Wednesday, 31 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

समुद्र-मंथन के लिए देवताओं ने भगवान से कहा कि महाराज, मन्थन तो हम लोग करेंगे, पर इसके लिए मथानी किसकी बनेगी और मथानी को चलाने के लिए रस्सी कौन-सी होगी ? तो भगवान ने संकेत किया कि मन्दराचल पर्वत को मथानी बनाओ । यह सूत्र बड़े महत्व का है । यह मन्दराचल शब्द बना कैसे है ? मन्दर और अचल, इन दो शब्दों को मिलाकर यह मन्दराचल शब्द बना है । अचल का अर्थ है, जो चलता नहीं, जो डिगता नहीं है । मन्दराचल पर्वत है, वह अचल है, अडिग है । जब उस पर्वत को मथानी बनाया जायेगा तो वह अचल रहेगा या चलेगा । उस मथानी को चलाना होगा । भगवान बड़ी अनोखी बात कहते हैं । मन्दर तो है अचल, अब इस अचल मन्दर को किस तरह चल बनाना है ? यह मन्दर क्या है ? गोस्वामीजी कहते हैं - विचार ही मन्दराचल पर्वत है । विचार के साथ वही समस्या जुड़ी हुई है कि जहाँ विचार आता है, वहाँ पर स्थिरता आ जाती है और विचार जहाँ स्थिरता के रूप में रहे, तो कई लोग यह कहकर प्रशंसा करते हैं कि ये तो अपने विचारों पर अडिग हैं, स्थिर हैं । पर याद रखिए, विचारों का अडिग और स्थिर रहना ही गुण नहीं है, उसे जरा गतिशील भी बनाइए । यह जो विचार है, उसको हम कर्म के साथ जोड़कर गतिशील करें । भगवान का अभिप्राय यह था कि आप कर्म कीजिए, केवल विचार के कारण कहीं आपके जीवन में जड़ता न आ जाए । मनुष्य जब विचारक बन जाता है, तो कभी-कभी उसमें जड़ता आ जाती है ।

Tuesday, 30 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

समुद्र-मंथन का रूपक गोस्वामीजी को अत्यंत प्रिय है, वे कई प्रसंगों में इसका उल्लेख करते हैं और भगवान राम के वन-गमन को भी उन्होंने समुद्र-मंथन के रूप में प्रस्तुत किया है । वेद केे अध्ययन को भी वे समुद्र-मंथन के रूप में ही प्रस्तुत करते हैं । इसका अभिप्राय यह है कि जीवन के विविध क्षेत्रों में यह अमृत-मंथन की प्रक्रिया चलनी चाहिए । भगवान ने कहा - समुद्र में रत्न है, उसे प्रगट करना है । सब कुछ होते भी जब तक उसे प्रगट न किया जाए, तब तक उसका लाभ क्या है ? जैसे पृथ्वी में सोना भी छिपा हुआ है, लोहा भी और कोयला भी, पर जब तक उसे पृथ्वी के अन्तराल से बाहर प्रकट न किया जाए, तब तक उसके होने भर से क्या लाभ ? भगवान कहते हैं कि समुद्र में सारी वस्तुएँ छिपी हुई हैं, तुम सब मिलकर मन्थन करके उसे प्रकट करो । यह मन्थन क्या है ? यही कर्म है । इसका अर्थ है कि व्यक्ति अगर संसार में प्रयत्न नहीं करेगा, पुरूषार्थ नहीं करेगा, कर्म नहीं करेगा और बिना प्रयत्न किये ही वह कल्पना करे कि हम जीवन में अमृतत्व प्राप्त कर लेंगे, तो यह सम्भव नहीं है ।

Monday, 29 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

भगवान विष्णु के साथ कौस्तुभमणि की भी कथा जुड़ी हुई है । उसका रहस्य भी समझ लेने योग्य है । अन्य किसी मणि को धागे में पिरोने के बाद ही उसे धारण किया जाता है । और यह कौस्तुभमणि, जिसे भगवान अपने गले में धारण किए हुए हैं, वह किस धागे में पिरोई हुई है, सोने के धागे में कि चाँदी के धागे में कि सूत के धागे में ? पुराणों में उसका बड़ा अनोखा वर्णन किया गया है । वहाँ संकेत यह है कि कौस्तुभमणि बिना किसी धागे के, बिना किसी सूत्र के, भगवान के गले में लग जाती है । यह बड़ा सार्थक संकेत है । जब हम किसी मणि को धागे में पिरोकर धारण करते हैं, तो उसमें छिद्र करना पड़ता है, पर कौस्तुभमणि निश्छिद्र है और बिना किसी प्रयत्न के इसका भगवान के ह्रदय की ओर आकर्षण है ।

Sunday, 28 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

समुद्र मंथन के समय बाह्य दृष्टि से देखने पर लक्ष्मी के सन्दर्भ में भगवान बड़े स्वार्थी दिखाई दे रहे हैं, क्योंकि उन्होंने लक्ष्मी को स्वयं ले लिया, पर आप श्रीमद्भागवत पढ़िए, जब लक्ष्मीजी निकलीं तो सारे देवता उन्हीं की ओर देखने लगे । लक्ष्मीजी की सखियों ने कहा कि आप जिन्हें चाहें, वरमाला पहनाकर उनका वरण करें । लक्ष्मीजी ने देखा कि प्रत्येक देवता में कुछ गुण हैं तो कुछ दोष भी हैं, पर जब उन्होंने भगवान नारायण को देखा कि वे तो सर्वगुणसंपन्न हैं । उनमें कोई दोष है ही नहीं । सखियों ने पूछा कि क्या इनमें भी कोई दोष है ? लक्ष्मीजी बोलीं, नहीं, पर इनके प्रति मेरे मन में एक उलाहना अवश्य है । क्या ? बोलीं, सारे देवता मेरी ओर देख रहे हैं, मुझे पाने को लालायित हैं, पर ये ही अकेले ऐसे हैं, जिनकी दृष्टि मेरी ओर नहीं है । मैं तो सोचती हूँ कि इन्ही के गले में वरमाला डाल दूँ । बड़ी सांकेतिक भाषा है । यहाँ अभिप्राय यह है कि जो लक्ष्मीजी को चाहने वाले हैं, उन्हें यदि वे मिलेंगी, तब तो वे उसे संचित करके रखने की ही चेष्टा करेंगे, पर जिनके जीवन में लक्ष्मी के प्रति आसक्ति नहीं है, उन्हें जब वे मिलेंगी, तो उससे लोक-कल्याण होगा ।

Saturday, 27 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
वस्तुतः भगवान द्वारा अमृत-वितरण करते समय जो पक्षपात दिखाई देता है, वह केवल बहिरंग दृष्टि से दिखाई देनेवाली विषमता है । समान रूप से वितरण कर दिया जाए, यह सूत्र तो बड़ा आकर्षक प्रतीत होता है, परन्तु बिना परिणाम का विचार किये, यदि समान वितरण किया जाए तो वह समान वितरण कल्याणकारी नहीं होगा । अतः भगवान विष्णु के वितरण में जो पक्षपात दिखाई देता है, वह केवल स्थूल दृष्टि से दिखाई देता है, अन्तरंग दृष्टि से नहीं । उसमें संकेत क्या था ? भगवान नारदजी पर हँसते हुए बोले, नारद, तुम कहते हो कि मैंने शंकरजी को जहर पिला दिया, लेकिन जिनको मैंने जहर पिलाया, उन्होंने तो मुझे कभी उलाहना नहीं दी और तुम उनका पक्ष लेकर उलाहना दे रहे हो । विचार करके देखो, असुरों का और समाज का भी कल्याण तो उनकी मृत्यु में ही है । इसलिए असुरों को अमृत नहीं मिलना चाहिए और शंकरजी को विष मिला लेकिन विष को विष तब कहते हैं, जब वह व्यक्ति को मार दे, पर इस विषपान के द्वारा तो शंकरजी की महिमा और भी प्रकट हो गई कि संसार के अन्य देवता तो अमृत पीकर अमर हुए मगर शंकरजी ने तो विष को भी अमृत बना लिया, वे तो विष पीकर अमर हो गए ।

Friday, 26 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

यदि दैत्य अमर हो जाए, तो क्या इससे उसका कल्याण होगा ? रामायण में तो रावण के बारे में आपको यही सूत्र मिलेगा । विभीषण ने आकर भगवान राम को सूचना दी कि महाराज ! रावण एक यज्ञ कर रहा है । भगवान बोले यह तो बड़ी शुभ सूचना है । यज्ञ को ध्वंस करनेवाला यज्ञ कर रहा है । विभीषण ने कहा - पर महाराज ! इस यज्ञ का फल यह होगा कि रावण अमर हो जाएगा । अब यह अमर हो जाना अच्छी बात है या बुरी ? भगवान राम ने पूछा कि तुम्हें क्या लगता है ? तो विभीषण द्वारा रावण के लिए एक शब्द प्रयोग किया गया, कहा कि इस यज्ञ के सिद्ध हो जाने पर वह अभागा मरेगा नहीं । यदि वह अमर हो जाता है तब तो उसे भाग्यशाली कहना चाहिए, पर वे कहते हैं कि महाराज, वह अभागा नहीं मरेगा । इसका अर्थ क्या हुआ कि अमर होकर वह सबको मारेगा । एक व्यक्ति यदि अमर होकर लाखों को कष्ट दे, उन्हें मारे, तो इस अमरता में किसका कल्याण है ? किसी का नहीं । उसमें संकेत यह था कि रावण के मरने में उसके स्वयं का भी कल्याण है और समाज का भी । क्यों ? इसलिए कि रावण मरेगा, तो मैं जानता हूँ आप उसे मुक्ति अवश्य देंगे । कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनकी अमरता समाज केे लिए और स्वयं उनके लिए बड़ी दुखदायी होती है । उनकी मृत्यु स्वयं उनके और समाज के लिए भी कल्याणकारी है ।

Thursday, 25 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

पुराणों में जिनका राक्षसों या दैत्यों के रूप में वर्णन किया गया है और जिन्हें हम खलनायक या दुर्गुण-दुर्विचारों के रूप में देखते हैं, उनके जीवन में भी अमृत या सद्गुण पक्ष दिखाई देते हैं । उनके विषय में कभी-कभी बड़े जोर-शोर के साथ इस पक्ष पर बल दिया जाता है । किसी ने तो गोस्वामीजी पर ऐसा भी आक्षेप किया कि वे श्रीराम के इतने पक्षपाती थे कि उन्होंने रावण के महान गुणों का वर्णन ही नहीं किया, उनकी महानता का उल्लेख ही नहीं किया । ठीक है, परन्तु गोस्वामीजी ही क्यों, यह पक्षपात तो भगवान विष्णु से शुरु हो गया । नारद जब रुष्ट हुए, तो भगवान पर यही आक्षेप किया कि तुम्हारे जैसा विचित्र बँटवारा करनेवाला दूसरा कोई नहीं होगा । जब परिश्रम देवता और दैत्य ने समान रूप मिलकर किया है, तो पुरस्कार का अमृत का बँटवारा भी तो बराबरी का ही होना चाहिए या नहीं ? पर तुमने प्रयत्न यही किया कि अमर देवता ही हों, दैत्य अमर न हो सकें । अब यह भगवान का पक्षपात है या नहीं ? लोकहित के लिए इस प्रकार का पक्षपात आवश्यक है या नहीं ? इसके अंतरंग तत्व पर विचार करें तो लगेगा कि इसका तात्पर्य बिल्कुल ही भिन्न है और यही जीवन का सत्य भी है । क्या जीवन में समान परिश्रम करने पर भी प्रत्येक व्यक्ति को एक ही स्थिति प्राप्त होती है ? मनःस्थिति की दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति एक ही जैसा कर्म करे तो क्या उन्हें एक जैसा ही फल मिलता है ? नहीं मिलता । अभिप्राय यह कि केवल समान श्रम का नहीं, बल्कि वस्तुतः पात्रता का महत्व है । भगवान का तात्पर्य यह था कि जिसे अमृत प्राप्त नहीं होना चाहिए उसको यदि अमरता मिल जाए तो यह न तो समाज के लिए हितकर होगा और न ही उसके लिए ही ।

Wednesday, 24 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

जिन्हें हम सद्गुण कहते हैं, जैसे निर्भयता, यदि यह निर्भयता देवता की वृत्ति में उदित हो, तो वह समाज के लिए बड़ा हितकर होगा, परन्तु देववृत्ति वाले निर्भय हों या न हों, पर दैत्यवृत्ति वाले तो प्रारंभ से ही निर्भय दिखाई देते हैं । इसलिए बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो जाती है । कहीं किसी गाँव में डाका पड़ता है, तो दस-बीस डाकू आकर अपनी निर्भयता के कारण पूरे गाँव को लूटकर ले जाते हैं; परन्तु गांववाले बेचारे भले आदमी हैं, उनमें डाकुओं जितनी निर्भयता की वृत्ति नहीं है, इसलिए लूट लिए जाते हैं । अतः समस्या यह है कि गुण कहीं किसी ऐसे व्यक्ति को प्राप्त न हो जाए, जो उसका दुरुपयोग करे ।

Tuesday, 23 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

समुद्र-मंथन के संदर्भ में जो रूपक सामने आया है, उसमें एक सामंजस्य का स्वरूप प्रस्तुत किया गया है । अमृत की आवश्यकता देवता और दैत्यों दोनों के अन्तःकरण में विद्यमान है और दोनों ही पक्ष अमृतत्व प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करते दिखाई देते हैं । पर अन्तर यही है कि देवता जिस अमृत को भगवान की सहायता और सत्कर्म के मार्ग से पाना चाहते हैं, वहीं पर राक्षसों के समक्ष मार्ग की समस्या को लेकर कोई द्वन्द नहीं है । उन्हें तो अमृत चाहिए । चाहे जिस मार्ग से और जैसे भी । भगवान ने प्रयास यह किया कि सद्गुणों के रूप में जो देवता हैं, वे तो अमर हो जायें और दुर्गुण रूप राक्षसों का विनाश हो जाय । सांकेतिक भाषा है कि जीवन में प्रयत्न यह करना है कि हमारे जीवन में सद्गुण तो अमर हो जाएँ, पर दुर्गुण न अमर हो सकें ।

Monday, 22 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

विचार के द्वारा कर्म की उपेक्षा हो या कर्म का परिणाम विचार की उपेक्षा हो, तो ये दोनों ही व्यक्ति और समाज के जीवन में अधूरे सत्य के परिचायक हैं । इसके पीछे एक रहस्य है और रामायण और महाभारत में भी इस सत्य की ओर ध्यान दिलाया गया है । महाभारत में कर्ण और अर्जुन दोनों सगे भाई हैं, महाभारत में कर्ण सूर्य के पुत्र हैं और अर्जुन इन्द्र के । वहाँ दोनों भाइयों का जन्म एक ही माता के गर्भ से हुआ । दोनों सगे भाई थे, अतः दोनों में घनिष्ठ प्रेम होना चाहिए था। रामायण में भी बालि और सुग्रीव दोनों सगे भाई हैं, अतः उनमें परस्पर प्रेम होना चाहिए था, परन्तु महाभारत में समस्या यह आती है कि अर्जुन और कर्ण में टकराहट है और रामायण में भी यद्यपि बालि और सुग्रीव प्रारंभ में तो जुड़े हुए थे, परन्तु आगे चलकर उनमें भी भेद उत्पन्न हो गया, शत्रुता पैदा हो गई । रामायण और महाभारत दोनों में ये जो दृष्टांत हैं, ये जीवन के इसी सत्य को प्रकट करते हैं और यह समस्या बड़ी जटिल है कि कर्म और विचार कैसे एक दूसरे के पूरक हों । कर्म और विचार तो सगे भाई के समान हैं, परन्तु जब वे प्रेम के साथ एक-दूसरे के पूरक होकर रहें, तभी व्यक्ति के जीवन को सच्चे अर्थों में पूर्ण कहा जा सकता है ।

Sunday, 21 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

साधारण परम्परा की दृष्टि से देखें, भगवान श्रीराघवेन्द्र द्वारा सुग्रीव को राज्य देना और अंगद को युवराज बनाना उपयुक्त नहीं लगता, क्योंकि प्राचीन परम्परा के अनुसार तो राज्य आनुवांशिक परम्परा से प्राप्त होता था । ऐसी परिस्थिति में जब कोई सिंहासन पर बैठता था, तो उसका पुत्र ही युवराज के पद पर अभिषिक्त किया जाता था । यहाँ पर भगवान उसे एक दूसरे ही रूप में प्रस्तुत करते हैं । वे राज्य पद तो सुग्रीव को देते हैं, पर राज्य की परम्परा को सुग्रीव के वंश से न जोड़कर बालि के पुत्र अंगद को युवराज बनाने की आज्ञा देते हैं । यदि आध्यात्मिक दृष्टि से विचार करें, तो भगवान का अभिप्राय यह है कि सुग्रीव सूर्य के पुत्र हैं । सूर्य प्रकाश है, विचार है, ज्ञान है और बालि इन्द्र का अंश है, वह पुण्य तथा सत्कर्म का प्रतीक है । बालि में अभिमान था, परन्तु अंगद ऐसे सत्कर्म और पुण्य का प्रतीक है, जिनमें अभिमान की वृत्ति नहीं है । इसका आध्यात्मिक तात्पर्य यह है कि ज्ञान और सत्कर्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं, अपितु पूरक हैं । बहुधा समाज में एक बड़ा विचित्र विरोधाभास दिखाई देता है, जो व्यक्ति अधिक कर्तव्यपारायण होते हैं, वे प्रायः विचार को अनुपयोगी मानकर उससे भागते हैं और कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो बहुत विचार करते हैं, पर कर्म के प्रति उनकी हेय दृष्टि होती है या कर्म में उनकी वृत्ति नहीं होती ।

Saturday, 20 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

बालि सर्वश्रेष्ठ पुण्य का प्रतीक है, क्योंकि इन्द्र का पद सर्वश्रेष्ठ पुण्यात्मा को प्राप्त होता है । पर उस पुण्य के साथ अभिमान जुड़ा हुआ है । बालि के पुत्र होने के नाते अंगद में बालि का वह पुण्य का अंश तो है, पर उसका पुण्याभिमान पूरी तरह से मिट चुका है । ऐसी स्थिति में यह कह सकते हैं कि अंगद बालि के पुण्य का परिशुद्ध रूप है, क्योंकि उसमें अभिमान का मैल नहीं है और पुण्य के परिणामस्वरूप विनम्रता का गुण भी अंगद में विद्यमान है । इसलिए बालि के देहत्याग के बाद भगवान श्रीराम लक्ष्मणजी को आदेश देते हैं कि वे किष्किन्धा जाकर सुग्रीव का राजतिलक करें और अंगद को युवराज पद दें । और इतना ही नहीं, बाद में जब वे सुग्रीव को आदेश देते हैं कि तुम किष्किन्धा का राज्य चलाओ, तो यह कहना नहीं भूलते कि ध्यान रहे कि किष्किन्धा का राज्य तुम्हें अकेले नहीं, अंगद को साथ लेकर उसकी सहमति से चलाना है ।

Friday, 19 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

अंगद बालि का पुत्र है, पर अंगद में एक विशेषता है । बालि जीवनभर स्वयं को अभिमान से मुक्त नहीं कर सका । बल्कि यों कह सकते हैं कि बालि जैसे सद्गुण संपन्न व्यक्ति का सबसे बड़ा दोष उसका अभिमान था । बालि अपने जीवन के अंतिम क्षणों में उस अभिमान का परित्याग करने में समर्थ होता है । वह अपने अहंकार को भगवान के चरणों में अर्पित कर देता है और ममता के केन्द्र अपने पुत्र अंगद को भगवान के सामने उपस्थित करता है । अंगद की प्रशंसा करते हुए बालि ने सबसे पहले यही कहा, प्रभो ! मेरा यह पुत्र बड़ा विनयी और बलवान है । विनयी और बलवान इन दोनों शब्दों के प्रयोग करने में बालि का तात्पर्य यह था कि कई लोग बड़े विनम्र तो होते हैं, पर स्वयं निर्बल होते हैं । अतः संसार में प्रायः निर्बलों में ही विनम्रता देखी जाती है और दूसरी ओर जो बलवान होते हैं उनमें बहुधा अपने बल का गर्व है । बल और विनय का सामंजस्य बड़ा ही दुर्लभ है । पर बालि ने अंगद की जो समीक्षा प्रस्तुत की, उसमें यही कहा कि महाराज ! यह विनयी भी है और बलवान भी ।

Thursday, 18 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

प्रभु जब सुवैल शैल पर विश्राम करने लगे, तो दो लोगों को अपने सिरहाने बैठाया और दो को चरणों में । सुग्रीव की गोद में प्रभु का सिर है, विभीषण कान के पास बैठे हैं, प्रभु का एक चरण अंगद की गोद में है और दूसरा हनुमानजी की गोद में । किसी ने पूछा, प्रभो ! यह जो बैठने का क्रम है, इसमें भी तो कोई उद्देश्य होगा ? भगवान बोले, मैंने पदों का बँटवारा कर दिया है । कैसे ? बोले, एक जो लंका का राजपद था, वह विभीषण को दे दिया । दूसरा जो किष्किन्धा का राज्य था, वह सुग्रीव को दे दिया, पर ये अंगद और हनुमान तो मेरा ही पद चाहते हैं, अतः इन्हें अपना ही पद दे दिया है, क्योंकि उन्हें अन्य किसी पद की अभिलाषा नहीं है ।

Wednesday, 17 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...

जब साक्षात भगवान बालि से जीवित रहने के लिए कहते हैं तब बालि ने मना कर दिया और कहा कि एक वरदान आप मुझे अवश्य दीजिए, जन्म-जन्मांतर में आपके चरणों में मेरा प्रेम बना रहे । भगवान भाव-विभोर हो जाते हैं । पहले बालि से सुग्रीव हारा, फिर भगवान से बालि हारा, पर अन्त में अब बालि से भगवान हार जाते हैं । इस देहाभिमान से मुक्ति, अहम् का ऐसा त्याग कि जीवन में रंचमात्र भी ममता न हो । बालि ने अपनी अहंता और ममता का सर्वश्रेष्ठ उपयोग किया । अहम् था शरीर में और ममता थी अपने बेटे में । उसने दोनों को दो स्थानों में लगा दिया । अपनी अहंता को बालि ने देहाभिमान से मुक्त होकर अपने प्राणों की माला भगवान के चरणों में चढ़ा दी । और अंगद का हाथ प्रभु के हाथ में देकर बोले, यह मेरी ममता रहे आपके कर-कमलों में ।

Tuesday, 16 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

जब भगवान राम ने बालि से जीवित रहने के लिए कहा तब बालि के विचार और भावुकता दोनों इतने अद्भुत रूप से सामने आईं कि उन्होंने मना कर दिया । उन्होंने दो कारणों से भगवान का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया । एक तो उनको लगा कि मैं जीवित रहकर प्रभु के लिए समस्या पैदा करुँगा । क्या ? बोले कि वे सुग्रीव को कह चुके हैं कि बालि को मैं एक ही बाण से मारूँगा और वह बेचारा न जाने कब से सिंहासन पर बैठने की कल्पना कर रहा होगा । मैं जीवित रहा, तो प्रभु का वचन पूरा नहीं होगा । उनका वचन पूरा होना चाहिए । दूसरी बात यह कि बालि ने प्रभु से कहा, प्रभो, आप मुझसे जीवित रहने के लिए कह रहे हैं, तो समझ गया कि आप मुझसे पूरी तरह से प्रसन्न नहीं हैं । भगवान बोले कि बालि, यह तुम क्या कह रहे हो ? ईश्वर कह रहा है कि तुम जीवित रहो और तुम कह रहे हो कि ईश्वर प्रसन्न नहीं है । बालि ने कहा कि नहीं, महाराज ! शायद आपको लगता होगा कि मैं 'अहम्' के केन्द्र बने हुए इस देह को ही सब कुछ मानता हूँ । क्योंकि व्यक्ति जब वह 'मैं' कहता है, तो वह 'मैं' को शरीर रूप में देखता है । तो प्रभो, भले ही मैं कभी देहाभिमानी रहा होऊँ, पर आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि अब ऐसी बात नहीं है । बालि ने कहा कि महाराज, यदि आपको लगता है कि अब भी मेरे पाप बचे हुए हैं, तो मैं चाहता हूँ कि मेरा जन्म हो, परन्तु एक वरदान आप मुझे अवश्य दीजिए, जन्म-जन्मांतर में आपके चरणों में मेरा प्रेम बना रहे ।

Monday, 15 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

भगवान जब भी अंगद को याद करते हैं, उन्हें बालि की याद आ जाती है और इसलिए वे अंगद को बालिपुत्र कहकर ही सम्बोधित करते हैं । बालि जीवनभर विजेता रहा और अन्त में भी वह सुग्रीव से बाजी मार ले गया । कैसे ? जब बालि ने भगवान से पूछा कि मेरा अपराध क्या है । भगवान ने कहा कि तुम बड़े अभिमानी हो । तब बालि ने बड़े कोमल शब्दों में भगवान से केवल यही निवेदन किया कि प्रभो, मैं अभिमानी तो अवश्य था, पर आपके सामने आने के बाद भी, आपका बाण लगने के बाद भी क्या मैं अभिमानी बना हुआ हूँ ? और यदि बना हुआ हूँ तो इसका अर्थ यह हुआ कि अभिमान आपसे बड़ा है । आपकी विलक्षणता तो यही है न कि आपके सम्मुख होते ही अभिमान नष्ट हो जाता है ? तो फिर बताइए कि क्या मैं अभिमानी हूँ ? भगवान बालि की बात सुनकर तत्काल समझ गए और उन्होंने बालि के मस्तक पर हाथ रखकर कहा कि नहीं, नहीं, मैं अपनी योजना वापस लेता हूँ, अब मेरी इच्छा तुम्हें मारने की नहीं है, मैं चाहता हूँ कि तुम शरीर से अचल हो जाओ, शरीर की रक्षा करो । कितना बड़ा प्रलोभन है ? व्यक्ति में मृत्यु से बचने का प्रलोभन कितना बड़ा होता है ? और जब साक्षात भगवान बालि से जीवित रहने के लिए कह रहे हैं । परन्तु बालि के विचार और भावुकता दोनों इतने अद्भुत रूप से सामने आईं कि उन्होंने मना कर दिया ।

Sunday, 14 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

सुग्रीव के जीवन में बीच-बीच में एक-एक कमी दिखाई देती है और वह क्रमशः दूर होती जाती है, पर बालि के चरित्र में मानो एक क्षण में सब कुछ हो गया । उसकी छाती पर जब भगवान का बाण लगा, तो क्षणभर में कितना बड़ा परिवर्तन हो गया । उसने एक ऐसी लम्बी छलाँग लगाई कि सुग्रीव को जो जीवनभर में नहीं मिला, वह उसे क्षणभर में मिल गया । इसका सूत्र यह है कि अहंता और ममता यानि 'मैं' और 'मेरा' का भाव जीवन में दो ही चीजों का त्याग सबसे कठिन है - जो व्यक्ति अहम् और मम से मलिन है, उसके लिए ब्रह्मसुख अगम है ।

Saturday, 13 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनके जीवन में बिना भय के प्रीति नहीं होती है । ऐसे लोगों के जीवन में प्रेम लाने के लिए भय का उपयोग करना चाहिए । भय करना बुरा है, भय नहीं करना चाहिए, ऐसा कहकर भय से छुटकारा नहीं पाया जा सकता । जिनकी प्रकृति ही ऐसी बनी हुई है, उनके लिए भय से मुक्ति का कोई उपाय नहीं है, पर इसका भी सदुपयोग है । सुग्रीव के चरित्र में भय का यह रूप भी दिखाई देता है ।

Friday, 12 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

सुग्रीव को राज्य मिला, पत्नी मिली, यह सब मिठाई थी, पर भोगों में पड़कर जब वे रोगग्रस्त हो गए, तो भगवान ने लक्ष्मणजी को भेजा कि अब तो दवाई देनी पड़ेगी और भगवान को उस समय बालि की ही याद आ गयी । उन्होंने कहा, जिस बाण से मैंने बालि को मारा, उसी से कल मैं सुग्रीव को भी मारूँगा । लक्ष्मणजी बोले, यह कार्य आप मुझे सौंप दें, मैं अभी जाकर उसे मार देता हूँ । प्रभु ने कहा, क्या तुम सोचते हो कि मैं सचमुच उसे मारने की योजना बना रहा हूँ ? लक्ष्मणजी बोले कि प्रभो ! अभी तो आप यही कह रहे थे । भगवान बोले, मैं इसलिए कह रहा था कि यह सुनकर डर के मारे शायद वह रास्ते पर आ जाए । सुग्रीव को मिठाई तो बहुत मिल गई, अब इस बाण की कड़वी दवा से उसके ह्रदय में, उसके जीवन में परिवर्तन हो, इसलिए मैंने ऐसा कहा । लक्ष्मणजी ने पूछा, प्रभो ! अब करना क्या है ? भगवान बोले कि भय के कारण ही तो सुग्रीव भक्त बना था । बालि को मिटा दिया तो उसका भय दूर हो गया और इसका परिणाम यह हुआ कि अब मुझे ही भूल गया, उसका स्वभाव अब भी वैसा ही है । जाओ, थोड़ा-सा डर उसमें फिर पैदा कर दो, वह फिर भक्त बन जाएगा । लक्ष्मणजी प्रसन्न होकर चलने लगे, तो सुग्रीव के डरपोक और भगोड़े स्वभाव को ध्यान में रखकर भगवान बोले, लक्ष्मण ! जरा ध्यान रहे, वह जितना डरपोक है, उतना भगोड़ा भी है । ऐसा न डराना कि वह दूसरी ओर भाग खड़ा हो, बल्कि ऐसा डराना कि इधर ही आए । इसी में डर का सदुपयोग है । भगवान कहते हैं - भय भय के लिए नहीं है, भय का उपयोग प्रेम के लिए है ।

Thursday, 11 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

सुग्रीव के चरित्र में साधना की दृष्टि से एक क्रमिक विकास है । इसके बाद भी उसके चरित्र में समस्याएँ आती हैं । बालि का वध करने के बाद भगवान ने सुग्रीव को किष्किंधा का राज्य दे दिया, पर राज्य देते समय उन्होंने सुग्रीव को सावधान कर दिया ।बोले, एक बात याद रखना, सीताजी का पता भी लगाना है, इस बात को मत भूलना और भगवान ने ये सुग्रीव से ही नहीं हम सब लोगों से भी कहा है कि राज-काज, स्त्री, परिवार तो सब मिल गया, पर यह मत भूलना कि लक्ष्य जो है वह ये सब नहीं है, लक्ष्य है भक्तिरूपा सीताजी का पता लगाना । लेकिन राज्य पाकर सुग्रीव एक बार फिर भूल गये । तब हनुमानजी और लक्ष्मणजी द्वारा भय दिखाकर उन्हें लौटाना पड़ा । इस तरह सुग्रीव के जीवन में मिठाई और कड़वी दवाई, दोनों का प्रयोग किया गया ।

Wednesday, 10 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

बालि से लड़ने के लिए सुग्रीव प्रभु का बल लेकर गये, तो बेचारे हार क्यों गये ? यदि आप दूध लेने को फूटा लोटा लेकर किसी के पास जाएँ और वह उसे दूध से भर दे, पर घर आते तक सारा दूध बह जाए, तो देनेवाले का क्या दोष ? सुग्रीव जब लड़ने चला तो वह भी सोचने लगा कि बालि इतना बलशाली है, क्या केवल भगवान के बल से हम उसे हरा पायेंगे ? उसे भगवान के बल पर भी सन्देह हुआ और उसने एक चतुराई की । उसने सोचा कि ठीक है, भगवान का बल तो है ही, उसमें थोड़ा-सा अपना छल भी मिला दें, यह छल ही सबसे बड़ा छेद है । अपना छल पहले, ईश्वर का बल बाद में, मानो सुग्रीव का विश्वास स्थिर नहीं है, उसमें छल-छिद्र है और उस छिद्र वाले बर्तन में इतना बल दिया, इतनी कृपा दी, फिर भी उसने सब खो दिया, बालि से हार गया । इस संघर्ष में बालि विजयी हुआ, तब सुग्रीव के मन में निराशा हुई और भगवान के प्रति अनन्य शरणागति का भाव उदय हुआ । लगा कि प्रभो,  अब तो आप ही मुझे बचा सकते हैं, आप ही मेरी रक्षा कीजिए । भगवान ने बाण चलाया और सुग्रीव की रक्षा हो गई ।

Tuesday, 9 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी ने बालि के सन्दर्भ में व्यंग्य करते हुए लिखा, जब वह सुग्रीव की गर्जना सुन उसको मारने चला तो गोस्वामीजी यह नहीं लिखते हैं कि ज्ञानी बालि या भावुक बालि चला, अपितु वे लिखते हैं कि अभिमानी बालि चला । उसके व्यवहार से पता चल गया कि उसे कितना अभिमान है । अभिप्राय है कि हमारे ज्ञान और भावना की कसौटी तो हमारा व्यवहार है । यदि बालि की समझ में आ गया है कि श्रीराम साक्षात ईश्वर हैं, तब तो उसे यही अनुभव करना चाहिए कि भगवान की कृपा मेरे ऊपर है, तो सुग्रीव के ऊपर भी है । बालि के जीवन में ज्ञान सुग्रीव से अधिक है, ईश्वर के प्रति भावना भी अधिक है, मगर उसके जीवन में जो परिणाम निकलना चाहिए था, वह नहीं निकल रहा है । सुग्रीव पर प्रहार करके, उसे हराकर वह बड़ी प्रसन्नता का बोध कर रहा है ।

Monday, 8 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

....कल का शेष.....
जिसे हम बालि का दुर्बल पक्ष कहते हैं, वह उसके द्वारा तारा को कहे गए दो वाक्यों से प्रकट होता है । उनमें से एक विचारमूलक है और दूसरा भावनामूलक, लेकिन दोनों का जो निष्कर्ष निकला, वह सही नहीं था । ब्रह्म तो वस्तुतः सम है । श्रीराम ब्रह्म हैं, वे सम हैं । तुम चिन्ता मत करो कि वे सुग्रीव का पक्ष लेंगे और मेरा विरोध करेंगे । 'ईश्वर सम है' यहाँ तक उसका कहना बिल्कुल ठीक है, पर इसका यह निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं है कि वे सुग्रीव का पक्ष नहीं लेंगे । उसके वाक्य में एक गुण है, तो एक दोष भी है । वह तारा से भावुकता के स्वर में दूसरी बात यह भी कहता है, यदि तुम्हें लगता है कि वे मुझे मार देंगे, तो भी तुम्हें चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं, यदि ईश्वर मुझे मार भी देगा, तो मैं तो धन्य हो जाऊँगा । इस प्रकार एक तो ईश्वर सम है और यदि नहीं भी है तो उसके प्रहार में कृपा हो सकती है, इन दोनों बातों का ज्ञान बालि के जीवन में है । इस अर्थ में वह सुग्रीव की अपेक्षा ईश्वर से अधिक निकट है । पर कमी उसमें इस अर्थ में है ? ईश्वर सम है, इस ज्ञान का यदि हम यह अर्थ लें कि ईश्वर पाप और पुण्य में सम है, अतः मनमाने पाप करो, चिन्ता की कोई बात नहीं, तब तो ईश्वर का समत्व समाज के लिए बड़ा घातक सिद्ध होगा । इसी प्रकार भगवान के बाण के प्रहार में कृपा दिखे, तो इस सिद्धांत का यह अर्थ तो नहीं होता कि हम यही चेष्टा करें कि हम अनुचित कार्यों में लगें रहें और यह मानें कि भगवान हमें मारेंगे भी तो भी कृपा ही होगी । भगवान तो रावण पर भी कृपा करते हैं, तो क्या हमें रावण ही बनना चाहिए । कृपा की यह व्याख्या उचित नहीं है ।

Sunday, 7 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

बालि और सुग्रीव में एक अनोखा अन्तर है । सुग्रीव जिस बात को बहुत कठिनाई से समझ पाए थे, बालि उसे न जाने कब से जानता था । श्रीराम के ईश्वरत्व को पहचानने में सुग्रीव को समय लगा । परन्तु लगता है कि बालि भगवान से भलीभाँति परिचित है । जब वह सुग्रीव से लड़ने चला तो तारा ने उसके पैर पकड़ लिए और कहा कि नाथ, क्या आपने सुग्रीव की गर्जना नहीं सुनी ? यह गर्जना बता रही है कि उसके पीछे किसी का बल है । शायद आपको पता नहीं कि सुग्रीव से जिनकी मित्रता हो गई है, वे महान बलशाली हैं । तारा ने सोचा था कि इस सूचना से बालि डर जाएगा, पर बालि का उत्तर क्या बताता है ? बताता है कि उसे ईश्वर का ज्ञान है । तारा बालि की बात पर हँसते हुए बोला कि तुम उन्हें मनुष्य कह रही हो, बलवान व्यक्ति कह रही हो, मुझे तो तुम्हारी बुद्धि पर तरस आ रहा है । अरे, मनुष्य नहीं, बलवान राजकुमार नहीं, वे तो साक्षात ईश्वर हैं । जानने की यह पद्धति सुग्रीव के चरित्र में लम्बी है, परन्तु बालि के जीवन में यह ज्ञान बिल्कुल स्पष्ट है कि वे भगवान हैं । सुग्रीव को भगवान की भवगत्ता पर जितना विश्वास है, बालि को उससे कहीं अधिक है । इसे यों कह सकते हैं कि बालि का ग्रहणपात्र बड़ा है, सुग्रीव का उसकी तुलना में छोटा है । यही बालि के जीवन का एक उज्ज्वल पक्ष है, पर इसके साथ ही उनके जीवन में दुर्बलता भी है ।
       ......शेष कल ....

Saturday, 6 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

विश्वास को पात्र कहा गया । इसका अभिप्राय क्या है ? यह कि ईश्वर में अनन्त सामर्थ्य है, लेकिन जीव में उसे ग्रहण करने की जितनी क्षमता होगी, उसी क्षमता की सीमा तक वह उसे ग्रहण कर सकता है । सुग्रीव के चरित में भी यही सत्य दिखाई पड़ता है । भगवान तो महान हैं, पर पात्र छोटा निकला । भगवान राम ने सुग्रीव से कहा - अच्छा, अब तो तुम्हें विश्वास हो गया कि मैं बालि को मारूँगा ? हाँ महाराज, हो गया - तो अब तुम एक काम करो, किष्किन्धापुरी जाकर बालि के महल के सामने जरा गर्जना तो करो, बालि को चुनौती दो । सुग्रीव प्रभु का मुँह देखने लगे, बोले - प्रभो, आपने ने कहा था कि बालि को मैं मारूँगा । अब उसे चुनौती मैं दूँगा कि आप ? भगवान बोले - मारूँगा मैं, पर चुनौती तुम दोगे, तुम लड़ोगे । यह बड़ा अनोखा तत्वज्ञान है । गीता में भगवान अर्जुन से कहते हैं कि कर्म तुम करोगे और उसका फल मैं दूँगा । भगवान कहते हैं - कर्म से हम तुमको भागने नहीं देंगे, लड़ना तो तुम्हें ही पड़ेगा, पर उसका परिणाम का अधिकार तुम्हारे पास नहीं, मेरे पास है ।

Friday, 5 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

विश्वास भी हो गया, प्रीति भी हो गई, तब सुग्रीव भगवान से बोले, महाराज ! मैं समझ गया कि आप बालि का वध कर देंगे । पर जीव का विश्वास कैसा होता है ? क्या इसके बाद सुग्रीव के जीवन में समस्याएँ नहीं आईं ? वे तो पग-पग पर आती हुई दिखाई देती हैं । गोस्वामीजी ने एक बहुत बढ़िया बात कही । उनसे पूछा गया कि आप रामायण कैसे लिख रहे हैं ? बोले कि भगवान की प्रेरणा से । पर उसके साथ उन्होंने एक विचित्र बात जोड़ दी । क्या ? मुझमें जितना बुद्धि-बल है, प्रभु की प्रेरणा से उतना ही लिखूँगा । इसका अर्थ क्या है ? जब भगवान की प्रेरणा से लिखना है, तो अपने बुद्धि-बल-विवेक की बात क्यों कहते हैं ? इसका उत्तर यह है कि जैसे किसी के पास दूध का अगाध सागर है और आप सुन लें कि वे बड़े उदार हैं, बड़ी उदारता से दूध बाँट रहे हैं, तो यह सुनकर आप दूध लेने जाएँगे, वे तो सचमुच बड़ी उदारता पूर्वक दूध बाँट रहे हैं, पर आप तो उतना ही दूध लेकर लौटेंगे जितना बड़ा आपका पात्र है । इसी प्रकार भगवान की महिमा के साथ-साथ जीव के विश्वास का बर्तन जितना बड़ा होगा, ईश्वर की महिमा उसमें उतनी ही समायेगी, वहाँ पर उतनी ही दिखेगी ।