खर-दूषण के नाश के पश्चात शू्र्पणखा निराश होकर रावण के पास जाती है और उसे श्रीराम के विरुद्ध उकसाती है। रावण स्वर्णमृग, कांचन का प्रलोभन भेजता है। पहले ही भगवान राम ने सीताजी से लोभ की भूमिका स्वीकारने के लिए कहा था और स्वयं काम की भूमिका को स्वीकारने वाले थे। सीताजी की दृष्टि स्वर्णमृग पर पड़ती है - शू्र्पणखा की ओर न तो भगवान राम ने देखा था और न लक्ष्मणजी ने, पर सीताजी स्वर्णमृग की ओर देखती हैं और भगवान राम से कहती हैं - हे देव ! कृपालु रघुवीर !! सुनिए ! इस मृग की छाल बहुत ही सुन्दर है। इसको मारकर इसका चमड़ा ला दीजिए। अब श्री राघवेन्द्र इस बात को सुनकर सीताजी से कह सकते थे कि यह मृग नकली है और यदि ऐसा नहीं कहना चाहते थे तो वहीं से बैठे-बैठे मृग पर बाण चलाकर उसे मार सकते थे, पर कमर में फेंटा कसकर मृग के पीछे भाग चले। क्यों? इसलिए कि उन्होंने कामी की भूमिका स्वीकार की थी। और इसलिए वे - कामी लोगों की दीनता दिखलाते हैं। वे प्रिया की इच्छा पूर्ण करने चल पड़े। उन्हें दिखाई नहीं पड़ा कि मृग असली है या नकली। क्यों? गोस्वामीजी कहते हैं - जब जीवन में काम आता है तो आँखें मूँद जाती हैं, असली-नकली कुछ दिखाई नहीं पड़ता।
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