गोस्वामीजी का प्रारम्भिक जीवन जैसा कि हमें ज्ञात है, अत्यंत दीनता, दरिद्रता और अभावों में बीता । 'मानस' और 'विनयपत्रिका' दोनों में ही दीनता पूर्ण अनेक पक्तियाँ पढ़ने को मिलती हैं । एक दिन हिन्दी की प्रसिद्ध कवियत्री श्रीमती महादेवी वर्मा ने मुझसे कहा कि गोस्वामीजी की यह दीनताभरी वाणी समाज के लिए अकल्याणकारी नहीं है ? क्या इसे पढ़कर व्यक्ति के जीवन में अपने आपको दीन-हीन मानने की वृत्ति नहीं आ जाएगी ? वैसे यह प्रश्न बड़ा युक्तिसंगत लगता है, पर आइए इस पर एक भिन्न दृष्टि से विचार करके देखें ! प्रश्न यह है कि हम विचार कहाँ से प्रारंभ करें ? हम जिस स्थिति में हैं वहाँ से अथवा 'क्या होना चाहिए' वहाँ से ! तो विचार का श्रीगणेश वहाँ से होना चाहिए कि हमारी वर्तमान स्थिति क्या है । पहले हम यह जान लें कि हम कहाँ पर स्थित हैं । यह तो कोई भी कह सकता है कि व्यक्ति का शरीर स्वस्थ और रोगमुक्त होना चाहिए । पर जिससे आप यह बात कहें उसकी क्या स्थिति है । वह रोगग्रस्त है अथवा अपने आपको स्वस्थ अनुभव कर रहा है । यदि उसके शरीर में रोग है, दुर्बलता है तो इस बात को दुहरा देने मात्र से कि व्यक्ति को स्वस्थ होना चाहिए, उसे कोई लाभ होनेवाला नहीं है । इसलिए कोई आदर्श वाक्य दुहराने के स्थान पर सर्वप्रथम जो वर्तमान स्थिति है, उस पर विचार करना आवश्यक है । व्यक्ति की जो समस्या है उस पर ध्यान देने की आवश्यकता है ।
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