Sunday, 1 May 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

नारदजी जब काम पर विजय पाने की पूरी गाथा शंकरजी को सुना देते हैं, तब भगवान शंकर विनम्र शब्दों में कहते हैं - मैं आपको बार-बार प्रणाम करता हूँ । पहला वाक्य सुनकर नारद बड़े प्रसन्न हुए कि शंकरजी मेरी स्तुति कर रहे हैं, बार-बार मुझसे विनय कर रहे हैं । पर अगले ही वाक्य में शंकरजी ने अपना क्षोभ प्रकट कर दिया और वह क्षोभ बड़ा कठोर था -
   जिमि यह कथा सुनायहु मोही ।
   तिमि जनि हरिहि सुनायहु कबहूँ ।।
अब इससे बढ़कर कथा की बुरी आलोचना हो ही नहीं सकती कि कोई कह दे - यह कथा अब कभी मत सुनाइए, वह सुनने योग्य नहीं है । भगवान शंकर की बात से नारदजी को ऐसा लगा कि उन्हें मुझसे ईर्ष्या हो गयी है, वे नहीं चाहते कि मेरा नाम फैले, इसलिए ये मुझे रोक रहे हैं और कपट की शिक्षा दे रहे हैं ; भगवान के सामने सरल बनना चाहिए या कि कपट करना चाहिए ? भक्ति का लक्षण ही है छलरहित बनना - लेकिन इधर शंकरजी कहते हैं - अगर भगवान विष्णु पूछें तो भी प्रसंग छिपा लीजिए । नारद भक्तिभाव भूल गए । बस, यही मानस-रोगों के सन्दर्भ में एक विडंबना है । संक्षिप्त में इसे यों कह लीजिए कि शरीर के रोगों के संबंध में तो व्यक्ति अपने रोग को स्वीकार कर अपने को रोगी मानता है, लेकिन मन के रोगों के संबंध में सिद्धांत बिल्कुल उल्टा है । मन का रोगी अपने को रोगी न मान सामने वाले को ही रोगी मानता है । नारदजी के साथ यही होता है । वे स्वयं रुग्ण हैं, पर रोगी समझ रहे हैं शंकरजी को ।

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