गोस्वामीजी ने अपनी भूख के विषय में कहा है कि यदि कोई मुझे चने के चार दाने दे देता था तो ऐसा लगता था कि मानो चार फल मिल गये हों । पर गोस्वामीजी ने समाज से मिलनेवाले अपमान और कष्टों के विष को भगवान शंकर की तरह पी लिया और हम सबको रामकथा का अमृत पिलाकर धन्य बना दिया । मनुष्य के जीवन में अन्तर्बाह्य से जुड़ी अनेकानेक समस्याएँ हैं । बाहर की समस्याएँ भी कष्ट देती हैं, पर मन की समस्याएँ कहीं अधिक दुख देती हैं । गोस्वामीजी ने भी मन से जुड़ी समस्याओं का अनुभव किया और उनका समाधान उन्होंने प्रभु के चरित्र में पाया । वे कहते हैं - मैंने प्रभु की कृपा से ही विश्राम प्राप्त किया । वस्तुतः भगवान राम के नाम की विशेषता यही है ।
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