Wednesday, 1 July 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..................

वैद्य नाड़ी के माध्यम से देखता है कि व्यक्ति के शरीर में पित्त, कफ अथवा वात में से कौन सी नाड़ी कुपित है। आयुर्वेदशास्त्र में नियम यह है कि उसमें रोगों की नहीं, रोगी की चिकित्सा की जाती है। इसका अर्थ यह है कि रोग की चिकित्सा करने से पहले रोगी की प्रकृति का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। रामचरितमानस में भी आध्यात्मिक दृष्टि से व्यक्ति की जो चिकित्सा की गयी है, उसमें इसी पध्दति का पालन किया गया है। वैद्य पहले देखते हैं कि व्यक्ति की प्रकृति कौन सी है - वात की है अथवा पित्त की या कफ की, और उस पर ध्यान रखकर वे दवा देते हैं। ठीक इसी प्रकार मानवीय प्रकृति में भी विभिन्न प्रकार के दोष हैं, पर विभिन्न दोषों के होते हुए भी प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में किसी न किसी दोष की मुख्यता होती है। कई व्यक्तियों को क्रोध बहुत आता है, बहुतों के जीवन में कामवासना की प्रधानता दिखाई देती है, फिर बहुतों के जीवन में लोभ अत्यंत उग्र मात्रा में रहता है। इस प्रकार मानस की दृष्टि से व्यक्ति का विभाजन मूलतः तीन प्रकार से किया गया है। इन तीन  प्रकार के व्यक्तियों में प्रकृति के विकृत होने पर अलग-अलग मानसिक रोगों का जन्म होता है। इसलिए यदि हम व्यक्ति की प्रकृति को पहले समझ लें, तो चिकित्सा सरल हो सकती है।

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