Sunday, 25 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

भगवान श्रीराम ने सुग्रीव को आगे बढ़ाने की चेष्टा की । लेकिन सुग्रीव अपनी भोग-परायण वृत्ति के कारण भोगों को पाते ही उसमें इतने डूब गये और स्वयं को ऐसा भुलावा देने की चेष्टा की, अपने भोगों के पक्ष में ऐसा तर्क खोज लिया कि प्रभु ने श्रीसीताजी का पता लगाने के लिए कहा तो है, पर कोई समय थोड़े ही दिया है कि इतने दिनों के भीतर पता लगाना है । यदि प्रभु ने कोई निश्चित अवधि दी होती, यदि कह दिया होता कि इतने दिनों में पता लगाना है, तो दूसरी बात थी, पर ऐसी कोई जल्दी नहीं है । यह सुग्रीव का अपने आपके प्रति एक बहुत बढ़िया धोखा था, जिसका परिणाम सामने आ गया । हनुमानजी और लक्ष्मणजी जब पहुँचे, तो सुग्रीव डर के मारे काँपने लगे और इसी कारण बाद में बड़े सावधान हो गये । जब बन्दरों को कहा कि श्रीसीताजी का पता लगाकर आओ तो साथ ही यह भी कह दिया " पन्द्रह दिनों के भीतर" । यह पन्द्रह दिन क्यों दे रहे हैं ? बोले कि मैं अनुभव से सीख रहा हूँ । प्रभु ने मुझे समय की सीमा नहीं दी, इसलिए भोग में डूब गया । इसीलिए इन लोगों को अब बता दे रहा हूँ कि यह काम दी हुई समय-सीमा के भीतर ही होना चाहिए ।

No comments:

Post a Comment