Sunday, 28 June 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

व्यक्ति जब अस्वस्थ होता है तो वह निराकरण के लिए डॉक्टर या वैद्य के पास जाता है। डॉक्टर अथवा वैद्य का सबसे पहला कार्य होता है निदान। निदान का तात्पर्य है - रोग के स्वरूप का ठीक - ठीक ज्ञान एवं रोग का मूल कारण। वैद्यों की अपनी अलग पध्दति होती है। वे नाड़ी के माध्यम से रोगों का निदान करते हैं। वे देखते हैं कि वात, पित्त और कफ की नाड़ियों में से किसकी गति तीव्र है और उसके आधार पर वे रोग का निदान करते हैं तथा उसके अनुरूप चिकित्सा करते हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में भी चिकित्सक रोगी के विभिन्न पदार्थों की जाँच करते हैं तथा उसके माध्यम से रोग का पता लगाने की चेष्टा करते हैं और विलक्षणता यह है कि अगर जाँच में कोई कीटाणु पकड़ में न आये, तो चिकित्सक उससे प्रसन्न नहीं होता, क्योंकि वह मानता है कि व्यक्ति अगर अस्वस्थ है, तो उसके भीतर रोग के कीटाणु विद्यमान होने ही चाहिए। कीटाणुओं का पकड़ में न आना जाँच में कमी का परिचायक है, उसके अभाव का परिचायक नहीं और जब चिकित्सक को किसी अन्य परीक्षण से रोग के कीटाणु प्राप्त हो जाते हैं, तो उसे प्रसन्नता इस अर्थ में होती है कि उसके लिए चिकित्सा का मार्ग खुल गया।

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

रोगी दो प्रकार के होते हैं ; एक तो वह है, जो स्वयं रोग से ग्रस्त है और दूसरा वह चिकित्सक है, जो रोग की औषधि का पता लगाने के लिए स्वयं अपने शरीर में उस रोग के कीटाणुओं को प्रविष्ट कराकर रोगी बन जाता है - यह देखने के लिए कि शरीर पर उन कीटाणुओं की क्या प्रतिक्रिया होती है और उसकी औषधि क्या होगी ? अब जो व्यक्ति स्वेच्छापूर्वक अपने शरीर में रोग की सृष्टि करके दवा खोजना चाहता है, वह कितना सह्रदय और उदार होगा। बस, यही उत्कृष्टतम भूमिका भगवान राम की है। वे रोगी और श्रृंगारी की भूमिका को स्वीकार करते हैं, अपनी प्रिया की इच्छा पूर्ण करने के लिए बिना विचार किये मायावी स्वर्णमृग के पीछे दौड़ पड़ते हैं और फलस्वरूप सीताजी को खो बैठते हैं। और तब साधारण व्यक्ति की तरह विरह में रोने लगते हैं। अब जिनके मन में भगवान की पूर्व लीला देखकर विवाह की इच्छा हो आया थी। उन्हें मानो भगवान ने संदेश दिया कि हमारी स्थिति को देखकर समझ लो कि जब हमें इतना रोना पड़ रहा है तो तुम्हें कितना रोना पड़ेगा। भगवान राघवेन्द्र उनके मन में वैराग्य की सृष्टि करने के लिए इस प्रकार की लीला करते हैं। वे अपने दोषों को स्वीकारते हैं और अपनी दुर्बलता पर व्यंग्य करते हैं। इसके माध्यम से वे मानो साधक को बतलाते हैं कि दूसरों का दोष देखना सरल है, पर सच्चा साधक वही है जो अपने में दोष देखे।

Friday, 26 June 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

भगवान राम लोकशिक्षा के लिए अपने जीवन में दुर्गुण को स्वीकार करते हैं। इसलिए जब वे सीताजी के साथ राक्षसों के नाश की भावी योजना बना रहे थे, उन्होंने लक्ष्मणजी को अपने पास से हटा दिया था, क्योंकि उन्हें मालूम था कि लक्ष्मण इसे बिल्कुल पसन्द नहीं करेंगे , वे तो कहेंगे कि महाराज! इसके लिए इतनी बड़ी योजना की क्या आवश्यकता है ? मैं ही सब राक्षसों को मार देता हूँ और लक्ष्मणजी ऐसा करने में समर्थ हैं। उनके बारे में भगवान राम ने कहा ही है - जगत में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मणजी क्षणभर में उन सबको मार सकते हैं। मन में फिर प्रश्न होता है कि जब ऐसी बात थी, तो भगवान केवल लक्ष्मणजी को लेकर ही लंका पर आक्रमण कर सकते थे। तब उन्होंने बानरों की सेना एकत्रित क्यों की ? इसका भी एक तात्पर्य है। ये वानर कौन हैं ? गोस्वामीजी विनयपत्रिका में लिखते हैं - ये सब भालू-वानर मोक्ष के साधन हैं। तात्पर्य यह है कि ईश्वर सर्वसमर्थ होते हुए भी साधनों का आश्रय लेकर लंका पर विजय प्राप्त करता है। इसके माध्यम से वह दिखाना चाहता है कि कहीं भगवत्कृपा का आश्रय लेकर साधक के जीवन में निष्क्रियता न आ जाए। इसलिए समाज के सम्मुख साधना का पक्ष रखने के लिए वे जीवन में त्रुटियों को स्वीकार करते हैं।

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........

प्रसंग आता है कि शू्र्पणखा जिस समय लक्ष्मणजी के पास गयी तो उन्होंने बातों में उसे सुन्दरी कह दिया- यह तो उन्होंने व्यंग्य में कहा था, पर शू्र्पणखा को उससे संतोष और असंतोष दोनों एक साथ हुआ। संतोष इसलिए कि बड़े भाई ने एक बार भी उसके सौन्दर्य की प्रशंसा नहीं की, पर छोटे ने एक बार सुन्दरी तो कहा और असंतोष इसलिए कि वह सुन्दरी तो कह रहा है, पर एक बार भी मेरी ओर नहीं देख रहा है, इसकी दृष्टि है राम की ओर। उधर लक्ष्मणजी का तात्पर्य यह था कि जब तक मैं तुम्हें नहीं देख रहा हूँ, तभी तक तुम सुन्दरी हो। जब देख लूँगा तब तो तुम्हारी सुन्दरता रह ही नहीं जायेगी। इसका अभिप्राय यह है कि जो कामान्ध है, उसकी दृष्टि में तुम सुन्दर हो सकती हो, पर यथार्थ नेत्र वाले के समक्ष तुम्हारी सुन्दरता नहीं टिकेगी। यथार्थ नेत्र कौन से हैं ? ज्ञान और वैराग्य ही यथार्थ नेत्र हैं। जब तक वैराग्य की दृष्टि नहीं पड़ी है, तभी तक तुम्हारा सौन्दर्य है। वैराग्य की दृष्टि पड़ते ही तुम्हारे सौन्दर्य की कृत्रिमता प्रकट हुए बिना नहीं रहेगी।

Wednesday, 24 June 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................

खर-दूषण के नाश के पश्चात शू्र्पणखा निराश होकर रावण के पास जाती है और उसे श्रीराम के विरुद्ध उकसाती है। रावण स्वर्णमृग, कांचन का प्रलोभन भेजता है। पहले ही भगवान राम ने सीताजी से लोभ की भूमिका स्वीकारने के लिए कहा था और स्वयं काम की भूमिका को स्वीकारने वाले थे। सीताजी की दृष्टि स्वर्णमृग पर पड़ती है - शू्र्पणखा की ओर न तो भगवान राम ने देखा था और न लक्ष्मणजी ने, पर सीताजी स्वर्णमृग की ओर देखती हैं और भगवान राम से कहती हैं - हे देव ! कृपालु रघुवीर !! सुनिए ! इस मृग की छाल बहुत ही सुन्दर है। इसको मारकर इसका चमड़ा ला दीजिए। अब श्री राघवेन्द्र इस बात को सुनकर सीताजी से कह सकते थे कि यह मृग नकली है और यदि ऐसा नहीं कहना चाहते थे तो वहीं से बैठे-बैठे मृग पर बाण चलाकर उसे मार सकते थे, पर कमर में फेंटा कसकर मृग के पीछे भाग चले। क्यों? इसलिए कि उन्होंने कामी की भूमिका स्वीकार की थी। और इसलिए वे - कामी लोगों की दीनता दिखलाते हैं। वे प्रिया की इच्छा पूर्ण करने चल पड़े। उन्हें दिखाई नहीं पड़ा कि मृग असली है या नकली। क्यों? गोस्वामीजी कहते हैं - जब जीवन में काम आता है तो आँखें मूँद जाती हैं, असली-नकली कुछ दिखाई नहीं पड़ता।

Tuesday, 23 June 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

यह समझना भूल होगी कि एक बार काम पर विजय प्राप्त कर लेने से, कोई भय नहीं रह जाता है। शू्र्पणखा अकेली नहीं है। वह निराश होकर चुप नहीं बैठती। उसके पास अगणित साधन हैं, जिनके माध्यम से वह बदला लेने की चेष्टा करती है। वह जाती है खर, दूषण और त्रिशिरा के पास और उनके चौदह हजार सैनिकों को राम के विरुद्ध प्रेरित करती है। भगवान राम चौदह सैनिकों सहित तीनों का नाश कर देते हैं। अर्थात उन्होंने समस्त दुर्गुणों का नाश कर दिया, पर यहाँ भी एक क्रम है। जब चौदह हजार राक्षसों की सेना लेकर तीनों आये, तो भगवान राम ने लक्ष्मण से कहा - लक्ष्मण ! राक्षसों की भयानक सेना आ गयी है। जानकीजी को लेकर तुम पर्वत की कन्दरा में चले जाओ। सावधान रहकर सीताजी की रक्षा करना। यहाँ पर सीताजी की रक्षा का अभिप्राय क्या है? यह कि यदि जीवन में वैराग्य है तो भक्ति सुरक्षित है। भक्ति का पक्ष विश्वास का है और विश्वास के बिना वैराग्य नहीं टिकता। तात्पर्य यह है कि जब भक्ति वैराग्य के द्वारा सुरक्षित होती है तब सारे दुर्गुण-दुर्विचार पराजित हो जाते हैं।

Monday, 22 June 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

शू्र्पणखा आती है और भगवान के सामने विवाह का प्रस्ताव रखती है, वह कहती है - मेरे अनुरूप पुरुष जगत भर में नहीं हैं, मैंने तीनों लोकों को खोजकर देखा, इसी से अब तक कुमारी रही। अब तुमको देखकर कुछ चित्त ठहरा है। अब इससे बचने का उपाय क्या है। वही जो भगवान राम ने किया। शू्र्पणखा लंका से आयी है और लंका साक्षात देहनगर है। तो जब देह का आकर्षण सामने आया तो भगवान राम ने सीताजी अर्थात वैदेही की ओर देखा और देखने के साथ-साथ शू्र्पणखा को कहाँ भेजा ? लक्ष्मणजी के पास। इसका आध्यात्मिक तात्पर्य क्या है ? आकर्षण से बचने के दो माध्यम हैं - भक्ति और वैराग्य। श्री सीताजी मूर्तिमती भक्ति हैं और श्री लक्ष्मणजी मूर्तिमान वैराग्य। भगवान राम ने भक्ति की ओर देखा और वासना को वैराग्य के पास भेज दिया और तब लक्ष्मण क्या करते हैं ? लक्ष्मणजी ने बात तो शू्र्पणखा से की, उसके प्रश्नों का उत्तर भी दिया, पर देखते रहे प्रभु की ओर। इसका अर्थ है कि यदि भक्ति की ओर देखते रहें तो वासना का आकर्षण व्यक्ति को विचलित नहीं कर सकता। अथवा यदि भगवान के सौन्दर्य और भगवान के चरणों में दृष्टि बँधी रहे तो वासना मनुष्य को विचलित नहीं कर सकती।

Saturday, 20 June 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

राम चाहते तो चित्रकूट में रहकर दिव्य रस में चौदह वर्ष बिताकर अयोध्या लौट जाते, पर वे जीवन के द्वितीय पक्ष को प्रकट करने दण्डकारण्य जाने का निर्णय लेते हैं। चित्रकूट की भूमि जितनी पवित्र थी , दण्डकारण्य की भूमि उतनी ही अपवित्र। अत: जब लक्ष्मण वन में कन्द-मूल-फल लेने जाते हैं, तो भगवान राम सीताजी से कहते हैं, "सीते! चित्रकूट की भूमिका अब समाप्त होती है। चित्रकूट में तुमने और मैंने जिस दिव्य सुख का, भक्ति और भगवान के मिलन की परिपूर्णता का अनुभव किया, वह पक्ष समाज के सामने रखा, लेकिन उस पक्ष में भी जिसकी दृष्टि में पवित्रता नहीं थी, अन्तःकरण में वासना थी, उसमें भ्रांति उत्पन्न हुई। अब जीवन की विकृति-विसंगतियों का जो दूसरा पक्ष है, उसकी भूमिका तुम्हें भी स्वीकारनी होगी और मुझे भी। इसलिए भगवान राम अरण्यकांड में न तो अपने ईश्वरत्व को प्रकट करते हैं, न ही अपने गुणों को।

Friday, 19 June 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........

 उठता है कि भगवान श्री राघवेन्द्र चित्रकूट को छोड़कर दण्डकारण्य में क्यों जाते हैं ? वहाँ तो उनके दिन बड़े आनन्द में ही बीत रहे थे। फिर सीताजी भी चित्रकूट में इतनी सुखी थीं, उनका मन श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में अनुरक्त है, इससे उनको वन हजारों अवध के समान प्रिय लगता है। तो, जब चित्रकूट में सब प्रकार से सबको आनन्द ही आनन्द था, तब तो यही उचित होता कि भगवान राम चौदह वर्ष वहीं रह जाते और वनवास का काल समाप्त होने पर अयोध्या लौटकर सिंहासन पर बैठ जाते। तब भी भगवान श्रीराम चित्रकूट के आनन्द को छोड़कर दण्डकारण्य चले जाते हैं। क्यों? आप देखेंगे कि चित्रकूट का प्रसंग अयोध्याकांड के अन्त में है, पर वह वहीं समाप्त नहीं होता। अरण्यकांड के प्रारंभ में भी हम उसका प्रसंग पाते हैं। अरण्यकांड का प्रारंभ एक घटना से होता है। भगवान राम वन में जाकर पुष्प चुनकर लाते हैं और उनके गहने बनाते हैं तथा उन गहनों से सीताजी का श्रृंगार करते हैं। जब भगवान राम सीताजी का श्रृंगार करके बैठे हुए थे तो स्वर्ग से इन्द्र का पुत्र जयंत यह सुनकर कि पृथ्वी पर ईश्वर का अवतार हुआ है, चित्रकूट में उनके दर्शन के लिए पहुँचता है, पर वहाँ आकर उसने ईश्वर को जो कुछ करते देखा, उससे उसके अन्तःकरण में ईश्वर के ईश्वरत्व पर श्रद्धा तो हुई नहीं , बल्कि उसे लगा कि यह तो स्वर्ग का नित्यप्रति का दृश्य है। देवतागण अप्सराओं का श्रृंगार करते ही हैं। क्या यही ईश्वर है जो फूलों के गहने बनाकर अपनी प्रिया का श्रृंगार कर रहा है ? यह कैसा ईश्वर है, जो वनवासी-तपस्वी बनकर चौदह वर्षों के लिए वन में आया है और यहां श्रृंगार लीला में लिप्त है ? और तब जयंत को इतना बुरा लगता है कि वह कौए के रूप में आकर सीताजी के चरणों में चोंच से प्रहार करता है। भगवान राघवेन्द्र भक्तिदेवी का रंचमात्र भी रक्त बहता हुआ नहीं देख सकते। इसलिए वे जयंत को दण्ड देते हैं और साथ ही संकल्प लेते हैं कि जब चित्रकूट जैसी पुण्यभूमि में स्वर्ग से आये इन्द्र के पुत्र जयंत जैसे व्यक्ति के मन में मेरे चरित्र को देखकर भ्रांति उत्पन्न हो गयी, तो मुझे इस स्थल का परित्याग कर भिन्न भूमि में प्रवेश करना चाहिए, जहाँ मैं जीवन की विकृतियों और दुर्गुणों का जो दूसरा पक्ष है, उसे प्रकट कर सकूँ।

Wednesday, 17 June 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........

भगवान श्रीकृष्ण गीता में काम का परिणाम लोभ न बताकर सीधे क्रोध ही बताते हैं। संग से कामना उत्पन्न होती है और कामना से क्रोध जन्म लेता है। लगता है कि बीच की कड़ी टूटी हुई है। यह भी तो वे कह सकते थे कि कामना से लोभ जन्म लेता है। पर वह न कहकर कामना से क्रोध उत्पन्न होने की बात कहते हैं। कारण यह है कि व्यक्ति के मन में जब कामना पूर्ति से लोभ की वृत्ति उत्पन्न होगी, तो वह कभी संतुष्ट तो होगी नहीं और असंतोष क्रोध को ही जन्म देगा।  इसलिए उन्होंने काम के पश्चात सीधे क्रोध के ही उत्पन्न होने की बात कही।

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्........

आयुर्वेद में मान्यता है कि व्यक्ति के शरीर में कफ, वात और पित्त स्वयं गतिशील नहीं हैं, अपितु वात ही इन दोनों को गति प्रदान करता है। महर्षि चरक के सामने जब यह प्रश्न किया गया कि कफ, वात और पित्त में किसे प्रमुखता दें, तो उन्होंने उत्तर में वात की मुख्यता ही प्रतिपादित की। वात ही शरीर की अन्य धातुओ को सक्रिय बनाता है, इसलिए वही सारी विकृतियों के मूल में है। इसी प्रकार मानस-रोगों के संदर्भ में लोभ और क्रोध के मूल में कहीं न कहीं पर काम ही विद्यमान है। यहाँ पर काम को व्यापक अर्थों में लेना होगा। सभी प्रकार की कामना को हम काम कह सकते हैं। इस काम की दो दिशाएँ हैं - एक है लोभ और दूसरी है क्रोध। जब मनुष्य के मन में काम का जन्म होता है और जब उस कामना की पूर्ति होती है, तब उसके भीतर लोभ जन्म लेता है। कामना पूर्ति से मनुष्य को संतोष नहीं होता, अपितु उसकी इच्छा बढ़ती जाती है। दूसरी ओर, यदि कामना की पूर्ति में बाधा आयेगी, तो व्यक्ति में क्रोध उत्पन्न होगा। इस प्रकार जो कामना मूल में है, उसी का परिणाम होता है लोभ या फिर क्रोध।