उठता है कि भगवान श्री राघवेन्द्र चित्रकूट को छोड़कर दण्डकारण्य में क्यों जाते हैं ? वहाँ तो उनके दिन बड़े आनन्द में ही बीत रहे थे। फिर सीताजी भी चित्रकूट में इतनी सुखी थीं, उनका मन श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में अनुरक्त है, इससे उनको वन हजारों अवध के समान प्रिय लगता है। तो, जब चित्रकूट में सब प्रकार से सबको आनन्द ही आनन्द था, तब तो यही उचित होता कि भगवान राम चौदह वर्ष वहीं रह जाते और वनवास का काल समाप्त होने पर अयोध्या लौटकर सिंहासन पर बैठ जाते। तब भी भगवान श्रीराम चित्रकूट के आनन्द को छोड़कर दण्डकारण्य चले जाते हैं। क्यों? आप देखेंगे कि चित्रकूट का प्रसंग अयोध्याकांड के अन्त में है, पर वह वहीं समाप्त नहीं होता। अरण्यकांड के प्रारंभ में भी हम उसका प्रसंग पाते हैं। अरण्यकांड का प्रारंभ एक घटना से होता है। भगवान राम वन में जाकर पुष्प चुनकर लाते हैं और उनके गहने बनाते हैं तथा उन गहनों से सीताजी का श्रृंगार करते हैं। जब भगवान राम सीताजी का श्रृंगार करके बैठे हुए थे तो स्वर्ग से इन्द्र का पुत्र जयंत यह सुनकर कि पृथ्वी पर ईश्वर का अवतार हुआ है, चित्रकूट में उनके दर्शन के लिए पहुँचता है, पर वहाँ आकर उसने ईश्वर को जो कुछ करते देखा, उससे उसके अन्तःकरण में ईश्वर के ईश्वरत्व पर श्रद्धा तो हुई नहीं , बल्कि उसे लगा कि यह तो स्वर्ग का नित्यप्रति का दृश्य है। देवतागण अप्सराओं का श्रृंगार करते ही हैं। क्या यही ईश्वर है जो फूलों के गहने बनाकर अपनी प्रिया का श्रृंगार कर रहा है ? यह कैसा ईश्वर है, जो वनवासी-तपस्वी बनकर चौदह वर्षों के लिए वन में आया है और यहां श्रृंगार लीला में लिप्त है ? और तब जयंत को इतना बुरा लगता है कि वह कौए के रूप में आकर सीताजी के चरणों में चोंच से प्रहार करता है। भगवान राघवेन्द्र भक्तिदेवी का रंचमात्र भी रक्त बहता हुआ नहीं देख सकते। इसलिए वे जयंत को दण्ड देते हैं और साथ ही संकल्प लेते हैं कि जब चित्रकूट जैसी पुण्यभूमि में स्वर्ग से आये इन्द्र के पुत्र जयंत जैसे व्यक्ति के मन में मेरे चरित्र को देखकर भ्रांति उत्पन्न हो गयी, तो मुझे इस स्थल का परित्याग कर भिन्न भूमि में प्रवेश करना चाहिए, जहाँ मैं जीवन की विकृतियों और दुर्गुणों का जो दूसरा पक्ष है, उसे प्रकट कर सकूँ।
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