जब गरूड़ भ्रमरोग से अस्वस्थ हुए थे, तब वैद्य ढूँढ़ने के लिए उन्हें कितनी यात्रा करनी पड़ी थी, इसका वर्णन उत्तरकाण्ड में मिलता है। न जाने कितने वैद्यों के पास वे भटके थे। गरूड़ की समस्या यह थी कि जिस वैद्य के पास वे जाते, वह उन्हें दूसरे वैद्य के पास जाने की सलाह देता था। जब वे प्रथम वैद्य नारद के पास पहुँचे, तो उन्होंने कहा, भई ! इस रोग की चिकित्सा मुझसे अच्छी तो ब्रह्माजी कर सकेंगे और जब वे ब्रह्माजी के पास पहुँचे, तो उन्होंने कहा - सबसे बड़े वैद्य तो शंकरजी हैं। उनके पास जाओ। जब वे तीसरे श्रेष्ठ वैद्य शंकरजी के पास गये, तो उन्होंने कहा, यदि तुम स्वस्थ होना चाहते हो, तो कौए के पास जाओ। अब नारद, ब्रह्मा और शंकरजी तो बड़े वैद्य थे, उनकी तुलना में काकभुशुण्डि अत्यंत सामान्य थे। तात्पर्य यह है कि किसी व्यक्ति को बड़ा गुरु, बहुत बड़े महापुरुष प्राप्त हो जाएँ तो मात्र उससे उसकी समस्या का समाधान नहीं हो जाता। उसके लिए यह जानना आवश्यक होता है कि स्वयं रोगी की स्थिति क्या है और किस प्रकार के वैद्य से उसको उसे लाभ होगा। इसलिए भगवान शंकर ठीक से निदान करके गरूड़जी को उचित वैद्य के पास भेजते हैं और तब कहीं उनका संशय का रोग दूर होता है।
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