सुग्रीव विषयों और भोगों को पाकर कुछ समय के लिए विषय-विमूढ़ और भ्रान्त से हो जाते हैं और अंगद ? अंगद और सुग्रीव में जो भिन्नता है, उसे गोस्वामीजी ने बड़े सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है । अंगद की भूमिका और सुग्रीव की भूमिका में बड़ा विलक्षण अन्तर है । लक्ष्मणजी जब सुग्रीव को डराने नगर में पहुँचे तो धनुष चढ़ाकर कहा कि मैं सारे नगर को जलाकर नष्ट कर दूँगा, तब अंगद की भूमिका सामने आयी । जब सुग्रीव ने सुना कि लक्ष्मणजी आये हैं, तो वह बेचारा डर के मारे घर में जाकर छुप गया और अंगद ने क्या किया ? उन्होंने तो बिल्कुल उल्टा काम किया, नगर को व्याकुल देखकर बालि के पुत्र अंगद आये । अंगद लक्ष्मणजी के चरणों में प्रणाम करते हैं और लक्ष्मणजी तत्काल उनकी बाँह पकड़कर कहते हैं कि अंगद ! तुम्हारे लिए तो कहीं रंचमात्र भी भय का प्रश्न नहीं है । वस्तुतः यह अंगद और सुग्रीव के चरित्र का जो सूत्र है, उसको हम यों कह सकते हैं कि एक पात्र ऐसा है, जिसे भय की आवश्यकता है और वह भय के द्वारा ही प्रेरित होता है, दूसरे का चरित्र भय से नहीं, बल्कि विवेक और भक्ति की वृत्ति से प्रेरित होता है, उसे भय की आवश्यकता नहीं होती ।
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