राम चाहते तो चित्रकूट में रहकर दिव्य रस में चौदह वर्ष बिताकर अयोध्या लौट जाते, पर वे जीवन के द्वितीय पक्ष को प्रकट करने दण्डकारण्य जाने का निर्णय लेते हैं। चित्रकूट की भूमि जितनी पवित्र थी , दण्डकारण्य की भूमि उतनी ही अपवित्र। अत: जब लक्ष्मण वन में कन्द-मूल-फल लेने जाते हैं, तो भगवान राम सीताजी से कहते हैं, "सीते! चित्रकूट की भूमिका अब समाप्त होती है। चित्रकूट में तुमने और मैंने जिस दिव्य सुख का, भक्ति और भगवान के मिलन की परिपूर्णता का अनुभव किया, वह पक्ष समाज के सामने रखा, लेकिन उस पक्ष में भी जिसकी दृष्टि में पवित्रता नहीं थी, अन्तःकरण में वासना थी, उसमें भ्रांति उत्पन्न हुई। अब जीवन की विकृति-विसंगतियों का जो दूसरा पक्ष है, उसकी भूमिका तुम्हें भी स्वीकारनी होगी और मुझे भी। इसलिए भगवान राम अरण्यकांड में न तो अपने ईश्वरत्व को प्रकट करते हैं, न ही अपने गुणों को।
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