नारदजी जब बह्मलोक का लम्बा चक्कर लगाते हुए भगवान विष्णु के लोक में गए, तो भगवान ने देखा - नारद के मन में अभिमान के भारी वृक्ष का अंकुर पैदा हो गया है । नारदजी को जिसे काट देना चाहिए था, उसे नहीं काटा है । सत्कर्म के पास अहंकार की घास तो उगेगी ही, पर बुद्धिमान साधक उस अहंकार की घास को काटकर धान्य को आगे बढ़ने की शक्ति देता है । अतः भगवान ने निर्णय किया - मैं उसे तुरन्त उखाड़ फेकूँगा । अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान भाषण के द्वारा नारद को समझाने की चेष्टा नहीं करते । उन्हें लगता है कि शिवजी ने नारद को समझाने की चेष्टा की, तो नारद ने उन्हें ईर्ष्यालु समझ लिया, इसलिए यदि मैं भी उन्हें समझाने की चेष्टा करुँ, तो कहीं मुझमें भी दोष न देखने लगें, यह न सोचने लगें कि मुझे भी उनसे ईर्ष्या हो गयी है । यदि रोगी वैद्य को ही रोगी मानकर उसकी चिकित्सा करने की चेष्टा करे और कहे कि आपको दवा लेने की आवश्यकता है, तब तो रोगी स्वस्थ होने से रहा । अतः नारद के रोग को भगवान सीधे नष्ट करने का निश्चय करते हैं । इसके लिए वे एक नई पद्धति का आश्रय लेते हैं
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