देवता तो अमृत पीकर अमर हुए, पर भगवान शंकर विषपान करके भी अमर हो गए । संसार में भी समुद्र-मंथन चलता ही रहता है । उसमें सुख और दुख दोनों ही आते हैं । पर हमारी वृत्ति यही होती है कि सुख का अमृत मिलने पर हम उसे अकेले ही पीना चाहते हैं और जब दुखरूपी जहर प्राप्त होता है तो उसे बाँटना चाहते हैं । भगवान शंकर का जीवन-दर्शन यह नहीं है । मानो वे कहते हैं कि दुख स्वयं पी लो, सुख सबको बाँट दो ।
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