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सती भगवान शंकर की प्रिय पत्नी हैं और भगवान शंकर आध्यात्मिक दृष्टि से वैद्य हैं। जैसे शरीर के रोगों को वैद्य दूर करता है, उसी प्रकार मन के रोगों को गुरु दूर करता है। अन्य गुरु तो कुछ लोगों के ही गुरु होते हैं, पर भगवान शंकर के बारे में कहा गया है कि वे त्रिभुवन-गुरु हैं। इसका अभिप्राय क्या है ? भले ही सती संसार के सर्वश्रेष्ठ गुरु की पत्नी थीं, पर बहुत बड़े गुरु के शिष्य हो जाने से ही रोग दूर नहीं हो जाता। सतीजी के संदर्भ में तो यह बड़े पते की बात है। वे अपने रोग को छिपाना चाहती हैं। भगवान शंकर जैसे वैद्य ने यह बताने की चेष्टा की कि तुम्हें रोग हो गया है। सतीजी का सौभाग्य यह था कि उन्हें ढूँढ़ने कहीं अन्यत्र नहीं जाना था। वैद्य तो साथ ही चल रहे थे। लेकिन संसार में, विशेषकर मानसिक रोगियों में, अपने रोग छिपाने की जो प्रवृत्ति बहुधा देखी जाती है, सतीजी उससे ग्रस्त हैं। वे भगवान शंकर से न तो अपने संदेह का वर्णन करती हैं, न ही अपने मोह तथा भ्रम की।
सती भगवान शंकर की प्रिय पत्नी हैं और भगवान शंकर आध्यात्मिक दृष्टि से वैद्य हैं। जैसे शरीर के रोगों को वैद्य दूर करता है, उसी प्रकार मन के रोगों को गुरु दूर करता है। अन्य गुरु तो कुछ लोगों के ही गुरु होते हैं, पर भगवान शंकर के बारे में कहा गया है कि वे त्रिभुवन-गुरु हैं। इसका अभिप्राय क्या है ? भले ही सती संसार के सर्वश्रेष्ठ गुरु की पत्नी थीं, पर बहुत बड़े गुरु के शिष्य हो जाने से ही रोग दूर नहीं हो जाता। सतीजी के संदर्भ में तो यह बड़े पते की बात है। वे अपने रोग को छिपाना चाहती हैं। भगवान शंकर जैसे वैद्य ने यह बताने की चेष्टा की कि तुम्हें रोग हो गया है। सतीजी का सौभाग्य यह था कि उन्हें ढूँढ़ने कहीं अन्यत्र नहीं जाना था। वैद्य तो साथ ही चल रहे थे। लेकिन संसार में, विशेषकर मानसिक रोगियों में, अपने रोग छिपाने की जो प्रवृत्ति बहुधा देखी जाती है, सतीजी उससे ग्रस्त हैं। वे भगवान शंकर से न तो अपने संदेह का वर्णन करती हैं, न ही अपने मोह तथा भ्रम की।
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