Friday, 26 June 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........

प्रसंग आता है कि शू्र्पणखा जिस समय लक्ष्मणजी के पास गयी तो उन्होंने बातों में उसे सुन्दरी कह दिया- यह तो उन्होंने व्यंग्य में कहा था, पर शू्र्पणखा को उससे संतोष और असंतोष दोनों एक साथ हुआ। संतोष इसलिए कि बड़े भाई ने एक बार भी उसके सौन्दर्य की प्रशंसा नहीं की, पर छोटे ने एक बार सुन्दरी तो कहा और असंतोष इसलिए कि वह सुन्दरी तो कह रहा है, पर एक बार भी मेरी ओर नहीं देख रहा है, इसकी दृष्टि है राम की ओर। उधर लक्ष्मणजी का तात्पर्य यह था कि जब तक मैं तुम्हें नहीं देख रहा हूँ, तभी तक तुम सुन्दरी हो। जब देख लूँगा तब तो तुम्हारी सुन्दरता रह ही नहीं जायेगी। इसका अभिप्राय यह है कि जो कामान्ध है, उसकी दृष्टि में तुम सुन्दर हो सकती हो, पर यथार्थ नेत्र वाले के समक्ष तुम्हारी सुन्दरता नहीं टिकेगी। यथार्थ नेत्र कौन से हैं ? ज्ञान और वैराग्य ही यथार्थ नेत्र हैं। जब तक वैराग्य की दृष्टि नहीं पड़ी है, तभी तक तुम्हारा सौन्दर्य है। वैराग्य की दृष्टि पड़ते ही तुम्हारे सौन्दर्य की कृत्रिमता प्रकट हुए बिना नहीं रहेगी।

No comments:

Post a Comment