Saturday, 29 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी की आत्मकथा (विनय-पत्रिका) में शरीर से जुड़े सम्बन्धों का वर्णन नहीं है, यह तो मन की आत्मकथा है । इसमें मन के विविध और विलक्षण चित्रों के दर्शन आपको होंगे । साधारण दृष्टि से देखने पर हमें ऐसा लग सकता है कि इसमें रामचरितमानस में जैसा रस है, वैसा रस नहीं है, पर गहराई से दृष्टि डालने पर हमें ज्ञात होता है कि ये दोनों तो एक-दूसरे के पूरक ग्रन्थ हैं । 'विनयपत्रिका', प्रभु के नाम लिखी गई एक पाती है जिसे लेकर गोस्वामीजी प्रभु की सभा में गए । इस रचना की पृष्ठभूमि और इसमें जो संकेत सूत्र हैं, वे दोनों ही अत्यंत महत्वपूर्ण हैं ।

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