दुर्गुणों के बीज समय पाकर कैसे उभड़ आते हैं, इसे प्रत्यक्ष कराने के लिए भगवान ने एक कौतुक किया । जब देवर्षि नारद चलने लगे, तो भगवान अपनी माया को प्रेरित कर एक नगर की रचना करते हैं । भगवान की यह माया बैकुंठ से भी अधिक सुन्दर एक चित्र-विचित्र नगर की सृष्टि करती है । एक ओर लक्ष्मी हैं, जो भक्तिरूपा हैं और दूसरी ओर माया है, जिसके द्वारा दुर्गुणों की सृष्टि होकर व्यक्ति भ्रमित होता है और उसका सारा ज्ञान विस्मृत हो जाता है । नारद के साथ यही हुआ । वे यह भी तो सोच सकते थे कि जब मैं जा रहा था तब रास्ते में यह नगर तो था नहीं, अब आते समय कहाँ से आ गया ? लेकिन इस बात पर उनकी दृष्टि ही नहीं गई । जो नहीं था, यदि वह दिखाई दे तो समझ लेना चाहिए कि यह जादू का ही खेल है । और जादू के खेल को बस देखना ही चाहिए । जादूगर के हाथ में मिठाई देखकर यदि कोई लपककर खा लेने की इच्छा करे तो उसमें खतरा है । तो, नारद यदि देखते कि यह भी कोई जादूगरी का, माया का खेल है, तो बच जाते । लेकिन वे ऐसा नहीं देख पाते ।
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