Wednesday, 1 July 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

प्राचीन और आधुनिक दोनों चिकित्सा - विज्ञानों में निदान को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। निदान में रोग का पकड़ में आ जाना कल्याण का प्रथम सोपान है। यह बात मानस-रोगों पर भी लागू होती है। मानस-रोग का वर्णन सुनकर बहुधा जो श्रोता मुझसे मिलने के लिए आते हैं, वे बड़े घबराये से रहते हैं। वे मुझसे आग्रह करते हैं कि आप केवल रोग की वर्णन ही न करें, बल्कि उसकी दवा भी बताते चलें, पर मैं जिस पध्दति से इस प्रसंग में रोगों का वर्णन किया गया है, उसी के अनुरूप आपके सामने बात रख रहा हूँ। हम लोग पहले रोग का निदान ठीक कर लें, सही-सही अर्थों में यह समझ लें कि हमारे जीवन में कौन सी समस्या है तथा यह जान लें कि मन में जो रोग विद्यमान हैं, वे कैसे उदित होते हैं एवं उनकी प्रक्रिया कैसी है ?

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