देश के एक बहुत बड़े उद्योगपति मेरे पास आए और उन्होंने मुझसे एकान्त में प्रश्न किया कि 'जीवन का लक्ष्य क्या है ?' सन्त-महात्मा साधारणतया यही कहते सुने जाते हैं कि जीवन का लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है । अब उनसे इस उत्तर को सुनने के बाद किसी के पूछने पर हम भी यही बात दुहरा दें, तो यह एक वाक्य की पुनरावृति मात्र ही होगी, वास्तविकता नहीं । मैंने उन्हें उत्तर देने के स्थान पर उनसे ही पूछ दिया कि आपको क्या लगता है ? मैं यदि कोई लक्ष्य बता दूँ और आप उसी बात को दुहराते रहें, तो इससे कुछ अन्तर पड़ने वाला नहीं है । इसके पश्चात उनसे एक लम्बा विचार-विनिमय हुआ । इसीलिए हमारे शास्त्र बड़े मनोवैज्ञानिक रूप में इस तथ्य की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं । शास्त्रों में एक ओर जहाँ यह लिखा हुआ है कि हमारा लक्ष्य ईश्वर को पाना है अथवा आत्मज्ञान प्राप्त करना है, वहीं दूसरी ओर यह भी लिखा हुआ है कि मनुष्य के पुरुषार्थ के चार उद्देश्य हैं - अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष - इन चार फलों की प्राप्ति करना । इस प्रकार जीवन में चार लक्ष्यों की बात सामने आती है । अतः शास्त्र जब जीवन के एक लक्ष्य की बात न कहकर चार लक्ष्यों की बात कहते हैं तो इसका संकेत यही है कि व्यक्ति वहीं से प्रारंभ करे जहाँ पर वह अवस्थित है ।
Monday, 31 July 2017
Sunday, 30 July 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
गोस्वामीजी का प्रारम्भिक जीवन जैसा कि हमें ज्ञात है, अत्यंत दीनता, दरिद्रता और अभावों में बीता । 'मानस' और 'विनयपत्रिका' दोनों में ही दीनता पूर्ण अनेक पक्तियाँ पढ़ने को मिलती हैं । एक दिन हिन्दी की प्रसिद्ध कवियत्री श्रीमती महादेवी वर्मा ने मुझसे कहा कि गोस्वामीजी की यह दीनताभरी वाणी समाज के लिए अकल्याणकारी नहीं है ? क्या इसे पढ़कर व्यक्ति के जीवन में अपने आपको दीन-हीन मानने की वृत्ति नहीं आ जाएगी ? वैसे यह प्रश्न बड़ा युक्तिसंगत लगता है, पर आइए इस पर एक भिन्न दृष्टि से विचार करके देखें ! प्रश्न यह है कि हम विचार कहाँ से प्रारंभ करें ? हम जिस स्थिति में हैं वहाँ से अथवा 'क्या होना चाहिए' वहाँ से ! तो विचार का श्रीगणेश वहाँ से होना चाहिए कि हमारी वर्तमान स्थिति क्या है । पहले हम यह जान लें कि हम कहाँ पर स्थित हैं । यह तो कोई भी कह सकता है कि व्यक्ति का शरीर स्वस्थ और रोगमुक्त होना चाहिए । पर जिससे आप यह बात कहें उसकी क्या स्थिति है । वह रोगग्रस्त है अथवा अपने आपको स्वस्थ अनुभव कर रहा है । यदि उसके शरीर में रोग है, दुर्बलता है तो इस बात को दुहरा देने मात्र से कि व्यक्ति को स्वस्थ होना चाहिए, उसे कोई लाभ होनेवाला नहीं है । इसलिए कोई आदर्श वाक्य दुहराने के स्थान पर सर्वप्रथम जो वर्तमान स्थिति है, उस पर विचार करना आवश्यक है । व्यक्ति की जो समस्या है उस पर ध्यान देने की आवश्यकता है ।
Saturday, 29 July 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
गोस्वामीजी की आत्मकथा (विनय-पत्रिका) में शरीर से जुड़े सम्बन्धों का वर्णन नहीं है, यह तो मन की आत्मकथा है । इसमें मन के विविध और विलक्षण चित्रों के दर्शन आपको होंगे । साधारण दृष्टि से देखने पर हमें ऐसा लग सकता है कि इसमें रामचरितमानस में जैसा रस है, वैसा रस नहीं है, पर गहराई से दृष्टि डालने पर हमें ज्ञात होता है कि ये दोनों तो एक-दूसरे के पूरक ग्रन्थ हैं । 'विनयपत्रिका', प्रभु के नाम लिखी गई एक पाती है जिसे लेकर गोस्वामीजी प्रभु की सभा में गए । इस रचना की पृष्ठभूमि और इसमें जो संकेत सूत्र हैं, वे दोनों ही अत्यंत महत्वपूर्ण हैं ।
Friday, 28 July 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
गोस्वामीजी के जन्म के समय आनन्द-उल्लास के कोई चिन्ह दिखाई नहीं देते पर उस महापुरुष ने अनेकानेक जीवों के जीवन में आनन्द, उत्साह और उल्लास का संचार किया । गोस्वामीजी ने अपनी आत्मकथा जिस रूप में लिखी है उसमें उन्होंने अपने कुल, माता-पिता, जन्म स्थान आदि का वर्णन उस पद्धति से नहीं किया है जैसा कि अन्यत्र देखा जाता है । इसलिए उनके इस ग्रन्थ की तुलना चित्र से न करके 'दर्पण' से करना अधिक उपयुक्त होगा । हम जब किसी व्यक्ति के चित्र के सामने खड़े होते हैं तो उस व्यक्ति की आकृति और उसके मुख के भाव को देखते हैं, पर दर्पण की विशेषता यह है कि उसके सामने खड़े होने पर हम अपने आपको देखते हैं । गोस्वामीजी की आत्मकथा की विशेषता भी यही है कि हम सब उसमें अपने आपको देख सकते हैं । गोस्वामीजी के बारह ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं, पर उनमें से भी जिन दो ग्रन्थों का अधिक प्रचार है, वे हैं - 'रामचरितमानस' और 'विनय पत्रिका' । 'रामचरितमानस' तो रामकथा है और 'विनय पत्रिका' गोस्वामीजी की आत्मकथा है ।
Thursday, 27 July 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
गुरू वसिष्ठ भगवान राम के नामकरण के समय कहते हैं कि भगवान राम का नाम और उनकी कथा दोनों ही परम कल्याणकारी हैं, विश्राम प्रदान करने वाले हैं । ये चेतना प्रदान करने वाले हैं, जगाने वाले हैं और सुलाकर विश्राम प्रदान करने वाले भी हैं । भगवत्कथा 'मोह की निद्रा' से जगाती है और 'भगवद् विश्वास' के रूप में विश्राम प्रदान करती है ।
Wednesday, 26 July 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
गोस्वामीजी ने अपनी भूख के विषय में कहा है कि यदि कोई मुझे चने के चार दाने दे देता था तो ऐसा लगता था कि मानो चार फल मिल गये हों । पर गोस्वामीजी ने समाज से मिलनेवाले अपमान और कष्टों के विष को भगवान शंकर की तरह पी लिया और हम सबको रामकथा का अमृत पिलाकर धन्य बना दिया । मनुष्य के जीवन में अन्तर्बाह्य से जुड़ी अनेकानेक समस्याएँ हैं । बाहर की समस्याएँ भी कष्ट देती हैं, पर मन की समस्याएँ कहीं अधिक दुख देती हैं । गोस्वामीजी ने भी मन से जुड़ी समस्याओं का अनुभव किया और उनका समाधान उन्होंने प्रभु के चरित्र में पाया । वे कहते हैं - मैंने प्रभु की कृपा से ही विश्राम प्राप्त किया । वस्तुतः भगवान राम के नाम की विशेषता यही है ।
Tuesday, 25 July 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
देवता तो अमृत पीकर अमर हुए, पर भगवान शंकर विषपान करके भी अमर हो गए । संसार में भी समुद्र-मंथन चलता ही रहता है । उसमें सुख और दुख दोनों ही आते हैं । पर हमारी वृत्ति यही होती है कि सुख का अमृत मिलने पर हम उसे अकेले ही पीना चाहते हैं और जब दुखरूपी जहर प्राप्त होता है तो उसे बाँटना चाहते हैं । भगवान शंकर का जीवन-दर्शन यह नहीं है । मानो वे कहते हैं कि दुख स्वयं पी लो, सुख सबको बाँट दो ।
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