Saturday, 3 March 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

तुलसीदास जी से पूछा गया कि आप किसको कथा सुना रहे हैं ? वे बोले कि भाई ! मैं अपने मन को सुना रहा हूँ । तब तो महाराज ! आपका मन बड़ा ऊँचा होगा, जिसको आप प्रभु की कथा सुना रहे हैं ? बोले कि नहीं, मेरे मन का एक ही विशेषण है । क्या ? मेरा मन बड़ा दुष्ट है । शंकरजी ने सुना तो आश्चर्य चकित हो गये । उन्होंने रोक लगा दी थी, दुष्ट को मत सुनाना । उन्होंने सोचा कि मैंनें दुष्टों को सुनाने पर रोक लगायी और इस दुष्ट ने दुष्ट मन को ही श्रोता बनाया, पर गोस्वामीजी का अभिप्राय यह है कि महाराज ! आप कैलाश शिखर की ऊँचाई पर रहते हैं, वहाँ तो दुष्ट जा ही नहीं सकेगा । हम जिस मनोभूमि में रहते हैं, वहाँ तो दुष्टता ही दुष्टता है । इस दुष्टता की मनोभूमि में अगर हम दुष्ट मन को कथा से वंचित करेंगे, तब तो फिर यह शिष्ट बन ही नहीं पायेगा, इसलिए कृपा कीजिए, गंगा जब ऊपर से नीचे आयेंगी, तभी तो इन दुष्टों की दुष्टता दूर होगी ।

Friday, 2 March 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

गोस्वामीजी विनयपत्रिका में प्रभु की कृपा का वर्णन करते हैं कि भगवान कितने उदार हैं, क्षमाशील हैं, इसका पूरा वर्णन करते हैं और अन्त में वे सम्बोधित किसे करते हैं, सुना किसे रहे हैं ? रामायण के पहले कथावाचक के यहाँ सबसे कम भीड़ थी या उसके अन्तिम कथावाचक के यहाँ ? रामकथा के प्रथम वक्ता तो शंकरजी हैं, उनके यहाँ तो कथा सुननेवाले के लिए पात्रता की इतनी कठिन कसौटी थी कि स्वयं शंकरजी के गणों को भी वहाँ आकर कथा सुनने का अधिकार नहीं दिया गया । इतनी अधिक मर्यादा जिस कथा की है, वह समझ लें कि कितनी दुर्लभ है । कथा की दुर्लभता का जो स्वरूप है, वह शंकरजी के चरित्र में दिखाई देता है, जहाँ शंकरजी स्वयं एक ही वक्ता और पार्वतीजी एक ही श्रोता हैं । भगवान शंकर प्रथम वक्ता हैं और अन्तिम वक्ता गोस्वामीजी हैं । शंकरजी के यहाँ तो कम-से-कम एक श्रोता दिखाई भी पड़ा, पर गोस्वामीजी के यहाँ कोई श्रोता नहीं है, अकेले बैठे हुए गुनगुना रहे हैं । किसी ने पूछा कि महाराज ! किसे सुना रहे हैं ? गोस्वामीजी ने कहा कि भाई, एक श्रोता तो है । कहाँ है ? वे बोले कि बाहर नहीं भीतर है । बोले कि भाई ! मैं अपने मन को सुना रहा हूँ ।

Thursday, 1 March 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

रामायण में पार्वतीजी ने भगवान शंकर से कहा कि आप ईश्वर के स्वभाव का अधिक वर्णन न किया करें । क्यों ? बोलीं कि महाराज ! ईश्वर का स्वभाव सुनकर तो लोगों को मनमानी करने की ईच्छा होगी । लोग अगर सुन लेंगे कि ईश्वर तो बड़ा उदार है, क्षमाशील है, वे जीव के अपराध कभी देखते ही नहीं, तो वे यही समझेंगे कि फिर तो हमें सब कुछ करने की छूट है । इस पर भगवान शंकर ने कहा कि पार्वती ! भगवान के स्वभाव का वर्णन व्यक्ति को पाप करने की प्रेरणा देने के लिए नहीं है । तो फिर किसलिए है ? शंकरजी ने सूत्र देते हुए कहा कि भगवान के स्वभाव का वर्णन करने पर भी भला कितने लोग उनके स्वभाव को जान पाते हैं ? बिरले ही कोई जान पाते हैं और जो जान लेते हैं, उसकी कसौटी क्या है ? भगवान के स्वभाव को जान लेने पर तो जीव ऐसा कृतज्ञ हो जाता है कि उसे भगवान का भजन छोड़कर कुछ अच्छा ही नहीं लगता ।

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

चाहे हम यह मान लें कि ईश्वर डरानेवाला है, या यह मान लें कि ईश्वर अभय देने वाला है । जब उनकी कृपा पर दृष्टि जाती है, उनके स्वभाव पर दृष्टि जाती है, तो यही लगता है कि ईश्वर तो जीवन को निर्भय बनाने वाले हैं और जब जीव ईश्वर की महिमा और अपनी कमियों पर दृष्टि डालता है, वह डर के मारे काँपने लगता है । ऐसी स्थिति में मुख्य बात यह है कि हमारे अन्तःकरण में अगर भय से सद्भाव आये या अभय से आये, ये दोनों ही वृत्तियाँ उपयोगी हैं ।

Tuesday, 27 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

ईश्वर में अनन्त गुण हैं और महाप्रभु वल्लभाचार्य कहते हैं कि ईश्वर 'अखिल विरुद्ध धर्माश्रय' हैं । एक ही व्यक्ति में परस्पर विरोधी गुण दिखाई नहीं देते, परन्तु ईश्वर में समस्त विरोधी गुण एक साथ दिखाई देते हैं । प्रश्न उठता है कि ईश्वर भयदायक हैं या अभयदायक ? इसका वही उत्तर है । ईश्वर में कृपागुण भी है और न्यायगुण भी । कृपा और न्याय परस्पर एक-दूसरे से भिन्न हैं । जो न्याय करेगा, वह कृपा नहीं करेगा और जो कृपा करेगा, वह न्याय नहीं कर सकेगा, पर ईश्वर बहुत बड़ा न्यायाधीश है और ईश्वर परम कृपालु भी है । इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि जिसके जीवन में कृपागुण की स्मृति होती है, वह अभय हो जाता है और जिसके जीवन में ईश्वर के न्यायगुण की याद आती है, वह डर के मारे काँपने लगता है ।

Monday, 26 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

सुग्रीव विषयों और भोगों को पाकर कुछ समय के लिए विषय-विमूढ़ और भ्रान्त से हो जाते हैं और अंगद ? अंगद और सुग्रीव में जो भिन्नता है, उसे गोस्वामीजी ने बड़े सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है । अंगद की भूमिका और सुग्रीव की भूमिका में बड़ा विलक्षण अन्तर है । लक्ष्मणजी जब सुग्रीव को डराने नगर में पहुँचे तो धनुष चढ़ाकर कहा कि मैं सारे नगर को जलाकर नष्ट कर दूँगा, तब अंगद की भूमिका सामने आयी । जब सुग्रीव ने सुना कि लक्ष्मणजी आये हैं, तो वह बेचारा डर के मारे घर में जाकर छुप गया और अंगद ने क्या किया ? उन्होंने तो बिल्कुल उल्टा काम किया, नगर को व्याकुल देखकर बालि के पुत्र अंगद आये । अंगद लक्ष्मणजी के चरणों में प्रणाम करते हैं और लक्ष्मणजी तत्काल उनकी बाँह पकड़कर कहते हैं कि अंगद ! तुम्हारे लिए तो कहीं रंचमात्र भी भय का प्रश्न नहीं है । वस्तुतः यह अंगद और सुग्रीव के चरित्र का जो सूत्र है, उसको हम यों कह सकते हैं कि एक पात्र ऐसा है, जिसे भय की आवश्यकता है और वह भय के द्वारा ही प्रेरित होता है, दूसरे का चरित्र भय से नहीं, बल्कि विवेक और भक्ति की वृत्ति से प्रेरित होता है, उसे भय की आवश्यकता नहीं होती ।

Sunday, 25 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

भगवान श्रीराम ने सुग्रीव को आगे बढ़ाने की चेष्टा की । लेकिन सुग्रीव अपनी भोग-परायण वृत्ति के कारण भोगों को पाते ही उसमें इतने डूब गये और स्वयं को ऐसा भुलावा देने की चेष्टा की, अपने भोगों के पक्ष में ऐसा तर्क खोज लिया कि प्रभु ने श्रीसीताजी का पता लगाने के लिए कहा तो है, पर कोई समय थोड़े ही दिया है कि इतने दिनों के भीतर पता लगाना है । यदि प्रभु ने कोई निश्चित अवधि दी होती, यदि कह दिया होता कि इतने दिनों में पता लगाना है, तो दूसरी बात थी, पर ऐसी कोई जल्दी नहीं है । यह सुग्रीव का अपने आपके प्रति एक बहुत बढ़िया धोखा था, जिसका परिणाम सामने आ गया । हनुमानजी और लक्ष्मणजी जब पहुँचे, तो सुग्रीव डर के मारे काँपने लगे और इसी कारण बाद में बड़े सावधान हो गये । जब बन्दरों को कहा कि श्रीसीताजी का पता लगाकर आओ तो साथ ही यह भी कह दिया " पन्द्रह दिनों के भीतर" । यह पन्द्रह दिन क्यों दे रहे हैं ? बोले कि मैं अनुभव से सीख रहा हूँ । प्रभु ने मुझे समय की सीमा नहीं दी, इसलिए भोग में डूब गया । इसीलिए इन लोगों को अब बता दे रहा हूँ कि यह काम दी हुई समय-सीमा के भीतर ही होना चाहिए ।