमी रह जाय, व्यक्ति के जीवन में अगर केवल भगवान की कृपा कहने की वृत्ति आ जाय, तो उसमें तमोगुण, आलस्य और निष्क्रियता की वृत्ति भी आ जायेगी और अगर उसमें केवल पुरुषार्थ की वृत्ति आ जाय तो उसके अन्तःकरण में अभिमान की वृत्ति भी आ जायेगी। निष्क्रियता और अभिमान इन दोनों से बचने का उपाय यह है कि पुरुषार्थ व्यक्ति के तमोगुण को दूर करे और भगवान की कृपा उसके अभिमान का नाश करे और इस तरह जीवन में एक सामंजस्य स्थापित हो।

Friday, 25 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

.....कल से आगे....
जब हम भगवान से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि - त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देवदेव।। इस पर भगवान यदि कहें कि अच्छी बात है, चलो ! हम तुम्हारे माता, पिता, बन्धु, मित्र, धन और विद्या सब ले लेते हैं और हमही तुम्हारे सब बन जाते हैं, तो कितने लोग इसके लिए राजी होंगे ? तात्पर्य यह है कि कहीं न कहीं हमारी प्रार्थना में अंतर्द्वन्द है। प्रार्थना तो हम लोग भगवान से नित्य करते हैं, पर क्या हम सच्चे अर्थों में इस प्रार्थना को साकार देखना चाहते हैं ?

Thursday, 24 September 2015

युग तुलसी श्रीरामकिंकर उवाच्...........

......कल से आगे.....
भगवान राम रावण को मारते-मारते थक गये, पर रावण मरता ही नहीं। भगवान भी अभिनय में दिखाते हैं कि यह युद्ध कितना कठिन है। यह बुराइयों के प्रति संघर्ष कोई एक क्षण में समाप्त होने वाली प्रक्रिया नहीं है। यह सतत निरन्तर चलते रहने वाली प्रक्रिया है। इसे हम यह न समझ लें कि एक दिन कोई हवन-पूजन-अनुष्ठान कर दे और सारी समस्या का समाधान हो जाय। वह तो एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, जीवनभर की समस्या है। भगवान राम स्वयं इस नरलीला में थककर विभिषण की ओर देखते हैं। मस्तक पर पसीने की बूँदें आ जाती हैं। ईश्वर तो बड़ा अनोखा है, उसे जीव से पूछना पड़ रहा है कि रावण कैसे मरेगा ? भगवान तो जीव की परीक्षा लेना चाहते थे कि तुम प्रार्थना तो करते थे कि रावण को मार दीजिए, पर क्या तुम वास्तव में चाहते हो कि यह मरे ? यही हमारे जीवन का सत्य है। प्रार्थना तो हम लोग भगवान से नित्य करते हैं कि भगवान ! बुराई को मिटाइए। पर क्या हम सच्चे अर्थों में इस प्रार्थना को साकार देखना चाहते हैं ?
                .......आगे कल.......

Wednesday, 23 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

........कल से आगे ........
सिर कटने का तात्पर्य क्या है ? बुद्धि की नासमझी, भ्रम एवं मोह। अगर समाज और व्यक्ति की बुराई के मिटाना है तो उसकी नासमझी, भ्रम तथा मोह को काट देना होगा, लेकिन समस्या यह थी कि जब भगवान राम रावण का सिर काटते थे, तो ऐसा नहीं था कि उसका कोई प्रभाव न होता हो, रावण का सिर काटकर गिर जाता था, पर अगले ही क्षण बड़ा आश्चर्यजनक दृश्य सामने आता था। रावण को नया सिर निकल आता था और हमारे आपके जीवन का भी यही अनुभव है। बुद्धि से समझ लिया, लेकिन कथा से उठकर बाहर गये नहीं कि रावण का सिर ज्यों का त्यों फिर निकल आया।
           त्रिजटा ने कहा कि सिर के साथ भुजा भी कटे। इसका अभिप्राय क्या है ? भुजा क्या है ? भुजा कर्म का केन्द्र है। सिर विचार का केन्द्र है। समाज में लोगों का विचारपरिवर्तन होना चाहिए यह है रावण का, मोह का सिर कटना और आचरण-परिवर्तन हो जाय, इसका प्रतिक है भुजा कटना। लेकिन जैसे रावण के सिर काटने से फिर से सिर निकल आते थे, वैसे ही भुजाएँ काटने पर फिर से भुजाएँ निकल आती थीं। इसलिए त्रिजटा ने कहा था कि केवल सिर या भुजाएँ काटने से नहीं, इनके साथ ही ह्रदय पर भी प्रहार करना होगा, तब रावण की मृत्यु होगी और आगे चलकर बड़ा अनोखा प्रसंग आ गया।
            .........आगे कल.....

Tuesday, 22 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

रामायण में समन्वय और सामंजस्य है। गोस्वामीजी ने सामंजस्य को स्वीकार किया। रावण सारी समस्याओं का घनीभूत रूप है। उसमें मनोजन्य, बुद्धिजन्य, चित्त की संस्कारजन्य और अहंकारजन्य चारों प्रकार की समस्याएँ विद्यमान हैं और चारों का केन्द्र भी। रावण का सिर कट जाता है, पर वह मरता नहीं। सिर एक केन्द्र है बुद्धि का। सिर में ही मस्तिष्क है और मस्तिष्क से ही मनुष्य विचार करता है। सिर कटना महत्वपूर्ण है। सिर कटने से व्यक्ति मर जाता है, पर रावण नहीं मरता। क्यों नहीं मरता ? और सिर कटने पर नहीं मरा तो कैसे मरेगा ? इसका अलग-अलग उत्तर रामचरितमानस में दिया गया है। रावण के ह्रदय पर प्रहार होगा, तभी वह मरेगा। जब रावण की नाभि में प्रहार होगा तब वह मरेगा। अलग-अलग प्रसंगों में अलग-अलग उत्तर है। त्रिजटा से सीताजी पूछती हैं कि रावण सिर कटने पर भी क्यों नहीं मरता है ? त्रिजटा कहती है कि रावण केवल सिर काटने से नहीं मरेगा। सिर के साथ उसकी भुजाएँ भी कटेंगी और ह्रदय पर भी प्रहार होगा, तब वह मरेगा।  यही है सामंजस्य।
            .........आगे कल......

Monday, 21 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........

कर्मयोग में धर्म का केन्द्र अहंकार है। धर्म में जो हम वर्ण और आश्रमधर्म देखते हैं उसका केन्द्र है व्यक्ति का अहंकार। कर्म सिध्दांत में कहा गया है कि व्यक्ति में "मैं" स्वाभाविक है। यह "मैं" ही सारी समस्या का मूल है। इसे छोड़ना होगा, पर कहना कितना आसान है, "मैं" को छोड़ना उतना आसान नहीं। तब कहा गया कि अगर न छूटे तो उसका सदुपयोग करना चाहिए। उस "मैं" को धर्म की दिशा में मोड़ दिया जाय। एक धार्मिक के "मैं" को एक वर्णाश्रम धर्म के "मैं" में परिवर्तित कर दिया जाय ताकि उस "मैं" का, 'मैं' ब्रह्मचारी हूँ, ऐसा मानकर ब्रह्मचर्य में उसकी निष्ठा हो। 'मैं संन्यासी हूँ', ऐसा मानकर संन्यास में, त्याग में उसकी निष्ठा हो। इसलिए धर्म का केन्द्र 'मैं' है, जहाँ उसके सदुपयोग के द्वारा समाज को सुव्यवस्थित बनाने की चेष्टा की गयी।

Sunday, 20 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

जो योगी थे, उन्होंने समस्या का केन्द्र स्वीकार किया चित्त को। ये सब अन्तःकरण चतुष्टय में अलग-अलग केन्द्र के रूप में चुना गया। व्यक्ति बहुत सी बातों के बारे में समझ लेता है कि ये बातें ठीक नहीं है। भाषण में जब कोई बहुत सुन्दर तार्किक पध्दति से कोई बात कहता है तो सुनकर लगता है कि उसकी बात बिल्कुल ठीक है, लेकिन ठीक लगते हुए भी, समझ में आ जाने के बाद भी, वह जाना हुआ सत्य जीवन में क्यों नहीं उतर पाता ? व्यक्ति की बुद्धि और चित्त में द्वन्द्व है। बुद्धि के द्वारा हम कुछ बातों को समझना चाहते हैं, स्वीकार करना चाहते हैं, पर चित्त वह है, जहाँ पर हमारे संस्कार, पूर्व-पूर्व जन्मों में किए हुए कर्मों के संस्काररुप में संग्रहीत हैं। जो पूर्व जन्मों के अभ्यास और संस्कार हैं और यह जो वर्तमान में बुद्धि के द्वारा जाना गया सत्य है, उनमें टकराहट होती है और उस टकराहट में बुद्धि , जो इस जीवन में सत्य को समझ गयी है, चित्त के संस्कारों और अभ्यासों के सामने परास्त हो जाती है। ज्ञान की शैली है, बुद्धि का शोधन। योग की शैली है - "योगश्चित्तवृत्ति निरोध:"। जब तक हम चित्त को संस्कारों से शून्य नहीं कर लेंगे, तब तक हम कितना भी सुन लें, समझ लें, पर उसे जीवन में नहीं उतार पायेंगे।

Saturday, 19 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

कल से आगे .......
जब ज्ञानी से पूछा गया कि व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या क्या है ? व्यक्ति के पुनर्निर्माण का उपाय क्या है ? तो उन्होंने कहा कि व्यक्ति की बुद्धि में जब तक भ्रम है और जब तक भ्रम का निवारण नहीं होगा, जब तक व्यक्ति में विवेक जाग्रत नहीं होगा, तब तक व्यक्ति भटकता रहेगा, परमानंद की प्राप्ति नहीं कर सकेगा। इसलिए उन्होंने कहा कि अन्तःकरण में सर्वोच्च केन्द्र बुद्धि का है और इसे ही ज्ञानदीपक के रूप में शोधन करके आप अपनी बुद्धि को परिवर्तित करें और उस शुद्ध बुद्धि के द्वारा सत्य का साक्षात्कार करें। हमारे अन्तःकरण में जो ग्रन्थियाँ पड़ गयी हैं, उन ग्रन्थियों से हम इस बुद्धि के द्वारा मुक्त हो जाएँ। इस तरह ज्ञानियों ने बुद्धि को केन्द्र बनाकर विचार किया।

Friday, 18 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

ये जो व्यक्ति की समस्याएँ हैं, इनके संदर्भ में भी अलग-अलग केन्द्रों से विचार किया गया है और व्यक्ति तथा समाज को स्वस्थ बनाने के लिए ज्ञानियों ने एक भिन्न केन्द्र से समाज की स्वथ्यता का उपाय बताया ; फिर भक्तों ने दूसरी पध्दति से ; कर्मयोगियों ने तीसरी पध्दति से और पातंजल योगसूत्र ने चौथी पध्दति से इन पर चर्चा की। इस प्रकार ये जो अन्तःकरण की वृत्तियाँ हैं, उनको केन्द्र बनाकर अगणित प्रकार से व्यक्ति की स्वथ्यता के अलग-अलग उपाय बताये गये।

Thursday, 17 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

ईश्वर के संदर्भ में कहें या जीवन के किसी क्षेत्र के संदर्भ में, एक ही सत्य को विद्वानों ने विविध रूपों में वर्णन किया है, इस सत्य को जान लेने के बाद अन्ततोगत्वा हमें अपने लिए किसी एक का वरण कर लेना पड़ता है और उसी पध्दति के अनुकूल, जैसा कि गोस्वामीजी ने विनय पत्रिका में कहा है ; उनसे पूछा गया कि महाराज ! कौन-सा पुराण ठीक है ? कौन-सा शास्त्र ठीक है ? कौन से मुनि ठीक हैं ? गोस्वामीजी ने बड़ी मधुर बात कही - यदि सबकी बातों को पढ़ें तो ऐसा लगता है कि इनमें तो परस्पर झगड़ा है। तो फिर क्या करें ? क्या यह सब छोड़ दें ? सबको अस्वीकार कर दें ? उन्होंने कहा, नहीं - बस, गुरुजी ने कह दिया कि तू राम नाम लिया कर। मुझे तो लगा कि यही मेरे लिए राजमार्ग है। मैं इसी राजमार्ग से चल पड़ा। इसका अभिप्राय यह है कि आप विवेकपूर्ण इस सत्य को जान लें और आग्रह में न पड़ें कि इनमें से सत्य कौन-सा है ? बल्कि इस दृष्टि से विचार करें कि सत्य का कौन-सा रूप हमारे लिए व्यक्तिगत रूप से और सामाजिक रूप से कल्याणकारी है और उसी को हम जीवन में स्वीकार कर लें।

Wednesday, 16 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

मनु ने भगवान के लिए जो शब्द कहे वह बड़े सार्थक हैं। मनु ने कहा - "सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनू।" आप तो कल्पतरु हैं। हमारी जो कल्पना होगी उसे आप साकार कर देंगे, पर मनु ने उन्हें केवल सुरतरु ही नहीं, कामधेनु भी कहा। वैसे तो कल्पतरु और कामधेनु दोनों का गुण एक ही माना जाता है। दोनों ही कामनाओं और कल्पनाओं को पूरा करते हैं। तो यहाँ कल्पतरु के साथ कामधेनु कहने की क्या आवश्यकता है ? आवश्यकता यह है कि यहाँ प्रार्थना करने वाले दो हैं - मनु और शतरूपा। एक पुरुष और एक स्त्री। तो जहाँ मनु ईश्वर की कल्पना पुरुष के रूप में करते हैं, वहाँ तो वे कल्पतरु हैं और जहाँ शतरूपा उन्हें आदिशक्ति के रूप में, नारी के रूप में कल्पना करती हैं, वहाँ वे कामधेनु हैं। ईश्वर पुरुष है या नारी ? तो वे तो केवल जहाँ एक ओर कल्पतरु हैं, पुरुष हैं; वहीं दूसरी ओर कामधेनु हैं , नारी हैं। आप जो चाहें कल्पना कर लीजिए, उसे पूरा करना उनका स्वभाव है।

Tuesday, 15 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

अगर हम संसार के संदर्भ में कल्पना करें तो शायद वह साकार न हो, पर ईश्वर के संदर्भ में जब सन्तों ने कल्पना की तो उसे ईश्वर ने पूरा किया। अलग-अलग संतों को और आचार्यों को जो अलग-अलग फल दिखाई दे रहा है, इसका अभिप्राय यह है कि उन्होंने जैसी भावना और कल्पना की, ईश्वर के द्वारा उसकी पूर्ति ही हुई। मनु के संदर्भ में साधना के इसी सत्य को प्रकट किया गया है। भगवान मनु के सामने प्रकट नहीं हुए। उन्होंने मनु से पूछा कि तुम क्या चाहते हो ? तो मनु ने पहला वाक्य यही कहा कि मैं आपको देखना चाहता हूँ। फिर भी भगवान प्रकट नहीं हुए और उन्होंने मनु से पूछा कि तुम किस रूप में दर्शन चाहते हो ? इसका अभिप्राय क्या है ? यह कि ईश्वर के रूप और गुण की भावना और कल्पना का निर्णय तो हमें करना है। भगवान कहते हैं, निर्णय करने में मैं समर्थ नहीं हूँ, यह तुम्हें करना है।

Monday, 14 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

रामचरितमानस में एक और दृष्टांत है, जैसे किसी वृक्ष के संबंध में विवाद हो कि यह कौन सा वृक्ष है ? तो निर्णय यह हुआ कि उस वृक्ष के फल से अनुमान करना चाहिए - फलेन परिचीयते। फल को देखकर वृक्ष का पता चल जायगा। तब एक-एक व्यक्ति क्रम से वृक्ष के पास गये और फल लेकर लौटे। लेकिन इससे विवाद का निपटारा नहीं हुआ, क्यों ? जितने व्यक्ति फल लेकर लौटे, उन सबके हाथ में अलग-अलग फल थे और जिसके हाथ में जो फल था, वह उसी का वृक्ष कह रहा था और सचमुच इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता था कि वह स्वयं फल उसी वृक्ष से वह लेकर आ रहा है और परिणाम यह हुआ कि विभिन्न प्रकार के फल लेकर लौटने वाला हर व्यक्ति यह दावा करने लगा कि जो फल उसके हाथ में है, उसी सा वह वृक्ष है। कोई कह रहा था आम का वृक्ष है, कोई कह रहा था अमरूद का है, कोई इमली का, कोई केले का। अंत में किसी संत से पूछा गया। संत ने कहा - भाई ! वह तो कल्पवृक्ष है। उसके नीचे जाकर जिसने जो कल्पना की, उसे वही फल मिला। ईश्वर भी ऐसा ही है। वह कल्पतरु है। अपनी कल्पना ही उसमें दिखाई देती है। वैसे तो कल्पना असत्य को कहते हैं, जिसका कोई अस्तित्व नहीं होता। लेकिन कल्पना जब कल्पतरु से जुड़ जाती है तो सत्य हो जाती है। कल्पतरु की विलक्षणता यही है कि उसमें कल्पना को सत्य करने का सामर्थ्य है।

Sunday, 13 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

बिल्वमंगल जब भगवान राम के मंदिर में गये और उन्होंने भगवान से कहा कि आप बड़े सुन्दर लग रहे हैं, पर जरा धनुष-बाण हटाकर हाथ में वंशी ले लीजिए तो तुरन्त उन्होंने धनुष-बाण त्यागकर हाथ में वंशी ले ली और इसी तरह गोस्वामीजी जब वृंदावन गये और मंदिर में जाकर भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन किया तो उनके सौन्दर्य की प्रशंसा करते हुए बोले कि आप बड़े सुंदर तो लग रहे हैं, पर हाथ में थोड़ा धनुष-बाण ले लीजिए और भगवान वंशी छोड़कर हाथ में धनुष-बाण ले लेते हैं। इस तरह वे तो इतने बढ़िया अभिनेता हैं कि बिल्वमंगल की माँग पर धनुष-बाण छोड़कर वंशी धारण कर लेते हैं और गोस्वामी तुलसीदास की माँग पर वंशी छोड़कर धनुष-बाण धारण कर लेते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि उस ईश्वर को हर व्यक्ति ने अपने अन्तःकरण के मंच पर, अपने जीवन में जिस रूप में देखना चाहा, ईश्वर ने उसकी प्रार्थना स्वीकार करके स्वयं अपने आपको उसी रूप में प्रदर्शित कर दिया। मानो एक अभिनेता में जो विलक्षणता है, वही विलक्षणता ईश्वर में है।

Saturday, 12 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

ईश्वर के संदर्भ में रामचरितमानस में भक्तों ने एक बड़ी मधुर बात कही है। जब वह तर्क-वितर्क चला कि ईश्वर कैसा है तो इसका भी वही समाधान निकला। सभी लोगों ने ईश्वर के अलग-अलग रूपों को बताया। भक्तों ने इसे अकेले दूसरे ढंग से कहा। उन्होंने कहा कि भाई ! इस विषय में बहस करने और उलझने से कोई लाभ नहीं है कि ईश्वर कैसा है ? हमें तो यह निर्णय करना है कि हमें कैसा ईश्वर चाहिए ? हमें जिस ईश्वर की आवश्यकता है, वह तो हमारे संस्कार और रुचि से जुड़ा हुआ है। हम व्यर्थ ही विवाद में पड़कर परस्पर उलझ रहे हैं। हम तो अपनी इच्छानुसार ईश्वर का चुनाव करते हैं। इसलिए जहाँ बहुत से लोग इस विवाद में उलझे रह जाते हैं कि ईश्वर का वास्तविक स्वरूप क्या है ? निराकार है या साकार, निर्गुण है या सगुण, सगुण निराकार है निर्गुण निराकार, एक ही हैं या दोनों या सब ? अब अगर आप इसे भक्त की दृष्टि से देखें तो किस तरह देखेंगे ?

Friday, 11 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................

अगर गहराई से विचार करके देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि किसी न किसी संदर्भ में या किसी न किसी दृष्टि से प्रत्येक मान्यता के पीछे एक बड़ा बल है, एक बड़ा तर्क है। लेकिन इतना होते हुए भी जब हम अपने लिए चुनाव करने चलेंगे तो किसी एक के प्रति आग्रह अवश्य होगा। उसी प्रकार जैसे, एक रोगी यदि यह जान भी ले कि सारी चिकित्सा-पध्दतियाँ समान रूप से उपादेय है, फिर भी अन्त में उसे यह निर्णय करना पड़ता है कि हम इस रोग के लिए किस चिकित्सा-पध्दति का आश्रय लें ? और जिस पध्दति का हम चुनाव करते हैं, उसकी जो मान्यताएँ और औषधियाँ हैं, उन्हें भी हम स्वीकार करते हैं, पर इस चुनाव की भी एक कसौटी है। कसौटी यह नहीं है कि कौन-सी पैथी ठीक है ? बल्कि सबसे कसौटी यह है कि व्यक्ति को स्वस्थता किससे मिलती है ? स्वस्थता ही कसौटी है।

Thursday, 10 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

व्यक्ति के अन्तःकरण में विवेक का उदय हो जाने पर उसके जीवन में आग्रह समाप्त हो जाना चाहिए, लेकिन इस अनाग्रह में एक बड़ी जटिल समस्या है। मान लीजिए ! किसी व्यक्ति का यदि आग्रह हो कि सारी चिकित्सा पध्दतियों में केवल उसी की चिकित्सा पध्दति श्रेष्ठ है, तो यह तो विवेक का लक्षण नहीं माना जाता, किन्तु दूसरी ओर व्यक्ति जब चिकित्सा करने चलेगा, रोग के लिए दवा करने चलेगा तो ऐसी परिस्थिति में उसको किसी न किसी प्रकार का आग्रह स्वीकार करना पड़ेगा। उस प्रकार यहाँ आग्रह और अनाग्रह का बड़ा विचित्र समन्वय है। अभिप्राय यह है कि विवेक में तो अनाग्रही होना चाहिए। इसी अनाग्रह का दर्शन भगवान श्रीरामकृष्ण देव ने विविध साधना पध्दतियों की चरम उपलब्धि के माध्यम से प्रकट किया। उन्होंने बताया कि विविध पध्दतियों के द्वारा उन्हें एक ही सत्य का साक्षात्कार हुआ, लेकिन इतना होता हुए भी व्यक्ति के सामने एक प्रश्न रह जाता है कि जब वह किसी पध्दति का चुनाव करेगा तो यत्किंचित आग्रह किए बिना वह उस पध्दति को स्वीकार नहीं कर सकेगा। यद्यपि आग्रह जहाँ होता तो, वहाँ पर प्रत्येक व्यक्ति यही कहता है कि हमारी जो मान्यता है वही वैज्ञानिक है और दूसरों की अवैज्ञानिक। लेकिन समन्वय का अभिप्राय यह है कि हम पहले यह समझ लें, जान लें तथा मान लें कि सभी पध्दतियाँ सही और वैज्ञानिक हैं।

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

शरीर के रोगों के संदर्भ में जैसे विभिन्न प्रकार की चिकित्सा पध्दतियाँ प्रचलित हैं और प्रत्येक पध्दति की अपनी मान्यताएँ और धारणाएँ हैं, राजनीति के क्षेत्र में भी सामाजिक निर्माण के लिए विविध वाद प्रचलित हैं, इसी प्रकार मनुष्य के अंतःकरण के संबंध में भी विभिन्न प्रकार की पध्दतियों का वर्णन महापुरुषों के द्वारा हमारे शास्त्रों में किया गया है और यदि हम इस दृष्टि से विचार करने बैठें कि इनमें से कौन-सी पध्दति श्रेष्ठ है तो यह एक ऐसा जटिल विवाद है कि जिसका कभी निपटारा ही नहीं हो सकता। विभिन्न विचारकों और महापुरुषों ने अपने-अपने वाद प्रस्तुत किए हैं और ऐसी पध्दति से किए हैं कि अवश्य ही वे बड़े तर्कसंगत प्रतीत होते हैं। ऐसी परिस्थिति में किसी को स्वीकार करें और किसी को स्वीकार न करें, ऐसा संभव नहीं। किन्तु फिर भी व्यक्ति के सामने यह समस्या तो आती ही है कि उसे उन समस्त वादों में से किसी न किसी पध्दति का आश्रय लेना ही पड़ता है। यहाँ पर एक बड़ी जटिल समस्या है कि व्यक्ति के जीवन में आग्रह होना चाहिए या नहीं ? तो उसका उत्तर है कि अनाग्रह ही विवेक की चरम उपलब्धि है - "बुध्देः फलमनाग्रहः" ।

Wednesday, 9 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

जिस प्रकार अनेक प्रकार के पदार्थों के रहते हुए भी व्यक्ति यदि शरीर से स्वस्थ नहीं है तो उनका भोग वह नहीं कर सकता, क्योंकि स्वथ्यता के अभाव में वह किए हुए भोजन को पचा ही नहीं सकेगा। और शरीर को किए हुए भोजन का लाभ तभी मिलता है जब वह पूर्ण रूप से पच जाए। इसी प्रकार यदि व्यक्ति का मन स्वस्थ नहीं है, वह मानस-रोगों से ग्रस्त है तो रामचरितमानस में वर्णित पात्रों और उनके चरित्र की व्याख्या को सांसारिक व्याख्या के रूप में देखेगा। परिणाम होगा कि उसके जीवन में उस कथा का कोई भी लाभ नहीं होगा। क्योंकि इस कथा के नायक श्रीराम तत्वतः ब्रह्म हैं। और वे लोक कल्याण के लिए नर जैसी लीला कर रहे हैं। सगुण साकार के क्रिया-कलापों की आध्यात्मिकता को समझने के लिए व्यक्ति का मन से स्वस्थ होना नितांत आवश्यक है। "सरुज सरीर बादि बहु भोगा" की अर्धाली में इसी सत्य की ओर इंगित किया गया है। पर यदि मन ही अस्वस्थ हो तो शरीर की स्वथ्यता उसे पूर्णानन्द की ओर नहीं ले जा सकती।

Monday, 7 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........

यदि हमारे जीवन में काम, क्रोध और लोभ के ये तीनों विकार संतुलित हैं, तो मानस रोग दूर होते हैं। अतः हम इन तीनों को नियमित और संतुलित करने की चेष्टा करें, उन्हें ऐसी दिशा में मोड़ दें जिससे वे हमारे तथा समाज के लिए कल्याणकारी हो सकें। जो शरीर का रोगी है, वह अकेले ही उस रोग के फल का भोग करता है, पर मन का रोगी दूसरे व्यक्ति को भी रोगी बना देता है। एक व्यक्ति का काम दूसरे में क्रोध की उत्पत्ति करता है। यदि अकेला व्यक्ति कामी बनेगा तो उसकी प्रतिक्रिया में दूसरा व्यक्ति, जिसे हानि होगी, क्रोधी बनेगा। एक लोभी समाज को दरिद्र बना देता है। एक क्रोधी समाज में भय की सृष्टि कर देता है। इस प्रकार एक अस्वस्थ व्यक्ति समाज को भी अस्वस्थ बना देता है यही मानस - रोगों की समस्या है। संतुलित और स्वस्थ समाज के लिए व्यक्ति का मानस-रोगों से मुक्त होना आवश्यक है।

Sunday, 6 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........

प्रश्न यह है कि क्रोध की आवश्यकता है या नहीं ? उसका उत्तर एक प्रतिप्रश्न करके दिया जा सकता है कि घर में अग्नि की आवश्यकता है या नहीं ? व्यक्ति जरा सा भी असावधान हो जाय, तो घर जल जाय, वह स्वयं जलकर मर जाय, पर अग्नि यदि नियंत्रित हो, तो भोजन पकाया जा सकता है। तात्पर्य यह है कि अग्नि की आवश्यकता तो है, पर उसे नियंत्रित होना चाहिए। विवाह के प्रसंग में हम भगवान राम के जीवन में क्रोध का यही नियंत्रित स्वरूप देखते हैं। उन्होंने परशुराम से धीरे से एक वाक्य कह दिया- महर्षि , आपने बहुत दिन तक क्रोध किया, आप ब्राह्मण हैं, आपको क्रोध शोभा नहीं देता, ब्राह्मण के ह्रदय में बहुत अधिक दया होनी चाहिए। आपने कृपा वाले पक्ष को छोड़ दिया है।  भगवान राम की भाषा बड़ी संतुलित है। भगवान राम का तात्पर्य यह है कि जहाँ क्रोध के साथ क्षमाशीलता का नियंत्रण है, ऐसा क्रोध ही रोग को दूर करने में समर्थ होता है। शीलवान का क्रोध अन्याय के, दुर्गुणों के विरुद्ध होगा और सृष्टि के सृजन में उसका उपयोग होगा।

Saturday, 5 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

मानस-रोगों के संदर्भ में एक और बड़े महत्व की बात बतायी गयी है कि रोग की चिकित्सा ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे एक रोग तो घटे पर दूसरा बढ़ जाय। परशुरामजी समाज की अस्वस्थता की चिकित्सा करने के लिए आये थे। उस समय जितने भी महापुरुष थे, वे सभी समाज को स्वस्थ करने की चेष्टा कर रहे थे। विश्वामित्र भी एक महापुरुष के रूप में समाज को स्वस्थ करना चाहते थे और परशुराम भी, फिर महाराज श्री जनक भी। दूसरी ओर रावण जैसे लोग थे, जो समाज में अस्वस्थता का, दोषों का, दुर्गुणों का संचार कर रहे थे। तो, प्रश्न यह आता है कि विश्वामित्र, परशुराम और जनक जैसे लोगों के होते हुए भी भगवान राम को क्यों आना पड़ा ? इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि रोग और राक्षस इतने बढ़े हुए थे कि उनकी कोई सीमा नहीं रह गयी थी, या फिर यह कह सकते हैं कि जो चिकित्सक थे, उनमें कुछ न कुछ अपूर्णता विद्यमान थी, जिसका परिणाम यह होता था कि एक ओर तो व्यक्ति और समाज की रोग दूर होता था, पर दूसरी ओर समाज में एक नया असंतुलन उत्पन्न होता था। परशुरामजी का चरित्र इसका प्रमाण है। वे लोभ के सबसे बड़े चिकित्सक थे। आप देखेंगे कि उनके चरित्र में दो महान गुण थे - एक तो उन्होंने जीवन में कभी राज्यसत्ता का लोभ नहीं किया और दूसरे वे जीवन भर बाल ब्रह्मचारी रहे। इसका अभिप्राय यह है कि वे काम के विजेता थे और लोभ के भी। और उन्होंने चिकित्सा भी ठीक उसी प्रकार से की। लेकिन उनमें क्रोध भरा हुआ था। वे स्वयं कहते हैं मैं बहुत क्रोधी हूँ, तब मानो अपनी अस्वस्थता की सूचना देते हैं। इस प्रकार अपने क्रोध के द्वारा वे समाज में एक दूसरा असन्तुलन उत्पन्न कर देते हैं।

Friday, 4 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

भगवान श्रीराम के अवतार का क्या प्रयोजन है ? आप कह सकते हैं कि भगवान श्रीराम का उद्देश्य राक्षसों का वध करना है, तो यह भी एक उत्तर है। फिर यह भी कह सकते हैं कि समाज में जो अस्वस्थता आ गयी थी, उसे मिटाने के लिए भगवान राम का अवतार हुआ था। ये दोनों उत्तर सही हैं, क्योंकि भगवान राम के चरित्र के द्वारा दोनों ही कार्य पूरे हुए। श्री भरत की मुख्य भूमिका तो मानस-रोगों को विनष्ट करने की है ही, पर भगवान राम के चरित्र में भी आप यह पक्ष पाते हैं कि जो अस्वस्थ व्यक्ति है, मानसिक दृष्टि से रूग्ण हैं, भगवान राम उनकी अपने चरित्र के द्वारा चिकित्सा करते हैं। हम जो रामायण पढ़ते हैं, सुनते हैं, भगवान के चरित्र का पठन-पाठन करते हैं, इस सबका तात्पर्य यह है कि हमारे जीवन में भी वैसी ही समग्रता आवे, जैसी भगवान राम के जीवन में थी ; हमारा अन्तःकरण भी उसी प्रकार का हो जाय जैसा भगवान श्रीराम का था।

Thursday, 3 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................

सांकेतिक रूप से वर्णन आता है कि रावण को मारना बड़ा कठिन है। वह मूर्तिमान मोह है और मोह ही समस्त रोगों के मूल में है। इसलिए भगवान श्रीराम रावण पर जब प्रहार करते हैं तो आप पढ़ते हैं कि उन्हें रावण के तीन केन्द्रों पर प्रहार करना पड़ा - रावण का भुजा एवं सिर काट दिया, उसके हृदय पर प्रहार किया गया और उसकी नाभि पर बाण मारा गया। रावण की मृत्यु के ये तीन केन्द्र हैं। रावण के सिर और भुजाएँ तो कई बार भगवान श्रीराम द्वारा काट डाली गयी थीं, पर हर बार उसके नये सिर और नयी भुजाएँ निकल आती थी। जब भगवान राम ने विभिषण से पूछा कि रावण के तो नये-नये सिर और भुजाएँ निकल आती हैं, इसका क्या उपाय है ? तो विभिषण ने कहा - प्रभु! इसकी भुजा पर ही प्रहार कीजिए और इसके सिर पर भी, पर साथ-साथ आप इन सबके मूलकेन्द्र मन और चित्त पर भी प्रहार कीजिए। भुजा पर प्रहार करने का अभिप्राय यह है कि शरीर के द्वारा जो दुष्कर्म होता है उस पर प्रहार, सिर पर प्रहार करने का अर्थ होता है बुद्धि पर प्रहार। रावण को अपनी बुध्दिमता का जो गर्व था और अपने विषय में जो यह विश्वास था कि मैं अमर हूँ, तो ऐसी बुद्धि और अहंकार को नष्ट करने के लिए उसका सिर काटना होगा। फिर उसके मन में परिवर्तन लाने के लिए उसके हृदय में प्रहार करना होगा, पर इन तीनों के साथ-साथ जब तक इन सबके मूल में - चित्त में जो संस्कार संग्रहीत हैं, उन पर प्रहार नहीं होगा, तब तक चित्त के संस्कार नहीं सुखेंगे, तब तक काम नहीं बनेगा। भगवान राम चारों स्थानों पर प्रहार करते हैं और इस प्रकार रावण की मृत्यु होती है।

Wednesday, 2 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

मनुष्य के मन में जो संस्कार दिखाई देते हैं, उनका मूल चित्त में है। यह चित्त पूर्व-पूर्व जन्मों के संस्कारों को संग्रहीत किये रहता है। तब फिर चिकित्सा कैसे होगी? चिकित्सा का क्रम कैसे चलेगा ? चित्त में संस्कार बनते हैं और चित्त के संस्कार मन पर दोष के रूप में उभरते हैं और मन में जो दोष आते हैं, वे ही क्रिया में प्रकट होते हैं, तो पिछले दिनों जो बात कही गयी थी कि यदि हम बुद्धि के द्वारा बुराई को बुराई समझ लें तथा अपने अन्तःकरण में अहंकार को न आने दें, तो बुराई की समस्या का समाधान हो सकता है। अतः यही ध्यान रखना होगा कि अहंकार और बुद्धि भी कहीं हमारे मन और चित्त के साथी न बन जायँ। मन और चित्त में तो समस्याएँ भरी हुई हैं। चेष्टा यही करनी होगी कि बुद्धि और अहंकार सुरक्षित रहें। रावण का दुर्भाग्य यह है कि उसके चरित्र में बुद्धिजन्य दोष भी आ जाता है, वह जो भी समझता है, उल्टा समझता है, अपने दुर्गुणों को अहंकार की दृष्टि से देखता है और सोचता है कि मैं बिल्कुल ठीक हूँ, मुझ जैसा पण्डित, मुझ जैसा महापुरुष संसार में कोई है ही नहीं।

Tuesday, 1 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

कथा आती है कि कोई संत नौका में बैठकर जा रहे थे। उस नौका में जितने अन्य यात्री थे सब बड़े दुष्ट थे। वे उन संत की खूब हँसी उड़ा रहे थे। हँसी-हँसी में उनमें से एक ने कहा कि संत लोग तो बड़े समत्व में रहते हैं और ऐसा कहकर उनके सिर पर जूता रख दिया। संत ने तो बुरा नहीं माना, पर उनका यह अनादर भगवान से सह्य नहीं हुआ और आकाशवाणी हुई- तुम कहो तो मैं इस नाव को उलट दूँ और सारे दुष्टों को डूबो दूँ। इस बात पर संत ने बहुत बढ़िया बात कही - महाराज! जब आपके मन में उलटने की बात आ गयी है तो मैं कैसे रोकूँ? उलट दीजिए! लेकिन उलटना ही है तो इन लोगों की बुद्धि उलट दीजिए। जिससे इनकी ऐसी वृत्ति ही मिट जाय। नाव उलटना ठीक नहीं। इससे आपकी उलटने की इच्छा भी पूरी हो जायेगी और इनकी बुद्धि भी उलट जायेगी।