आयुर्वेद में मान्यता है कि व्यक्ति के शरीर में कफ, वात और पित्त स्वयं गतिशील नहीं हैं, अपितु वात ही इन दोनों को गति प्रदान करता है। महर्षि चरक के सामने जब यह प्रश्न किया गया कि कफ, वात और पित्त में किसे प्रमुखता दें, तो उन्होंने उत्तर में वात की मुख्यता ही प्रतिपादित की। वात ही शरीर की अन्य धातुओ को सक्रिय बनाता है, इसलिए वही सारी विकृतियों के मूल में है। इसी प्रकार मानस-रोगों के संदर्भ में लोभ और क्रोध के मूल में कहीं न कहीं पर काम ही विद्यमान है। यहाँ पर काम को व्यापक अर्थों में लेना होगा। सभी प्रकार की कामना को हम काम कह सकते हैं। इस काम की दो दिशाएँ हैं - एक है लोभ और दूसरी है क्रोध। जब मनुष्य के मन में काम का जन्म होता है और जब उस कामना की पूर्ति होती है, तब उसके भीतर लोभ जन्म लेता है। कामना पूर्ति से मनुष्य को संतोष नहीं होता, अपितु उसकी इच्छा बढ़ती जाती है। दूसरी ओर, यदि कामना की पूर्ति में बाधा आयेगी, तो व्यक्ति में क्रोध उत्पन्न होगा। इस प्रकार जो कामना मूल में है, उसी का परिणाम होता है लोभ या फिर क्रोध।
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