Thursday, 1 March 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

चाहे हम यह मान लें कि ईश्वर डरानेवाला है, या यह मान लें कि ईश्वर अभय देने वाला है । जब उनकी कृपा पर दृष्टि जाती है, उनके स्वभाव पर दृष्टि जाती है, तो यही लगता है कि ईश्वर तो जीवन को निर्भय बनाने वाले हैं और जब जीव ईश्वर की महिमा और अपनी कमियों पर दृष्टि डालता है, वह डर के मारे काँपने लगता है । ऐसी स्थिति में मुख्य बात यह है कि हमारे अन्तःकरण में अगर भय से सद्भाव आये या अभय से आये, ये दोनों ही वृत्तियाँ उपयोगी हैं ।

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