Thursday, 5 May 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

भगवान द्वारा माया से निर्मित नगर नारद को बड़ा आकर्षक प्रतीत होता है । और वे उसे देखने के लिए आगे बढ़ जाते हैं । उनके चित्त में विपर्यय उपस्थित होता है । नगर के शीलनिधी नाम के राजा ने आकर उन्हें प्रणाम किया और अपनी कन्या को बुलवाया । कन्या का नाम है विश्वमोहिनी । गोस्वामीजी विनयपत्रिका में सूत्र देते हैं कि माया तो विश्व को सम्मोहित ही करती है और यह मोहजनित मल करोड़ों उपाय से भी नहीं छूटता । ऐसी विश्वमोहिनी को बुलाकर राजा शीलनिधी नारदजी से कहते हैं - हे नाथ, आप अपने ह्रदय में विचारकर इसके सब गुण दोष कहिए । गोस्वामीजी यहाँ पर शब्दों को उलट देते हैं । जिस समय हिमाचल ने अपनी पुत्री का हाथ नारदजी को दिखलाया था तो उनसे कहा था - कन्या में क्या दोष-गुण हैं आप बताइए । पहले उन्होंने दोष का नाम लिया, फिर गुण का । और जब विश्वमोहिनी के पिता ने अपनी कन्या का हाथ दिखाया तो उनसे कहा - इसके गुण और दोष बताइए । इसका अभिप्राय यह है कि जहाँ वात्सल्य है, वहाँ यह चिंता रहती है कि यदि कोई कमी है, दोष है, तो उसका निराकरण होना चाहिए । पर जहाँ पर उद्देश्य ही मोहित करना है, वहाँ पर दोष का उल्लेख केवल कहने भर के लिए हो रहा है, मूलरूप से तो वहाँ गुण की तरफ ही आकृष्ट किया जा रहा है ।

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