शीलनिधी राजा एक पिता के रूप में नहीं, बल्कि माया के प्रति आकर्षण की वृद्धि करने के लिए नारद से कहते हैं कि महाराज, जरा बताइए इस कन्या में क्या गुण हैं और क्या दोष ! नारदजी ने जब कन्या को देखा तो उनको लगा कि उसमें सब गुण ही गुण हैं । यदि उन्होंने थोड़ा विचार किया होता तो समझ गये होते कि सृष्टि में जहाँ गुण हैं, वहाँ दोष भी अवश्य हैं । जब पार्वतीजी के बारे में उन्होंने बताया था, तब उनके गुणों का वर्णन करके कहा था - तुम्हारी कन्या में जो दो-चार कमियाँ हैं, उन्हें भी सुन लो । लेकिन विश्वमोहिनी के प्रसंग में उन्होंने शीलनिधी राजा से उनकी कन्या के दोष की चर्चा तक नहीं की । इसका अभिप्राय यह है कि उनको माया में गुण ही गुण दिखाई दे रहा है, दोष का दिखना बन्द हो गया है । यह दोष का दिखना बड़े महत्व की बात है । यदि व्यक्ति को दोष दिखाई देता रहे तो स्वाभाविक रूप से वह दोष की ओर से सावधान रहेगा । दोष को देखकर उसके अन्तःकरण में वैराग्य की सृष्टि होगी । पर जब उस व्यक्ति को दोष न दिखाई दे तो उसका परिणाम मोह ही तो होगा ? और वही नारदजी के जीवन में हुआ ।
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