शू्र्पणखा आती है और भगवान के सामने विवाह का प्रस्ताव रखती है, वह कहती है - मेरे अनुरूप पुरुष जगत भर में नहीं हैं, मैंने तीनों लोकों को खोजकर देखा, इसी से अब तक कुमारी रही। अब तुमको देखकर कुछ चित्त ठहरा है। अब इससे बचने का उपाय क्या है। वही जो भगवान राम ने किया। शू्र्पणखा लंका से आयी है और लंका साक्षात देहनगर है। तो जब देह का आकर्षण सामने आया तो भगवान राम ने सीताजी अर्थात वैदेही की ओर देखा और देखने के साथ-साथ शू्र्पणखा को कहाँ भेजा ? लक्ष्मणजी के पास। इसका आध्यात्मिक तात्पर्य क्या है ? आकर्षण से बचने के दो माध्यम हैं - भक्ति और वैराग्य। श्री सीताजी मूर्तिमती भक्ति हैं और श्री लक्ष्मणजी मूर्तिमान वैराग्य। भगवान राम ने भक्ति की ओर देखा और वासना को वैराग्य के पास भेज दिया और तब लक्ष्मण क्या करते हैं ? लक्ष्मणजी ने बात तो शू्र्पणखा से की, उसके प्रश्नों का उत्तर भी दिया, पर देखते रहे प्रभु की ओर। इसका अर्थ है कि यदि भक्ति की ओर देखते रहें तो वासना का आकर्षण व्यक्ति को विचलित नहीं कर सकता। अथवा यदि भगवान के सौन्दर्य और भगवान के चरणों में दृष्टि बँधी रहे तो वासना मनुष्य को विचलित नहीं कर सकती।
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