Sunday, 30 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान राम की जो यात्रा है, उसमें प्रभु ने दो रूपों में अपने आप को अभिव्यक्त किया है । एक ओर तो भगवान राम साक्षात ईश्वर हैं और दूसरी ओर वे मानवीय लीला संपन्न कर रहे हैं । इस यात्रा के क्रम में प्रभु पहले चारों विद्यार्थियों के पीछे चलते हैं । आध्यात्मिक अर्थों में इस पर यदि दृष्टि डालें कि यह चारों विद्यार्थी कौन हैं ? तो उनका एक दूसरा रूप ही हमें दिखायी देगा । महर्षि भरद्वाज जब अपनी पाठशाला के विद्यार्थियों से पूछते हैं कि आप लोगों में से मार्ग जानने वाला कौन है ? तो पचासों विद्यार्थी यह दावा करते हैं कि मार्ग हमारा देखा हुआ है - अब यह पचासों शब्द भौतिक अर्थों में बहुसंख्यक है, कि बहुत से विद्यार्थियों ने ऐसा कहा । और आध्यात्मिक अर्थों में इसका तात्पर्य है कि महर्षि भरद्वाज के आश्रम में विद्यार्थियों के रूप में जो दिखायी दे रहे हैं, वस्तुतः वे हमारे विविध धर्मग्रंथ ही हैं । और ये जितने हमारे धर्मग्रंथ हैं, उनको आप पचास के रूप में देख सकते हैं । अठारह पुराण, अठारह स्मृतियाँ, दस उपनिषद और चार वेद । इस तरह मानो हमारे पचास धर्मग्रंथ ही मूर्तिमान होकर आग्रह कर रहे हैं कि इन सबके मन में भगवान राम के प्रति प्रेम भी है ।

Saturday, 29 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

वर्णन आता है कि एक बार भगवान कृष्ण माखन चुराकर भाग रहे थे । और जिस गोपी के घर से मक्खन चुराया था वह पकड़ने के लिए दौड़ रही थी । एक भक्त ने उनको भागते देखा तो तुरन्त कहा - प्रभु ? रुकिये, रुकिये ? भगवान ने कहा देख नहीं रहे हो, पीछे गोपी पकड़ने के लिए आ रही है, और तुम रुकने के लिए कह रहे हो ? तो भक्त ने कहा कि, आप कहाँ जायेंगे भागकर ? कहीं न कहीं तो जाकर छिपेंगे ही । और प्रभु ! इस बात का अवश्य ध्यान रखियेगा कि अँधेरे में ही छिपियेगा, उजाले में मत छिपियेगा । क्योंकि उजाले में छिपने से पकड़ जाइयेगा । फिर अन्त में धीरे से भक्त ने कहा - महाराज ! अगर अँधेरे में ही छिपना है तो फिर मेरे ह्रदय के अँधेरे में ही आकर छिप जाइयेगा  क्योंकि यहाँ से बढ़कर अँधेरा आपको कहीं नहीं मिलेगा । गोस्वामीजी का अभिप्राय है कि उस युग के लोगों ने भगवान राम को जाग्रत अवस्था में देखा, वे तो धन्य हैं ही, क्योंकि त्रेतायुग प्रकाश का युग है । पर अगर हम लोग अन्धकार के युग में हैं, रात्रि के युग में हैं, तब हम तो प्रभु से और भी लाभ ले सकते हैं । उनसे कह सकते हैं प्रभु ! उस युग में तो आप चले, पर यह तो अँधेरी रात्रि का युग है और रात्रि को तो विश्राम चाहिए, इसलिए आइये इस तमोमय अन्तःकरण में बस कर विश्राम कीजिए ।

Friday, 28 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी कहते हैं कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम, श्रीसीताजी और श्रीलक्ष्मणजी इन तीनों पथिकों को वनमार्ग में चलते हुए जिन्होंने देखा, उन सभी ने बिना परिश्रम के बड़े ही आनन्द से इस संसार पथ को पार कर लिया । पर इतना कहने के बाद गोस्वामीजी को लगा कि हमारे युग के लोग तो इसे पढ़कर निराश हो जायेंगे । क्योंकि जब वे यह पढ़ेंगे कि जिन लोगों ने पथिक राम को चलते देखा उन्होंने संसार पथ को सरलता से पार कर लिया, तब उन्हें ऐसा लगेगा कि भई ! हम उतने सौभाग्यशाली नहीं हैं । क्योंकि यदि हम भी उस युग में होते तो उन पथिकों के दर्शन करके संसार पथ को सरलता से पार कर लेते । इसलिए हम तो केवल पुरानी स्मृति के रूप में ही इसका आनन्द ले सकते हैं । किन्तु इस यात्रा से हमारी समस्या का समाधान नहीं होगा । इसलिए गोस्वामीजी ने तुरन्त आश्वासन देते हुए अगली पंक्तियाँ जो कहीं, वे हमारे और आपके लिए बड़े काम की है । उन पंक्तियों का पहला शब्द है *अजहुँ* 'अब भी' । मानो उस युग के जिन लोगों ने दर्शन किया, उन्होंने तो लाभ लिया ही, पर आज भी जिनके ह्रदय में सपने में भी लक्ष्मण, सीताजी और श्रीराम यह तीनों पथिक बसे हुए हैं, वह व्यक्ति भगवान राम के धाम के पथ को सरलता से प्राप्त कर लेगा ।

Thursday, 27 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

उपयुक्त मार्ग के विषय में भगवान राम के द्वारा महर्षि भरद्वाज से किया जाना प्रश्न मानो हमारे आपके जीवन का शाश्वत प्रश्न है । व्यक्ति के जीवन में यह जिज्ञासा है कि मेरा उपयुक्त मार्ग कौन सा है ? भगवान राम भी जब यह जिज्ञासा करते हैं, तब महर्षि भरद्वाज के द्वारा दिया गया उत्तर बड़ा ही सार्थक है । वे कहते हैं कि वस्तुतः साधारण व्यक्ति के लिए तो किसी एक मार्ग का चुनाव करना आवश्यक है, लेकिन तुम्हारे लिए तो सभी मार्ग सुगम हैं । और सचमुच भगवान श्रीराघवेन्द्र ने अपनी विविध यात्राओं के माध्यम से जीवन-पथ का जो स्वरूप प्रस्तुत किया, उस पर चलने की जो पद्धति व्यक्ति को बतायी, उसको यदि व्यक्ति ठीक-ठीक ह्रदय में धारण कर ले, तो गोस्वामीजी उसे आश्वासन देते हैं कि भगवान राम के पथिक रूप का ध्यान करने से लाभ ही लाभ होगा ।

Wednesday, 26 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान राम ने कर्म-मार्ग में ताड़का का वध किया । ज्ञान-मार्ग में अहिल्या का उद्धार किया । और जब जनकपुर में पहुँच गये तो बड़ी मीठी यात्रा प्रारंभ हुई । गोस्वामीजी कहते हैं भगवान राम बैठे हुए हैं विश्वामित्र जी के पास और लक्ष्मण जी के मन में इच्छा उत्पन्न हुई नगर देखने की । यह नगर है श्रीसीताजी का । और श्रीसीताजी के लिए कहा गया है कि ये माया भी और भक्ति भी हैं । यद्यपि लगता तो यही है कि ये दोनों परस्पर विरोधी बातें हैं, पर सीता जी के लिए दोनों ही उपाधियाँ दी गयी हैं । और इन सीता जी से भगवान राम का विवाह हुआ जनकपुर में । भगवान राम अखण्ड ज्ञान हैं । मानो अखण्ड ज्ञान का भक्ति से मिलन हुआ । इस प्रकार सीता जी की प्राप्ति - भक्ति की प्राप्ति ही जनकपुर की यात्रा का परम लक्ष्य है ।

Tuesday, 25 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

विश्वामित्र जी भगवान राम को यज्ञ की रक्षा के लिए लेकर आये थे, भगवान राम यदि चाहते तो वहीं से लौट सकते थे । पर विश्वामित्र जी ने भगवान राम से कहा कि अब जनकपुर की यात्रा कीजिए । यह जनकपुर की यात्रा क्या है ? यदि इस प्रश्न पर विचार करें तो हमें यह स्पष्ट प्रतीत होगा कि यह ज्ञान-मार्ग की यात्रा है । महाराज जनक उस समय के सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी थे । उनके लिए वाक्य भी यही कहा गया कि वे ज्ञानियों में सिरमौर हैं । और यदि ज्ञान के पथ पर चलेंगे तो सबसे पहला काम है अहिल्या का उद्धार । अहिल्या पत्थर बनी हुई है । गोस्वामीजी कहते हैं कि यह बुद्धि ही अहिल्या है । इसका अभिप्राय है कि जब तक बुद्धि, जड़ से चेतन नहीं होगी तब तक हम ज्ञान मार्ग में आगे बढ़ने में समर्थ नहीं होंगे । भगवान के द्वारा अहिल्या-उद्धार का अभिप्राय है कि विषयासक्ति के कारण जो बुद्धि जड़ हो चुकी थी, उसको श्रीराघवेन्द्र ने चेतन किया ।

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

ताड़का के दो बेटे हैं - एक तो सुनहला मृग मारीच है । इसका तात्पर्य है कि जो व्यक्ति आशा करता है, उसको सर्वत्र सुनहला मृग ही दिखायी देता है, परन्तु भगवान श्रीराघवेन्द्र ने इस मारीच को दूर फेंक दिया । इसका तात्पर्य है कि व्यक्ति को सुनहली कल्पनाओं को जीवन से दूर फेंक देना चाहिए । और जहाँ पर आशा होगी वहीं पर दोष का भी जन्म होगा, यही सुबाहु है । पर इस सुबाहु को भी जीतना होगा । इसका अभिप्राय है कि जीवन में निष्काम कर्म का जो आदर्श है वही श्रेयस्कर है । इसलिए भगवान राम ने आशा छोड़ कर, बदले में पाने की कामना छोड़कर, सुनहली कल्पना छोड़ कर, विश्व की सेवा करने का जो कर्मपथ है, उसको अपने चरित्र के माध्यम से पूरा कर लिया ।

Sunday, 23 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

कर्म के संबंध में भगवान राम ने एक सूत्र देते हुए कहा कि जब आप लोक-कल्याण के लिए कर्म करने चलें तब ताड़का, मारीच और सुबाहु से अवश्य बचें । लेकिन भई ! जिस ताड़का से कर्म-मार्ग के यात्री बच नहीं पाते, सेवा करने वाले भी बच नहीं पाते, उस ताड़का को पहचानिये, कि वह कौन है । इसके आध्यात्मिक स्वरूप का वर्णन करते हुए गोस्वामीजी कहते हैं कि यह ताड़का व्यक्ति के अन्तःकरण में रहने वाली दुराशा है । और यह तो नित्य ही हमें व्यावहारिक जीवन में देखने को मिलता है कि जब हम दूसरों की या समाज की कोई सेवा करते हैं तो बदले में यह आशा जरूर रखते हैं कि हमें भी सम्मान या पद अवश्य मिले । कुछ न कुछ आशा पाल लेते हैं बस यही ताड़का है । भगवान राम ने ताड़का का वध कर दिया, इसका अभिप्राय है कि यदि आपको यज्ञ (कर्म) की रक्षा करनी है, सेवा करनी है तो सेवा कीजिए पर बदले में किसी प्रकार की आशा मत कीजिए ।

Saturday, 22 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

लक्ष्मण जी के ह्रदय में लालसा है कि जरा जनकपुर देख आवें । पर बोल नहीं पा रहे हैं । और भई ! यह बहुत अच्छी बात है कि जीव के मन में भक्ति के मार्ग पर चलने की इच्छा तो उत्पन्न हुई । और तब भगवान राम ने विश्वामित्र से तुरंत कहा - गुरुदेव ! लक्ष्मण नगर देखना चाहते हैं । गुरु जी ने कहा कि ये क्यों नहीं बोल रहे हैं ! तो प्रभु ने कहा, महाराज ! आपके भय और संकोच से बोल नहीं पा रहे हैं । विश्वामित्र जी ने कहा कि अगर ये नगर देखना चाहते हैं, तो मैं आज्ञा देता हूँ कि ये जाकर नगर देख आयें । भगवान राम ने कहा - महाराज ! आज्ञा मुझे भी चाहिए । विश्वामित्र जी ने हँसकर कहा कि फिर यह क्यों नहीं कहते कि मुझे भी देखना है । प्रभु ने कहा - महाराज ! मुझे बिल्कुल नहीं देखना है । तो फिर तुम कैसी आज्ञा चाहते हो ? भगवान ने स्पष्ट करते हुए कहा - गुरुदेव ये देखना चाहते हैं, लेकिन कोई दिखाने वाला भी तो चाहिए । और भगवान राम का तात्पर्य यह था कि अगर जीव अकेला जायेगा तो मायानगर के चक्कर में फँसे बिना नहीं रहेगा, और मुझे यदि लेकर जायेगा तो भक्ति को प्राप्त करके लौटेगा । इसका अभिप्राय है कि सीताजी को ईश्वर से अलग कर दिया जाय तो वे माया हो जायेंगी पर श्रीराम के साथ मिलकर वे ही भक्ति हो जाती हैं । भगवान का तात्पर्य था कि महाराज ! लक्ष्मण अगर अपनी आँखों से जनकपुर देखेगा तो उलझ जायेगा, भ्रम में पड़ जायेगा । इसलिए मैं स्वयं इसे दिखाऊँगा ।

Friday, 21 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान राम के चरित्र में जब यात्राएँ प्रारंभ हुई तब उनमें ज्ञान, भक्ति और कर्म इन तीनों का सामंजस्य आपको मिलेगा । जब भगवान विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करने के लिए उनके आश्रम तक की यात्रा करते हैं, तब यह मानो कर्मपथ था । क्योंकि कर्मपथ का अभिप्राय है कि जो कर्म अन्यायियों तथा राक्षसों को दण्ड देने के लिए, बुराई को मिटाने के लिए, यज्ञ की रक्षा करने के लिए किया जाय, जहाँ पर सत्कर्म का उद्देश्य स्वार्थ न होकर लोक-कल्याण है ।

Thursday, 20 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान राम ने जन्म लिया तो चार भाइयों के रूप में लिया । अगर भगवान चाहते तो एक ही माता के गर्भ से भी जन्म ले सकते थे, पर एक ही माता के माध्यम से न लेकर तीन माताओं के माध्यम से जन्म लिया । ये तीन माताएँ कौन हैं ? अगर आप विचार करें तो आपको लगेगा कि वस्तुतः अयोध्या से ही यह त्रिवेणी संगम प्रारंभ हो गया । कौसल्या, सुमित्रा, कैकेयी के आध्यात्मिक स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया कि महाराज दशरथ मूर्तिमान वेद हैं । कौसल्या जी ज्ञानमयी हैं, कैकेयी जी क्रियामयी हैं और सुमित्रा जी उपासनामयी हैं । भगवान राम से अब अगर पूछा जाय कि आप ज्ञान के माध्यम से मिलेंगे कि क्रिया के माध्यम से अथवा भक्ति के माध्यम से ? तो भगवान ने तीनों माताओं के माध्यम से जन्म लेकर मानो कहा कि भई ! ज्ञान के माध्यम से भी मैं जन्म लेता हूँ, कर्म के माध्यम से भी मैं ही जन्म लेता हूँ तथा भक्ति के माध्यम से भी मैं ही जन्म लेता हूँ ।

Tuesday, 18 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान राम ने मार्ग के विषय में जिज्ञासा भी की, तो त्रिवेणी के किनारे रहने वाले एक सन्त से की । त्रिवेणी का अभिप्राय है कि जहाँ पर गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम हुआ है । इसका अभिप्राय है कि यदि किसी से यह प्रश्न किया जाय कि ज्ञान, भक्ति और कर्म में किसकी श्रेष्ठता है ? तो भगवान राम ने अपने चरित्र के द्वारा इसका उत्तर इस प्रकार दिया कि ज्ञान, भक्ति और कर्म इनमें से जिसका भी संस्कार व्यक्ति में प्रबल हो वहाँ से साधना प्रारंभ हो, किन्तु अन्त में संगम जरूर होना चाहिए ।

Monday, 17 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

राजनीतिज्ञ की दृष्टि तात्कालिक लाभ की ओर होती है और वेद की दृष्टि पारलौकिक लाभ की ओर । पर प्रश्न यह है कि व्यक्ति को लौकिक लाभ की ओर ध्यान देना चाहिए कि पारलौकिक लाभ की ओर ? और इसका उत्तर तो यही है कि व्यक्ति को जीवन में दोनों की आवश्यकता है । क्योंकि हमारे सिर में अगर पीड़ा होती है, तो हमें दो चेष्टाएँ करनी चाहिए । एक तो यह कि तुरंत ही पीड़ा की तीव्रता मिटे ऐसा कोई उपाय किया जाय तथा दूसरी यह कि रोग के मूल कारण को समझकर उसे भी मिटाने का उपाय करें । क्योंकि जब रोग का मूल कारण ही मिट जायेगा तो फिर दर्द सर्वदा के लिए बन्द हो जायेगा, जिससे बाहरी दवा की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी । इसी प्रकार राजनीति की दृष्टि है - समस्या का तात्कालिक समाधान देना, और समाज में उसकी भी आवश्यकता है । लेकिन वेद का उद्देश्य समस्या का आन्तरिक समाधान देना है, समस्या का जो मूल कारण है उसका समाधान देना है । भगवान श्रीराम साधुमत, लोकमत, राजनीति, वेदनीति, नीति-प्रीति, स्वार्थ तथा परमार्थ इन सब में सामंजस्य की स्थापना करते हैं । और भगवान राम की जो यात्राएँ हैं, यह भी वस्तुतः कर्म, ज्ञान और भक्ति का सामंजस्य ही है ।

Sunday, 16 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेद सिद्धांत इन चारों का सामंजस्य होना चाहिए । इस सूत्र का तात्पर्य यही है कि इनमें परस्पर टकराहट है । साधुमत और लोकमत में बड़ी भिन्नता दिखायी देती है । साधु अपने विचारों पर दृढ़ रहता है और लोकमत बदलता रहता है । भगवान राम किसके पुजारी हैं - साधु के कि लोक के ? अगर भगवान राम केवल अगस्त्य, बाल्मीकि, भरद्वाज आदि की पूजा करते, उन्हें सम्मान देते, तो यह ठीक ही था, क्योंकि साधु तो पूजा के अधिकारी हैं ही । लेकिन कितना कठिन कार्य भगवान राम ने अपने जीवन में स्वीकार किया । भगवान राम से पूछा गया कि यह तो प्रतिपल बदलने वाला लोकमत है, इसको आप महत्व देते हैं कि नहीं ? तो आप, सब इस बात से भली भाँति भिज्ञ हैं कि साधुमत को सम्मान देने वाले भगवान ने लोकमत को इतना अधिक सम्मान दिया कि एक धोबी के मत को भी, कुछ गिने-चुने व्यक्तियों के मत को भी, भगवान राम मानते हैं । भगवान कहते हैं कि यह कहकर हम छुट्टी पा लें कि संसार वालों का स्वभाव तो बदल जाने का है, यह कदापि ठीक नहीं है । प्रभु का तात्पर्य है कि साधु का सम्मान करना तो ठीक है पर समाज का कल्याण तथा समाज में एकसूत्रता उत्पन्न करना भी हमारा परम कर्तव्य है ।

Saturday, 15 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

बहिरंग दृष्टि से देखें तो ऐसा लगता है कि विभीषण को शरण में लेने में भगवान राम का स्वार्थ है । इसलिए भगवान राम ने भी लंका के राज्य का प्रलोभन विभीषण को दे दिया । लेकिन गम्भीरता से विचार करने पर हमें इसमें एक भिन्न ही अर्थ का दर्शन होगा । भगवान राम ने जब लंकेश कहा तो विभीषण संकोच में पड़ गये, पर उनका तात्पर्य भिन्न था, जिसका दर्शन आगे चलकर होता है जब भगवान राम ने विभीषण का तिलक किया । तो भई ! राजतिलक करने के बाद अगर भगवान राम विभीषण को लंकेश कहें तब तो बिल्कुल ठीक है, क्योंकि राजतिलक हो जाने के बाद व्यक्ति राजा हो जाता है । पर तिलक करने से पूर्व ही भगवान ने विभीषण को लंकेश कहकर क्यों पुकार दिया । विभीषण जी ने पूछ दिया - प्रभु ! आपने मुझे पहले ही लंका का राजा क्यों कह दिया ? प्रभु ने कहा - विभीषण, अगर लंका का राज्य मैं देता, तो निश्चित रूप से बाद में ही कहता । पर मैं जानता हूँ कि लंका के वास्तविक राजा तो तुम ही हो । विनय-पत्रिका में गोस्वामीजी कहते हैं कि विभीषण जीव है । और रावण का परिचय देते हुए कहा गया कि रावण मूर्तिमान मोह है । इस पर यदि तात्विक दृष्टि से विचार करें तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि हमारे जीवन में मोह का शासन है कि जीव का ? भगवान राम कहते हैं कि वस्तुतः राजा तो जीव है, लेकिन मोह नकली राजा बन बैठा है । इसलिए प्रभु ने कहा मित्र ! जब मैं कहता हूँ कि तुम राजा हो तब मैं तो केवल तुम्हारे उस वास्तविक स्वरूप की तुम्हें याद दिला रहा हूँ, जिसको तुम भ्रमवश भूल गये हो ।

Friday, 14 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

सुबेल पर्वत पर कितना सुन्दर दृश्य है ! भगवान राम के दाहिने कान के पास विभीषण जी बैठे हुए हैं । और लक्ष्मण जी कहाँ बैठे हुए हैं ? इसका स्पष्टीकरण करते हुए तुलसीदास जी ने कहा कि लक्ष्मण जी पीछे की ओर, कुछ दूर पर बैठे हुए हैं । इसमें एक ओर तो भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण हैं और दूसरी ओर रावण के छोटे भाई विभीषण हैं । किन्तु भगवान राम जब दोनों के बैठने के स्थान का चुनाव करने लगे तो लक्ष्मण जी से भगवान ने पूछा - लक्ष्मण ! तुम कहाँ बैठोगे ? मेरे पास या मुझसे दूर ? लक्ष्मण जी ने कहा - महाराज ! आपके पास दूसरों को बैठने के लिए जगह खाली रहे, इसलिए मैं जरा दूर ही बैठूँगा । इस तरह भगवान श्रीराघवेन्द्र मनुष्य से लेकर गीध, पशु-पक्षी और राक्षसों तक को एकाकार कर देते हैं ।

Thursday, 13 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

एक माँ जब अपने बालक से व्यवहार करती है तो क्या उसमें नीति नहीं होती है । माँ बालक को कभी डाँटती है, कभी समझाती है । माँ जब बालक को समझाती है तो उसमें साम-नीति है । जब कभी मिठाई का लोभ देती है, तो उसमें दाम-नीति है । कभी छड़ी उठाती है, तो यह दण्ड-नीति है और जब कभी दूसरे बालकों से अलग करने की चेष्टा करती है तब वह भेद-नीति का आश्रय लेती है । पर माँ की विशेषता यह है कि उसकी नीति, प्रीति बालक के हित के लिए है, अपने स्वार्थ के लिए या अपनी सत्ता प्रदर्शन के लिए नहीं है । रामचरितमानस में पग-पग पर भगवान राम ने नीति और प्रीति दोनों को मिलाकर समाज को एक नयी दृष्टि दी ।

Wednesday, 12 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान राम विभीषण जी के संबंध में सुग्रीव से पूछते हैं - तुम क्या कहते हो ? सुग्रीव ने कहा - महाराज ! यह रावण का भाई है, भेद लेने के लिए आया हुआ है, इसलिए इसको बाँधकर रख लीजिए । भगवान राम मुस्कराकर बोले - अच्छा भाई ! हमारे-तुम्हारे बीच में अगर मतभेद है तो फिर किसी तीसरे से ही पूछ लिया जाय और इसके लिए सबसे उपयुक्त पात्र हनुमान जी ही हो सकते हैं । हनुमान जी ही तो विभीषण को निमंत्रण देकर आये थे । हनुमान जी ने प्रभु का समर्थन कर दिया । यद्यपि सुग्रीव प्रारंभ में थोड़ा सा हताश हुए कि मेरी बात की उपेक्षा करके अपरिचित विभीषण पर इतना विश्वास कर लिया गया । पर जब विभीषण ने प्रणाम किया, तो भगवान राम उठे और कसकर जब उन्होंने विभीषण को ह्रदय लगाया तब, लगा तो विभीषण को ह्रदय से रहे थे पर भगवान श्रीराघवेन्द्र, सुग्रीव की ओर देख रहे थे । सुग्रीव कह सकते हैं कि महाराज ! क्या आप मेरे ऊपर व्यंग्य कर रहे हैं ? भगवान का अभिप्राय था कि मित्र ! मैं व्यंग्य नहीं कर रहा हूँ, वरन तुमसे बताना चाहता हूँ कि मैं तुम्हारी ही आज्ञा का पालन कर रहा हूँ । क्योंकि मैंने जब तुमसे पूछा था कि क्या करना चाहिए, उस समय अगर तुमने कह दिया होता कि इसको मार डालना चाहिए, तब तो मेरे समक्ष बहुत बड़ा संकट आ जाता, पर तुम्हारे मुँह से निकला कि इसे बाँध करके रख लीजिए । और भई ! बाँधने के लिए अब रस्सी आदि मैं कहाँ ढूँढता, इसलिए इसे अपनी भुजा के बन्धन से बाँधकर रख लेता हूँ । यही प्रीति का बन्धन है । और सबसे कठिन (मजबूत) बन्धन भी प्रीति का ही है, नीति का नहीं । क्योंकि नीतिज्ञ तो कैदी को लोहे और रस्सी के बन्धन में बाँधेगा । प्रभु का भाव था कि सुग्रीव देख लो, मैंने विभीषण को अपनी भुजा के बन्धन में इतना कहकर बाँध लिया है कि अब यह जीवन भर कहीं भागकर जाने की चेष्टा नहीं करेगा । इसका अभिप्राय है कि भगवान राम को प्रसन्नता तब होती है जब वे नीति और प्रीति दोनों को मिला देते हैं ।

Tuesday, 11 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान श्रीराघवेन्द्र ने शत्रु के भाई विभीषण को अपना मित्र बना लिया, मंत्री बना लिया और उसके द्वारा लंका के रहस्यों को जानकर, लंका के युद्ध को जीत लिया, इससे बढ़कर राजनैतिक सफलता भला क्या होगी ? विभीषण के आने पर, अगर सुग्रीव की बात मानकर भगवान राम विभीषण को लौटा दें, तो भगवान राम की यह जो महानतम नीतिगत सफलता है कि उन्होंने इतना जीत लिया विभीषण का ह्रदय, कि वे पूरी तरह समर्पित हो गये प्रभु के प्रति, वह तो प्रकट होने से रह जाती । इसलिए विभीषण को शरण में लेना नीति के अनुकूल तो है ही, पर साथ-साथ भगवान राम कहते हैं कि नीति और प्रीति परस्पर विरोधी नहीं हैं । भगवान राम का तात्पर्य यह है कि जब नीति होगी ह्रदय में और प्रीति होगी वाणी में, तब वह कल्याणकारी नहीं होगी । पर भगवान राम के चरित्र की विशेषता यह है कि उनके ह्रदय में प्रीति और व्यवहार में नीति विद्यमान है । अपने चरित्र में इन दोनों का सामंजस्य करके भगवान राम दिखाते हैं ।

Monday, 10 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान श्रीराघवेन्द्र कहते हैं कि नीति और प्रीति में जो विरोध दिखायी देता है, वह वास्तविक नहीं होता । अगर ऐसा हो तो व्यक्ति का जीवन या तो प्रीतिरहित होगा या नीतिरहित होगा । इसी तरह से परमार्थ और स्वार्थ भी विरोधी नहीं है । भगवान राम अपने चरित्र के द्वारा यह बताते हैं कि नीति - प्रीति तथा परमार्थ और स्वार्थ परस्पर विरोधी माने जाने वाले ये गुण भी वास्तव में एक-दूसरे के पूरक हैं । इसलिए भगवान राम ने विभीषण के सन्दर्भ में इन चारों को यथार्थ करके दिखा दिया । अगर हम गहराई से विचार करके देखें तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि भगवान राम का विभीषण को शरण में लेना, नीति के अनुकूल है कि प्रीति के ? इसको यदि आप राजनीति की दृष्टि से देखेंगे तो यह भगवान राम की सबसे बड़ी सफलता है, पर प्रेम की दृष्टि से भगवान राम की सबसे बड़ी महानता है ।

Sunday, 9 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

रामायण में एक बड़ी मीठी बात यह आती है कि विभीषण जब भगवान की शरण में आये तो बन्दरों ने उन्हें रोक लिया । उनको लगा कि विभीषण निशाचर हैं, और भगवान राम सूर्यवंशी हैं, इसलिए अंधकार और प्रकाश का भला साथ कैसा ? सुग्रीव तक की बात तो उनको ठीक लग रही है, क्योंकि सुग्रीव की भी परम्परा सूर्य से जुड़ी हुई मानी जाती है । पर विभीषण - यह तो अंधकार की परंपरा में हैं । जब विभीषण से परिचय पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मैं रावण का भाई हूँ । बन्दरों ने सुना तो विभीषण जी को रोककर सुग्रीव को सूचना दी कि रावण का भाई प्रभु से मिलने आया हुआ है । प्रभु ने जब देखा कि सुग्रीव के कान में कोई सूचना दी जा रही है, तो भगवान ने पूछा - मित्र ! क्या सूचना है ? सुग्रीव ने कहा - महाराज ! रावण का भाई आपसे मिलने आया हुआ है । आगे सुग्रीव ने इशारों में कहा कि महाराज ! यह प्रेम की भाषा तो हो सकती है कि अगर कोई आया है, तो उसको बुला लो । पर राजनीति की भाषा नहीं है । प्रेम में तो हो सकता है कि सबको अपना लो,  पर नीति तो यही कहती है कि पहले व्यक्ति की परीक्षा लो और पूरी तरह से परख कर तब उसे स्वीकार करो ।
           लेकिन भगवान श्रीराम क्या करने के लिए आये हुए हैं ? इसका स्पष्टीकरण करते हुए रामायण में गुरु वसिष्ठ कहते हैं कि यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति को यही लगता है कि नीति और प्रीति एक दूसरे की विरोधी बातें हैं । क्योंकि जो बहुत प्रेम करेगा वह राजनीति में सफल नहीं होगा । और जो राजनीतिज्ञ होगा वह प्रेम के चक्कर से बचेगा । और इसी प्रकार की मान्यता यह भी है कि जो स्वार्थी होता है, वह परमार्थ तत्व से दूर चला जाता है और जो परमार्थ तत्व की ओर बढ़ता है, वह व्यक्ति स्वार्थ का परित्याग करता है । पर गुरु वसिष्ठ ने कहा - भगवान राम केवल व्यक्तियों को ही एक सूत्र में आबद्ध नहीं कर रहे हैं, अपितु प्रभु तो कहते हैं कि ये जो परस्पर विरोधी दिखायी देने वाली वस्तुएँ हैं, इन्हें भी एक सूत्र में आबद्ध किया जा सकता है ।

Saturday, 8 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान राम की अयोध्या से लेकर लंका तक की यात्रा में यदि क्रम से देखेंगे तो आपको दिखायी देगा कि भगवान श्रीराघवेन्द्र पहले मनुष्य और मनुष्य में सामीप्य की सृष्टि करते हैं । फिर मनुष्य तथा पशु-पक्षियों में जो दूरी विद्यमान थी उसे समाप्त करते हैं । और फिर मनुष्यों तथा राक्षसों में सामीप्य की सृष्टि करते हैं । इस तरह से यह कह सकते हैं कि भगवान श्रीराम ने अपनी सारी यात्राओं के द्वारा सबको मिलाकर एक कर दिया । और मिलाने की इस कला की अन्तिम परिणति रामराज्य के रूप में होती है । क्योंकि रामराज्य तब तक नहीं बन सकता, जब तक सारा समाज भगवान राम के प्रेम-सूत्र में आबद्ध नहीं हो जाता ।

Friday, 7 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान श्रीराघवेन्द्र के चरित्र में यात्राओं के प्रसंग बहुत से हैं । प्रभु अयोध्या से विश्वामित्र के आश्रम की यात्रा करते हैं । विश्वामित्र के आश्रम से जनकपुर - यात्रा का एक दूसरा रूप है और जनकपुर से वापस लौटकर, भगवान राम की अयोध्या से चित्रकूट तक तीसरी बड़ी लम्बी यात्रा है । चित्रकूट में कुछ समय व्यतीत करने के बाद भगवान राम दण्डकारण्य की ओर प्रस्थान करते हैं, यह भगवान राम की चौथी बड़ी यात्रा है । उसके पश्चात भगवान दण्डकारण्य से किष्किन्धा की ओर यात्रा प्रारंभ करते हैं । इसके पश्चात भगवान लंका की यात्रा करते हैं । तथा सबसे अन्त में पुनः लंका से अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं ।
          भगवान राम की इन विविध यात्राओं को आप सामाजिक तथा आध्यात्मिक दोनों ही सन्दर्भों में देख सकते हैं । अगर इसे सामाजिक संदर्भ में देखें तो इसका तात्पर्य है कि इन यात्राओं के द्वारा भगवान राम सबको एक सूत्र में आबद्ध करते हैं । जैसे मणियों को पिरो देने पर भले ही धागा न दिखायी दे, पर बुध्दिमान व्यक्ति जानता है कि धागे में ही मनके पिरोये हुए हैं, उसी तरह से समस्त ब्रह्मांड के मूल में एकमात्र श्रीराम ही विद्यमान हैं । यह बात स्वयं भगवान कृष्ण ने गीता में कही है । और अपने इस सिद्धांत वाक्य को भगवान श्रीराम ने अपने व्यक्तित्व के द्वारा प्रत्यक्ष करके दिखाया । इसका अभिप्राय है कि अयोध्या से लेकर लंका तक की यात्रा में भगवान श्रीराघवेन्द्र सबको एकता के सूत्र में पिरोकर सबको एकत्र करके मानो सब में अपनी अवस्थिति का परिचय देते हुए दिखायी देते हैं ।

Thursday, 6 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

महर्षि भरद्वाज ने प्रभु की प्रशंसा करते हुए - *सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं* - के रूप में जो वाक्य कहा वह सर्वथा यथार्थ है । क्योंकि भगवान श्रीराम ने अपने चरित्र में कर्म-मार्ग, ज्ञान-मार्ग तथा भक्ति-मार्ग अथवा शास्त्रों में जितने मार्गों का वर्णन किया गया है उन समस्त मार्गों पर चलकर स्वयं उनकी परीक्षा ली । जिस मार्ग पर जिस पध्दति से चलना चाहिए भगवान राम उस मार्ग पर उसी पध्दति से चलते हैं । और सारे मार्गों पर चलने में जो समस्याएँ आती हैं, प्रत्येक मार्ग में चलने का जो कौशल होता है, भगवान राम अपने चरित्र के द्वारा उन सबका दिग्ददर्शन करते हैं । इस प्रकार भगवान राम मार्गों में जितनी भी विधि है, उन सबको स्वीकार करते हैं ।

Wednesday, 5 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

विज्ञान के दो भाग होते हैं । विज्ञान का एक भाग वह है जिसमें सिध्दांत की शिक्षा दी जाती है, तथा विज्ञान का दूसरा भाग वह है जिसमें प्रयोग के द्वारा विज्ञान के उन सिध्दांतों की सत्यता की परख की जाती है । यदि सिध्दांत प्रतिपादित न किया जाय तो व्यक्ति किस आधार पर प्रयोग करेगा और प्रयोग के बिना उस सिध्दांत की सत्यता सिध्द नहीं होगी, अतः उसकी वास्तविकता को सिध्द करने के लिए प्रयोग आवश्यक है । इसी प्रकार गीता में सूत्र के रूप में जो सिध्दांत कहे गये हैं रामचरितमानस में उन्हीं का क्रियात्मक रुप है । भगवान राम ने उन सिध्दांतों का अपने चरित्र में पहले पालन और निर्वाह किया । श्रीराम के रूप में भगवान श्रीराम ने उपदेश बहुत कम दिया और श्री कृष्ण के रूप में उपदेश बहुत दिया । यह बड़ी सुनियोजित योजना थी भगवान की । क्योंकि अगर आप अपने जीवन में समझे हुए सत्य को उपदेश के रूप में कहें, जिसका अनुभव आप ने स्वयं किया है, तो सामने वाले को पूरा विश्वास दिला सकते हैं, पर अगर आप केवल सुनी-सुनाई या पढ़ी पढ़ायी बात सुना दें तो सुनने वाले को पूरा विश्वास नहीं होगा । इसीलिए गीता के जितने सिध्दांत हैं, भगवान राम के रूप में स्वयं उन्होंने पहले उन सबको क्रियान्वित किया, और उसकी सत्यता का समग्र अनुभव करने के बाद जब वे कृष्ण के रूप में अवतरित होते हैं तो उन्हीं सिध्दांतों का उपदेश देते हैं ।

Tuesday, 4 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

आप आदि से अन्त तक रामचरितमानस का अध्ययन करेंगे तो ज्ञात होगा कि भगवान राम का व्यक्तित्व क्या है, भगवान राम का चरित्र क्या है । वैसे वे साक्षात ईश्वर तो हैं ही पर ईश्वर होने के साथ-साथ उन्होंने जो नर चरित्र किया है, वह कोई साधारण नहीं है । अपितु शास्त्रों और पुराणों में जिन सिध्दांतों का प्रतिपादन किया गया है, जो उपदेश दिये गये हैं, उन्हीं का समग्र आचरित रूप ही श्रीराम के रूप में प्रकट होता है । गीता के सन्दर्भ में इसे देखें तो यह कह सकते हैं कि गीता में जिसे सूत्र के रूप में कहा गया है रामायण में उसे क्रियात्मक रूप में प्रत्यक्ष प्रदर्शित किया गया है ।

Monday, 3 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

जिसको जो मार्ग सुगम हो उसको उसी मार्ग का आश्रय लेना चाहिए । व्यावहारिक जीवन में भी सफलता का मूल मंत्र यही है । बहुधा यह देखा जाता है कि व्यावहारिक जीवन में जो व्यक्ति असफल होते हैं, उन्हें अधिकांश व्यक्ति यह कहते हैं कि यह व्यक्ति तो बड़ा अयोग्य है । पर किसी व्यक्ति का असफल हो जाना उसकी अयोग्यता का सच्चा परिचायक नहीं है । संस्कृत में एक वाक्य में कहा गया कि वस्तुतः कोई व्यक्ति अयोग्य नहीं होता बल्कि होता यह है कि जिस व्यक्ति में जो योग्यता है, उससे भिन्न काम उसे यदि दे दिया जायेगा तो वह व्यक्ति उसमें अयोग्य ही सिध्द होगा । इसका अभिप्राय है कि जिस कार्य में रुचि है, अगर वह कार्य हमें व्यावहारिक जीवन में भी मिले तो हम सफल हो सकते हैं । पर योग्य कहे जाने वाले व्यक्ति को भी यदि ऐसा कार्य दे दिया जाय जिसका उसे अभ्यास नहीं है, तो वह भी अयोग्य सिध्द हो जायेगा । इसलिए संस्कृत में एक वाक्य में कह दिया गया कि संसार में कोई अयोग्य व्यक्ति है ही नहीं, पर उसकी योग्यता को परखकर उससे उपयुक्त काम लेने वाले संसार में दुर्लभ हैं ।

Sunday, 2 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामचरितमानस में भक्ति मार्ग की सुगमता की ओर संकेत किया गया है, पर विनय-पत्रिका में ठीक इससे उल्टी बात आप पायेंगे । वहाँ पर तो गोस्वामीजी कहते हैं - रघुपति भगति करत कठिनाई । - भगवान की भक्ति करना अत्यंत कठिन है । गोस्वामीजी से यह प्रश्न किया गया कि एक ओर तो आप रामचरितमानस में भक्ति मार्ग की सरलता की ओर संकेत करते हैं, और दूसरी ओर विनय पत्रिका में उसे अत्यंत कठिन बताते हैं । तो रामचरितमानस का वाक्य प्रामाणिक है या विनयपत्रिका का ? वस्तुतः भक्ति मार्ग सुगम है या अगम ? उस समय गोस्वामीजी ने इस प्रश्न का उत्तर उस पद में बड़ा सुलझा हुआ दिया है । उन्होंने कहा कि सुगमता और अगमता वस्तुतः व्यक्ति की अपनी-अपनी प्रतीति है । इसका सूत्र देते हुए वे कहते हैं कि जो व्यक्ति जिस कला में निपुण है, उसके लिए वही सुगम है, जो निपुण नहीं है, उसके लिए कठिन है । और बड़ा सुन्दर दृष्टांत देते हुए उन्होंने कहा कि नदी की धारा अगर तीव्र वेग से बह रही है, तो धारा को पार करना सरल है या कठिन ? इस प्रश्न का उत्तर दो पात्रों से पूछ कर देख लीजिए । और वे दोनों पात्र हैं, एक तो छोटी सी मछली तथा दूसरा विशालकाय हाथी । और दोनों से यह प्रश्न जब पूछा जायेगा तब हाथी तो कहेगा कि मेरे लिए कठिन है । परन्तु मछली कहेगी कि यह तो बड़ा सरल कार्य है, क्योंकि जल की उल्टी धारा में मछली तैर कर चली जाती है, और विशाल काय हाथी धारा के तीव्र प्रवाह में बह जाता है । गोस्वामीजी का अभिप्राय है कि हमें सरलता और कठिनता शब्द में उलझने की आवश्यकता नहीं है । बल्कि हमें तो यह निर्णय करने की आवश्यकता है कि हमारे लिए सुगम क्या और अगम क्या है । क्योंकि किसी के लिए कर्म-मार्ग सुगम है, किसी के लिए ज्ञान-मार्ग और किसी के लिए भक्ति-मार्ग सुगम है और जो मार्ग किसी एक के लिए सुगम है, वही दूसरे के लिए अगम बन जाता है ।

Saturday, 1 April 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

कर्म, ज्ञान और भक्ति मार्गों में जब भक्ति पथ की प्रशंसा की गयी, तो यही कहकर की गयी कि यह मार्ग अत्यंत सुगम और सरल है -
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा,
योग न जप तप मख उपवासा ।
- इस पंक्ति से ऐसा प्रतीत होता है कि भक्ति मार्ग अत्यंत सरल है । और मानस में ही ऐसी पंक्तियाँ मिलती हैं, जिनको पढ़कर ऐसा लगता है कि जैसे ज्ञान का मार्ग अत्यंत कठिन है । उत्तरकाण्ड में गोस्वामीजी कहते हैं -
ग्यान पंथ कृपान कै धारा ।
परत खगेस होइ नहीं बारा ।।
- इस तरह ज्ञान के मार्ग की कठिनता की ओर संकेत किया गया । लेकिन यह जो ज्ञान मार्ग की कठिनाई है और भक्ति मार्ग की सरलता है, यह तो कहने वाले की अपनी अनुभूति है, इसे सिध्दांत वाक्य मानने की कोई आवश्यकता नहीं है ।