Saturday, 4 July 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

भगवान राम ने शरणागति के संदर्भ में कहा है कि व्यक्ति कैसा भी रोगी क्यों न हो, वह अवश्य स्वथ्य हो जायेगा, पर रोग को दूर करने के लिए उसे कम से कम चार वस्तुओं को छोड़ना पड़ेगा। मेरी शरण में आने के पहले व्यक्ति को मद, मोह, कपट और छल छोड़ देना चाहिए। वैद्य के पास जाने की प्रक्रिया भी यही है। वैद्य के पास अगर व्यक्ति मद को लेकर जाय और यह सोचे कि मैं वैद्य की तुलना में अधिक योग्य हूँ, तब तो वैद्य की दी हुई औषधि और पथ्य पर उसका विश्वास ही नहीं होगा। इसलिए उसको पहले मद छोड़ना होगा। मान लिया कि मद नहीं है, पर यदि वह वैद्य के वचनों को सुनकर भी अपनी इच्छा के अनुकूल आचरण करने लगे, तो वह मोह की स्थिति होगी। फिर यदि वैद्य के पास पहुँचकर रोगी उसे अपने रोगों के विषय में भ्रांति में रखना चाहे, उससे छल-कपट करना चाहे तो इससे वह स्वयं ठगा जायेगा। इस प्रकार भगवान राम शरणागति के संदर्भ में जो बात कहते हैं, वह वैद्य के संदर्भ में भी सही है।

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