Sunday, 5 July 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........

व्यक्ति ईश्वर को सुख के लिए पाना चाहता है और काम व्यक्ति के सामने दावा करता है कि मैं तुम्हें सुख दे सकता हूँ। साहित्य में काम का जो वर्णन किया गया है, वह राम से ठीक मिलता -जुलता है। जैसे राम परम सुन्दर हैं, वैसे ही काम को भी परम सुन्दर बताया गया है। राम धनुष-बाणधारी हैं, तो काम भी वैसा है। फिर दोनों का रंग भी साँवला है। शंकरजी ने काम को जला दिया। उनका तात्पर्य था कि तुम राम के स्थान पर आ जाते हो, इसलिए साधक के लिए सबसे अधिक घातक तुम्हीं हो। अतएव तुम्हें मिटा देना चाहिए। जब संसार में कोई मूल्यवान बढ़िया वस्तु बनती है, तो उसके अनुरूप नाम से नकली वस्तु भी बाजार में बिकने आ जाती है। तब नकली वस्तु बनाने वाले नक्कालों से सावधान का विज्ञापन देकर लोगों को सावधान कर देते हैं। सबसे बड़ा खतरा यही है कि असली के धोखे में कहीं नकली वस्तु न खरीद ली जाय। शंकरजी का यही संकेत है।
           ........आगे कल .......

Saturday, 4 July 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

भगवान राम ने शरणागति के संदर्भ में कहा है कि व्यक्ति कैसा भी रोगी क्यों न हो, वह अवश्य स्वथ्य हो जायेगा, पर रोग को दूर करने के लिए उसे कम से कम चार वस्तुओं को छोड़ना पड़ेगा। मेरी शरण में आने के पहले व्यक्ति को मद, मोह, कपट और छल छोड़ देना चाहिए। वैद्य के पास जाने की प्रक्रिया भी यही है। वैद्य के पास अगर व्यक्ति मद को लेकर जाय और यह सोचे कि मैं वैद्य की तुलना में अधिक योग्य हूँ, तब तो वैद्य की दी हुई औषधि और पथ्य पर उसका विश्वास ही नहीं होगा। इसलिए उसको पहले मद छोड़ना होगा। मान लिया कि मद नहीं है, पर यदि वह वैद्य के वचनों को सुनकर भी अपनी इच्छा के अनुकूल आचरण करने लगे, तो वह मोह की स्थिति होगी। फिर यदि वैद्य के पास पहुँचकर रोगी उसे अपने रोगों के विषय में भ्रांति में रखना चाहे, उससे छल-कपट करना चाहे तो इससे वह स्वयं ठगा जायेगा। इस प्रकार भगवान राम शरणागति के संदर्भ में जो बात कहते हैं, वह वैद्य के संदर्भ में भी सही है।

Friday, 3 July 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................

जब गरूड़ भ्रमरोग से अस्वस्थ हुए थे, तब वैद्य ढूँढ़ने के लिए उन्हें कितनी यात्रा करनी पड़ी थी, इसका वर्णन उत्तरकाण्ड में मिलता है। न जाने कितने वैद्यों के पास वे भटके थे। गरूड़ की समस्या यह थी कि जिस वैद्य के पास वे जाते, वह उन्हें दूसरे वैद्य के पास जाने की सलाह देता था। जब वे प्रथम वैद्य नारद के पास पहुँचे, तो उन्होंने कहा, भई ! इस रोग की चिकित्सा मुझसे अच्छी तो ब्रह्माजी कर सकेंगे और जब वे ब्रह्माजी के पास पहुँचे, तो उन्होंने कहा - सबसे बड़े वैद्य तो शंकरजी हैं। उनके पास जाओ। जब वे तीसरे श्रेष्ठ वैद्य शंकरजी के पास गये, तो उन्होंने कहा, यदि तुम स्वस्थ होना चाहते हो, तो कौए के पास जाओ। अब नारद, ब्रह्मा और शंकरजी तो बड़े वैद्य थे, उनकी तुलना में काकभुशुण्डि अत्यंत सामान्य थे। तात्पर्य यह है कि किसी व्यक्ति को बड़ा गुरु, बहुत बड़े महापुरुष प्राप्त हो जाएँ तो मात्र उससे उसकी समस्या का समाधान नहीं हो जाता। उसके लिए यह जानना आवश्यक होता है कि स्वयं रोगी की स्थिति क्या है और किस प्रकार के वैद्य से उसको उसे लाभ होगा। इसलिए भगवान शंकर ठीक से निदान करके गरूड़जी को उचित वैद्य के पास भेजते हैं और तब कहीं उनका संशय का रोग दूर होता है।

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

....पिछला से आगे .....
सती भगवान शंकर की प्रिय पत्नी हैं और भगवान शंकर आध्यात्मिक दृष्टि से वैद्य हैं। जैसे शरीर के रोगों को वैद्य दूर करता है, उसी प्रकार मन के रोगों को गुरु दूर करता है। अन्य गुरु तो कुछ लोगों के ही गुरु होते हैं, पर भगवान शंकर के बारे में कहा गया है कि वे त्रिभुवन-गुरु हैं। इसका अभिप्राय क्या है ? भले ही सती संसार के सर्वश्रेष्ठ गुरु की पत्नी थीं, पर बहुत बड़े गुरु के शिष्य हो जाने से ही रोग दूर नहीं हो जाता। सतीजी के संदर्भ में तो यह बड़े पते की बात है। वे अपने रोग को छिपाना चाहती हैं। भगवान शंकर जैसे वैद्य ने यह बताने की चेष्टा की कि तुम्हें रोग हो गया है। सतीजी का सौभाग्य यह था कि उन्हें ढूँढ़ने कहीं अन्यत्र नहीं जाना था। वैद्य तो साथ ही चल रहे थे। लेकिन संसार में, विशेषकर मानसिक रोगियों में, अपने रोग छिपाने की जो प्रवृत्ति बहुधा देखी जाती है, सतीजी उससे ग्रस्त हैं। वे भगवान शंकर से न तो अपने संदेह का वर्णन करती हैं, न ही अपने मोह तथा भ्रम की।

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........

यह रामचरितमानस क्या है ? चिकित्सा के संदर्भ में यदि हम देखें, तो इसमें विचित्र रोगियों का वर्णन किया गया है। उन रोगियों में कुछ ऐसे हैं, जो स्वथ्य हो जाते हैं और कुछ ऐसे भी हैं, जो स्वथ्य नहीं हो पाते। इन रोगियों के दृष्टान्तों के माध्यम से मानो यह बताया गया है कि किस प्रकार के व्यक्ति स्वस्थ होते हैं और किस प्रकार के रोगियों की अस्वस्थता दूर नहीं होती। जैसे सती हैं। उनके चरित्र में एक रोग उत्पन्न होता है और वह इस सीमा तक पहुँच जाता है कि उन्हें शरीर का परित्याग करना पड़ता है। पीलिया एक रोग है, जिसमें नेत्रों में पीलापन आ जाता है। जब यह रोग बहुत बढ़ जाता है, तब व्यक्ति को सारी वस्तुएँ पीली दिखाई देने लगती हैं। वस्तु तो ज्यों की त्यों होती है, पर आँखों का रंग बदल जाने से वस्तु भी बदली हुई दिखाई देती है। तो, सती के जीवन में ऐसे ही  मानसिक पीलिया का जन्म होता है। वे वन में भगवान राम को सीता के वियोग में विलाप करते हुए देखती हैं और जब भगवान शंकर उन्हें ईश्वर और सच्चिदानन्द कहकर दूर से प्रणाम करते हैं, तो वे चकित हो जाती हैं, क्योंकि श्रीराम उन्हें अत्यंत साधारण व्यक्ति दिखाई पड़ते हैं। भगवान शंकर चाहते हैं कि सती का यह रोग किसी प्रकार दूर हो, पर उनके जैसे कुशल चिकित्सक के होने पर भी सती का रोग इस जन्म में दूर नहीं होता।
         

Wednesday, 1 July 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..................

वैद्य नाड़ी के माध्यम से देखता है कि व्यक्ति के शरीर में पित्त, कफ अथवा वात में से कौन सी नाड़ी कुपित है। आयुर्वेदशास्त्र में नियम यह है कि उसमें रोगों की नहीं, रोगी की चिकित्सा की जाती है। इसका अर्थ यह है कि रोग की चिकित्सा करने से पहले रोगी की प्रकृति का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। रामचरितमानस में भी आध्यात्मिक दृष्टि से व्यक्ति की जो चिकित्सा की गयी है, उसमें इसी पध्दति का पालन किया गया है। वैद्य पहले देखते हैं कि व्यक्ति की प्रकृति कौन सी है - वात की है अथवा पित्त की या कफ की, और उस पर ध्यान रखकर वे दवा देते हैं। ठीक इसी प्रकार मानवीय प्रकृति में भी विभिन्न प्रकार के दोष हैं, पर विभिन्न दोषों के होते हुए भी प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में किसी न किसी दोष की मुख्यता होती है। कई व्यक्तियों को क्रोध बहुत आता है, बहुतों के जीवन में कामवासना की प्रधानता दिखाई देती है, फिर बहुतों के जीवन में लोभ अत्यंत उग्र मात्रा में रहता है। इस प्रकार मानस की दृष्टि से व्यक्ति का विभाजन मूलतः तीन प्रकार से किया गया है। इन तीन  प्रकार के व्यक्तियों में प्रकृति के विकृत होने पर अलग-अलग मानसिक रोगों का जन्म होता है। इसलिए यदि हम व्यक्ति की प्रकृति को पहले समझ लें, तो चिकित्सा सरल हो सकती है।

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

प्राचीन और आधुनिक दोनों चिकित्सा - विज्ञानों में निदान को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। निदान में रोग का पकड़ में आ जाना कल्याण का प्रथम सोपान है। यह बात मानस-रोगों पर भी लागू होती है। मानस-रोग का वर्णन सुनकर बहुधा जो श्रोता मुझसे मिलने के लिए आते हैं, वे बड़े घबराये से रहते हैं। वे मुझसे आग्रह करते हैं कि आप केवल रोग की वर्णन ही न करें, बल्कि उसकी दवा भी बताते चलें, पर मैं जिस पध्दति से इस प्रसंग में रोगों का वर्णन किया गया है, उसी के अनुरूप आपके सामने बात रख रहा हूँ। हम लोग पहले रोग का निदान ठीक कर लें, सही-सही अर्थों में यह समझ लें कि हमारे जीवन में कौन सी समस्या है तथा यह जान लें कि मन में जो रोग विद्यमान हैं, वे कैसे उदित होते हैं एवं उनकी प्रक्रिया कैसी है ?