नारद के मन में यही तो अहंकार आ गया था कि मैंने काम को, क्रोध को, लोभ को, बुराई को जीत लिया है । भगवान नारद के इस अहंकार के आधार को ही नष्ट कर देना चाहते हैं । वे यह बताना चाहते हैं कि जैसे गर्मी के दिनों में घास सूख जाती है, दिखाई नहीं देती, पर इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि घास के बीज नष्ट हो गए, बल्कि यह जानना चाहिए कि घास के बीज तो धरती के नीचे छिपे हुए हैं और वर्षा का जल पाकर वे फिर से उग आते हैं, उसी प्रकार नारद, तुमने जिन दुर्गुणों को जीतने का दावा किया है, उन सबके बीज तुम्हारे अन्तःकरण में विद्यमान हैं, इसलिए समय पाकर वे फिर से उभड़ सकते हैं ।
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