देश के एक बहुत बड़े उद्योगपति मेरे पास आए और उन्होंने मुझसे एकान्त में प्रश्न किया कि 'जीवन का लक्ष्य क्या है ?' सन्त-महात्मा साधारणतया यही कहते सुने जाते हैं कि जीवन का लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है । अब उनसे इस उत्तर को सुनने के बाद किसी के पूछने पर हम भी यही बात दुहरा दें, तो यह एक वाक्य की पुनरावृति मात्र ही होगी, वास्तविकता नहीं । मैंने उन्हें उत्तर देने के स्थान पर उनसे ही पूछ दिया कि आपको क्या लगता है ? मैं यदि कोई लक्ष्य बता दूँ और आप उसी बात को दुहराते रहें, तो इससे कुछ अन्तर पड़ने वाला नहीं है । इसके पश्चात उनसे एक लम्बा विचार-विनिमय हुआ । इसीलिए हमारे शास्त्र बड़े मनोवैज्ञानिक रूप में इस तथ्य की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं । शास्त्रों में एक ओर जहाँ यह लिखा हुआ है कि हमारा लक्ष्य ईश्वर को पाना है अथवा आत्मज्ञान प्राप्त करना है, वहीं दूसरी ओर यह भी लिखा हुआ है कि मनुष्य के पुरुषार्थ के चार उद्देश्य हैं - अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष - इन चार फलों की प्राप्ति करना । इस प्रकार जीवन में चार लक्ष्यों की बात सामने आती है । अतः शास्त्र जब जीवन के एक लक्ष्य की बात न कहकर चार लक्ष्यों की बात कहते हैं तो इसका संकेत यही है कि व्यक्ति वहीं से प्रारंभ करे जहाँ पर वह अवस्थित है ।
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