रोगी दो प्रकार के होते हैं ; एक तो वह है, जो स्वयं रोग से ग्रस्त है और दूसरा वह चिकित्सक है, जो रोग की औषधि का पता लगाने के लिए स्वयं अपने शरीर में उस रोग के कीटाणुओं को प्रविष्ट कराकर रोगी बन जाता है - यह देखने के लिए कि शरीर पर उन कीटाणुओं की क्या प्रतिक्रिया होती है और उसकी औषधि क्या होगी ? अब जो व्यक्ति स्वेच्छापूर्वक अपने शरीर में रोग की सृष्टि करके दवा खोजना चाहता है, वह कितना सह्रदय और उदार होगा। बस, यही उत्कृष्टतम भूमिका भगवान राम की है। वे रोगी और श्रृंगारी की भूमिका को स्वीकार करते हैं, अपनी प्रिया की इच्छा पूर्ण करने के लिए बिना विचार किये मायावी स्वर्णमृग के पीछे दौड़ पड़ते हैं और फलस्वरूप सीताजी को खो बैठते हैं। और तब साधारण व्यक्ति की तरह विरह में रोने लगते हैं। अब जिनके मन में भगवान की पूर्व लीला देखकर विवाह की इच्छा हो आया थी। उन्हें मानो भगवान ने संदेश दिया कि हमारी स्थिति को देखकर समझ लो कि जब हमें इतना रोना पड़ रहा है तो तुम्हें कितना रोना पड़ेगा। भगवान राघवेन्द्र उनके मन में वैराग्य की सृष्टि करने के लिए इस प्रकार की लीला करते हैं। वे अपने दोषों को स्वीकारते हैं और अपनी दुर्बलता पर व्यंग्य करते हैं। इसके माध्यम से वे मानो साधक को बतलाते हैं कि दूसरों का दोष देखना सरल है, पर सच्चा साधक वही है जो अपने में दोष देखे।
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