नारदजी ने जब विश्वमोहिनी का हाथ देखा, तो शीलनिधी ने उनसे पूछा - महाराज, लड़की के हाथ में क्या लिखा है ? नारद ने मोह के कारण पाठ उल्टा पढ़ा । नारदजी को कहना यह चाहिए था कि ऐसे-ऐसे लक्षण जिस वर में होंगे, उससे इस कन्या का विवाह होगा, जैसा कि उन्होंने पार्वतीजी के प्रसंग में कहा था कि ये जितने लक्षण मैंने बताए वे शंकरजी में हैं, इसलिए इसका विवाह शंकरजी से होगा । पर यहाँ पर उनकी बुध्दि में विपरीतता आ गई । उन्होंने लक्षणों का उल्टा अर्थ ले लिया । 'जो एहि बरइ अमर सोई होई' का अर्थ उन्होंने यह लगाया कि जो इस कन्या से विवाह करेगा, उसमें अमरता आदि के गुण आ जाएँगे । अर्थात पहले तो वह मरणधर्मा ही होगा, पर जब इस कन्या से उसका विवाह हो जाएगा तो अमर हो जाएगा । तात्पर्य यह है कि पहले तो लोग उसको कुछ नहीं मानते रहेंगे, पर विवाह के बाद उसकी पूजा करने लगेंगे ! अभिप्राय यह है कि जो कुछ मिलेगा, वह माया की कृपा से, माया के द्वारा मिलेगा !! देवर्षि नारद के जीवन में माया की यही विकटता दीख पड़ती है ।
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