नारदजी ने जब विश्वमोहिनी का हाथ देखा, तो शीलनिधी ने उनसे पूछा - महाराज, लड़की के हाथ में क्या लिखा है ? नारद ने मोह के कारण पाठ उल्टा पढ़ा । नारदजी को कहना यह चाहिए था कि ऐसे-ऐसे लक्षण जिस वर में होंगे, उससे इस कन्या का विवाह होगा, जैसा कि उन्होंने पार्वतीजी के प्रसंग में कहा था कि ये जितने लक्षण मैंने बताए वे शंकरजी में हैं, इसलिए इसका विवाह शंकरजी से होगा । पर यहाँ पर उनकी बुध्दि में विपरीतता आ गई । उन्होंने लक्षणों का उल्टा अर्थ ले लिया । 'जो एहि बरइ अमर सोई होई' का अर्थ उन्होंने यह लगाया कि जो इस कन्या से विवाह करेगा, उसमें अमरता आदि के गुण आ जाएँगे । अर्थात पहले तो वह मरणधर्मा ही होगा, पर जब इस कन्या से उसका विवाह हो जाएगा तो अमर हो जाएगा । तात्पर्य यह है कि पहले तो लोग उसको कुछ नहीं मानते रहेंगे, पर विवाह के बाद उसकी पूजा करने लगेंगे ! अभिप्राय यह है कि जो कुछ मिलेगा, वह माया की कृपा से, माया के द्वारा मिलेगा !! देवर्षि नारद के जीवन में माया की यही विकटता दीख पड़ती है ।
Saturday, 7 May 2016
Friday, 6 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
शीलनिधी राजा एक पिता के रूप में नहीं, बल्कि माया के प्रति आकर्षण की वृद्धि करने के लिए नारद से कहते हैं कि महाराज, जरा बताइए इस कन्या में क्या गुण हैं और क्या दोष ! नारदजी ने जब कन्या को देखा तो उनको लगा कि उसमें सब गुण ही गुण हैं । यदि उन्होंने थोड़ा विचार किया होता तो समझ गये होते कि सृष्टि में जहाँ गुण हैं, वहाँ दोष भी अवश्य हैं । जब पार्वतीजी के बारे में उन्होंने बताया था, तब उनके गुणों का वर्णन करके कहा था - तुम्हारी कन्या में जो दो-चार कमियाँ हैं, उन्हें भी सुन लो । लेकिन विश्वमोहिनी के प्रसंग में उन्होंने शीलनिधी राजा से उनकी कन्या के दोष की चर्चा तक नहीं की । इसका अभिप्राय यह है कि उनको माया में गुण ही गुण दिखाई दे रहा है, दोष का दिखना बन्द हो गया है । यह दोष का दिखना बड़े महत्व की बात है । यदि व्यक्ति को दोष दिखाई देता रहे तो स्वाभाविक रूप से वह दोष की ओर से सावधान रहेगा । दोष को देखकर उसके अन्तःकरण में वैराग्य की सृष्टि होगी । पर जब उस व्यक्ति को दोष न दिखाई दे तो उसका परिणाम मोह ही तो होगा ? और वही नारदजी के जीवन में हुआ ।
Thursday, 5 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
भगवान द्वारा माया से निर्मित नगर नारद को बड़ा आकर्षक प्रतीत होता है । और वे उसे देखने के लिए आगे बढ़ जाते हैं । उनके चित्त में विपर्यय उपस्थित होता है । नगर के शीलनिधी नाम के राजा ने आकर उन्हें प्रणाम किया और अपनी कन्या को बुलवाया । कन्या का नाम है विश्वमोहिनी । गोस्वामीजी विनयपत्रिका में सूत्र देते हैं कि माया तो विश्व को सम्मोहित ही करती है और यह मोहजनित मल करोड़ों उपाय से भी नहीं छूटता । ऐसी विश्वमोहिनी को बुलाकर राजा शीलनिधी नारदजी से कहते हैं - हे नाथ, आप अपने ह्रदय में विचारकर इसके सब गुण दोष कहिए । गोस्वामीजी यहाँ पर शब्दों को उलट देते हैं । जिस समय हिमाचल ने अपनी पुत्री का हाथ नारदजी को दिखलाया था तो उनसे कहा था - कन्या में क्या दोष-गुण हैं आप बताइए । पहले उन्होंने दोष का नाम लिया, फिर गुण का । और जब विश्वमोहिनी के पिता ने अपनी कन्या का हाथ दिखाया तो उनसे कहा - इसके गुण और दोष बताइए । इसका अभिप्राय यह है कि जहाँ वात्सल्य है, वहाँ यह चिंता रहती है कि यदि कोई कमी है, दोष है, तो उसका निराकरण होना चाहिए । पर जहाँ पर उद्देश्य ही मोहित करना है, वहाँ पर दोष का उल्लेख केवल कहने भर के लिए हो रहा है, मूलरूप से तो वहाँ गुण की तरफ ही आकृष्ट किया जा रहा है ।
Wednesday, 4 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
दुर्गुणों के बीज समय पाकर कैसे उभड़ आते हैं, इसे प्रत्यक्ष कराने के लिए भगवान ने एक कौतुक किया । जब देवर्षि नारद चलने लगे, तो भगवान अपनी माया को प्रेरित कर एक नगर की रचना करते हैं । भगवान की यह माया बैकुंठ से भी अधिक सुन्दर एक चित्र-विचित्र नगर की सृष्टि करती है । एक ओर लक्ष्मी हैं, जो भक्तिरूपा हैं और दूसरी ओर माया है, जिसके द्वारा दुर्गुणों की सृष्टि होकर व्यक्ति भ्रमित होता है और उसका सारा ज्ञान विस्मृत हो जाता है । नारद के साथ यही हुआ । वे यह भी तो सोच सकते थे कि जब मैं जा रहा था तब रास्ते में यह नगर तो था नहीं, अब आते समय कहाँ से आ गया ? लेकिन इस बात पर उनकी दृष्टि ही नहीं गई । जो नहीं था, यदि वह दिखाई दे तो समझ लेना चाहिए कि यह जादू का ही खेल है । और जादू के खेल को बस देखना ही चाहिए । जादूगर के हाथ में मिठाई देखकर यदि कोई लपककर खा लेने की इच्छा करे तो उसमें खतरा है । तो, नारद यदि देखते कि यह भी कोई जादूगरी का, माया का खेल है, तो बच जाते । लेकिन वे ऐसा नहीं देख पाते ।
Tuesday, 3 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
नारद के मन में यही तो अहंकार आ गया था कि मैंने काम को, क्रोध को, लोभ को, बुराई को जीत लिया है । भगवान नारद के इस अहंकार के आधार को ही नष्ट कर देना चाहते हैं । वे यह बताना चाहते हैं कि जैसे गर्मी के दिनों में घास सूख जाती है, दिखाई नहीं देती, पर इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि घास के बीज नष्ट हो गए, बल्कि यह जानना चाहिए कि घास के बीज तो धरती के नीचे छिपे हुए हैं और वर्षा का जल पाकर वे फिर से उग आते हैं, उसी प्रकार नारद, तुमने जिन दुर्गुणों को जीतने का दावा किया है, उन सबके बीज तुम्हारे अन्तःकरण में विद्यमान हैं, इसलिए समय पाकर वे फिर से उभड़ सकते हैं ।
Monday, 2 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
नारदजी जब बह्मलोक का लम्बा चक्कर लगाते हुए भगवान विष्णु के लोक में गए, तो भगवान ने देखा - नारद के मन में अभिमान के भारी वृक्ष का अंकुर पैदा हो गया है । नारदजी को जिसे काट देना चाहिए था, उसे नहीं काटा है । सत्कर्म के पास अहंकार की घास तो उगेगी ही, पर बुद्धिमान साधक उस अहंकार की घास को काटकर धान्य को आगे बढ़ने की शक्ति देता है । अतः भगवान ने निर्णय किया - मैं उसे तुरन्त उखाड़ फेकूँगा । अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान भाषण के द्वारा नारद को समझाने की चेष्टा नहीं करते । उन्हें लगता है कि शिवजी ने नारद को समझाने की चेष्टा की, तो नारद ने उन्हें ईर्ष्यालु समझ लिया, इसलिए यदि मैं भी उन्हें समझाने की चेष्टा करुँ, तो कहीं मुझमें भी दोष न देखने लगें, यह न सोचने लगें कि मुझे भी उनसे ईर्ष्या हो गयी है । यदि रोगी वैद्य को ही रोगी मानकर उसकी चिकित्सा करने की चेष्टा करे और कहे कि आपको दवा लेने की आवश्यकता है, तब तो रोगी स्वस्थ होने से रहा । अतः नारद के रोग को भगवान सीधे नष्ट करने का निश्चय करते हैं । इसके लिए वे एक नई पद्धति का आश्रय लेते हैं
Sunday, 1 May 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
नारदजी जब काम पर विजय पाने की पूरी गाथा शंकरजी को सुना देते हैं, तब भगवान शंकर विनम्र शब्दों में कहते हैं - मैं आपको बार-बार प्रणाम करता हूँ । पहला वाक्य सुनकर नारद बड़े प्रसन्न हुए कि शंकरजी मेरी स्तुति कर रहे हैं, बार-बार मुझसे विनय कर रहे हैं । पर अगले ही वाक्य में शंकरजी ने अपना क्षोभ प्रकट कर दिया और वह क्षोभ बड़ा कठोर था -
जिमि यह कथा सुनायहु मोही ।
तिमि जनि हरिहि सुनायहु कबहूँ ।।
अब इससे बढ़कर कथा की बुरी आलोचना हो ही नहीं सकती कि कोई कह दे - यह कथा अब कभी मत सुनाइए, वह सुनने योग्य नहीं है । भगवान शंकर की बात से नारदजी को ऐसा लगा कि उन्हें मुझसे ईर्ष्या हो गयी है, वे नहीं चाहते कि मेरा नाम फैले, इसलिए ये मुझे रोक रहे हैं और कपट की शिक्षा दे रहे हैं ; भगवान के सामने सरल बनना चाहिए या कि कपट करना चाहिए ? भक्ति का लक्षण ही है छलरहित बनना - लेकिन इधर शंकरजी कहते हैं - अगर भगवान विष्णु पूछें तो भी प्रसंग छिपा लीजिए । नारद भक्तिभाव भूल गए । बस, यही मानस-रोगों के सन्दर्भ में एक विडंबना है । संक्षिप्त में इसे यों कह लीजिए कि शरीर के रोगों के संबंध में तो व्यक्ति अपने रोग को स्वीकार कर अपने को रोगी मानता है, लेकिन मन के रोगों के संबंध में सिद्धांत बिल्कुल उल्टा है । मन का रोगी अपने को रोगी न मान सामने वाले को ही रोगी मानता है । नारदजी के साथ यही होता है । वे स्वयं रुग्ण हैं, पर रोगी समझ रहे हैं शंकरजी को ।
जिमि यह कथा सुनायहु मोही ।
तिमि जनि हरिहि सुनायहु कबहूँ ।।
अब इससे बढ़कर कथा की बुरी आलोचना हो ही नहीं सकती कि कोई कह दे - यह कथा अब कभी मत सुनाइए, वह सुनने योग्य नहीं है । भगवान शंकर की बात से नारदजी को ऐसा लगा कि उन्हें मुझसे ईर्ष्या हो गयी है, वे नहीं चाहते कि मेरा नाम फैले, इसलिए ये मुझे रोक रहे हैं और कपट की शिक्षा दे रहे हैं ; भगवान के सामने सरल बनना चाहिए या कि कपट करना चाहिए ? भक्ति का लक्षण ही है छलरहित बनना - लेकिन इधर शंकरजी कहते हैं - अगर भगवान विष्णु पूछें तो भी प्रसंग छिपा लीजिए । नारद भक्तिभाव भूल गए । बस, यही मानस-रोगों के सन्दर्भ में एक विडंबना है । संक्षिप्त में इसे यों कह लीजिए कि शरीर के रोगों के संबंध में तो व्यक्ति अपने रोग को स्वीकार कर अपने को रोगी मानता है, लेकिन मन के रोगों के संबंध में सिद्धांत बिल्कुल उल्टा है । मन का रोगी अपने को रोगी न मान सामने वाले को ही रोगी मानता है । नारदजी के साथ यही होता है । वे स्वयं रुग्ण हैं, पर रोगी समझ रहे हैं शंकरजी को ।
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